सोमवार, 24 मई 2010

अंतिम उच्चारण- शिवशंकर मिश्र

अंतिम उच्चारण -
                        दस साल का हो जाने पर भी जब तीसरा लड़का बोलने की बजाय महज इशारे करता और लोगों को देख कर निर्मल हँसी हँसता, तो हरखू मिसिर को निराशा हुई। उन्हें लगा कि यह बड़े लड़के की तरह नहीं कि बम्बई से पैसा कमा कर भेजे , घर आने पर खेती के काम में हाथ बँटाये या गाँव में किसी से झगड़ा-टंटा होने पर बाप की बगल में लाठी लिये डटा रहे। एक रात नींद आने से पहले मिसिर को जंगी पाठक के भाई गूंगे पाठक की याद हो आयी। गूंगे पहलवान ने गूँगेपन और थोड़ा बहरेपन के बावजूद अपने परिवार की उन्नति में जो मदद की, गाँव में जब-तब इसके चर्चे चलते- ...कि कैसे गूंगे के रहते गांवदारी के मसलों में जंगी पाठक से लोग हमेशा दबते थे, ...कि कैसे गूंगे पाठक जब खेत में पहुँचते तो मजदूर मुस्तैदी से काम करने लगते, ...कि कैसे एक बार हाथ भर जमीन के लिए लाठियां चलीं और गूंगे शहीद हो गए... आदि-आदि। मिसिर खिल उठे। उन्हें लगा कि अगर दूध-घी की भर्ती की जाय और रियाज-पानी पर जोर दिया जाय, तो घर में जल्दी ही गूंगे पहलवान जैसा एक लठैत तैयार हो सकता है। फिर मिसिर की आँखों में पंचायतों में उनका रुख भांपते लोगों, दखल की हुई बंजर जमीन, डरे हुए मुस्तैदी से हल चलाते मजदूरों और लहलहाती फसलों के कई सपने तैर उठे। शायद इसी उत्साह में अगले दिन जब भैंस की खली और मिट्टी के तेल की खरीद के लिए मिसिर बाजार गए, तो तीसरे लड़के के लिए मारकीन का कुर्ता और चारखाने का जांघिया सिलाते आये। मिसिराइन को निर्देश दिया कि इसे थोड़ा दूध-मट्ठा दे दिया कर। यह पहली बार था, जब कि उसकी ओर ध्यान दिया गया। मिसिर दिन भर खेतों में होते या सरपंच की चौपाल में बैठ कर अपनी हैसियत पुख्ता कर रहे होते। मिसिराइन भोर से देर रात तक घरेलू धंधों में उलझी रहतीं। बड़ा बेटा बम्बई में पैसे कमा रहा होता। मझला प्राइमरी स्कूल में पढ़ने जाता, छुट्टी होने पर दखिनहिया माई के चौरे के पास पीपल की छाँव में गुल्ली-डंडा खेलता या कुछ अनाज झटक कर लाई-गुड और चूरन खरीदने की फिराक में इधर-उधर मंडराता रहता। छोटे को पढाई के काबिल नहीं समझा गया। ...जब बोलता ही नहीं, तो पढेगा क्या? इस तरह पढ़ाई -लिखाई के जंजाल से बचा रहा वह। बच्चों के संग खेलने का बड़ा मन होता। लेकिन उसकी उम्र के लड़के मजाक उड़ाते। छोटे बच्चे उसके संग खेलने में हिचकते, शायद डर जाते थे। वह मुंह लटका कर किसी नुक्कड़ पर खड़ा  हो जाता। आते-जाते कोई दिख जाता तो फिर वही निर्मल हंसी। लोग गंभीर हो जाते, अजनबी आँखों से उसे घूरते और आगे बढ़ जाते। वह उदास हो जाता और चुपके से पड़ोस के मंदिर में घुस जाता। वहां बेडौल चिकने पत्थरों को सूंघने -चाटने और चढ़ाए हुए फूलों को इकट्ठा करने में व्यस्त हो जाता। कम ही कभी ऐसे अवसर आते, जब दोपहरी में मिसिराइन को तेल लगाने के लिए मिसिर कोठरी में बुलाते। खूब आत्मीयतापूर्वक बैठे माता-पिता के चेहरों पर एक विशेष प्रकार का मानवीय भाव दमकता रहता, जो कभी ऐसे ही अवसरों पर दिखता था। वह भी दौड़कर वहां पहुंच जाता। जल्दी ही माता-पिता दृढ़ता से उसे खेलने भेज देते। वह कहाँ जाए..? किसके संग खेले..? कोई तो नहीं खेलता उसके साथ..! मुंह लटकाए वह फिर पड़ोस के मंदिर में पहुंच जाता, जहां तरह-तरह के फूलों, चन्दन और हवन की गंध में एक अलग माहौल मिलता, जो घर के माहौल से बेहतर होता।
                                          छोकरा बाढ़ पर है और आगे चलकर कपड़े छोटे हो सकते हैं, इस भय से मिसिर ने अभी तक उसे नए कपड़े नहीं सिलाए थे। भाइयों के जो पुराने रंगउड़े कपड़े पहनाये गए, उनमें उसकी रूचि नहीं बनी। इस तरह उन कपड़ों के चीथड़े हमेशा मंदिर के पिछवाड़े घूर पर पाए गए। लेकिन आज नए कपड़े पहनकर वह बड़ी देर तक खुद को निहारता रहा और दरवाजे से हो कर गुजरने वालों को दिखाता रहा। नए कपड़ों की चिकनाई से बदन में गुदगुदी होने लगी। उसे लगा कि अब गर्मियों में जब बारातें सजेंगी, झैंयक-झैंयक बाजे बजेंगे और सजे-धजे पुरुष और कुछ एक बच्चे ट्रैक्टर पर सवार होकर कहीं बहुत दूर जायेंगे, मिठाइयाँ खायेंगे, तो उनके संग वह भी जा सकेगा। इस विचार से उसे इतनी खुशी हुई कि कुर्ते का दामन खींचते हुए गाँव की गलियों में दौड़ पड़ा। जो भी मिला, प्रसन्नता से 'हे हे' करके उसका ध्यान खींचा, कुर्ता दिखाया और आगे बढ़ गया। इस तरह गाँव की दो परिक्रमा हो गयी और मन की खुशी नहीं चुकी, तो नहर की ओर दौड़ गया वह। वहां बहते हरे पानी और दूर तक फैले बेतरतीब सिंवान को देखते-देखते कपड़ों की ओर से ध्यान हट गया भूख लग आयी और वह घर की ओर लौट पड़ा। नहर से गाँव की ओर जाने वाली पगडंडी के किनारे-किनारे दरारों वाली काली मिट्टी में पलाश और झरबेरी के तितर-बितर झाड़ खड़े थे। थोड़ी देर तो कुर्ते की जेब में हाथ डाले बिना कुछ देखते हुए चलता रहा वह, लेकिन जल्द ही, लगभग बीस कदम चलने के बाद, झरबेरी के झाड़ में चमकते नन्हे सिंदूरी फलों ने उसका चित्त मोह लिया। दौड़ कर वह झाड़ के निकट उकडूँ बैठ गया। उसे याद आया कि मंदिर में जब एक दिन बहुत-सी औरतों ने जल चढ़ाया था, तो कुछ विचित्र फलों, फूलों और पत्तियों के साथ ये नन्हे सिंदूरी फल भी दिखे थे। ताबड़तोड़ पांच-छः झरबेरियाँ तोड़ते-तोड़ते उंगलियों में कई कांटे चुभ गए। कांटे चुभते, तो वह कान के पास हाथ ले जाकर हिलाता, खून को कुर्ते में पोंछता और झरबेरियाँ तोड़ने-खाने लगता। दोपहर तक झरबेरियाँ खाते-खाते जब तृप्त हो गया और कुर्ता कई जगह से फट गया,तो उसके मन में एक विचार कौंध गया कि जो चीज उसको इतनी भली लगी, वह जरूर सबको भली लगेगी। फिर कुर्ते को उतार कर ढेर सारी झरबेरियों की पोटली बनायी और गाँव की ओर दौड़ पड़ा। वह झरबेरियाँ खाकर खुश होते लोगों की कल्पना कर रहा था। इस कल्पना से मन में कुछ ऐसा उल्लास उमग आया कि बरबस उसके मुंह से 'बईऽऽऽऽ बईऽऽऽऽ ' का उच्चारण फूट पड़ा। 'बेर' कहने की कोशिश में वह 'बईऽऽऽऽ बईऽऽऽऽ' चिल्लाता जा रहा था। पहला उच्चारण था यह उसका ....। दरवाजे-दरवाजे 'बईऽऽऽऽबईऽऽऽऽ' चिल्लाते हुए वह बच्चों को झरबेरियाँ बांटता रहा । बाद में बड़ी उम्र की लड़कियों और बहुओं ने भी झरबेरियाँ लूटने में उत्साह दिखाया। बहुओं के देर से भोजन बनाने या नौजवानों की आवारगी पर झींकते और माला जपते बूढ़ों को भी उसने झरबेरियाँ देनी चाहीं, लेकिन उन्होंने यह समझ कर कि छोकरा चिढ़ा रहा है, झिड़क दिया।किसी-किसी ने तो लाठी भी उठा ली। वह कुछ दूरी पर खड़ा होकर विस्मय से उन्हें देखता और चल देता.... ।
गाँव के मंद उबाऊ जीवन में, जहाँ अतीत की छोटी-छोटी बातों का जिक्र कर के लोग ऊब मिटाते हैं, यह एक महत्वपूर्ण घटना थी। बच्चों के लिए तो पूरा मेला था। उनकी पूरी पलटन उसके पीछे- पीछे गलियों में दौड़ती रही। वे उछल रहे थे और तालियाँ पीट रहे थे। नए सखा को छू रहे थे और बेर मांग रहे थे। बहुत अच्छा लग रहा था उसे। उसका सब कुछ बच्चों को अच्छा लग रहा था आज। भरा-पूरा स्वस्थ शरीर, छोटे-छोटे खड़े बाल,गेहुंआ रंग, शरीर पर भूरे चकत्ते, सदा खुले रहने वाले होठों से बहता लिसलिसा पदार्थ, निर्मल खिलखिलाहट,आँखों में सहज जिज्ञासा और आत्मीयता की चमक, उच्चारण की विफल चेष्टा और सफल संकेत-बच्चों का मन मोह रहा था यह सब। अब तक उसके पिता ने उसका कोई नाम नहीं रखा था। वह घर में सबसे छोटा था, लिहाजा उसको सब छोटका कहते थे। यही उसका नाम था। लेकिन छोटे बच्चों को अपनी उम्र से बड़े सखा को 'छोटका' कहना शायद उचित नहीं लगा। उन्होंने उसके प्रथम उच्चारण को ही उसका नाम मान लिया और उसे 'बई' कहना शुरू कर दिया। बाद में पूरे गाँव ने इस संज्ञा को स्वीकार कर लिया। बई के लिए अपूर्व उल्लास का दिन था वह। घर के अकेलेपन से उबरकर पहली बार वह गाँव के जीवन में शामिल हो गया था- अपने ढंग से।
                 साँझ हो रही थी। आकाश में पक्षियों के काफिले उत्तर की ओर उड़े जा रहे थे।सिंवान से लौटते पशुओं के खुरों से धूल उड़ रही थी गाँव की गलियों में। अँधेरा चुपचाप पसर रहा था। बई की टांगों और आँखों में कच्ची जामुन-सी कसैली थकान महसूस हुई। घर की ओर लौट पड़ा वह- फटे कुर्ते की पोटली में थोड़ी झरबेरियाँ लिए हुए। उसे पूरा विश्वास था कि माई झरबेरियाँ पाकर बहुत खुश होगी। आंगन में ढिबरी जलाती मिसिराइन छोकरे की वजह से होने वाली जगहँसाई से वैसे ही काफी गुस्से में थीं और जब नए कुर्ते की यह गत देखी, तो लाल भभूका हो गयीं।कान उमेठते हुए उसकी पीठ और गाल पर दो-तीन हाथ जड़ दिये उन्होंने और देर तक बड़बड़ाती रहीं, जिसका सारांश यह था कि अभी क्या पिटाई हुई है, बाप के आने पर असली कुटम्मस होगी। डर के मारे वह भीतर कोठरी में दुबक कर बैठ गया, जहां कुछ देर में मिसिराइन ने दीवार के बिलके में जलती हुई ढिबरी रख दी। पहले तो वह बाप के आने का इन्तजार करता रहा -सहमा हुआ, लेकिन जब मिसिर देर तक नहीं आये तो डर-भय भूलकर ढिबरी की सिंदूरी लौ और धुंए को देखने में डूब गया। वह हल्के-हल्के फूंक मारता, ढिबरी की लौ कांपती, फिर स्थिर हो जाती कोठरी को आलोकित करते हुए।मजा मिल रहा था उसे। एक बार फूंक तेज हो गयी, ढिबरी बुझ गयी। अंधेरी कोठरी में ऊबने लगा वह । कुछ देर में प्यास महसूस हुई। माई गुस्से में थी। ...पानी कैसे मांगे ? ...क्या करे? अचानक एक जुगत सूझी.... । अँधेरे में उसने ढिबरी टटोली। मिट्टी का तेल मुंह में जाते ही उसका जी मिचलाने लगा और उल्टियां शुरू हो गयीं।
                                        गोधूली बीत चुकी थी। पीपल के पीछे पूर्णिमा का चाँद झाँकने लगा था, जब मिसिर सरपंच के यहाँ से बैठकबाजी करके लौटे। वे बहुत खुश थे। ख़ुशी की बात यह थी कि हरिजन बस्ती में डाका डालने की जिम्मेदारी सरपंच ने मुख्य रूप से मिसिर को ही सौंपी थी, जिसमें सवर्ण परिवारों के और भी लठैत शामिल थे । मिसिर को यह बिलकुल उचित लगा कि अगर इन सालों को लतियाया नहीं गया,तो फिर कलट्टर के यहाँ बंधुआ मजदूरी के खिलाफ दरखास भेजेंगे। लेखपाल जांच करने आयेगा और बेमतलब घूस देना पड़ेगा।शायद इसी ख़ुशी में हाथ नहीं उठाया मिसिर ने। या इस वजह से भी, कि उनके पहुंचने पर बई का चेहरा घिन से विकृत हो रहा था। बुरी तरह उल्टी  कर रहा था वह। या इस वजह से कि मिसिराइन उसका सिर सहलाते हुए मिसिर को बरज रही थीं कि खुद अपनी करनी से मर रहा है, मार-पिटाई मत करो। पिटाई के लिए हाथ तो नहीं उठाया मिसिर ने, लेकिन गुस्से में बार-बार आँगन से दरवाजे तक चक्कर लगाते रहे। दांत पीसते हुए बड़बड़ाते रहे कि साला पिछले जनम का मुद्दई है, जिसने बदला लेने के लिए औतार लिया है... आदि-आदि।
                                         इस तरह बई गाँव का चर्चित छोकरा हो गया। काम-काज से फुर्सत हो कर लोग गांवदारी के गंभीर मसलों पर बातें करते और जब ऊबने लगते तो उसकी नित नयी वारदातों के चर्चे चलाते। गाँव के किसी भी टोले के बच्चों के खेल और बालकलह में उसे सहज प्रवेश मिल गया था। सांझ को जब बुजुर्ग जम्हाइयां लेते हुए बातें करते और घरों के भीतर औरतें खाना बना रही होतीं, तो बच्चे घुटपहला खेलते। वे बई को आँख मूंदने को कहते। वह आँख बंद कर लेता। बच्चे गीत गाते -
' सिल फूटे सिलौटी फूटे
देखन वाले की आंखी फूटे... ।'
                                        फिर बच्चे खंडहरों में छिप जाते। बई उन्हें खोजने और छू लेने के लिए इधर-उधर छापे मारता। अब वह रोज नए-नए शब्द बोलने की विफल कोशिश करता। कभी बच्चे बई के नेतृत्व में आकाश में उड़ते पंछी जैसे जहाजों को देखते। फेरी वालों की अजीब बेरस आवाजों या आइसक्रीम वालों के भोंपू सुन कर वे गाँव की सरहद तक उनका पीछा करते। कभी घर में कलह करके दरवाजे पर बैठे गंभीर, चिंतित लोगों को वे कौतूहल से घूरते और तालियाँ बजाते हुए भाग जाते ।                                                                                                                                                   
एक    दिन पासियों  के टोले में बारात आयी।
दिन ढलते-ढलते बीन और ढोलक के संगीत के साथ-साथ आग में भुनते सुअर की चिघ्घाड़ पूरे गाँव में सुनाई  पड़ने लगी। सवर्ण घरों के बच्चों को उनके माता-पिता ने वहां जाने की अनुमति नहीं दी। बच्चे रोते रहे। लुकते-छिपते कुछ बच्चे बई के साथ वहां जा पहुंचे। सुअर के पैर बंधे थे। गुदामार्ग में जलती हुई सलाख डाल कर आग की लपटों में पकाया जा रहा था उसे।बच्चे बुरी तरह डर कर भाग गये। कुछ देर में सुअर शांत हो गया...। बीन बज रही थी। ढोलक पर थाप पड़ रही थी। पता नहीं क्या जादू था उस संगीत में कि बच्चे डर-भय भूल कर फिर आ गये। बारातियों को पहले मिर्चवांग [ गुड़ और काली मिर्च का शरबत ] पिलाया गया, फिर महुए की शराब। थोड़ी देर में मशालें जलीं और चमन्नचवा शुरू हो गया - बिना मंच के। नकली घोड़े पर सवार एक आदमी मिर्जा बन कर आ गया - हाथ में चाबुक लिए। वह अपने पैरों पर चलता था, लेकिन बच्चों को लगता, घोड़ा नाच रहा है। पीछे-पीछे सुमांगी नाचता- कागज की लम्बी टोपी लगाये हुए। पखावज और सतावर बजते। बीच-बीच में अचानक मिर्जा चाबुक फटकारता, बाजे बंद हो जाते और सुमांगी तरह-तरह के चुहल करता। इसी बीच मिर्जा ने एक बार चाबुक फटकारा, बाजे बंद हो गए। मिर्जा कड़क कर बोला-
'सुमांगी!'   
'जी सरकार !'
'एक गधा ले आओ! '
' हजूर अब गधे नहीं मिलते! '
' क्यों ?'
'अब सारे गधे नेता हो गए सरकार!'
लोग हँसते-हँसते लोट-पोट हो रहे थे।
बच्चों के लिए तो यह बिलकुल नया तमाशा था। देर रात तक वे आँखें फाड़े वहीँ डटे रहे। इस बीच सभी बच्चों के बाप,चाचा या बड़े भाई आये। वे बच्चों को डांटते-पीटते घर ले गए। बई के लिए कोई नहीं आया। हरखू कहीं गाँव से बाहर गये थे। मिसिराइन पासियों के टोले में जा नहीं सकती थीं। आधी रात को खाने- पीने के लिए पंगत बैठी तो बई भी एक किनारे बैठ गया। बारात और घरात के लोग नशे में चूर थे। वे भावुक हो रहे थे। कोई हँस रहा था। कोई रो रहा था। पहले तो बाँभन के लड़के को खाना खिलाने में संकोच किया उन्होंने, लेकिन बई के हाथ पसार देने पर द्रवित हो उठे। दो-एक निवाले गले के नीचे उतरते ही उसे उबकाइयां आने लगीं। फिर तो भीतर का सारा माल बाहर-मूल ब्याज समेत। बारातियों का सारा मजा किरकिरा हो गया। डांटकर भगा दिया उन्होंने उसे। वह अँधेरी गलियों में भागा जा रहा था, लड़खड़ाते हुए। गलियों में सोये कुत्ते जाग गए और भौंकने लगे। कुछ देर भौंकते रहे। फिर अपना दायित्व निभा कर सो गए। दूसरे दिन पूरे गाँव में यह खबर बिजली की तरह फैल गयी। अक्सर लोग यह चर्चा करते पाए गए कि बइअवा साला तो पगलेट है ही, लेकिन हरखू मिसिर को क्या कहा जाय? उन्हें निगरानी नहीं करनी चाहिए? साला पासियों के यहाँ भच्छाभच्छ खा आया। बड़े कर्मकांडी बनते हैं। आखिर जिस बर्तन में बइअवा खायेगा, उसी में तो खायेंगे। भला बोलो अब हरखू के घर खाने पीने लायक है? इस तरह खासा बात का बतंगड़ बन गया। बात मिसिर के कान तक पहुँच गयी। उन्हें गांवदारी, न्योता-ब्याह और जजमानी का भी संकट दिखाई पड़ा। उन्होंने जमकर बई की धुनाई की और थाली पीटते हुए पूरे गाँव में ऐलान किया कि पंचों, अब हमें इस कुजात से कुछ लेना-देना नहीं और न आज से इसे हम अपने बर्तन में खिलाएंगे। घर लौटकर उन्होंने मिसिराइन को ख़बरदार किया कि आज से यह पम्पूसेट पर रहेगा। रेंड़ के पत्ते पर खाना परोस देना। अंजुरी से पानी पिला देना। ध्यान देना कि घर में घुसने न पाए और इसे छूना मत। ...बहुत कोशिश के बाद भी यह माजरा बई की समझ में नहीं आया। घर में घुसना चाहता, तो पिता लाठी लेकर दौड़ा लेते। अब भी वह गाँव में घूमता। बच्चों के संग खेलना चाहता, बच्चे भी उसके साथ खेलना चाहते, लेकिन ज्यों ही सवर्ण टोले का कोई बड़ा-बुजुर्ग उसे देख लेता, डांटकर भगा देता और सारी घृणा धरती पर थूककर पवित्र हो लेता। सबने अपने-अपने बच्चों को उसके साथ खेलने और उसे छूने की मनाही कर दी थी। पम्पिंगसेट पर कोई बच्चा नहीं जाता था। गाँव से बहुत दूर था पम्पिंगसेट बिना बच्चों के संग खेले वह रह नहीं पाता था। अक्सर वहां पिता उपस्थित होते थे। पिता की उपस्थिति आतंकित करती थी। हरखू पूरी तरह निराश और उदासीन हो गए थे उसकी तरफ से।
गाँव से हटकर दक्खिन की ओर हरिजन बस्ती थी।
अब उसका सारा समय वहीं बीतता। कोई बाधा नहीं थी वहां... । बच्चों के संग घुटपहला और गुल्ली-डंडा खेलता। बच्चों को छू लेता और निर्मल हँसी  हँसता। पानी की कोई कमी नहीं थी। भूख लगने पर दिक्कत होती। सांझ होते-होते थके-हारे स्त्री-पुरुष खेतों से मजदूरी करके लौटते-पोटली में दिन भर की मेहनत का मोल बांधे हुए। झोपड़ों के ऊपर धुंआ उठता। अपने-अपने भाग का कुछ खाना वे बई को दे देते। वह चपड़ी मटर की रोटियों को एकत्र करता और खा लेता। जब अन्न से शरीर में कुछ शक्ति का संचार होता, तो हर झोपड़े के सामने जा कर खिलखिलाता। शायद आभार व्यक्त करता इस तरह। कभी-कभी बस्ती के झोपड़ों के ऊपर धुंआ नहीं उठता था। भूख से बिलबिला उठता वह, तो देर रात को दबे पाँव सवर्ण टोले में प्रवेश करता। घर के पिछवाड़े की सांकल धीरे से खटखटाता। हरखू पम्पिंग्सेट की रखवाली के लिए खेत के किनारे बने झोपड़े में होते। माई धीरे से सांकल खोलती। रेंड़ के पत्ते पर भात और नमक रख देती। वह खाने लगता-सड़प-सड़प। माई लोटे से पानी की धार गिराती। वह अंजुरी से पी लेता। तृप्त होने पर माई को देख कर खिलखिलाता। माई डांट देती-
'चुप नासपीटे, करमजले! कोई सुन लेगा तो सांसत हो जाएगी सारे परिवार की।'
 फिर वह भाग जाता हरिजन बस्ती में। भूख के सिवा कोई बाधा नहीं थी उसके लिए वहां।
तीन साल बीत गए इसी तरह। बहुत कुछ सीख-समझ लिया उसने इस बीच। जांघिये का नाड़ा बांधना सीख लिया, जो सबसे मुश्किल कम था उसके लिए। जाड़े की ठिठुरन भरी रातों में आग, पुआल और कपड़ों से आदमी का रिश्ता समझ लिया। गर्मी की तपती दोपहरियों में पानी और छाँव से जिन्दगी का नाता समझ लिया। दाना-पानी और बच्चों के संग खेले बिना नहीं रहा जा सकता, यह भी समझ लिया। अब भी वह कभी-कभी देर रात को दबे पाँव सवर्ण टोले में घुसता। कुत्ते सो रहे होते। वह धीरे से कुंडी खटखटाता। माई किवाड़ खोलती। रेंड़ के पत्ते पर बचा-खुचा खाना परोस देती। लोटे से पानी की धार गिराती। अंजुरी से पानी पी लेता वह पहले की तरह। कभी-कभी माई बड़े या मझले भाई का कोई पुराना कपड़ा दे देती। अब वह उनके चीथड़े नहीं करता था, फिर भी बहुत कुछ ऐसा था, जो नहीं सीख -समझ सका था वह। सवर्ण टोले के लोग उसे छूते क्यों नहीं? बापू उसे घर में घुसने क्यों नहीं देते? माई रेंड़ के पत्ते पर खाना क्यों देती है? थाली में क्यों नहीं? उसे अंजुरी से पानी क्यों पीना पड़ता है? बड़ी कोशिश के बाद भी ये बातें बिल्कुल समझ में नहीं आयी थीं । एक अजीब परिवर्तन हो गया था उसके अन्दर। खिलखिलाती लड़कियाँ बहुत सुन्दर लगतीं, हर चीज से सुन्दर। हंसते-खेलते लड़के-लड़कियाँ किसी झाड़ , झोपड़ी या अरहर के खेत में छिप जाते । उसका बहुत मन होता कि कोई खिलखिलाती लड़की उसके संग खेले...। फिर वह भी छिप जाय कहीं उसे लेकर...। उसकी सूरत और बेवकूफियों को देख कर चंपा खूब हंसती। बई को बहुत अच्छा लगता। चंपा के काले-कलूटे गालों में पकी झरबेरी-जैसी चमक उग आती। वह खिलखिलाती तो सांवले होंठ और उजले दांतों के बीच एक जादू कौंध जाता। अजीब सम्मोहन ! भूख लगने पर रोटी, प्यास लगने पर पानी, पेट भरा होने पर फूल जितने सुन्दर लगते, उससे भी सुन्दर और आकर्षक था वह जादू ! उससे रहा नहीं गया। एक दिन उसने चम्पा के गाल छू लिए 'तड़ -तड़ ' दो झापड़ जड़ दिए चंपा ने उसके गालों पर। यह छुअन अच्छी लगी उसे... । बहुत अच्छी... । लेकिन एक बात समझ में नहीं आयी। चंपा के चहरे पर घृणा का भाव...? वह बोली-
'पहले ऐना में अपनी सूरत तो निहार ले।'
वह तुरंत समझ गया कि जब तक ऐना में अपनी सूरत नहीं देखेगा,
चंपा उसे छूने नहीं देगी। भूख-प्यास से मोहलत मिलती तो आइने की तलाश में जुट जाता। एक दिन बिसाती आया - साइकिल के आगे-पीछे फीते, चोटियाँ, सोने की-सी दिखती अंगूठियाँ, मोती की-सी चमकती मालाएं, रिबन और पता नहीं क्या-क्या लटकाए। लड़कियों, बहुओं का मेला लग गया उसके चारों ओर । बई ने देखा कि उसके पास छोटे-बड़े कई तरह के आइने हैं। वह दौड़ कर बिसाती के पास पहुँच गया। लड़कियाँ हँस पड़ीं उसे देख कर। बई ने महसूस किया कि निश्चय ही उसका यहाँ आना सब को अच्छा लगा। आत्मीयता की चमक से दीप्त आँखों और निर्मल मुस्कान से आभार व्यक्त किया उसने सब के प्रति। फिर इशारों से आइना माँगा बिसाती से। बिसाती ने आइनों के मोल बता दिए -
'छोटा ऐना दो रुपैया। उससे बड़ा तीन रुपैया। सबसे बड़ा पांच रुपैया। कौन-सा चाहिए ?'
                                                                      बई ने बड़े आइने की ओर इशारा किया।
                                           'तो पांच रुपैया निकालो !'
वह सोच में डूब गया... ।  रुपैया...? ...ऐना रुपैया से मिलता है ? ...चंपा के गाल छूने के लिए पहले ऐना में मुंह निहारना होगा। ...ऐना रुपैया देने पर मिलेगा। ...रुपैया कहाँ मिलेगा...? कैसे बनाया जाता है रुपैया? बहुत कठिन काम लगा यह उसे। उसने चकित हो कर बिसाती की ओर देखा। ...कैसा आदमी है यह? ...इतने सारे ऐना हैं इसके पास। ...एक ऐना दे नहीं सकता? ...उसके पास एक भी ऐना होता,तो बारी-बारी से पूरे गाँव को दे देता। हर आदमी ऐना में अपनी सूरत निहार लेता और लड़कियों के गाल छू लेता । बहुत उदास हो गया वह और धीरे-धीरे सिर झुकाए लौट पड़ा...। लड़कियाँ हंसने लगीं। उसने मुड़कर अचरज से उन्हें देखा। इस हँसी का अर्थ उसकी समझ में नहीं आया...।
                                                                                            असाढ़ के दिन थे। खूब पानी बरस चुका था।
 पेड़-वृक्ष सब धुलकर और भी तरो-ताजा  लग रहे थे। कहीं डौल न बैठने से खूब भूख लग आयी थी बई को। वह इधर-उधर मंडरा रहा था-भूख से विकल...। सैयद पांड़े के खेत में ककड़ी की काफी अच्छी उपज हुई थी इस साल। उनका नाम सियादत्त पांड़े था। लोग ऊब मिटने और मजा लेने के लिए सैयद पांड़े कहते थे। बाद में यही नाम लोकप्रिय हो गया। गर्मी में पांड़े ककड़ियां तोड़ कर बाजार ले जाते। पैसे मिलते। बरसात आने पर ककड़ियां कम फलतीं। जो फलतीं, कड़ी और मोटी हो जातीं। उनके पैसे न मिलते। कोई खरीदता नहीं था। पैसे न मिलें, न सही । बच्चे खायेंगे इस इरादे से उन्होंने ककड़ी की फसल नहीं उजाड़ी थी। लगभग दस बिस्वा खेत में ककड़ी की पियराई विरल लताएँ छ्छ्ड़ी हुई थीं। बीच-बीच में कुछ एक बड़ी ककड़ियां चमक रही थीं। बई को यह सब बहुत भाया...। अभी वह नहीं समझ सका था कि हवा, बारिश, धूप-छाँव, सूरज-चाँद और तारों की तरह धरती सब की नहीं होती। वह टुकड़ों में बँटी होती है। टुकड़ों पर अलग-अलग लोगों का मालिकाना होता है, सब का नहीं। खेतों में उगी फसल और पेड़ों में लगे फल सब के नहीं होते। उससे नहीं रहा गया...। खेत में कूदकर ककड़ियां खाने लगा। तृप्त होने पर भी ताजा नहायी लताओं का सौन्दर्य और ककड़ी का स्वाद लुभाता रहा। उस सौन्दर्य और स्वाद को सार्वजनिक करने का बरबस मन हो आया उसका। ककड़ी खा कर खुश होते बच्चों की कल्पना करके वह इतना प्रसन्न हुआ कि 'ककई-ककई' का उच्चारण फूट पड़ा मुंह से। तार-तार हुए कुरते की पोटली में ककड़ियां भरता, 'ककई-ककई' चिल्लाता और बच्चों में बाँट आता। बच्चे खुश होते। वह खिल उठता... । पोटली की ककड़ियां ख़त्म होतीं, तो फिर तोड़ लाता। पहले तो हरिजन बस्ती में ककड़ियां बांटता रहा, फिर उसे लगा कि उस परम स्वाद से कोई वंचित न रह जाय। इस तरह उल्लास के अतिरेक में सारी मूमानियत और मर्यादा भूल कर सवर्ण टोले में भी जा पहुंचा। पुरुष खेतों में थे। कोई जुताई करवा रहा था। कोई धान की रोपाई करा रहा था। बच्चों ने बहुत दिनों के बाद सखा को पाया, वह भी ककड़ियों के साथ। उन सब ने ककड़ियां खायीं। खुश हुए... ।वह खिलखिला रहा था...। होठों और नाक से बहता लिसलिसा पदार्थ ठोढ़ी पर आ रहा था। मानो भीतर का उल्लास छलक रहा हो। घर-घर ककड़ी बाँटते हुए सैयद पांड़े के भी घर जा पहुंचा वह। कुंडी खटखटायी। पंड़ाइन ने दरवाजा खोला। खिलखिलाते हुए ककड़ियों की पोटली पसार दी उसने पंड़ाइन के सामने...। पंड़ाइन को मामला समझते देर नहीं लगी। पूरे गाँव में केवल उन्हीं के खेत में ककड़ी की फसल हुई थी उस साल। वे आगबबूला हो उठीं। पिछले चार साल से उन्हें कुछ मनोरोग थे शायद। बात करते-करते बेवजह झगड़ने लगती थीं। पांड़े के खेतों में वैसी ही उपज होती, जैसे दूसरों  के खेतों में, लेकिन पंड़ाइन इस बात पर कुढ़ती रहतीं कि उनके खेतों में अच्छत भी नहीं निकलता। गुजारा कैसे होगा...? उनके लड़के हृष्ट-पुष्ट थे। लेकिन उन्हें फ़िक्र बनी रहती कि उनके लड़के दिन पर दिन दुबले होते जा रहे हैं। बड़ी बहू आये अभी तीन साल ही हुए थे, लेकिन उन्हें यह भी उलझन रहती कि यह मुंहझौंसी बाँझ उन्हीं के लड़के की किस्मत में थी...। पूरे गाँव के बारे में दुश्मन होने का शक था उन्हें...। लेकिन चूंकि वे घर की सार-सँभार ठीक से करती थीं और चिंता करती थीं, तो अपनी सम्पत्ति, अपने पति और अपनी संतानों की, इसलिए गाँव में मनोरोगी के रूप में स्वीकृत नहीं हुई थीं।
                    यह घटना मथती रही उन्हें। ...छोकरे की ढिठाई तो देखो कि
मेरे ही खेत की ककड़ी तोड़ी और मुझे ही चिढ़ाने  आ गया। ...ऊपर से हँस भी रहा है। आज ककड़ी तोड़ रहा है, कल डकैती भी कर सकता है। ...धान पकेंगे। ...खलिहान गाँव से बाहर ही रहेगा। ...आग भी लगा सकता है खलिहान में। ...बच्चे दिन भर इधर-उधर टहलते रहते हैं। ...गला भी दबा सकता है उनका। ...जरूर इसमें उसके माई-बाप का भी हाथ रहा होगा। नहीं तो उसकी ऐसी मजाल कि मेरी ही ककड़ी तोड़ कर मेरे ही घर आ गया कि लो ककड़ी खा लो और करेजा तर कर लो। आपे से बाहर हो गयीं पंड़ाइन। पूरे शरीर में क्रोध की लहर उठने लगी । दिन ढलने में अभी कुछ देर थी, जब वे उलाहना देने पहुँच गयीं हरखू के दरवाजे। मिसिराइन ने बहुत समझाया की छोकरा पागल है। लेकिन पंड़ाइन की समझ में बात आयी नहीं ।
'पागल है कि बौरहा। हम नहीं जानते। तुम्हें मना नहीं करना चाहिए।
बिना तुम्हारी मर्जी के इतना बड़ा कांड कर डाला उसने ? आंय ?'
' अरे पंड़ाइन ककड़ी ही तोड़ी है, किसी की मूड़ी तो नहीं
मरोड़ दी। बेमतलब की बात हमें नहीं अच्छी लगती। '
'क्या कहा ? बेमतलब की बात है यह ? मूड़ी
मरोरेगा तो टेंटुआ नहीं दबा देंगे हम उसका ?'
दोनों महिलाएं गला फाड़-फाड़ कर चिल्लाने लगीं ।
कोई किसी की सुनने को तैयार ही नहीं था। ताने-तिश्ने बढ़ते गये।
' तेरा भतार मरे। तू रांड़ हो जा।'
'मेरा काहे ? तेरा भतार मरे । तेरा पूत मरे। '
पंड़ाइन क्रोध में काँप रही थीं -
 'तेरा झोंटा उखाड़ लूंगी डाइन !'
वे लिपट गयीं मिसिराइन से। अन्य महिलाएं और बच्चे तटस्थ
 प्रेक्षक के रूप में खड़े थे। पुरुष खेतों में थे। कुछ बूढ़े, जो काम पर नहीं जा सकते थे, लाठी का सहारा लेकर आ गये थे। दोनों महिलाएं गुत्थम-गुत्था...।इसी बीच पंड़ाइन की धोती की गांठ खुल गयी। किफायतशारी के चलते पेटीकोट पहनती नहीं थीं। बेपर्द हो गयीं वे। मामला संगीन हो गया...। अपमानित पंड़ाइन घर चली गयीं। अपने ही बाल नोचने लगीं।वे काँप रही थीं। सिर पटक रही थीं और गला फाड़ कर चिल्ला रही थीं । बच्चे धोती दे रहे थे -
'माई धोती पहन ले। चुप हो जा।'
लेकिन वे चुप न हुईं।
'हटा ले धोती। आज खून पी के रहूंगी इस डाइन का, तभी धोती
पहनूंगी। चोरी, ऊपर से सीनाजोरी ...? मजाल तो देखो रांड़ की !'
सैयद धान की रोपनी करा कर लौट रहे थे।
रास्ते में ही सारा मामला मिर्च-मसाले के साथ सुन लिया था उन्होंने। घर पहुँच कर मेहरारू का यह हाल देखा, तो संयम खो बैठे। फौरन तमंचा निकाला। कारतूस भरा। कुछ कारतूस कमर में खोंस लिए और पहुँच गये हरखू के घर। हरखू धान की रोपनी करा कर लौटे थे। थके हुए लेटे थे चारपाई पर। सैयद ने ललकारा - 'निकाल अपनी मेहरारू को घर से। आज इसे नंगी नचाएंगे पूरे गाँव में। एक तो तेरे लडके ने ककड़ी तोड़ी, ऊपर से तुम्हारी मेहरारू ने नंगी कर दिया मेरी जोरू को सारे गाँव के सामने। निकाल डाइन को। आज मजा चखाऊंगा।'
हरखू ने सैयद के हाथ में तमंचा देखा। वे तुरंत सजुक हो गए।
सिर में फेंटा बांध लिया और लाठी उठा ली। बोले-
'देखो सैयद ! मेरा छोकरा पागल है। ससुरे को हमने घर से भी निकाल दिया है।
फिर ककड़ी तोड़ी तो कोई हीरा-मोती तो तोड़ नहीं लिया? रही मेहरारू कीबात तो मेहरारू
जानें। हमसे बात करनी है तो जबान सम्हाल कर बात करो, नहीं तो जीभ खींच लूंगा हाँ !'
दोनों ओर से वीरोचित बातें होती रहीं।
सारा गाँव इकट्ठा हो गया था। हरखू ने सोचा कि हाथ पर लाठी मारकर तमंचा छीन लें। उन्होंने लाठी तानी, तब तक ''धाँयऽऽऽ...!'' हरखू वीरगति को प्राप्त हुए.... । चहचहाते पक्षी उड़ गये। सिंवान से लौटते पशु इधर-उधर भागने लगे। तमाशबीन भाग गए। तमाशबीनों में बई भी खड़ा था। वह कुछ भी नहीं समझ पाया । बापू की लाश के पास खड़ा हो गया। हरखू का बेजान जिस्म धरती पर पड़ा था। सिर छितरा गया था। खून के फौव्वारे निकल रहे थे। बापू की लाश के पास माई छाती पीट-पीट कर विलाप कर रही थी। बापू की यह दुर्दशा देख कर या माई का विलाप सुनकर या पता नहीं किस कारण सेअचानक बई चीख पड़ा- 'हू...' और गाँव से बाहर भाग गया।
कई दिनों तक गाँव में सन्नाटा रहा। सैयद गाँव छोड़कर भाग गये। पुलिस ने उनके घर कुर्की कर डाली थी। दिन भर कौए मंडराते। सांझ को दक्खिन के पोखरे में बनमुर्गियाँ चहकतीं । रात को सियार बोलते । कुत्ते रोते। लोगों का कहना था कि यह सब भयानक अपशकुन है। कई दिनों तक शौच-मैदान के सिवा लोग घरों से बाहर नहीं निकले। घरों में रात भर दीये  जलाए जाते। सोते बच्चे रातों को अचानक चीख पड़ते। रात भर स्त्रियाँ पतियों से चिपकी रहतीं। कहीं किसी से भेंट होने पर लोग एक-दूसरे का रुख भांपते, फिर सम्हल कर फुसुर-फुसुर बातें करते -
'बाल्हा रे! ऐसा इस्टीडन्ट? '
'महराज सोनबरसा में ऐसा कब्भी नहीं हुआ ।'
'ई बइअवा साला महाकारनी लौंडा है। चाहे जो करा दे।'
'क्या कहा पुलुस ?'
'भागो महराज पुलुस का क्या भरोसा? '
'पता नहीं ससुरे क्या बात-बेबात पूछें ।'
मृतक संस्कार हो चुका था। दसवें दिन
होने वाली शुध्दि और तेरहवें दिन होने वाले भोज सम्बन्धी कर्म-कांड अभी बाकी थे। हरखू का बड़ा लड़का बम्बई से आ गया था। सैयद अदालत में हाजिर हो चुके थे। गाँव का जनजीवन अभी सामान्य नहीं हो पाया था कि एक दिन गाँव वालों ने उसे देखा। उसने शायद किसी को नहीं देखा... । सूरज निकलने में देर थी। उजाला फैल चुका था। आकाश में कौओं के झुण्ड दक्खिन की ओर जा चुके थे। गाँव के नर-नारी, बच्चे-बूढ़े पेट साफ करने और पगडंडियों को गन्दी करने की गरज से गाँव से बाहर निकल रहे थे। प्रथम दृष्टि शास्त्री जी की पड़ी। देश के एक पूर्व प्रधानमन्त्री की तरह ठिगने होने की वजह से लोगों ने उन्हें यह उपाधि दे दी थी। शास्त्री जी ने उपाधि की मर्यादा के अनुसार निरंतर तालव्य 'श' बोलने का अभ्यास कर लिया था। तुरंत उनहोंने सारी सुर्ती थूक दी। नाक पर गमछा रख लिया और बुदबुदाये -
 'राम-राम ! महा अशुभ! पितरघाती!'
नौरंगी बहू के पेट में मरोड़ थी। लेकिन
वह भी पल भर के लिए ठिठक गयी- 'पिच्च'। सारी घृणा थूककर वह आगे बढ़ गयी। लगभग इसी तरह सबने उसे देखा।उसने किसी को नहीं देखा। 'माई' कहने की विफल चेष्टा में 'बाँईऽऽबाँईऽऽ!' चिल्लाता चला जा रहा था वह। खेतों की मेड़ों पर लड़खड़ाता,सम्हलता, फिर वेग से चल देता। जिस समय उसने गाँव में प्रवेश किया, बछड़े रस्सी तोड़ डालने की कोशिश में कुलांचे भर रहे थे। गायों के थनों में दूध की उत्तेजना भर गयी थी। ...लेकिन वह इन सबसे बेखबर था। बस 'बाँईऽऽ बाँईऽऽ' चिल्लाता चला जा रहा था। सुबह की नम हवा, चिड़ियों की चहचह और गाँव की अलसायी शांति को उसकी चीत्कार नुकसान पहुंचा रही थी।
गाँव के बाहर उत्तर की ओर बंदरहिया बारी है। बंदरहिया बारी में
न तो बन्दर हैं,न बारी। शायद कभी बन्दर भी रहे हों और बारी भी। अब तो केवल नीम, बबूल,गूलर और पीपल के कुछ पेड़ बचे हैं। झाड़-झंखाड़ । कम ही कोई उधर जाता है। भागते-भागते वहीँ गिर पड़ा था बई। दिमाग बिल्कुल सन्न ... । एक गहरा अँधेरा दिमाग में भरता जा रहा था। उस अँधेरे में कुछ भी नहीं दिख रहा था। कुछ देखने, करने, सुनने, बोलने की इच्छा भी नहीं महसूस हो रही थी ... ।
आराम... । बहुत आराम मिल रहा था... । तन-मन पूरी तरह ढीला ... । अनंत विश्राम... । वह अचेत हो गया... । कई दिन, कई रात वह इसी तरह पड़ा रहा... । कभी सूरज की किरणें या बारिश की तेज बौछारें जगा देतीं। भूख-प्यास की अवश प्रेरणा से वह इधर-उधर टहलता, लड़खड़ाते हुए। पीपल के फल, निबोली, बबूल की पत्तियां - जो भी मिल जाता, खा लेता। धरती के गड्ढों में जगह-जगह बरसाती पानी भर गया था। पानी में कुंजीबेरा के दूधिया रंग वाले फूल खिल गये थे... । वह पानी पी लेता। कुछ देर कुंजीबेरा के फूलों को निहारता... । फिर सो जाता...। दिन में चील, कौए और गीध मंडराते। रातों में मेढक और झींगुर बोलते। सियार 'हुआ-हुआ' करते। तरह-तरह के जलजीव और वन्यजीव निकलते। वे उसे सूंघते-चाटते। चलती हुई सांस को महसूस करते। उसके जिस्म में कोई हरकत न होती। उसकी निर्भय अहिंसा पर वे चकित होते और अपनी राह चले जाते, बिना कोई नुकसान पहुँचाये। कभी-कभी नींद खुलने पर बड़ी मुश्किल होती उसे। सोनबरसा के पास ही सोहागी पहाड़ था। सोहागी की चोटियों को काटकर कोई कारखाना बनाया जा रहा था। आये दिन डायनामाइट के धमाके होते। धरती काँप उठती... । वह बुरी तरह डर जाता। दिमाग में तरह-तरह के दृश्य तैरने लगते... । कहीं बहुत से लोग गिर गये हैं... । उनके सिर के टुकड़े बिखरे हैं ... । खून के फौव्वारे बह रहे हैं...। डर कर वह भागने लगता है इधर-उधर... । हर जगह धमाकों की गूँज... । हर जगह धरती कांपती... । कहाँ जाए... ? फिर दिमाग सन्न... । गहरा अँधेरा दिमाग में पसरने लगता... । इस अँधेरे में कुछ भी न दिखता... । कुछ भी सुनायी न देता... । वह अचेत हो जाता... ।
             ...इस बीच कुछ सपने देखे उसने। सपनों का वर्णन संभव नहीं है। वर्णन के लिए भाषा के सिवा कोई साधन नहीं है, जबकि सपने भाषा में नहीं देखे थे उसने। या कम से कम इस भाषा में नहीं देखे थे, जिसमे उनका वर्णन किया जा रहा है -
                                                            प्यास.... । बहुत तेज प्यास.... । गला सूख गया है। जीभ तालू से चिपक गयी है। जान चली जायेगी बिना पानी के।....पोखरा पास में है। वह दौड़कर पहुँचना चाहता है वहां...। पूरी ताकत से कदम उठाता है। लेकिन आगे नहीं बढ़ पाता... । हवा का बहुत तेज झोंका ऊपर उड़ा ले जाता है। ...फिर वह गिर जाता है। पोखरा फिर उतनी ही दूरी पर, जितना पहले था... । बार-बार यही सिलसिला... । अंत में उसे लगा कि छलांग लगा कर नहीं पहुंचा जा सकता पानी के पास... । प्यास बुझाने के लिए लेट कर, धरती को पूरी तरह पकड़ कर ही जाना होगा पोखरे तक... । छाती के बल घिसट कर वह पोखरे के किनारे पहुँच जाता है। ...स्थिर शांत जल... । वह अंजुरी डुबोना चाहता है कि अचानक चौंक जाता है। ....पानी में एक चेहरा... । ...अरे यह तो उसका अपना ही चेहरा है। वह हंसता है और पानी में अपनी निर्मल हँसी का प्रतिबिम्ब देख कर मुग्ध हो जाता है। ...बिना पानी पिए जिया नहीं जा सकता। अंजुरी डुबोने से निर्मल हँसी का अपना ही प्रतिबिम्ब टूट सकता है। क्या किया जाय...? ...एक अजीब कशमकश में फंस जाता है वह। प्राण या प्रतिबिम्ब...? ...आखिरकार वह अंजुरी डुबो देता है... । पानी में हलचल हुई। प्रतिबिम्ब टूट गया... । डूबते सूरज की लाली से लाल पानी में होंठ, दांत, आँखें - अलग-अलग हो गए। वे टेढ़े-मेढ़े होकर तैरने लगे... । ...बहुत उदास हो गया वह। थोड़ी ही देर में पोखरे का पानी फिर स्थिर हो गया। उसे फिर अपना प्रतिबिम्ब दिखने लगा। ...अरे यह क्या? पोखरे के किनारे की कीचड़ हिलने लगी...। ...धीरे-धीरे कीचड़ ऊपर उठने लगी। ...नहीं-नहीं... । यह कीचड़ नहीं है...। कौन है यह...? कौन है यह...? कौन...? चम्पा... । वह बहुत खुश हो गया। बहुत खुश... । वह कहना चाहता है कि चम्पा मैंने अपनी सूरत देख ली। आइने में नहीं,पानी में। ...लेकिन मुंह से बोल फूटते ही नहीं... । चम्पा खिलखिला रही है। वह चम्पा के गाल छूना चाहता है। लेकिन जितना हाथ बढ़ाता है, चम्पा की लम्बाई उतनी ही बढ़ती जाती है। सिर उठा कर चम्पा के होठों और दांतों के बीच बहता जादू देखना चाहता है वह। लेकिन दृष्टि चम्पा के मुंह तक नहीं पहुँच पाती। बहुत सिर उठाने के बाद भी वह चम्पा के सीने से ऊपर नहीं देख पाता। अरे यह क्या...?चम्पा के शरीर में तो यह अंग नहीं था... । स्तन ... । खुले हुए... । स्तनों से दूध की धार बहने लगी.... । नहीं यह चम्पा नहीं है! फिर कौन है...? दूध की धार में नहा उठा वह... । अरे यह तो माई है। माई ! माई! वह खिलखिलाना चाहता है। लेकिन बोल नहीं फूटते ! पूरी ताकत लगा कर एक बार चीखता है। मुंह से निकलता है - 'बाँई...'। ...नींद टूट गयी। सपना नहीं टूटा... । या कम- से- कम सपने का प्रभाव ख़त्म नहीं हुआ। सपने को असलियत समझ रहा था वह। बार-बार 'बाँईऽऽ-बाँईऽऽ!' चीख रहा था। सूरज निकलने में अभी देर थी। लेकिन उजास फैल चुकी थी। बंदरहिया बारी के पेड़ों पर बैठे पंछी चहक रहे थे। उसकी चीख से पंछी एकबारगी चुप हो गये। फिर और तेजी से चहकने लगे...। वह इन सबसे बेखबर था। एक उन्माद - सा छा गया था मन में। एक ही सनक - माई से मिलने की, उससे लिपट जाने की। वह गाँव की ओर दौड़ा जा रहा था।
पति की मृत्यु के बाद से मिसिराइन का अजब हाल था। रात भर नींद नहीं आती थी।
 पता नहीं क्या-क्या बिसूरती रहतीं और भोर होते-होते सो जातीं। फिर दिन चढ़ने पर अचकचा कर उठ जातीं। गृहस्थी की सार-संभार भी नहीं कर पाती थीं। रोटी-पानी बड़ी बहू कर देती। मिसिराइन आँगन में सोयी थीं। दरवाजा खुला था। आँगन में जूठे बर्तन इधर-उधर बिखरे थे। बड़ी बहू उन्हें इकट्ठा कर रही थी। बड़ा लड़का शौच-मैदान के लिए चला गया था। मझले ने गाय का दूध दुह लिया था। बछड़े की रस्सी खोल दी थी और धान के खेतों को देखने चला गया था। बछडा बार-बार गाय के थन में मुंह मार रहा था, लेकिन दूध नहीं निकल रहा था...। 'बाँईऽऽ!' 'बाँईऽऽ!' की दहाड़ मारता बई सीधे आँगन में पहुंचा। बड़ी बहू चौंक गयी। नंग-धड़ंग बई को देख कर बरबस उसके मुंह से निकल पडा-
'हाय दैया!'
 बई को कुछ नहीं दिख रहा था। बस माई दिख रही थी।
 अजीब उन्माद...। सोयी हुई माई से लिपट गया वह। अचकचा कर माई ने आँखें खोलीं। सारी दुर्दशा का कारण साक्षात लिपटा था। माई ने झटक दिया। बई चारपाई से नीचे गिर पडा। फिर माई घूंसे बरसाती रही। रोती रही। ...बहुत दिनों के बाद माई की छुअन मिली थी। घूंसे बहुत भले लग रहे थे बई को... । आंसुओं की बूँदें शरीर पर पड़ रही थीं। उसे माँ के दूध में नहाने की अनुभूति हो रही थी... । गुदगुदी हो रही थी। वह खिलखिला रहा था और 'बाँईऽऽ !' 'बाँईऽऽ !' चिल्ला रहा था। माई ने घसीट कर उसे द्वार पर बैठा दिया। लेकिन वह माई को छोड़ नहीं रहा था। लिपट गया था माई से और खिलखिला रहा था। इस बीच गाँव के बड़े-बुजुर्ग हरखू के द्वार पर इकट्ठा हो गये। उन्होंने बई के चाचा रामजियावन को भी साथ में ले लिया था। गाँव की परम्पराओं को सुरक्षित रखने का जिम्मा था उनके सिर पर। काफी गंभीर थे सब लोग। कौतूहलवश कुछ बच्चे भी आ गये। बुजुर्गों ने उन्हें डांटा -'भागो यहाँ से! तुम्हारा क्या काम ?'
बच्चे फिर भी डटे रहे। शास्त्री जी कड़क मिजाज के आदमी थे। धार्मिक कर्मकांड में
 किसी तरह की त्रुटि, गाँव के रीति-रिवाज और जात-पांत की मर्यादाओं का किसी भी तरह का उल्लंघन देख कर आपे से बाहर हो जाते। मनुस्मृति पढ़ते थे। उन्होंने कहा-
 'ऐशे नहीं मानेंगे ये।'
फिर बच्चों की ओर मुखातिब हो कर दांत पीसते हुए कड़क कर बोले -
'भाग जाओ शरऊ नहीं तो हुमक कर चढ़ बैठेंगे। तुम्हारा यहाँ का परोजन है ?'
बच्चे भयभीत हो कर भाग गये...। अन्य लोगों ने शास्त्री जी की बात का समर्थन किया-
'महराज बच्चों की दोस्ती जान का खतरा।' 'बालक-बर्रै एक समाना।' आदि-आदि।
बई को कुछ नहीं दिख रहा था। वह अब भी माई से लिपटा था और खिलखिला रहा था।
 माई उसे झटकने की कोशिश करती तो 'बाँई-बाँई' कहते हुए और कसकर चिपक जाता। माई का अजब हाल था। आंसुओं की धार बंद नहीं हो रही थी। आवाज निकल नहीं रही थी। कभी बई को झटकना चाहती। कभी खुद भी कसकर चिपक जाती उससे... । लोगों के सामने समस्या थी। बई को उसकी माई से अलग कैसे किया जाय ? उसे छुआ नहीं जा सकता था ?धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। रामजियावन ने उपाय खोज निकाला। एक डंडा कसकर मारा बई की पीठ पर। बोले-
 'मार के आगे भूत नाचते हैं सरऊ ! क्या मुंह दिखाएँगे जात-बिरादरी में ?
आँय ? बेटा-बेटियों का बियाह कैसे होगा ? कुलच्छनी ससुर !'
वे बड़ी देर तक बड़बड़ाते रहे।
डंडे की चोट से बई का सपना टूट गया... । अचानक उसे सब कुछ याद आने लगा। गाँव के जिम्मेदार बुजुर्गों के चहरे देखे उसने। उसे लगा कि अभी इन लोगों के हाथों में कोई खिलौने जैसी चीज आ सकती है। धमाका हो सकता है। खून के फौव्वारे फूट सकते हैं। ...बुरी तरह डर गया वह। मुंह से चीख भी नहीं निकल सकी और भाग गया। माई ने दौड़ कर पकड़ लिया उसे। बड़ा बल आ गया था माई के शरीर में। बोली - 'कहाँ जा रहा है ? चल बैठ घर में !'
शास्त्री जी ने फैसला सुनाया-
'देखो हरखू बहू, तुम्हारे लड़के ने शुअर का मांश खाया है।
 मैंने बहुत शे शाश्तर-पुराण बांचे, इश का कोई पराश्चित नहीं है।
 छत्री मांश-मदिरा का शेवन कर शकता है, परंच बाम्हन के लिए
 महापाप है। फिर शुअर का मांश ? राम-राम!'
 इतना कह कर उन्होंने जमीन पर थूक दिया। फिर बोले-
'हाँ तुम्हारा पराश्चित हो शकता है। तुम्हें उशने छुआ है, तुम पंचगब्ब पियो।
दूध में शंखपुहुपी उबाल कर पियो। तभी हम लोग तुम्हारे भोज में खायेंगे।
 रही लड़के की बात तो अपना लड़का शबको पियारा होता है। मुदा इश
कारनी लड़के के मोह में न फंशो । यह अभगुतमूल नछत्तर में पैदा हुआ है।
 बाप को लील लिया, यह तुमने देखा ही। यदि यह घर में रहेगा तो पूरे बंश
का बिनाश हो जाएगा। जो हमारा करतब था, हमने शमझा दिया। बाकी तुम जानो।'
हरखू बहू बोलीं-
'ऐसा न करो पंडीजी ! कुछ तो उपाय खोजो!'
इतना ही कह पायीं वे और रोने लगीं... ।
हरखू का बड़ा लड़का धीरे से बोला-
'आज-कल होटलों में हर जाती के लोग सब कुछ खाते-पीते हैं।'
शास्त्री जी तमतमा उठे-
'होटल-फोटल की बात छोड़ो। शोनबरशा की बात करो। हमारे गाँव की
 बंभनमंडली का आचरण पूरे इलाके में बखाना जाता है। इशी के बलबूते
 हम लोगों को और गाँव वालों शे अधिक दैजा-दहेज़ मिलता है। शमझे ?'
आम तौर पर सरपंच दयालु आदमी थे। दखल की हुई जमीन, बंधुआ मजदूरी और उनके
प्रभुत्व के खिलाफ बोलने वालों को छोड़कर बाकी सब के लिए वे बहुत भले आदमी थे। अपने आदमियों के लिए जायज-नाजायज सब कुछ करने के लिए तैयार रहते। हरखू बहू का रोना देख कर वे पसीज उठे। उन्होंने शास्त्री जी को घुड़का-
'सास्त्री जी हरखू हमारे आदमी थे। हर चीज का परास्चित होता है।
जरा होस-हवास में बाँचो किताब। कोई रास्ता निकल आयेगा। तुम
पंचगब्ब, दूध और संखपुहुपी पिलाने को कहते हो। मैं कहता हूँ नहला
 दो साले को उसी में। तो भी नहीं होगा परास्चित ? क्यों भाई तुम लोग बोलो ?'
प्राइमरी स्कूल के मास्टर रामतवंकल बोले -
'अरे भाई जून - जमाना बदल रहा है और फिर जब सरपंच
 साहब कह रहे हैं तो जरा सोच-समझ कर बोलो सास्त्री जी। '
शास्त्री जी दबे मन से बोले-
'उपाय तो कुछ नहीं है। मुदा शमरथ को नहि दोश गोशांई।
जब शरपंच शाहब कहते हैं तो इशको भी शंखपुहुपी और
 पंचगब्ब पिलाओ। शतनरायन की कथा शुनाओ। अब हम क्या
 कहें ? मुदा छोकरा कारनी है। इश बात को शमझ लो। '
सरपंच ने कहा-
'कुछ कारनी - वारनी नहीं। देखो हरखू बहू, सास्त्री जी जो कह रहे हैं, सो करो
 और इस ससुरे को घर में रखो। अब कोई भच्छाभच्छ न खाने पाए। न कोई
 खुराफात करने पाए। घर से निकले तो हड्डी - पसली एक कर दो साले की।'
बई का प्रायश्चित हुए कई साल बीत गए हैं। झरबेरियों में अब भी फल लगते हैं।
चम्पा के गालों की चमक और मुस्कान का जादू और भी बढ़ गया है। बिसाती अब भी आइने बेचता है। लेकिन अब उसे किसी चीज की जरूरत नहीं। अब वह गाँव में नहीं मंडराता। सारे दिन अपने द्वार पर बैठा रहता है। निर्मल हँसी अब नहीं हँसता। उच्चारण की विफल चेष्टा और सफल संकेत नहीं करता। किसी आदमी को देख कर झट से भाग जाता है और कोठरी में छिप जाता है। ...शरीर में सूजन बढ़ गयी है। लोगों का विचार है कि अब वह सुधर गया है।

[ 'अभिप्राय ', इलाहाबाद, संयुक्तांक - २४ -२५ में प्रकाशित।]

13 टिप्‍पणियां:

  1. वाह बन्धू आपका ब्लाग देखकर दिल बाग बाग हो गया। लेकिन यह क्या आपके साथियों के ब्लोग मे मेरे ब्लोग का कोई जिक्र ही नही। देखिये आपके ब्लोग पर पहली टिप्पणी करने का सौभाग्य भी संयोग से मुझे ही मिला है। बहुत बहुत बधाई। हम आपको यूं ही बुलन्द होते हुए देखना चाहते हैं शिव शंकर जी।

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  2. priya,
    aapki tippani me akunth shubhaashansaa saaph jhalakati hai. " dosti kaa ek paimaanaa ye bhi hai." aapki ghazalen dilkash hain. Binaa aap ke zikr ke meraa koi fasaanaa pooraa hi nhin ho sakataa.

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  3. sundar
    Swagat Hai....
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  4. ब्लॉग के नाम ने आकर्षित किया और कहानी का शीर्षक भी अच्छा लगा, विषय वस्तु और भाव मार्मिक तथा धाराप्रवाह - बधाई

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  5. कहानी लंबी थी मगर एक बार में पढ़ गया - यानि रोचक लेखन है आपका. बधाई हो - बहुत अच्छा लिखते हैं आप. आता रहूँगा. स्वागत है

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  6. कहानी थोड़ी लंबी हो गई है। देर आए दुरुस्त आए। यूं ही लिखते रहें।
    आपके ब्लाग पर आकर अच्छा लगा। चिट्ठाजगत में आपका स्वागत है। हिंदी ब्लागिंग को आप और ऊंचाई तक पहुंचाएं, यही कामना है।
    इंटरनेट के जरिए अतिरिक्त आमदनी की इच्छा हो तो यहां पधारें -
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  7. Aadaraneeya aur aatmeeya saathiyon,
    blog kee duniyaa men nayaa hoon. Aap logon kee tippaniyon ne mujhe bharpoor utsaahit kiyaa. AABHAAR!

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  8. हिंदी ब्लाग लेखन के लिए स्वागत और बधाई
    कृपया अन्य ब्लॉगों को भी पढें और अपनी बहुमूल्य टिप्पणियां देनें का कष्ट करें

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  9. इस चिट्ठे के साथ हिंदी ब्‍लॉग जगत में आपका स्‍वागत है .. नियमित लेखन के लिए शुभकामनाएं !!

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  10. प्रिय निरंकुश जी, इतनी निरंकुशता भी ठीक नहीं होती. आप अच्छे लक्ष्य के लिये संघर्षरत हैं, शुभकामनायें पर अपनी बात अगर आप मेल से भेजा करें तो उसकी ज्यादा सार्थकता होगी. एक अच्छी कहानी पर चर्चा के बीच में आप की भैरवी अच्छी नहीं लग रही है. वह भी दोनों ही जगह आप ने अपनी कील हमारे सर में ठोंक दी है. ऐसा दर्दनाक मंजर मत खड़ा करिये महाराज.

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  11. " बाज़ार के बिस्तर पर स्खलित ज्ञान कभी क्रांति का जनक नहीं हो सकता "

    हिंदी चिट्ठाकारी की सरस और रहस्यमई दुनिया में राज-समाज और जन की आवाज "जनोक्ति.कॉम "आपके इस सुन्दर चिट्ठे का स्वागत करता है . चिट्ठे की सार्थकता को बनाये रखें . अपने राजनैतिक , सामाजिक , आर्थिक , सांस्कृतिक और मीडिया से जुडे आलेख , कविता , कहानियां , व्यंग आदि जनोक्ति पर पोस्ट करने के लिए नीचे दिए गये लिंक पर जाकर रजिस्टर करें . http://www.janokti.com/wp-login.php?action=register,
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  12. लोगों का विचार है कि अब वह सुधर गया है।
    yah vaakya is kahaani ko virechn ke siddhaant se jodata hai.

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  13. itni sundar evam maarmik kathaa padh man bhar aayaa.bahut hi achchhe lekhak hain aap.aapko dheron saadhuwad.meraa bhaai behraa hai.is kahaani ne mujhe aur adhik prabhaawit kiyaa.taareef ke shabd kum pad rahen hain.kripayaa ise atishayokti na samjhen.aapki kitab ka intazaar rahega.---devika,chennai

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