स्मृति-प्रदीप

दिनांक- 03.12.2007
प्रिय ज्योत्स्ना,

स्नेह! प्रदीप पर लिखना काफी मुश्किल काम है मेरे लिए। तुम्हारे लिए तो यह और भी कठिन है, लेकिन इसके अतिरिक्त और किया भी क्या जा सकता है। अभी प्रदीप पर बहुत कुछ लिखना है। फिलहाल यह छोटा-सा संस्मरण ही भेज पा रहा हूँ। प्रकाशन की आर्थिक व्यवस्था पर विस्तार से (और बिना किसी संकोच के) बात-चीत होनी चाहिए।
तुम्हारा-
शिव शंकर मिश्र

स्मृति-प्रदीप

शायद वह सन् 1985 की कोई सुबह थी, जब 'जनसत्ता' में हिंदी साहित्येतिहास पर केंद्रित एक लेख पढ़ते-पढ़‌ते नीचे लेखक का पता देखकर चौंक गया मैं। पता लिखा था- 383 बिरला छात्रावास, बी०एच०यू०। ...यह कमरा तो मेरे मित्र क्षमाशंकर पांडेय का है! मैं उसी छात्रावास के 108 नंबर कमरे में रहता था। लेख में प्रकाशित विचारों से पूरी तरह सहमत न होते हुए भी मैं उससे प्रभावित हुआ। लुंगी-बनियान में ही मैं उस कमरे में पहुँच गया। उन दिनों, जब कि बिरला छात्रावास में सभ्य होने के लिए लँगोट पहन लेना ही काफी हुआ करता था, लुंगी-बनियान लगभग राजपत्रित वेश था। कमरे का दरवाजा खुला था। क्षमाशंकर जी तखत पर बैठे थे ग‌मछा बनियान में। उनके अतिरिक्त एक काफी दुबला, गोल चेहरे वाला युवक चटाई बिछाये फर्श पर बैठा कुछ लिख रहा था। परिचय हुआ। आँखें मिलीं। बाहर की ओर निकली सी आँखें बहुत कुछ कहती लगती थीं। ये प्रदीप तिवारी थे, अलीगढ़ी पाजामा और बनियान में। फिर आश्चर्य...। वे बी०ए० प्रथम वर्ष के छात्र थे और वह लेख हिंदी के किसी बड़े विद्वान् की स्थापना के खंडन के क्रम में लिखा गया था। गहरे आत्मविश्वास से भरी, कर्कश से थोड़ी कम और बिल्कुल स्पष्ट आवाज़ में संक्षिप्त बात-चीत के बाद बाहर की ओर निकली-सी आँखें नीचे झुक गयीं। मैंने ध्यान से देखा। प्रदीप की निहायत पतली और आगे की ओर नुकीली उँगलियाँ कोई कार्टून बना रही थीं। तब मैं लोगों के चेहरे और उँगलियों को देखकर उनके बारे में अपनी राय बनाता था। पतली नुकीली उँगलियाँ मुझे बहुत अच्छी लगती थीं। इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि मेरे पिता की उँगलियाँ भी काफी कुछ इसी तरह थी। मन ही मन मै इस बात को लेकर दुखी रहता था कि मेरी उँगलियाँ पिता की उँगलियों की तरह पतली और नुकीली क्यों नहीं हैं। बाद में सामुद्रिक शास्त्र के एक जानकार ने बताया कि ये कलाकार उँगलियाँ होती हैं। ऐसे जातक दूसरों के लिए बहुत सह‌योगी, लेकिन स्वयं के लिए घातक और अल्पायु होते हैं। पता नहीं यह ‌कहाँ तक सत्य है, लेकिन यह सच है कि मेरे पिता चित्रकार थे और काफी कम उम्र में उन‌का निधन हो गया था। प्रदीप की उँगलियाँ देखकर कभी-कभी चिंता होती। कभी इस विषय पर ठहाकों के साथ हम लोग बातें करते...।

जैसे भी हो, पहली मुलाकात में ही मैं प्रदीप से बहुत प्रभावित हुआ। इतनी कम उम्र, प्रतिभा के विविध आयाम और बिना किसी पार्टी और संगठन से जुड़े निरंतर सृजनात्मकता आदि गुणों को देखकर हम लोगों (कम-से-कम मैं और क्षमाशंकर जी) ने बहुत-सी उम्मीदें पाल ली थीं। फिल्म बनाने और पत्रिका निकालने की योजना जल्दी ही बन गयी। 'आगाह' इस दिशा में प्रदीप का पहला कदम था। कम-से-कम पैसों में इस पत्रिका के कई अंक निकाले प्रदीप ने। पहले यह एक दीवार-पत्रिका थी। 'आगाह' के साइक्लोस्टाइल किये हुए पृष्ठ, जिनकी संख्या दो या चार होती थी, हम लोग रातों रात बी०एच०यू० और शहर की कुछ दीवारों पर चिपका देते थे। यहाँ 'हम लोग' कहना शायद उचित नहीं है, क्योंकि सब कुछ तो प्रदीप करते थे। धूमिल पर केंद्रित 'आगाह' का श्रमसाध्य अंक निकाला प्ररीप ने, जिसमें रत्न शंकर जी (धूमिल के पुत्र) का विशेष सहयोग रहा।

'आगाह' का पाँचवाँ अंक प्रेस में था। उन दिनों मैं वाचिक परंपरा का कथाकार था। हर शाम अस्सी घाट, पप्पू की चाय की दुकान और बिरला छात्रावास की अनौपचारिक बैठकों में मैं तरह-तरह के किस्से सुनाता। तब तक मेरी केवल एक कहानी 'पखावज-वृत्तांत' ('अभिप्राय' सं० राजेंद्र कुमार, इलाहाबाद) छपी थी। पाँचवें अंक में प्रदीप ने कुछ पृष्ठ मेरे लिए खाली रख छोड़े थे और आखिरकार उन्होंने मुझे कमरे में बंद करके कहानी लिखवा डाली- 'बई'। डॉ० राम प्रकाश कुशवाहा ने अपनी किताब 'दूसरा-पाठकनामा' में उस कहानी की समीक्षा की थी। काफी बाद में मैंने उसी कहानी का पुनर्लेखन किया। 'अंतिम उच्चारण उर्फ निर्मल हँसी की राख' शीर्षक से वह 'अभिप्राय (संयुक्तांक 24-25) में छपी।

कहीं लमही में या शायद 'मालवीय भवन' (बी०एच०यू०) में प्रदीप ने मेरा अभिनय देखा था। उन्हीं दिनों से उनकी जिद थी कि मैं फिल्मों में अभिनय करूँ। बिरला छात्रावास के दिनों में ही प्रदीप एक पटकथा लिख चुके थे। नाना पाटेकर और कुछ नये कलाकारों से बात भी हो गयी थी। मुझे खलनायक की भूमिका दी गयी थी। गीत क्षमाशंकर जी को लिखने थे। लेकिन फाइनेंसर की आकस्मिक दुर्घटना हो जाने से फिल्म नहीं बन सकी।

प्रदीप कुछ अर्थों में मेरे विलोम थे। मैं अकर्मण्यता की प्रत्यक्ष मूर्ति और प्रदीप निरंतर सक्रिय। क्षमाशंकर जी भी मेरे विलोम। रात में जल्दी सो जाते और भोर में उठ जाते। मैं देर रात तक जागता रहता। सबेरे का सूरज शायद ही कभी देखा हो मैं ने। प्रदीप देर रात तक मेरे साथ रहते, लेकिन मुझे ऐसी कोई रात याद नहीं है, जिसमें उन्होंने कुछ लिखा न हो। कई बार ऐसा होता कि बातें करते-करते रात के दो बज जाते। प्रदीप थोड़ी देर के लिए मुझसे अलग होते और घंटे भर में कुछ लिख कर या कोई कार्टून बना कर फिर मेरे पास आ जाते। उन‌के हाथ में डाक टिकट लगा लिफाफा होता। डाक टिकट और लिफाफे आम तौर पर प्रदीप के पास पहले से रखे होते। फिर हम लोग चाय पीने लंका जाते और रास्ते में मिलने वाले लेटरबाक्स में प्रदीप लिफाफा डाल देते। तब तक भोर हो रही होती और हम लोगों का सोना शुरू होता, जिसमें क्षमाशंकर जी हमेशा व्यवधान उत्पन्न करने, लेकिन नींबू की चाय के साथ और प्रदीप दोनों लोग क्षमाशंकर जी के सोने में खूब खलल पहुँचाते, लेकिन वे हम दोनों के लिए क्षमा कर देने वाले शंकर ही बने रहते। फिर आगे की पढ़ाई के लिए प्रदीप जे०एन०यू० चले गये। नौकरी के चक्कर में मुझे भी बनारस छोड़ना पड़ा।

...फिर बहुत दिनों बाद, शायद लगभग दस-दस बरस के अंतराल पर, प्रदीप से दो बार भेंट हुई। लगभग दस-दस बरस के अंतराल पर, इलाहाबाद में। में सिविल लाइंस से पत्नी हुई। दोनों मुलाकातें अकस्मात्। दोनों बार इलाहाबाद में। मैं सिविल लाइंस से पत्नी के साथ स्कूटर से निकल रहा था। प्रदीप अचानक दिख गये रिक्शे पर। मुझे पत्नी के साथ देखकर प्रदीप आश्वस्त हुए। बनारस में मेरी लगभग हर अराजकता के वे साक्षी थे। लगभग दो घंटे हम लोग वहीं किसी चाय की दूकान पर बैठे। कुछ सूचनात्मक बातों के अलावा हम लोग एक दूसरे को देखते रहे..... बस। ''कोउ किछु कहइ न कोउ किछु पूछा। प्रेम भरा मन निज गति छूँछा।"

करीब तीन साल पहले फिर मेरी भेंट प्रदीप से हुई। इस बार भी अचानक और इलाहाबाद में ही। मैं कमला नेहरू अस्पताल से अपने कैंसरग्रस्त बहनोई को देख कर लौट रहा था। अचानक प्रदीप का फोन मिला। वे सिविल लाइंस के एक होटल में ठहरे थे। मैं पहुँचा, तो वहाँ एक फिल्म के लिए स्क्रीन टेस्ट चल रहा था।

किस्सा कोताह यह कि प्रदीप ने हीरो के बाप की भूमिका के लिए स्क्रीन टेस्ट में शामिल होने के लिए राजी कर लिया। स्क्रीन टेस्ट हुआ। मेरा चयन हो गया। अगले दिन इफको (फूलपुर) में शूटिंग की अनुमति लेने और कुछ लोकेशन वगैरह देख‌ने का कार्यक्रम था। प्रदीप ने मुझे भी शामिल कर लिया। मेरी एम्बेसडर देखकर प्रदीप बहुत खुश हुए और मेरी गाड़ी में आकर बैठ गये। बनारस में हम लोग आम तौर पर पैदल चलते थे। उन दिनों हम लोग कार से चलने की उम्मीद भी नहीं करते थे। अपनी कार का एहसास करते हुए प्रदीप ने अपना अलग प्रोडक्शन हाउस बनाने की योजना बनायी। इस बार प्रदीप खूब खुश थे और में भी। लोटते हुए प्रदीप ने एक जगह सड़‌क किनारे रसगुल्ले की दूकान देखी और रसगुल्ला खाने का प्रस्ताव रखा। पूरी यूनिट के साथ खाये गये रसगुल्ले। बहरहाल वह फिल्म किन्हीं कारणों से आधी ही बन पायी। उम्र में बड़ा होने के नाते मुझे पक्का विश्वास था कि मैं पहले मरूँगा और प्रदीप मेरी वाचिक कथाओं और आवारगी पर जरूर कुछ लिखेंगे। कभी कभार इस विषय पर हम लोग हँसते-हँसते बातें करते, लेकिन इस दुर्भाग्य का तो कभी अनुमान ही नहीं था...। वह काली सुबह, जब मुंबई से क्रमशः उदय जी और अनिल भाई के फोन से प्रदीप के दिवंगत होने की खबर मिली, मैं स्तब्ध रह गया। मेरा अभिनेता असहाय हो गया..।

यह संयोग ही है कि आज जब प्रदीप की यादें सहेज रहा हूँ, मुझे 'इंडिया टुडे' की साहित्य वार्षिकी (1995-96) का वह अंक मिल गया, जिसमें प्रदीप की कविता 'सब से बुरा सपना' छपी है। आज प्रदीप का न होना उस पूरी मित्र मंडली का सबसे बुरा यथार्थ है, जो प्रदीप से जुड़ी थी। अब भौतिक रूप में प्रदीप नहीं हैं, लेकिन उनकी ज्योत्स्ना है, रहेगी-दोनों अर्थों में।
शिवशंकर मिश्र
हिन्दी विभाग,
जनता महाविद्यालय अजीतमल,
औरैया, उ.प्र 206121

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय पोस्ट