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पाठ और पुनः पाठ

शिवशंकर मिश्र का 'अन्तिम उच्चारण'- यथार्थ की महाकाव्यात्मक प्रस्तुति करती बहुविमर्शी कहानियों का संवेदनाधर्मी कथा-लोक रामप्रकाश कुशवाहा अपने प्रकाशन के लगभग छः-सात वर्ष बाद शिवशंकर मिश्र के कहानी-संग्रह "अंतिम उच्चारण" की कहानियों को एक बार फिर पढ़ना-पूरी तैयारी और धैर्य के साथ भारतीय समय और समाज के समुद्र में खोज-भावना से की गयी ऐसी लेखकीय गोताखोरियों से गुजरना है, जिसकी उपलब्धियों का तात्कालिक आकलन करना संभव ही न रहा हो। यद्यपि उनकी कहानियाँ  अपने पहले पाठ में भी अखबार में छपी किसी ध्यानाकर्षक घटना की तरह एक साँस में स्वयं को पढ़वा ले जाती हैं।  फिर भी इस टिप्पणी को पढ़ने की तरह बची रह जाती हैं कि घटना की अभी जाँच चल रही है या घटना के वास्तविक कारण का पता लगाया जा रहा है।  वस्तुतः शिवशंकर मिश्र के कथाकार को विरल और अद्वितीय बनाने वाली विशेषता सिर्फ उनके कवित्वमय आत्मीय अभिव्यक्ति-शिल्प में ही नहीं है, बल्कि अपनी कहानियों की कथावस्तु की उस शोधपूर्ण खोज में भी है; जो किसी को भी नहीं दुहराती। न तो स्वयं को और न ही दूसरों को। उनकी  कहानियाँ  कथा-साहित्य में अब तक ...

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