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बाबा की उघन्नी- शिवशंकर मिश्र

                 बारात आयी भी और चली भी गयी। सारा तामझाम हुआ। सारी रस्में पूरी की गयीं।खूब झाँय-झाँय हुआ। खूब झिकझिक हुई। आखिर में बैन करके रोती सियादुलारी भी विदा हो गयी, लेकिन बाबा की चारपाई जहां थी, वहीँ रही।पूरब के दालान में ऐन भंडारघर के सामने। पता नहीं कब से बिछी है यह चारपाई यहाँ... । बाबा के इकलौते पुत्र हीरालाल जी तिवारी कभी-कभी हिसाब करते हैं, तो पाते हैं कि पिछले तीस बरस से बिछी है यह चारपाई यहाँ। इसी पर लेटे रहते हैं बाबा। उठ-बैठ नहीं पाते। शौच आदि के लिए परिवारीजनों पर निर्भर रहते हैं। इन तीस वर्षों में बहुत कुछ बदला। पूरी दुनिया ही बदल गयी। बाबा की अपनी दुनिया थी। अपना परिवार...। अपने खेत... । यह दुनिया भी बदली। दुआर पर बैल कम हो गए। ट्रैक्टर आ गया और यह परिवार ऊपर से अमीर और भीतर से गरीब हो गया। घर में कई बच्चे पैदा हुए और बड़े हो गए। कई बारातें आयीं और गयीं। बाबा की चारपाई अपनी जगह ही रही। यहीं से लेटे-लेटे बाबा सब कुछ देखते-सम्हालते रहे...। कल रात भी वे लेटे-लेटे देखते रहे, जितना देख सकते थे। सुनते रहे, जितना सुन सकते ...