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आख्यान
कुछ शब्दचित्र हैं यहाँ। विकास की अन्धी दौड़ में
ये हाशिये की आख्यायें हैं और आख्यान भी!
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"बादल को घिरते देखा है' (नागार्जुन) और "मेघदूतम् (कालिदास)
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पाठ और पुनः पाठ- शिवशंकर मिश्र का 'अन्तिम उच्चारण'-
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सुधीर विद्यार्थी के '(मेरे) हिस्से का शहर'
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हजारों गद्य-कविताओं का कोलाज रचतीं बहुविमर्शी कहानियाँ...
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जरइ रे नउआ तोर नउअरिया जरइ पंडिता तोर बेद!
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