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हजारों गद्य-कविताओं का कोलाज रचतीं बहुविमर्शी कहानियाँ...

  शिवशंकर मिश्र का 'अन्तिम उच्चारण' - रामप्रकाश कुशवाहा पुस्तक - अंतिम उच्चारण (कहानी संग्रह), कहानीकार - शिवशंकर मिश्र प्रकाशक - सहयात्रा प्रकाशन, प्रा. लिमिटेड, सी - ५२ / जेड - ३, दिलशाद गार्डन, नयी दिल्ली - ११००९५ समकालीन कथाकारों में शिवशंकर मिश्र को विरल और अद्वितीय बनाने वाली विशेषता सिर्फ उनके कवित्वमय आत्मीय अभिव्यक्ति-शिल्प में ही नहीं है, बल्कि अपनी कहानियों की कथावस्तु की उस शोधपूर्ण खोज में भी है, जो किसी को भी नहीं दुहराती, न तो स्वयं को और न ही दूसरों को। उनकी कहानियां कथा-साहित्य में अब तक छूटे हुए और अब तक उपेक्षित या बहिष्कृत विषयधर्मी कथानक की खोज भी है। संभवतः इसीलिए उनके कहानी-संग्रह "अंतिम उच्चारण" की कहानियों को पढ़ना-पूरी तैयारी और धैर्य के साथ भारतीय समय और समाज के समुद्र में खोज-भावना से की गयी अत्यंत गंभीर किन्तु, अत्यंत रोचक और अविस्मरणीय लेखकीय गोताखोरियों से गुजरना है। उनकी कहानियां अपने पहले पाठ के बाद भी इस टिप्पणी की तरह पढ़ने को बची रह जाती हैं कि घटना के वास्तविक कारण का अभी पता लगाया जा रहा है।   शिवशंकर मिश्र ने अपनी गिनी-चुनी कहान...

जरइ रे नउआ तोर नउअरिया जरइ पंडिता तोर बेद!

                       ज्या दातर पारम्परिक नारी गीतों में जीवन के जो चित्र मिलते हैं, वे काफी पुराने लगते हैं। खास तौर पर हमारा आधुनिक जीवन, जिसमें अज्ञान और जादू-टोने की बजाय विज्ञान की सुविधाएँ, मध्ययुगीन स्थानीयता और जड़ता की जगह वैश्विकता और पुरुषसत्ता की जगह जनवाद या एक तुलनात्मक जनवाद है, इन गीतों में नहीं मिलता, फिर भी हमारे देश के एक विशाल भाग में शादी-विवाह, तीज-त्यौहार और श्रम के विविध अवसरों पर ये गीत गाये जाते हैं। एक बात और। यह कि कुछ गीतों (झूना और गारी) को छोड़ कर अधिकांश में विषाद की एक गहरी छाया मिलती है। इन गीतों का उनकी पारम्परिक धुनों से अनिवार्य सम्बन्ध है। उन धुनों में दुख की अभिव्यक्ति की गजब की क्षमता है। कभी-कभी किसी गीत के भाव समझ में नहीं आते, लेकिन मन्दगति वाले उदास सामूहिक सुरों से मन बरबस भर जाता है। यहाँ उन कविताओं के नियम लागू नहीं होते, जो कागज पर उतर कर पूरी होती हैं। ये घर-आँगन और खेत-खलिहानों में रचे और गाये जाते हैं। वहीं ये अपनी पूर्ण प्रभा के साथ प्राप्त होते हैं। कागज पर उतर कर ये अधूरे हो...

‘कथादेश’ मासिक फरवरी 2020 अंक, में प्रकाशित कहानी ‘जश्न’ की समीक्षा - डॉ. निशाकान्त द्विवेदी,

 ‘कथादेश’ मासिक फरवरी 2020 अंक, में प्रकाशित  शिवशंकर मिश्र की कहानी ‘जश्न’ भारत की बहुसंख्य आबादी का प्रतिनिधित्व  करती है। इसमें जहाँ एक ओर मानव में मानव सुलभ आनंद प्राप्ति की लालसा  है, तो दूसरी ओर उचित शिक्षा/ज्ञान के अभाव में दिन-रात दुःखों को सहन  करते हुए उसे सहज सहचर स्वीकार कर लेने की प्रवृत्ति दिखाई पड़ती है।    इसमें एक ओर यदि ग्रामीण परिवेश में पलकर अनपढ़ होते हुए भी परिवार के  सदस्यों का आपसी सद्भाव और प्रेम दिखाई देता है तो दूसरी ओर शहरी परिवेश के पढ़े  लिखे लोगों की उस प्रवृत्ति को दिखाता है, जो चतुर्थ श्रेणी  कर्मचारी से हाथ मिलाने में अपनी ज्ञान-गरिमा की उच्चता प्रभावित होने का  खतरा महसूस करता है। एक ओर अभाव ग्रस्त लोग उत्सव और आनंद हेतु अवसर  निकालकर अपनी दबी इच्छापूर्ति का संतोष करते हैं और दूसरी तरफ साधन  संपन्न तनाव में जीने के अभ्यासी हो रहे हैं। कहानी धर्म, जाति के आवरण  में जीने वालों के दिखावे को भी सहज भाव से अनावृत करती है।        प्रस्तुत  कहानी गंदगी और अज्ञान के साह...