गुरुवार, 9 जुलाई 2026

जरइ रे नउआ तोर नउअरिया जरइ पंडिता तोर बेद!

                       ज्यादातर पारम्परिक नारी गीतों में जीवन के जो चित्र मिलते हैं, वे काफी पुराने लगते हैं। खास तौर पर हमारा आधुनिक जीवन, जिसमें अज्ञान और जादू-टोने की बजाय विज्ञान की सुविधाएँ, मध्ययुगीन स्थानीयता और जड़ता की जगह वैश्विकता और पुरुषसत्ता की जगह जनवाद या एक तुलनात्मक जनवाद है, इन गीतों में नहीं मिलता, फिर भी हमारे देश के एक विशाल भाग में शादी-विवाह, तीज-त्यौहार और श्रम के विविध अवसरों पर ये गीत गाये जाते हैं। एक बात और। यह कि कुछ गीतों (झूना और गारी) को छोड़ कर अधिकांश में विषाद की एक गहरी छाया मिलती है। इन गीतों का उनकी पारम्परिक धुनों से अनिवार्य सम्बन्ध है। उन धुनों में दुख की अभिव्यक्ति की गजब की क्षमता है। कभी-कभी किसी गीत के भाव समझ में नहीं आते, लेकिन मन्दगति वाले उदास सामूहिक सुरों से मन बरबस भर जाता है। यहाँ उन कविताओं के नियम लागू नहीं होते, जो कागज पर उतर कर पूरी होती हैं। ये घर-आँगन और खेत-खलिहानों में रचे और गाये जाते हैं। वहीं ये अपनी पूर्ण प्रभा के साथ प्राप्त होते हैं। कागज पर उतर कर ये अधूरे हो जरते हैं और मंचीय अनुष्ठानों और रेडियो में विकृत हो जाते हैं। ये गीत हमारे देश के एक विशाल भाग-व्यापक ग्रामीण अंचलों की महिलाओं-की चेतना के अंग हैं और क्या बात है कि आज भी हमारे देश के एक बड़े हिस्से की चेतना में गहरा विषाद और मध्ययुगीन जड़ता के भी चित्र भरे हुए हैं?

                    दरअसल अभी हमारे देश के अधिकांश ग्रामीण अंचलों में ऐसे कुछ मध्ययुगीन तत्व प्रभावशाली हैं। वैसे तो दूसरे के विमान पर कुछ लोग अन्तरिक्ष तक हो आये हैं, लेकिन मध्ययुगीनता को खारिज करने वाली वैज्ञानिक तकनीक अभी जनजीवन में सुलभ नहीं हुई है। चिकित्सा-विज्ञान की बजाय झाड़-फूंक और जादू-टोने का प्रभाव अभी भी है। कृषिकर्म का अधिकांश कार्य प्राकृतिक साधनों और हल-बैल पर निर्भर है। हनुमान जी और गणेश जी के चित्रों और मन्त्रों के साथ जो ट्रैक्टर आये, अभी मुख्य रूप से वे ट्रालीवर्क और बारात ढोने में लगे हैं। सब लोगों का जीवन प्रकृति पर निर्भर है, तो प्रकृति का देवीरूप रहेगा। अँधेरा रहेगा। स्त्रियों की दशा और भी विशष्ट है। अभी उन्हें पर्दे में रहना पड़ता है। आज भी संयुक्त परिवार हैं। घर के भीतर के काम-सन्तान पैदा करना और खाना बनाना-दृढ़तापूर्वक उन्हीं के सिर पर है। बाहर की दुनिया से सम्पर्क के नाम पर कभी साल दो साल में एकाध बार ही धार्मिक उद्देश्य से पड़ोस के शहर ले जायी जाती हैं। वहाँ उनका सामना पंडों-पुरोहितों के यथार्थ से होता है। फिर वे लौटकर घरों के भीतर की ऊब, गुलामी और बेवजह घरों के ताने-तिश्ने का जीवन बिताती हैं। उनकी पढ़ाई-लिखाई का रिवाज नहीं है। जहाँ वे पढ़-लिख रही हैं, वहाँ भी पिता द्वारा उनका दूल्हा खोजा जाता है। पिता भौतिक समृद्धि और शिक्षा आदि देखकर विवाह कर देता है। फिर वे आजीवन एक आरोपित पति को प्यार (?) करती हैं। इस सबके बड़े भयानक परिणाम सामने आते हैं।

                             संक्षेप में हमारे समकालीन नारी जीवन का यही यथार्थ है। पारम्परिक नारी गीतों के विषय भी यही हैं। यह सच है कि इन गीतों की रचना काफी पहले हुई लगती है, लेकिन जीवन कमोवेश ऐसा ही है, जिसमें ये प्रासंगिक लगते हैं। इस यथार्थ की बड़ी संवेदनशील टिप्पणियाँ इन गीतों में मिलती हैं। अब तक इन गीतों के जो अध्ययन प्रकाश में आये हैं, उनको अधिकांश पौराणिकता, अलंकार और शृंगार आदि की खोज में व्यर्थ हुआ है, जबकि खोज का विषय यह होना चाहिए कि किस हद तक समकालीन नारी जीवन का यथार्थ इन गीतों में उतरा है और यह कि इस दारुण यथार्थ के विरोध में भी कहीं कुछ स्वर उभरते हैं या नहीं हैं या नहीं। यहाँ अवधी के कुछ गीतों को बानगी के तौर पर पेश किया जा रहा है:-

1-

ऊसर गोंड़ि-गोंड़ि कांकर बोयेउँ नाहीं जानेउँ तीत कि मीठ।

नगर पैठि बेटी तोर बर हेरेउँ नाहीं जानेउँ करम तोहार।।

माया बोलावईं गोद बैठावंइ बतिया पूछंई अरथाइ।

कवन-कवन सुख करिउ मोरि बेटी बतिया तू देतिउ बताइ।।

खांड़-चिरउँजी के भोजन माया कड़ुवन तेल असनान।

सत सुपेती के दासन माया सेजिया में सोवऊं अकेल।।

जरइ रे नउआ तोर नउअरिया जरइ पंडिता तोर बेद।

हमरे धिया के तइं अस बर हेरे सेजिया में सोवइ अकेल।।

                     यह कन्यापक्ष द्वारा गाया जाने वाला एक विवाह-गीत है। आँगन में वैवाहिक कर्मकांड होते रहते हैं और भीतर बैठी औरतें गहरी उदासी वाले सुरों में यह गीत गाती हैं। भाव इस प्रकार है:- 

                           ऊसर मिट्टी (जिसमें कुछ भी नहीं उपजता) को गोंड़-गोंड़ कर हमने कंकड़ बोये हैं। पता नहीं वे तीखे होंगे कि मीठे। बेटी नगरों में घूम-घूम कर तेरा वर खोजा गया है। पता नहीं तेरी किस्मत कैसी निकलेगी? 

आगे की पंक्तियों में बाद का दृश्य है-

                         अर्थात् बेटी के ससुराल से लौट आने का दृश्य। माँ बुलाती है। बेटी को गोद में बैठाकर खूब ब्यौरे के साथ पूछती है-बेटी, वहाँ तूने कौन-कौन से सुख किये हैं, सब बताओ। बेटी-माँ, वहाँ शक्कर और चिरौंजी का भोजन होता है। सरसों के तेल में नहाती हूँ। खूब समृद्धि के बिस्तर हैं, लेकिन माँ, सेज पर अकेली सोती हूँ। फिर माँ का शाप है-नाई तेरे कर्मकांड में और पंडित तेरे वेदों में आग लगे। तुम लोगों ने मेरी बेटी के लिए ऐसा वर खोजा कि वह सेज पर अकेली सोती है।

                          यहाँ पिता के द्वारा वर की खोज करने वाली परम्परा को ऊसर जमीन में कंकड़ बोकर भाग्य की प्रतीक्षा करना बताया गया है। इस तरह के विवाह में प्रेम का अभाव, जो हमारे युग का एक व्यापक और दुर्भाग्यपूर्ण यथार्थ है, इस गीत का विषय है।

2-

सोवत रहलिउं माया के कोरवा भोर भए भिनसार।

केकरे दुआरे माया बाजनि बाजइ केकर होइ बियाह।।

तुहईं बेटी ऐंगल तुहईं बेटी गैंगल तुहईं बेटी चतुरी सयान।

तोहरे बपइया द्वारे बाजन बाजइ तोहार होइ बियाह।।

सिखइउ न पायउं गुन गेहथइया तपयउं न राम रसोंइ।

सासु-ननद मिली भइया गरियइहीं मोसे सहा न जाइ।।

ठोंकि-ठोंकि बेटी ईन्हन नाइउ अदहन धरिउ बिचारि।

माड़ पसाइउ बेटी सासू गोहराइउ राखिउ जेठानी के मान।।

सासु-ननद मिलि भइया गरियइहीं सुनि लिहिउ अँचरा पसारि।

चारिन खूंट के नग्र अयोध्या बइठिउ माथ ओनाइ।।

        यह भी कन्यापक्ष का एक विवाह-गीत है। इसका विषय बाल-विवाह है। बाल-विवाह अभी गाँवों में किस तरह प्रचलित है, सभी जानते हैं। 

                       माँ की गोद में मैं सो रही थी कि सबेरा हो गया। माँ किसके दरवाजे पर बाजे बज रहे हैं और किसका विवाह हो रहा है...? बेटी, तू ही मेरी पगली है और तू ही मेरी चतुरी बेटी है। तेरे बाप के दरवाजे बाजे बज रहे हैं और तेरा विवाह हो रहा है। माँ, अभी मैंने गृहस्थी के गुण नहीं सीखे हैं और कभी रसोंई नहीं पकायी। वहाँ सास-ननद मिलकर गाली देंगी, तो मुझसे सहा नहीं जायेगा। बेटी ठोंक-ठोंक कर ईंधन डालना और विचार कर अदहन डालना। माड़ पसाकर सास को बुला लेना और जेठानी का सम्मान करना। सास-ननद भइया को गाली देंगी, तो आँचल फैला कर सुन लेना। अयोध्या, अर्थात् तेरी ससुराल का विस्तार चार खूंट का है, उसी सीमा में सिर झुका कर रहना।

3-

 "जौने बन सिंकिया न डोलइ सुगन नहिं बोलइ।

उहीं बन ब्याहे बापा मोर उलटि न चितवइ।।

मचियइ बइठि त सासू हड़पि-हड़पि बोलइ।

बहुआ इंटवा के माई तोर पथरवा के बपई।

बिजुरी बरन भइया तोर उलटि नहिं चितवई।।"

             जिस वन में सींक नहीं डोलती, जहाँ सुगना नहीं बोलता, उसी वन में मेरे बाप ने मेरा विवाह कर दिया। मचिया पर बैठी सास हड़प-हड़प कर बोलती हैं, बहू, तेरी माँ ईंट की है, तेरा बाप पत्थर का है और बिजली के रंग वाला तेरा भाई कभी घूम कर तेरी ओर नहीं देखते। 

4-

"सातइ सिंकिया के हमरी बढ़निया सात बीघा अँगनाई गोरिया।

अँगना बहारत टुटलि बढ़निया सासु गरियावईं बिनर भाइ गोरिया।।

काहे गरियाऊ सासू मोरे बिरन भइया मँगाइ लेबइ बढ़नी के बोझ गोरिया।

आगे-आगे आवइ सासू बढ़नी के बोझवा आवइ पीछे बिरन भाइ गोरिया।। 

कहँवा धरावउं सासू बढ़नी के बोझवा कहँवा बइठावउं पीछे बिरन भाइ गोरिया।

अँगने धरावउ बहुआ बढ़नी के बोझवा दुआरे बैठावउ बिरन भाइ गोरिया।।

का हो खवावउं सासू तोहरे ललनवा के का हो खवावउं बिरन भाइ गोरिया।

चउरा खवावउ बहुआ हमरे ललनवा के कोदौं खवावउं बिरन भाइ गोरिया।।"

                   पुरुष बाहर के जीवन में सक्रिय रहते हैं स्त्रियाँ घरों के भीतर काम करती और ऊबती रहती हैं, ऐसे में बेवजह ताने-तिश्ने होते रहते हैं। अक्सर लोग बड़े-बड़े घर बना लेते हैं कि इज्जत बढ़े और दहेज मिले, लेकिन दूसरे घरेलू खर्चों में कटौती करते रहते हैं। कन्यापक्ष के लोगों को वरपक्ष में सम्मान नहीं मिलता। ये विषय हैं इस गीत के। 

                    मेरी झाड़ू में सात सींकें हैं और मेरा आँगन सात बीघे का है। आँगन बुहारते हुए झाड़ू टूट गयी, तो सास मेरे भइया को गाली देती है। सास, तुम मेरे भइया को गाली क्यों देती हो? मैं झाड़ू के बोझ मँगा लूँगी। देखो, आगे-आगे झाड़ू का बोझ आ रहा है और पीछे-पीछे मेरे भइया आ रहे हैं। झाड़ू का बोझ कहाँ रखवाऊँ और भइया को कहाँ बैठाऊँ? बहू, आँगन में झाड़ू का बोझ रखवाओ और अपने भइया को दरवाजे पर बैठा दो। सास, तुम्हारे बेटे को क्या खिलाऊँ और अपने भइया को क्या खिलाऊँ? बहू, मेरे बेटे को चावल खिलाओ और अपने भइया को कोदों को भात खिलाओ।

             चौथा और पाँचवा-ये दोनों ढेढ़िया के गीत हैं। कातिक के पहले पखवारे में रात भर बहनें चुटकी बजाते और नाचते हुए इन गीतों को गाती हैं। इनकी धुन में एक तुलनात्मक गति होती है। यहाँ ‘गोरिया’ और ‘लोय’ जैसे शब्द अन्त में लगा दिये जाते हैं, जिनका अर्थ से नहीं, तुक और ताल से सम्बन्ध होता है।

5-

"गोबरा के खेप लइके निकरी बहिनिया बिरना बिरिछ तरे ठाढ़ गोरिया।

गेबरा के झउआ खेतवा में फेकेनि लपटि के भेंटेन बिरन भाइ गोरिया।।

बहिनी के रोये भीजइ कुसुम-चुनरिया भइया के रोये पटका रुमाल गोरिया।

एतना बियोग कस रोयेउ बहिनिया घरवा त होइहिं तोहार गोरिया।।

सासू के जारे भइया अस के जरेउं जइसे करहिया जरइ तेल गोरिया।

ननदी के जारे भइया अस के जरेउं जइसे दोहनिया जरइ दूध गोरिया।।

सासू त अहीं बहिनी बन के कोयलिया आज उड़इं कि काल्ह गोरिया।"

               ससुराल में बहन गोबर का खेप लेकर निकली। भैया पेड़ तले खड़े मिल गये। गोबर खेत में फेंक कर बहन भैया से लिपट गयी। बहन के रोने से कुसमी चुनरी भीज गयी। भैया के रोने से रूमाल भीग गया। बहन, तू इतना दुख करके क्यों रोती है? आगे चलकर यह घर तेरा हो जायेगा। भइया, सास के जलाने से मैं ऐसे जल गयी हूँ, जैसे कड़ाही में तेल जलता है। ननद के जलाने से मैं ऐसे जली हूँ, जैसे हांड़ी में दूध जलता है। बहन, सास तो गंगा के कगार की तरह हैं। आज गिरे कि कल। ननद तो वन की कोयल है। आज उड़े कि कल।

               क्या ये हमारे समकालीन यथार्थ का चित्र नहीं है? क्या यह बेबसी और विषाद पुरुषसत्ता और पिछड़ेपन के बदले प्रकारान्तर से जनवाद की माँग नहीं है। 

(अमृत प्रभात, इलाहाबाद, दिनांक-21 सितम्बर, 1987 में प्रकाशित)

शिवशंकर मिश्र
एसोसिएट प्रोफेसर एवम् अध्यक्ष हिन्दी विभाग,
जनता महाविद्यालय, अजीतमल, औरैया.
सम्प्रति : इलाहाबाद

                                                                             

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