स्नान का फल : एक पुनर्मूल्यन
स्नान का फल : एक पुनर्मूल्यन पाण्डेय बेचन शर्मा 'उग्र' के साहित्य की उग्रता से हिन्दी-जगत् सुपरिचित है। यह उग्रता रूढ़ियों, पाखण्डों, सामाजिक विडम्बनाओं और साम्राज्यवादी लूट के प्रति है। यहाँ 'स्नान का फल' नामक कहानी के माध्यम से उग्र-साहित्य की विशिष्टता के रेखांकन का एक प्रयास किया जा रहा है। यह कहानी उनके संग्रह ‘बलात्कार’ (मीरजापुर, 1927) में संकलित है। इससे पूर्व यह 'आज' (9 सितम्बर, 1925) में प्रकाशित हो चुकी थी। इस तरह मोटे तौर पर यह डॉ. राम विलास शर्मा के द्वारा निर्दिष्ट हिन्दी नवजागरण के तीसरे चरण की रचना है। यद्यपि डॉ. शर्मा 1920 तक ही द्विवेदी-युग अथवा हिन्दी नवजागरण का तीसरा चरण मानते हैं, लेकिन इसी क्रम वे आगे लिखते हैं- 'इस युग की सही पहचान तभी हो सकती है, जब हम एक तरफ गदर और भारतेन्दु युग से उसका सम्बन्ध पहचानें और दूसरी तरफ छायावादी युग, विशेष रूप से निराला के साहित्य, से उसके सम्बन्ध पर ध्यान दें।' (महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण', पृ. 15) वस्तुतः साहित्यिक प्रवृतियाँ और जागृतिमूलक आन्दोलनों की आवृत्तियाँ किसी एक दिन या त...