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शनिवार, 11 जुलाई 2026

हजारों गद्य-कविताओं का कोलाज रचतीं बहुविमर्शी कहानियाँ...

 शिवशंकर मिश्र का 'अन्तिम उच्चारण' - रामप्रकाश कुशवाहा


पुस्तक - अंतिम उच्चारण (कहानी संग्रह),
कहानीकार - शिवशंकर मिश्र
प्रकाशक - सहयात्रा प्रकाशन, प्रा. लिमिटेड,
सी - ५२ / जेड - ३, दिलशाद गार्डन, नयी दिल्ली - ११००९५

समकालीन कथाकारों में शिवशंकर मिश्र को विरल और अद्वितीय बनाने वाली विशेषता सिर्फ उनके कवित्वमय आत्मीय अभिव्यक्ति-शिल्प में ही नहीं है, बल्कि अपनी कहानियों की कथावस्तु की उस शोधपूर्ण खोज में भी है, जो किसी को भी नहीं दुहराती, न तो स्वयं को और न ही दूसरों को। उनकी कहानियां कथा-साहित्य में अब तक छूटे हुए और अब तक उपेक्षित या बहिष्कृत विषयधर्मी कथानक की खोज भी है। संभवतः इसीलिए उनके कहानी-संग्रह "अंतिम उच्चारण" की कहानियों को पढ़ना-पूरी तैयारी और धैर्य के साथ भारतीय समय और समाज के समुद्र में खोज-भावना से की गयी अत्यंत गंभीर किन्तु, अत्यंत रोचक और अविस्मरणीय लेखकीय गोताखोरियों से गुजरना है। उनकी कहानियां अपने पहले पाठ के बाद भी इस टिप्पणी की तरह पढ़ने को बची रह जाती हैं कि घटना के वास्तविक कारण का अभी पता लगाया जा रहा है।  

शिवशंकर मिश्र ने अपनी गिनी-चुनी कहानियां जैसे हजारों गद्य-कविताओं से बुनी हैं। गुलेरी की तरह ही उन्होंने भी बहुत कम ही लिखा है; लेकिन उनकी कहानियों की निर्माण सामग्री सीधे जिंदगी से लिए गए अनुभवों के ठोस पत्थरों से निर्मित हैं। शिवमूर्ति की तरह उनकी भी कहानियां अवधी अंचल की लोकभाषा-सर्जना तथा आस्वादधर्मिता का खजाना लुटाती चलती हैं। समकालीन कथावस्तु होते हुए भी उनकी कहानियों की रचनाधर्मिता पर अनुकरणपरक सामूहिकता या तात्कालिकता का असर नहीं है। उनकी कहानियां पढ़कर ऐसा लगता है, जैसे उन्होंने जिंदगी भर का अपना निरीक्षण और चिंतन अपनी कुछ ही कहानियों में निवेशित कर दिया है।  

उनकी प्रायः सभी कहानियां अपने पाठकों को एक विशेष दार्शनिक अंतर्दृष्टि सौंपती चलती हैं। यह अंतर्दृष्टि वे किसी ऐसे पात्र या चरित्र के माध्यम से उभारते हैं, जो या तो कोई बच्चा होता है या तो बचपन को जीने वाला ऐसा मंद-बुद्धि या फिर आदर्शवादी चरित्र का, जिसने विकास के क्रम में उपजीं सभ्यता की उन तमाम चालाकियों को जानने-समझने बूझने और जीने से इनकार कर दिया है, जिसे एक गलत दौर का जीवन-समय सृजित करने वाले तमाम लोग जी रहे हैं। वे बहुत चुपके से उस एक चुने हुए प्रतिनिधि चरित्र के माध्यम से अपनी कहानी को गुजरते समय की पड़ताल और सभ्यता-विमर्श बना देते हैं। इस केंद्रीय प्रतिनिधि पात्र को पहचानकर उसके साथ होते ही कहानी और सभ्यता-विमर्श के सारे भेद खुलने लगते हैं। उनकी कहानियों में मिलने वाले इस पात्र को शिशु-चेतनाधर्मी, निष्पाप, प्रागैतिहासिक, आदिम साम्यवादी या फिर सात्विक चेतना और संवेदनशीलता के वाहक किसी देवदूत का अचेतन रूपक भी कहा जा सकता है। अपनी कहानियों में पाठ के वर्णन के लिए जैसा बाल सुलभ खिलंदड़ा अंदाज शिवशंकर मिश्र बार-बार लगभग सभी कहानियों में अपनाते हैं, वह उनकी कहानियों के वस्तु और शिल्प का संस्मरणात्मक हिस्सा इतनी सहजता और स्वाभाविकता के साथ लगता है कि उनके प्रतीकात्मक और बौद्धिक आयामों, उनकी गहराई और विस्तार की ओर सहसा हमारा ध्यान ही नहीं जाता।

उनकी पहली ही कहानी 'अंतिम उच्चारण' को ही लें तो प्रथमदृष्टया मंद-बुद्धि का एक समस्या-बालक लगने वाला तथा अपने पिता की असामयिक मृत्यु का कारण भी बनने वाला बाल चरित्र 'बई' की जात-कुजात की वर्जनाओं को न समझ पाने वाली नासमझ, किन्तु मानवीय एवं समदर्शी सामाजिकता अपने प्रतीकात्मक महत्त्व के साथ-साथ जाति-विमर्श की नयी संभावनाओं का भी द्वार खोलती है। एक अबोध बच्चे की मानसिक यात्रा से वयस्कों के जीवन-बोध को प्रश्नांकित करने वाली यह कहानी कब एक बच्चे की रोचक कहानी के माध्यम से भी सामने आता है मूर्खताओं की शृंखला प्रस्तुत करते-करते बड़ों के सभ्यता-विमर्श की कहानी बन जाती है, पता ही नहीं चलता। इस कहानी का मुख्य पात्र 'बई' समय के साथ ऐसा ही मंद बुद्धि होने के कारण कभी भी वयस्क न होने वाला चरित्र है। 'पखावज' कहानी में यही चरित्र प्रागैतिहासिक जमाने के मनुष्यों की मिथकीय सृष्टि स्वर्ग के अधिपति इंद्र में बदल जाता है। पूरी कहानी आदिम मनुष्य के जीवन-बोध के पैमाने पर आधुनिक मनुष्य की प्रगति के निहितार्थों और रहस्यों को समझने और समझाने की मुस्कानयुक्त आह्लाद्पूर्ण कोशिश है। आधुनिक मनुष्य को प्राप्त वैज्ञानिक सुविधाओं से प्राचीन मनुष्य के कल्पना-लोक स्वर्ग का अधिपति इंद्र भले ही पिछड़ा हुआ और दया का पात्र लगता हो, यह कहानी का कुछ ही हिस्सा पढ़ने पर पाठक को ईमानदारी से बता दिया जाता है कि कहानी का आश्चर्यलोक इंद्र की नहीं, बल्कि आधुनिक मनुष्य की लीला का रोचक वृत्तान्त प्रस्तुत कर रहा है। यहाँ तक कि स्वर्ग का सामान्य प्रतीत होने वाला वर्णन भी मानव सभ्यता का गंभीर विमर्श उपस्थित करता चलता है!

यद्यपि शिवशंकर मिश्र की कहानियों का अनूठापन बचपन के खिलंदड़ा अंदाज में बड़ों की कहानी लिखने के कारण भी है; लेकिन पाठक जैसे ही पूरी कहानी पढ़ता है, कहानी वयस्कों की शातिर दुनिया पर अविकृत और निर्दोष बचपन द्वारा किए गए गंभीर व्यंग्य का अत्यंत गंभीर और सुचिंतित-सुनियोजित पाठ सामने लाती है। सहज-सामान्य लगने वाली आधुनिकता सहसा विकास के स्थान पर विनाश की प्रस्तावना लगने लगती है। जहाँ चीजें पर्यावरण विनाश की गंभीर त्रासदी के साथ स्थायी क्षति के साथ घट रही हैं। उनकी कहानियों का विविध-संरचनात्मक कलात्मक वैशिष्ट्य उनकी 'बाबा की उघन्नी' जैसी कहानी के माध्यम से भी सामने आता है।  

इस कहानी में एक ही यथार्थ का कई-कई पाठ और भाष्य पाठक के सामने अत्यंत रोचक और तुलनात्मक परिदृश्य उपस्थित करता है। कहानी में उपस्थित चरित्रों के नियंत्रण और पकड़ के बाहर का यथार्थ इतना अबूझ, रहस्यमय, दैवी और डरावना लगने लगता है कि चीजें भूत-प्रेत होने के स्तर तक अबूझ होती जाती हैं। 'बाबा की उघन्नी' में यह बहुआयामिता प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष दोनों ही स्तरों पर कहानी की बनावट का सुनियोजित हिस्सा है। प्रथम द्रष्टया गाँव के किसी संस्मरण की तरह लगाने वाली यह कहानी अपने अर्थ-सम्प्रेषण का एक समानांतर पाठ भी किसी रहस्य की तरह छिपाए चलती है। जीवन का जीना और उसका यथार्थ जितना ही कठिन और दुरूह होता जाता है, चाबी के गुच्छे पर बाबा की उंगलियाँ उतनी ही कसती जाती हैं। कहानी के प्रारम्भ में जो चाभी संयुक्त परिवार पर कार्यात्मक नियंत्रण का प्रतीक है, स्थितियां और खराब होने पर भूत-प्रेत भगाने में सक्षम लोहे की ताबीज में बदल जाती है। जिजीविषा का यह अतार्किक पक्ष दरअसल परिस्थितियों के समक्ष असहायता और निरीहतापूर्ण समर्पण ही है। किंकर्तव्यविमूढ़ता और अशक्तता की चरम परिणति और स्थगन भाव। जहाँ एक सीमा के बाद सामूहिकता भी सुरक्षा नहीं कर पाती, बल्कि त्रासदी का कारण बन जाती है। इस कहानी में कुटुंब जैसी आदिम संस्था पूंजीवादी- व्यक्तिवादी दौर में स्वयं को न बदल पाने की कीमत अपने एक सदस्य के मृत्यु के रूप में चुकाती है। कहानी में विवाह की खर्चीली तैयारी और आर्थिक चुनाव की बाध्यता में इलाज से वंचित नचकऊबहू का मरना अर्थाभाव में हुई मृत्यु से अधिक एक शहादत लगती है।

'पखावज' में कहानीकार ने प्राथमिक और द्वितीयक- किसान और बाजार सभ्यता दोनों को आमने-सामने ला खड़ा किया है। इस कहानी में स्वर्ग की परिकल्पना श्रम से विरत रहकर सुख-भोग करने वाले उच्च-वर्ग की जीवन-चर्या के रूप में किया गया है, जिसे साफ-साफ उसकी सूक्ष्मतम विशेषताओं के साथ पहचाना जा सकता है। इस कहानी को एक कथात्मक फैंटेसी के रूप में ही लिखा गया है। कहानी में स्वर्ग के अधिपति के रूपक के माध्यम से पूंजीवादी सभ्यता के उच्च वर्ग का अंकन होने के बावजूद लोक भी पूरी सहृदयता के साथ चित्रित हुआ है। सभ्यता की मुख्य-धारा से उपेक्षित और बहिष्कृत होने के बावजूद लोक के पास जीवन आदिम स्वस्थ लय जीवन के आदर्श मूल पाठ की तरह सुरक्षित है। उच्च स्तरीय सभ्यता की औचारिकतापूर्ण कृत्रिमता या बनावटीपन जो दरअसल बाजार की पेशेवर दक्षता ने एक कला के रूप में विकसित किया है, सामंतवाद के प्रतिनिधि आचरण से आच्छादित इन्द्र के चरित्र को किसी सामंत राजा की तरह चित्रित कर खड़ा कर दिया है। इस कहानी में स्वर्ग के अधिपति का चरित्र सामंतवादी युग से लेकर वैश्विक पूंजीवादी युग के विकास के सभी चरणों के शासक का अद्यतन व्यवहार-चित्र प्रस्तुत करता है। 

सत्ता कोई भी हो, उसका हर सुर आत्म-दर्प का ही होता है। उसकी परंपरा और संस्कार में आज भी सामंतयुगीन व्यक्तिवादी अतीत छिपा हुआ है। इस कहानी का उत्तरार्द्ध इस दृष्टि से अधिक रोचक अद्यतन होता चला गया है कि कहानीकार ने निरंतर बदलते पूंजीवाद के सापेक्ष निरंतर आधुनिक और उच्च तकनीक युक्त होते जाते स्वर्ग की दिलचस्प कल्पना की है, यह भी संकेत किया है कि पुरुष-सत्तात्मक स्वर्ग में स्त्रियों की बन्दी भूमिका देवता (पुरुषों) का मनोरंजन करना ही था, आज की सच्चाइयों और प्रवृत्तियों का प्रतिबिम्बन करने वाली इस कहानी में स्त्रियों का शोषण करने वाली पुरुष प्रधान सभ्यता के अतीत और वर्तमान दोनों के ही चेहरे साफ-साफ देखे जा सकते हैं। आधुनिक सभ्यता के लिए विशेष रूप से सृजित इस कहानी में स्वर्ग का कुरुचिपूर्ण होते जाना हमारे बुद्धिजीवी वर्ग और उसके आदर्शों का कुरुचिपूर्ण और प्रमादी होते जाना है। 'पखावज' कहानी की सफलता इसमें है कि फैंटेसी तत्वों के बावजूद यह कहानी अत्यंत साफ-साफ अपने निष्कर्षों को पाठकों तक पहुँचा देती है।

संख्या में कम होते हुए भी शिवशंकर मिश्र की इन कहानियों के अविस्मरणीय होने का रहस्य संभवतः यही है कि उनकी कहानियों के कथानक कल्पना सृजित न होकर वास्तविक जीवनानुभवों और स्मृतियों से जैसे चुने गए हैं। यही कारण है कि उनकी कहानियों के अपवादात्मक-असामान्य चरित्र भी जीवन में घटित विरल घटनाओं का एक हिस्सा लगते हैं। "मुनुआ की वीरगति" कहानी में मुनुआ के विकलांग होने का वास्तविक कारण जिसके लिए कहीं गरीबी, कहीं व्यवस्था द्वारा क्षेत्र के विकास का अभाव, वर्जित एवं विषाक्त प्रभाव वाली खेसारी की खेती तथा समुचित टीकाकरण के अभाव में सक्रिय पोलियो के विषाणु आदि कारण जिसकी पृष्ठभूमि पर मुनुआ जैसे विकलांग का जन्म संभव हो पाता है। कहानीकार ने जानबूझकर दो-चार रोचक वाक्यों में निबटा दिया है। पोलियोग्रसित अशक्त मुनुआ के दूसरे दौर की त्रासदी, जिसे कथाकार नें कथात्मक प्रस्तुति के लिए चुना है, अस्तित्व की सार्थकता और अस्मिता की सामाजिक स्वीकृति के प्रश्न को जीवन और मृत्यु के बीच आत्मघाती वरण तक ले गया है। बहुत ध्यान से पढ़ने पर ही यह रहस्योद्घाटन हो पाता है कि बिलकुल सामान्य और लगभग आत्मघाती सी लगाने वाली मुनुआ की मृत्यु वास्तव में एक हत्या ही है। उसकी मृत्यु के पीछे भी व्यवस्था की उपेक्षा और असमर्थता ही जिम्मेदार है। एक मारक विकल्पहीनता को जीने वाली जनसंख्या और उसके युवापीढ़ी के एक रात की जीवन-चर्या का चित्रण जिस निस्संगता और तटस्थता से शिवशंकर मिश्र ने किया है-घटनाओं और शब्दों के स्तर पर समाप्त हो जाने के बाद भी इस कहानी की अभिव्यक्ति-यात्रा कभी समाप्त नहीं होती। साधनहीनता के अभिशाप में पल रहा सामूहिक जीवन की साझा ऊब सिर्फ मनोरंजन से मिले सुख की खोज में रामलीला देखने हेतु शंकरगढ़ पहुँचने की समस्या को रात के अँधेरे में वास्तविक जीवन-संघर्ष में बदल देती है। गिट्टी लेने जाने वाली ट्रकों की प्रतीक्षा ही जीवन के रोमांचक भविष्य की प्रतीक्षा है। त्रासदी को उपेक्षित कर जी गयी एक करुण उत्सवधर्मिता का दौर चलता रहता है। परिहास में दी गयी चुनौती को स्वीकार करते हुए अपनी बहादुरी सत्यापित करने के लिए विकलांग मुनुआ चलती ट्रक से छलांग लगा देता है। समय पर प्राथमिक चिकित्सा न मिलने से घायल मूर्छित मुनुआ एक ओर मृत्यु की ओर कदम बढ़ा रहा होता है, दूसरी ओर उसके मृत्यु के मूल्य पर मनोरंजन करते साथी एक विकल्पहीन त्रासदीपूर्ण जीवन को सिर्फ साक्षी-भाव से जीते रहने और प्रतीक्षा करते रहने के लिए विवश हैं। किसी सैनिक अभियान और युद्ध की तरह मात्र श्रम के नियोजन से लगभग मुफ्त मनोरंजन हेतु की गयी इस यात्रा की वास्तविक कीमत जो न सिर्फ भयावह है, बल्कि मुनुआ के विडंबनात्मक मृत्यु के साथ व्यवस्था के नियामकों के सामने एक व्यंग्यात्मक प्रश्न-चिन्ह भी छोड़ जाती है। बहुचर्चित अलगावबोध और अमानवीकरण जैसी निषेधात्मक प्रवृत्तियां इस कहानी में अतिरिक्त मूल्य की तरह लगभग मुफ्त में उपस्थित हैं।

भारतीय समाज में हाशिए के बाहर का बहिष्कृत एवं लगभग निष्क्रिय कुंठित सामान्य उपेक्षित लोक का उदार असावधान मतदाता इतना निरीह हो चुका है कि अपने नागरिक अधिकारों की मांग भी नहीं कर सकता। स्वतन्त्र भारत के आर्थिक एवं जातीय लोकतंत्र का सूक्ष्मतम अवलोकन शिवशंकर मिश्र की लम्बी कहानी 'मुजरिम' में देखा जा सकता है। शिवशंकर मिश्र की अन्य कहानियों की तरह यह कहानी भी वर्णनात्मक और महाकाव्यात्मक दोहरी संरचना वाली होने से एक कथारूपक के रूप में बहुविमर्शात्मक संभावनाओं वाली एक औपन्यासिक कहानी है। कुछ-कुछ मन्नू भंडारी के प्रसिद्ध उपन्यास 'महाभोज' की तरह शिवशंकर मिश्र की 'मुजरिम' कहानी को लम्बी कहानी न कहकर लघु कलेवर का महाकाव्यात्मक उपन्यास कहना गलत न होगा। भारतीय समाज का उत्तर मार्क्सवादी एवं समाजशास्त्रीय विश्लेषण इस कहानी को महत्वपूर्ण बनाता है। इस एक कहानी के विश्लेषण से जाति-विमर्श के लिए आवश्यक वे सारे तथ्य एवं निष्कर्ष जुटाए जा सकते हैं, जो भारतीय जाति-व्यवस्था के उन पक्षों को भी अनावृत्त करता है, जिस ओर प्रायः हमारा ध्यान ही नहीं जाता। यह कहानी परंपरागत जातिवादी भारतीय समाज के विभिन्न अछूते पक्षों की ओर भी पाठकों का ध्यान आकर्षित करता है। उनकी 'मुजरिम' कहानी का विस्तृत विमर्शात्मक विवेचन किसी स्वतन्त्र लेख में करना ही उचित होगा।  तब तक इतना ही कहना चाहूँगा कि शिवशंकर मिश्र की कहानियां बिना किसी शोर के हिन्दी कहानी को बिलकुल विरल मौलिक कलात्मक प्रतिमान और विमर्शात्मक आयाम सौंपती हैं।

संपर्क : रामप्रकाश कुशवाहा,
बी-1, श्री साईं अपार्टमेंट, टंडीया,
करौंदी, सुन्दरपुर, वाराणसी (उ.प्र.)
 पिन - 221005
 ई-मेल : raprku@gmail.com

(कथादेश, नवम्बर 2017 में प्रकाशित समीक्षा) 

गुरुवार, 9 जुलाई 2026

जरइ रे नउआ तोर नउअरिया जरइ पंडिता तोर बेद!

                       ज्यादातर पारम्परिक नारी गीतों में जीवन के जो चित्र मिलते हैं, वे काफी पुराने लगते हैं। खास तौर पर हमारा आधुनिक जीवन, जिसमें अज्ञान और जादू-टोने की बजाय विज्ञान की सुविधाएँ, मध्ययुगीन स्थानीयता और जड़ता की जगह वैश्विकता और पुरुषसत्ता की जगह जनवाद या एक तुलनात्मक जनवाद है, इन गीतों में नहीं मिलता, फिर भी हमारे देश के एक विशाल भाग में शादी-विवाह, तीज-त्यौहार और श्रम के विविध अवसरों पर ये गीत गाये जाते हैं। एक बात और। यह कि कुछ गीतों (झूना और गारी) को छोड़ कर अधिकांश में विषाद की एक गहरी छाया मिलती है। इन गीतों का उनकी पारम्परिक धुनों से अनिवार्य सम्बन्ध है। उन धुनों में दुख की अभिव्यक्ति की गजब की क्षमता है। कभी-कभी किसी गीत के भाव समझ में नहीं आते, लेकिन मन्दगति वाले उदास सामूहिक सुरों से मन बरबस भर जाता है। यहाँ उन कविताओं के नियम लागू नहीं होते, जो कागज पर उतर कर पूरी होती हैं। ये घर-आँगन और खेत-खलिहानों में रचे और गाये जाते हैं। वहीं ये अपनी पूर्ण प्रभा के साथ प्राप्त होते हैं। कागज पर उतर कर ये अधूरे हो जरते हैं और मंचीय अनुष्ठानों और रेडियो में विकृत हो जाते हैं। ये गीत हमारे देश के एक विशाल भाग-व्यापक ग्रामीण अंचलों की महिलाओं-की चेतना के अंग हैं और क्या बात है कि आज भी हमारे देश के एक बड़े हिस्से की चेतना में गहरा विषाद और मध्ययुगीन जड़ता के भी चित्र भरे हुए हैं?

                    दरअसल अभी हमारे देश के अधिकांश ग्रामीण अंचलों में ऐसे कुछ मध्ययुगीन तत्व प्रभावशाली हैं। वैसे तो दूसरे के विमान पर कुछ लोग अन्तरिक्ष तक हो आये हैं, लेकिन मध्ययुगीनता को खारिज करने वाली वैज्ञानिक तकनीक अभी जनजीवन में सुलभ नहीं हुई है। चिकित्सा-विज्ञान की बजाय झाड़-फूंक और जादू-टोने का प्रभाव अभी भी है। कृषिकर्म का अधिकांश कार्य प्राकृतिक साधनों और हल-बैल पर निर्भर है। हनुमान जी और गणेश जी के चित्रों और मन्त्रों के साथ जो ट्रैक्टर आये, अभी मुख्य रूप से वे ट्रालीवर्क और बारात ढोने में लगे हैं। सब लोगों का जीवन प्रकृति पर निर्भर है, तो प्रकृति का देवीरूप रहेगा। अँधेरा रहेगा। स्त्रियों की दशा और भी विशष्ट है। अभी उन्हें पर्दे में रहना पड़ता है। आज भी संयुक्त परिवार हैं। घर के भीतर के काम-सन्तान पैदा करना और खाना बनाना-दृढ़तापूर्वक उन्हीं के सिर पर है। बाहर की दुनिया से सम्पर्क के नाम पर कभी साल दो साल में एकाध बार ही धार्मिक उद्देश्य से पड़ोस के शहर ले जायी जाती हैं। वहाँ उनका सामना पंडों-पुरोहितों के यथार्थ से होता है। फिर वे लौटकर घरों के भीतर की ऊब, गुलामी और बेवजह घरों के ताने-तिश्ने का जीवन बिताती हैं। उनकी पढ़ाई-लिखाई का रिवाज नहीं है। जहाँ वे पढ़-लिख रही हैं, वहाँ भी पिता द्वारा उनका दूल्हा खोजा जाता है। पिता भौतिक समृद्धि और शिक्षा आदि देखकर विवाह कर देता है। फिर वे आजीवन एक आरोपित पति को प्यार (?) करती हैं। इस सबके बड़े भयानक परिणाम सामने आते हैं।

                             संक्षेप में हमारे समकालीन नारी जीवन का यही यथार्थ है। पारम्परिक नारी गीतों के विषय भी यही हैं। यह सच है कि इन गीतों की रचना काफी पहले हुई लगती है, लेकिन जीवन कमोवेश ऐसा ही है, जिसमें ये प्रासंगिक लगते हैं। इस यथार्थ की बड़ी संवेदनशील टिप्पणियाँ इन गीतों में मिलती हैं। अब तक इन गीतों के जो अध्ययन प्रकाश में आये हैं, उनको अधिकांश पौराणिकता, अलंकार और शृंगार आदि की खोज में व्यर्थ हुआ है, जबकि खोज का विषय यह होना चाहिए कि किस हद तक समकालीन नारी जीवन का यथार्थ इन गीतों में उतरा है और यह कि इस दारुण यथार्थ के विरोध में भी कहीं कुछ स्वर उभरते हैं या नहीं हैं या नहीं। यहाँ अवधी के कुछ गीतों को बानगी के तौर पर पेश किया जा रहा है:-

1-

ऊसर गोंड़ि-गोंड़ि कांकर बोयेउँ नाहीं जानेउँ तीत कि मीठ।

नगर पैठि बेटी तोर बर हेरेउँ नाहीं जानेउँ करम तोहार।।

माया बोलावईं गोद बैठावंइ बतिया पूछंई अरथाइ।

कवन-कवन सुख करिउ मोरि बेटी बतिया तू देतिउ बताइ।।

खांड़-चिरउँजी के भोजन माया कड़ुवन तेल असनान।

सत सुपेती के दासन माया सेजिया में सोवऊं अकेल।।

जरइ रे नउआ तोर नउअरिया जरइ पंडिता तोर बेद।

हमरे धिया के तइं अस बर हेरे सेजिया में सोवइ अकेल।।

                     यह कन्यापक्ष द्वारा गाया जाने वाला एक विवाह-गीत है। आँगन में वैवाहिक कर्मकांड होते रहते हैं और भीतर बैठी औरतें गहरी उदासी वाले सुरों में यह गीत गाती हैं। भाव इस प्रकार है:- 

                           ऊसर मिट्टी (जिसमें कुछ भी नहीं उपजता) को गोंड़-गोंड़ कर हमने कंकड़ बोये हैं। पता नहीं वे तीखे होंगे कि मीठे। बेटी नगरों में घूम-घूम कर तेरा वर खोजा गया है। पता नहीं तेरी किस्मत कैसी निकलेगी? 

आगे की पंक्तियों में बाद का दृश्य है-

                         अर्थात् बेटी के ससुराल से लौट आने का दृश्य। माँ बुलाती है। बेटी को गोद में बैठाकर खूब ब्यौरे के साथ पूछती है-बेटी, वहाँ तूने कौन-कौन से सुख किये हैं, सब बताओ। बेटी-माँ, वहाँ शक्कर और चिरौंजी का भोजन होता है। सरसों के तेल में नहाती हूँ। खूब समृद्धि के बिस्तर हैं, लेकिन माँ, सेज पर अकेली सोती हूँ। फिर माँ का शाप है-नाई तेरे कर्मकांड में और पंडित तेरे वेदों में आग लगे। तुम लोगों ने मेरी बेटी के लिए ऐसा वर खोजा कि वह सेज पर अकेली सोती है।

                          यहाँ पिता के द्वारा वर की खोज करने वाली परम्परा को ऊसर जमीन में कंकड़ बोकर भाग्य की प्रतीक्षा करना बताया गया है। इस तरह के विवाह में प्रेम का अभाव, जो हमारे युग का एक व्यापक और दुर्भाग्यपूर्ण यथार्थ है, इस गीत का विषय है।

2-

सोवत रहलिउं माया के कोरवा भोर भए भिनसार।

केकरे दुआरे माया बाजनि बाजइ केकर होइ बियाह।।

तुहईं बेटी ऐंगल तुहईं बेटी गैंगल तुहईं बेटी चतुरी सयान।

तोहरे बपइया द्वारे बाजन बाजइ तोहार होइ बियाह।।

सिखइउ न पायउं गुन गेहथइया तपयउं न राम रसोंइ।

सासु-ननद मिली भइया गरियइहीं मोसे सहा न जाइ।।

ठोंकि-ठोंकि बेटी ईन्हन नाइउ अदहन धरिउ बिचारि।

माड़ पसाइउ बेटी सासू गोहराइउ राखिउ जेठानी के मान।।

सासु-ननद मिलि भइया गरियइहीं सुनि लिहिउ अँचरा पसारि।

चारिन खूंट के नग्र अयोध्या बइठिउ माथ ओनाइ।।

        यह भी कन्यापक्ष का एक विवाह-गीत है। इसका विषय बाल-विवाह है। बाल-विवाह अभी गाँवों में किस तरह प्रचलित है, सभी जानते हैं। 

                       माँ की गोद में मैं सो रही थी कि सबेरा हो गया। माँ किसके दरवाजे पर बाजे बज रहे हैं और किसका विवाह हो रहा है...? बेटी, तू ही मेरी पगली है और तू ही मेरी चतुरी बेटी है। तेरे बाप के दरवाजे बाजे बज रहे हैं और तेरा विवाह हो रहा है। माँ, अभी मैंने गृहस्थी के गुण नहीं सीखे हैं और कभी रसोंई नहीं पकायी। वहाँ सास-ननद मिलकर गाली देंगी, तो मुझसे सहा नहीं जायेगा। बेटी ठोंक-ठोंक कर ईंधन डालना और विचार कर अदहन डालना। माड़ पसाकर सास को बुला लेना और जेठानी का सम्मान करना। सास-ननद भइया को गाली देंगी, तो आँचल फैला कर सुन लेना। अयोध्या, अर्थात् तेरी ससुराल का विस्तार चार खूंट का है, उसी सीमा में सिर झुका कर रहना।

3-

 "जौने बन सिंकिया न डोलइ सुगन नहिं बोलइ।

उहीं बन ब्याहे बापा मोर उलटि न चितवइ।।

मचियइ बइठि त सासू हड़पि-हड़पि बोलइ।

बहुआ इंटवा के माई तोर पथरवा के बपई।

बिजुरी बरन भइया तोर उलटि नहिं चितवई।।"

             जिस वन में सींक नहीं डोलती, जहाँ सुगना नहीं बोलता, उसी वन में मेरे बाप ने मेरा विवाह कर दिया। मचिया पर बैठी सास हड़प-हड़प कर बोलती हैं, बहू, तेरी माँ ईंट की है, तेरा बाप पत्थर का है और बिजली के रंग वाला तेरा भाई कभी घूम कर तेरी ओर नहीं देखते। 

4-

"सातइ सिंकिया के हमरी बढ़निया सात बीघा अँगनाई गोरिया।

अँगना बहारत टुटलि बढ़निया सासु गरियावईं बिनर भाइ गोरिया।।

काहे गरियाऊ सासू मोरे बिरन भइया मँगाइ लेबइ बढ़नी के बोझ गोरिया।

आगे-आगे आवइ सासू बढ़नी के बोझवा आवइ पीछे बिरन भाइ गोरिया।। 

कहँवा धरावउं सासू बढ़नी के बोझवा कहँवा बइठावउं पीछे बिरन भाइ गोरिया।

अँगने धरावउ बहुआ बढ़नी के बोझवा दुआरे बैठावउ बिरन भाइ गोरिया।।

का हो खवावउं सासू तोहरे ललनवा के का हो खवावउं बिरन भाइ गोरिया।

चउरा खवावउ बहुआ हमरे ललनवा के कोदौं खवावउं बिरन भाइ गोरिया।।"

                   पुरुष बाहर के जीवन में सक्रिय रहते हैं स्त्रियाँ घरों के भीतर काम करती और ऊबती रहती हैं, ऐसे में बेवजह ताने-तिश्ने होते रहते हैं। अक्सर लोग बड़े-बड़े घर बना लेते हैं कि इज्जत बढ़े और दहेज मिले, लेकिन दूसरे घरेलू खर्चों में कटौती करते रहते हैं। कन्यापक्ष के लोगों को वरपक्ष में सम्मान नहीं मिलता। ये विषय हैं इस गीत के। 

                    मेरी झाड़ू में सात सींकें हैं और मेरा आँगन सात बीघे का है। आँगन बुहारते हुए झाड़ू टूट गयी, तो सास मेरे भइया को गाली देती है। सास, तुम मेरे भइया को गाली क्यों देती हो? मैं झाड़ू के बोझ मँगा लूँगी। देखो, आगे-आगे झाड़ू का बोझ आ रहा है और पीछे-पीछे मेरे भइया आ रहे हैं। झाड़ू का बोझ कहाँ रखवाऊँ और भइया को कहाँ बैठाऊँ? बहू, आँगन में झाड़ू का बोझ रखवाओ और अपने भइया को दरवाजे पर बैठा दो। सास, तुम्हारे बेटे को क्या खिलाऊँ और अपने भइया को क्या खिलाऊँ? बहू, मेरे बेटे को चावल खिलाओ और अपने भइया को कोदों को भात खिलाओ।

             चौथा और पाँचवा-ये दोनों ढेढ़िया के गीत हैं। कातिक के पहले पखवारे में रात भर बहनें चुटकी बजाते और नाचते हुए इन गीतों को गाती हैं। इनकी धुन में एक तुलनात्मक गति होती है। यहाँ ‘गोरिया’ और ‘लोय’ जैसे शब्द अन्त में लगा दिये जाते हैं, जिनका अर्थ से नहीं, तुक और ताल से सम्बन्ध होता है।

5-

"गोबरा के खेप लइके निकरी बहिनिया बिरना बिरिछ तरे ठाढ़ गोरिया।

गेबरा के झउआ खेतवा में फेकेनि लपटि के भेंटेन बिरन भाइ गोरिया।।

बहिनी के रोये भीजइ कुसुम-चुनरिया भइया के रोये पटका रुमाल गोरिया।

एतना बियोग कस रोयेउ बहिनिया घरवा त होइहिं तोहार गोरिया।।

सासू के जारे भइया अस के जरेउं जइसे करहिया जरइ तेल गोरिया।

ननदी के जारे भइया अस के जरेउं जइसे दोहनिया जरइ दूध गोरिया।।

सासू त अहीं बहिनी बन के कोयलिया आज उड़इं कि काल्ह गोरिया।"

               ससुराल में बहन गोबर का खेप लेकर निकली। भैया पेड़ तले खड़े मिल गये। गोबर खेत में फेंक कर बहन भैया से लिपट गयी। बहन के रोने से कुसमी चुनरी भीज गयी। भैया के रोने से रूमाल भीग गया। बहन, तू इतना दुख करके क्यों रोती है? आगे चलकर यह घर तेरा हो जायेगा। भइया, सास के जलाने से मैं ऐसे जल गयी हूँ, जैसे कड़ाही में तेल जलता है। ननद के जलाने से मैं ऐसे जली हूँ, जैसे हांड़ी में दूध जलता है। बहन, सास तो गंगा के कगार की तरह हैं। आज गिरे कि कल। ननद तो वन की कोयल है। आज उड़े कि कल।

               क्या ये हमारे समकालीन यथार्थ का चित्र नहीं है? क्या यह बेबसी और विषाद पुरुषसत्ता और पिछड़ेपन के बदले प्रकारान्तर से जनवाद की माँग नहीं है। 

(अमृत प्रभात, इलाहाबाद, दिनांक-21 सितम्बर, 1987 में प्रकाशित)

शिवशंकर मिश्र
एसोसिएट प्रोफेसर एवम् अध्यक्ष हिन्दी विभाग,
जनता महाविद्यालय, अजीतमल, औरैया.
सम्प्रति : इलाहाबाद

                                                                             

रविवार, 24 मई 2020

‘कथादेश’ मासिक फरवरी 2020 अंक, में प्रकाशित कहानी ‘जश्न’ की समीक्षा - डॉ. निशाकान्त द्विवेदी,


 ‘कथादेश’ मासिक फरवरी 2020 अंक, में प्रकाशित शिवशंकर मिश्र की कहानी ‘जश्न’ भारत की बहुसंख्य आबादी का प्रतिनिधित्व करती है। इसमें जहाँ एक ओर मानव में मानव सुलभ आनंद प्राप्ति की लालसा है, तो दूसरी ओर उचित शिक्षा/ज्ञान के अभाव में दिन-रात दुःखों को सहन करते हुए उसे सहज सहचर स्वीकार कर लेने की प्रवृत्ति दिखाई पड़ती है।

   इसमें एक ओर यदि ग्रामीण परिवेश में पलकर अनपढ़ होते हुए भी परिवार के सदस्यों का आपसी सद्भाव और प्रेम दिखाई देता है तो दूसरी ओर शहरी परिवेश के पढ़े लिखे लोगों की उस प्रवृत्ति को दिखाता है, जो चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से हाथ मिलाने में अपनी ज्ञान-गरिमा की उच्चता प्रभावित होने का खतरा महसूस करता है। एक ओर अभाव ग्रस्त लोग उत्सव और आनंद हेतु अवसर निकालकर अपनी दबी इच्छापूर्ति का संतोष करते हैं और दूसरी तरफ साधन संपन्न तनाव में जीने के अभ्यासी हो रहे हैं। कहानी धर्म, जाति के आवरण में जीने वालों के दिखावे को भी सहज भाव से अनावृत करती है। 

      प्रस्तुत कहानी गंदगी और अज्ञान के साहचर्य से उपजी ग्रामीण समस्याओं को उकेरती है, तो साथ ही शासन की सड़ांध से उपजी चिकित्सा क्षेत्र की समस्या से भी पर्दा उठाती है। कहानी यह भी उद्घाटित करती है कि देश की बहुसंख्य आबादी की समस्या का कारण केवल शिक्षा का अभाव, अज्ञान ही नहीं है, बल्कि, तथाकथित ज्ञानसम्पन्न लोगों की तांत्रिक भ्रष्टाचार का साहचर्य भी है। इस कहानी के प्रमुख पात्र के सभी भाई विकलांग या अभाव ग्रस्त होकर भी आनंद और प्रेम से रहा जा सकता है, इस रहस्य को उद्घाटित करते दिखाई देते हैं।यह एक जीवन दर्शन है। 
यह मानव प्रवृत्ति है कि अत्यंत कष्टमय दशाओं में भी वह जीवन से उदासीन नहीं होती- ‘अतिकष्टासु दशास्वपि जीवितनिरपेक्षा न भवन्ति खलु जगति प्राणिनां वृत्तयः’- बाणभट्ट। 

कहानी यह भी दिखाती है कि अज्ञान और जागरूकता के अभाव में जीवन संकट से कितना घिर सकता है, यहाँ तक कि‌ मृत्यु का वरण भी कर लेता है और यह कहानी इस रूप में भारतीय ग्रामीण समाज के एक बहुत बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करती है। फिर भी, मनुष्य सहज भाव से जश्न मनाने का कोई न कोई कारण भी खोज लेता है। आज देश को जिस ज्ञान एवं जागरूकता की आवश्यकता है, उस कान्तासम्मित संदेश को समेटे प्रस्तुत कहानी समाज और तंत्र से अपेक्षा रखती हुई और अधिक प्रासंगिक एवं सफल हुई है। प्रकारांतर से यह कहानी ‘कोरोना’ का भविष्य वाचन है।

  - डॉ. निशाकान्त द्विवेदी,  केन्द्रीय विद्यालय, मुजफ्फरपुर, बिहार