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अंतिम उच्चारण - शिवशंकर मिश्र

अंतिम उच्चारण - द स साल का हो जाने पर भी जब तीसरा लड़का बोलने की बजाय महज इशारे करता और लोगों को देख कर निर्मल हँसी हँसता, तो हरखू मिसिर को निराशा हुई। उन्हें लगा कि यह बड़े लड़के की तरह नहीं कि बम्बई से पैसा कमा कर भेजे, घर आने पर खेती के काम में हाथ बँटाये या गाँव में किसी से झगड़ा-टंटा होने पर बाप की बगल में लाठी लिये डटा रहे। एक रात नींद आने से पहले मिसिर को जंगी पाठक के भाई गूंगे पाठक की याद हो आयी। गूंगे पहलवान ने गूँगेपन और थोड़ा बहरेपन के बावजूद अपने परिवार की उन्नति में जो मदद की, गाँव में जब-तब इसके चर्चे चलते- ...कि कैसे गूंगे के रहते गांवदारी के मसलों में जंगी पाठक से लोग हमेशा दबते थे, ...कि कैसे गूंगे पाठक जब खेत में पहुँचते तो मजदूर मुस्तैदी से काम करने लगते, ...कि कैसे एक बार हाथ भर जमीन के लिए लाठियां चलीं और गूंगे शहीद हो गए... आदि-आदि। मिसिर खिल उठे। उन्हें लगा कि अगर दूध-घी की भर्ती की जाय और रियाज-पानी पर जोर दिया जाय, तो घर में जल्दी ही गूंगे पहलवान जैसा एक लठैत तैयार हो सकता है। फिर मिसिर की आँखों में पंचायतों में उनका रुख भांपते लोगों, दखल की हुई बंजर जमीन, डरे ...

हजारों गद्य-कविताओं का कोलाज रचतीं बहुविमर्शी कहानियाँ...

  शिवशंकर मिश्र का 'अन्तिम उच्चारण' - रामप्रकाश कुशवाहा पुस्तक - अंतिम उच्चारण (कहानी संग्रह), कहानीकार - शिवशंकर मिश्र प्रकाशक - सहयात्रा प्रकाशन, प्रा. लिमिटेड, सी - ५२ / जेड - ३, दिलशाद गार्डन, नयी दिल्ली - ११००९५ समकालीन कथाकारों में शिवशंकर मिश्र को विरल और अद्वितीय बनाने वाली विशेषता सिर्फ उनके कवित्वमय आत्मीय अभिव्यक्ति-शिल्प में ही नहीं है, बल्कि अपनी कहानियों की कथावस्तु की उस शोधपूर्ण खोज में भी है, जो किसी को भी नहीं दुहराती, न तो स्वयं को और न ही दूसरों को। उनकी कहानियां कथा-साहित्य में अब तक छूटे हुए और अब तक उपेक्षित या बहिष्कृत विषयधर्मी कथानक की खोज भी है। संभवतः इसीलिए उनके कहानी-संग्रह "अंतिम उच्चारण" की कहानियों को पढ़ना-पूरी तैयारी और धैर्य के साथ भारतीय समय और समाज के समुद्र में खोज-भावना से की गयी अत्यंत गंभीर किन्तु, अत्यंत रोचक और अविस्मरणीय लेखकीय गोताखोरियों से गुजरना है। उनकी कहानियां अपने पहले पाठ के बाद भी इस टिप्पणी की तरह पढ़ने को बची रह जाती हैं कि घटना के वास्तविक कारण का अभी पता लगाया जा रहा है।   शिवशंकर मिश्र ने अपनी गिनी-चुनी कहानि...

'सतगुर हमसूँ रीझि करि', सन्दर्भ : प्रो0 रामनारायण शुक्ल

वह 30 जुलाई, 1983 का दिन था, जब मैं पी.एच0डी0 में प्रवेश के लिए बी0एच0यू0 गया था। दिन भर क्षमाशंकर जी के साथ शोध.निदेशक की तलाश करता रहा, पर किसी के पास नया शोधार्थी लेने की जगह नहीं थी। दोपहर ढल गयी थी। मेरे मन में हताशा थी और सिर में दर्द भी हो रहा था। मैं इलाहाबाद लौटना चाहता था। 'आइए कॉफी पी जाय।' - क्षमाशंकर जी ने कहा। 'काफी तो महँगी होगी।' 'नहीं भैया, महामना ने छात्रों के लिए सारी व्यवस्था की है। यहाँ खाने.पीने की चीजें काफी कम पैसों में मिल जाती हैं।' 'मैत्री जलपान गृह' और पूरे विश्वविद्यालय का स्थापत्य बहुत आकर्षक लग रहा था। मैं सब कुछ बेगानेपन के साथ देख रहा था। जहाँ तक मुझे याद है, दो रुपयों के कूपन से हम लोगों को एक.एक रसगुल्ला तथा कॉफी मिल गयी थी। शायद रसगुल्ले का या कॉफी का कुछ ऐसा असर हुआ कि मेरा सिरदर्द गायब हो गया, पर मन में हताशा और बेगानगी बनी रही। मैं इलाहाबाद के लिए लौटने की सोच ही रहा था कि एक युवक आया और मुझसे बोला, 'आपको डॉ0 अवधेश प्रधान बुला रहे हैं।' 'मैत्री' के अहाते के एक कोने में, जहाँ कुछ लताओं का झुरमुट एक अल...

मुनुआ की वीरगति

सुबह-सुबह गाँव में बमचख मच गया। मुनुआ चलते ट्रक से कूद पड़ा और नचकऊ पाँडे़ दरवाजे-दरवाजे थाली पीटकर फरियाद कर रहे हैं। ‘अररऽरऽ।‘ जिसने जहाँ सुनी यह खबर, वह वहीं ठिठक कर खड़ा हो गया। अभी सूरज निकला भी नहीं था। लोग गोरुआरी-बछेरुआरी में लगे थे या लोटा लेकर शौच-मैदान के लिए निकल रहे थे। सब चौंक गये। ‘मरा कि बचा मुनुआ?‘ ‘मरा होता, तो नचकऊ किरिया-करम करते कि टाठी पीटकर गौंतरी लगाते?' ‘तो काहे की फरियाद कर रहे हैं नचकऊ?' ‘नचकऊ का कहना है कि गाँव के लड़कों ने धक्का देकर उनके लड़के को चलतिया टरक से गिरा दिया।’ - जगह-जगह बातें कर रहे थे लोग। ‘पर-पंचाइत का जमाना अब कहाँ रहा पाँड़े? आज-कल के लड़के कहो मानें कहो न मानें पंचों की बात। लेकिन ठीक है। तुम पंचाइत बैठा रहे हो, तो आ रहा  हूँ मैं भी।‘ - गाय दुहकर लेरुआ ढीलते हुए बोले कामता पाठक। छोटे बच्चे नचकऊ के पीछे-पीछे चल रहे थे। उनके लिए अपूर्व दृश्य था यह। उनमें से कई अभी सोकर उठे थे। आँखें मलते बच्चे सम्मोहित हुए चले जा रहे थे नचकऊ के पीछे-पीछे। सोनबरसा गाँव के लड़कों का वह झुंड रामलीला देखने जा रहा था, शंकरगढ़ की रामलीला। होने को तो सोनबरसा में भी...

जरइ रे नउआ तोर नउअरिया जरइ पंडिता तोर बेद!

                       ज्या दातर पारम्परिक नारी गीतों में जीवन के जो चित्र मिलते हैं, वे काफी पुराने लगते हैं। खास तौर पर हमारा आधुनिक जीवन, जिसमें अज्ञान और जादू-टोने की बजाय विज्ञान की सुविधाएँ, मध्ययुगीन स्थानीयता और जड़ता की जगह वैश्विकता और पुरुषसत्ता की जगह जनवाद या एक तुलनात्मक जनवाद है, इन गीतों में नहीं मिलता, फिर भी हमारे देश के एक विशाल भाग में शादी-विवाह, तीज-त्यौहार और श्रम के विविध अवसरों पर ये गीत गाये जाते हैं। एक बात और। यह कि कुछ गीतों (झूना और गारी) को छोड़ कर अधिकांश में विषाद की एक गहरी छाया मिलती है। इन गीतों का उनकी पारम्परिक धुनों से अनिवार्य सम्बन्ध है। उन धुनों में दुख की अभिव्यक्ति की गजब की क्षमता है। कभी-कभी किसी गीत के भाव समझ में नहीं आते, लेकिन मन्दगति वाले उदास सामूहिक सुरों से मन बरबस भर जाता है। यहाँ उन कविताओं के नियम लागू नहीं होते, जो कागज पर उतर कर पूरी होती हैं। ये घर-आँगन और खेत-खलिहानों में रचे और गाये जाते हैं। वहीं ये अपनी पूर्ण प्रभा के साथ प्राप्त होते हैं। कागज पर उतर कर ये अधूरे हो...

जश्न : शिव शंकर मिश्र

सुबह के आठ बजते-बजते रोज की तरह खाकी कमीज और चौड़ी मुहरी का उटँग पाजामा पहनकर अनंतराम दफ्तर के लिए रवाना हो गये- साइकिल से। एक बीड़ा पान वे घर से खाकर चले और दूसरा बीड़ा गमछे के छोर में बाँध लिया। अनंतराम का घर गाँव में था और दफ्तर शहर में। गाँव से शहर की दूरी चौबीस किलोमीटर थी। अनंतराम एक बीड़ा पान मुँह में दबाकर यह दूरी साइकिल से डेढ़-दो घंटों में पूरी कर लेते थे। लौटते समय फिर यही सिलसिला। अब की बार गमछे के छोर में बँधा पान का बीड़ा काम आता। यों अनंतराम की नौकरी में कोई ऐसी बाध्यता नहीं थी कि खाकी कमीज पहनी जाय, फिर भी वे हमेशा खाकी कमीज और चौड़ी मुहरी का सफेद पाजामा पहनते थे। दरअसल खाकी कमीज पहनने की वजह यह थी कि अनंतराम थे तो चतुर्थ श्रेणी सरकारी कर्मचारी, पर उनका कोई रुतबा नहीं था, ऐसा उन्हें लगता था। इस वजह से वे खाकी कमीज पहनते और खुद को पुलिस के सिपाही जैसा रुतबेदार महसूस करते थे। दिन के तीन बजे तक सब कुछ सामान्य ढंग से होता रहा-रोज की तरह। तकरीबन साढ़े तीन बजे, जबकि सभी अधिकारी और कर्मचारी काफी व्यस्त हो गये थे, गेट के बाहर फूटते पटाखों, लाउडस्पीकर पर बजते हनुमान-चालीसा और बीच-बीच मे...