सुबह-सुबह गाँव में बमचख मच गया। मुनुआ चलते ट्रक से कूद पड़ा और नचकऊ पाँडे़ दरवाजे-दरवाजे थाली पीटकर फरियाद कर रहे हैं।
‘अररऽरऽ।‘
जिसने जहाँ सुनी यह खबर, वह वहीं ठिठक कर खड़ा हो गया। अभी सूरज निकला भी नहीं था। लोग गोरुआरी-बछेरुआरी में लगे थे या लोटा लेकर शौच-मैदान के लिए निकल रहे थे। सब चौंक गये।
‘मरा कि बचा मुनुआ?‘
‘मरा होता, तो नचकऊ किरिया-करम करते कि टाठी पीटकर गौंतरी लगाते?'
‘तो काहे की फरियाद कर रहे हैं नचकऊ?'
‘नचकऊ का कहना है कि गाँव के लड़कों ने धक्का देकर उनके लड़के को चलतिया टरक से गिरा दिया।’
- जगह-जगह बातें कर रहे थे लोग।
‘पर-पंचाइत का जमाना अब कहाँ रहा पाँड़े?
आज-कल के लड़के कहो मानें कहो न मानें पंचों की बात। लेकिन ठीक है। तुम पंचाइत बैठा रहे हो, तो आ रहा हूँ मैं भी।‘
- गाय दुहकर लेरुआ ढीलते हुए बोले कामता पाठक।
छोटे बच्चे नचकऊ के पीछे-पीछे चल रहे थे। उनके लिए अपूर्व दृश्य था यह। उनमें से कई अभी सोकर उठे थे। आँखें मलते बच्चे सम्मोहित हुए चले जा रहे थे नचकऊ के पीछे-पीछे।
सोनबरसा गाँव के लड़कों का वह झुंड रामलीला देखने जा रहा था, शंकरगढ़ की रामलीला। होने को तो सोनबरसा में भी होती है लीला, लेकिन शंकरगढ़ की बात ही अलग है। सोनबरसा में गाँव के लोग राम-रावण बनते हैं। शंकरगढ़ में बाहर से मंडली आती है। सोनबरसा में जनाना का काम मर्द करते हैं। शंकरगढ़ में मंडली की लड़कियाँ आती हैं। एक से एक सुन्दर। गल्लो-गल्लो। फिर ड्रेस कहाँ मिलेगी? राजसी कोट, मुकुट, केश, मुरछल और मुखौटे तो शंकरगढ़ से ही माँगकर लाते हैं सोनबरसा वाले। जब शंकरगढ़ की लीला खतम होगी, तभी तो देंगे शंकरगढ़ वाले सब सामान। इसीलिए शंकरगढ़ की रामलीला ठीक दशहरे पर खतम होती है और सोनबरसा की दीवाली पर।
सबको जोहारते-बटोरते देर हो गयी थी। निस्तेज सा अधूरा चन्द्रमा चटख होने लगा था। लड़कों की बैचैनी बढ़ती जा रही थी। धान के खेतों के बीच से निकली पगडंडी पर चलते हुए वे चिन्तित हो रहे थे। ...प्रार्थना शुरू हो गयी होगी। ...हो सकता है नाच चल रहा हो। ...अभी कोस भर पैदल चलना होगा, तब सड़क मिलेगी। ...गिट्टी वाला ट्रक न मिला, तो कहो लीला ही खतम हो जाय पहुँचते-पहुँचते। ...और सारी देर की वजह है मुनुआ। सब कुढ़ रहे थे उस पर।
गाँव में जब भी कोई खास मौका आता है, मुनुआ सबसे पहले पहुँच जाता है लाठी लेकर। काँपती मुस्कान से हर उपहास का सामना करता है। न वह अखाड़ा खोद सकता है, न कुश्ती लड़ सकता है, मगर अखाडे़ की खुदाई शुरू होते ही पहुँच जाता है उत्तर की अमराई में।
‘जैऽऽ बजरंगबलीऽऽ!‘
‘लगा दे कालाजंगऽऽ!‘
‘मार दे धोबिया पछाड़ऽऽ!‘
-अखाडे़ के किनारे पालथी मारे ललकारता रहता है वह। भोर की ललामी फैल रही होती है। लोग चुप होकर कुश्ती लड़ते हैं, डँड़-बैठक करते हैं। वह पालथी मारे ललकारता रहता है, बेवजह।
लड़के कुश्ती लड़कर गाँव की और लौट रहे थे, तभी उन्होंने शंकरगढ़ की रामलीला देखने का कार्यक्रम बना लिया था। मुनुआ लाठी टेककर खड़ा हो गया है।
‘ए भाई, हम भी चलेंगे लीला देखने।‘
- सीना ठोंककर बोला था वह। लेकिन किसी को विश्वास नहीं हुआ था। साधारण से साधारण बात भी वह सीना या ताल ठोंककर बोलता। वीरता की यह अदा उसने अचानक सीख ली थी चार-पाँच साल पहले कभी। चार में पढ़ता था तब वह। रोज पिढ़ई में कालिख लगाता और घोट्टा मारता। पिता के सरौते से अरहर का डंठल छील कर कलम बनाता। शीशी में दुधिया घोलता और बड़े भाई के साथ गाँव के प्राइमरी स्कूल में पढ़ने जाता था। कातिक के महीने में कई दिनों के बुखार के बाद अचानक एक सुबह वह सोकर उठा, तो धड़ाम से गिर पड़ा। घंटों कोशिश करता रहा, लेकिन नहीं उठ पाया। माई ने सरसों के तेल में लहसुन पकाकर मालिश की। जोड़ों पर अजवाइन की पुल्टिस बाँधी। लेकिन कोई फर्क नहीं। इससे पहले वह खूब उछल-कूद करता था, दौड़ता था, मगर उस दिन हर कोशिश बेकार गयी। दिन भर पिता ने इसे नाटक समझा। लेकिन जब साँझ हो गयी और वह उसी तरह जमीन पर पड़ा रहा, तो उन्होंने सहारा देकर चारपाई पर लेटा दिया और दौड़कर पासीटोला चले गये, इसरी ओझा को बुलाने।
घोड़ी हिनहिनायी और लाठी के सहारे कूद पड़ा इसरी। इसी तरह वह घोड़ी पर चढ़ता है और इसी तरह उतरता है। बचपन में ही कभी पैर खराब हो गये थे। घुटनों के बल घिसटते हुए वह पहुँच गया मुनुआ की चारपाई के पास। मुनुआ को चारपाई से उतार कर जमीन पर बैठाया गया।
‘आ हो रामाऽऽ... लोखरी के बिलिया सेऽऽ निकरीं भवानीऽऽ गपर गपर गूलरऽऽ खाइँ हो मायऽऽ...।’
-झूम-झूम कर गाने लगा इसरी।
लोहबान का धुआँ पूरे घर में फैल रहा था।
‘बोल तीनौ बाचा...।’
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‘सत्त बाचा.....।’
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‘बरम बाचा....।’
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‘उरध बाचा...।’
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‘कौन है रे तूऽऽ....?’
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‘कहाँ से आयाऽऽ....?’
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‘किसको खायेगाऽऽ....?’
......................
‘किसको छोड़ेगाऽऽ...?’
अजीब आवाज में चीखते हुए बोल रहा था इसरी। लेकिन सब बेकार। मुनुआ पर कोई असर नहीं। इसरी चीख रहा था, अभुआ रहा था। मुनुआ जस का तस बैठा रहा। हिला-डुला भी नहीं। सब चुप थे। इसरी के सवालों के जवाब में केवल पीपल के पत्ते खड़क रहे थे। आखिर में बीरा-भभूत देकर चला गया था इसरी। बस उसी दिन से लाठी के सहारे चलने लगा मुनुआ। पाँच तक की पढ़ाई तो लाठी के सहारे हो गयी। आगे की पढ़ाई के लिए गाँव में स्कूल नहीं था। दस किलोमीटर दूर पढ़ने जाना उसके लिए सम्भव न होता। उन्हीं दिनों कभी वीरता की यह अदा सीख ली थी उसने, छोटी-छोटी बातों को भी सीना या ताल ठोंककर बोलने की अदा। इसीलिए उस दिन सीना ठोंककर शंकरगढ़ की लीला देखने की मुनुआ की घोषणा को लड़कों ने गम्भीरता से नहीं लिया था। बारह किलोमीटर पैदल चलने को तैयार थे सब। ....ट्रक मिला कि न मिला।.... यह लँगड़ा कैसे चल पायेगा? लेकिन चलने की बारी आयी तो मुनुआ सबसे पहले तैयार मिला। गाँव के बाहर दखिनहिया बारी से होकर निकलने वाली पगडंडी के किनारे लाठी के सहारे खड़ा दिखा वह। हल्की चाँदनी के धुँधलके में वह दिख रहा था, लेकिन काँपती मुस्कान साफ-साफ नहीं दिख रही थी। धान के खेत ओर खेतों के बीच की पगडंडी - सब दिख रहे थे, लेकिन साफ-साफ कुछ भी नहीं दिख रहा था। कोस भर दूर सड़क पर आते-जाते ट्रकों की रोशनी कभी-कभी घनी बारी से छनकर इस पार आ जाती थी। सब तेज चल रहे थे। हाँफता हुआ मुनुआ सबसे पीछे चल रहा था। उसका इन्तजार करने के लिए सबको बार-बार रुकना पड़ता था। ज्यों किसी ट्रक की रोशनी दिखती, लड़कों में उत्तेजना समा जाती। सबकी रफ्तार तेज हो जाती। कुछ दूर चलकर वे पीछे देखते। करीब फर्लांग भर पीछे लाठी के बल घिसटता मुनुआ हिलती परछाईं की तरह दिखता। सब को रुक जाना पड़ता। तब तक ट्रक निकल जाता।
‘ओफ्फोह....। साला लँगड़ा।’
‘अरे इस ससुरे का चक्कर छोड़ो, नहीं तो लीला भी छूट जायेगी।’
- सब कुढ़ रहे होते, तब तक मुनुआ आ जाता। आज वह सब सुन रहा था। और कोई दिन होता, तो ताल ठोंक कर जवाब देता, लेकिन आज तेज चलने की कोशिश में बुरी तरह हाँफ रहा था वह। बोलने की शक्ति नहीं बची थी। दोनों हाथों से लाठी पकड़ने की वजह से न ताल ठोंक सकता था, न सीना। सँकरी पगडंडी पर कई जगह फिसलकर गिर पड़ा था वह। वह गिर जाता, लाठी के सहारे उठता, तब तक लड़के और आगे बढ़ गये होते। फिर पूरा जोर लगाकर चलने लगता वह। होते-करते सड़क पर पहुँच गये सब। मुनुआ भी पहुँचकर हाँफ रहा था। धुँधलका और हल्का हो गया था। चन्द्रमा और चटख हो गया था। बुरी तरह हाँफने की वजह से वह हर अपमान को झेल लेने वाली मुस्कान नहीं मुस्करा पा रहा था।
जमाना बदल गया था। ऐसा लगता है कि सब जगह एक साथ नहीं बदलता जमाना। लोग अन्तरिक्ष में आने-जाने लगे थे। चन्द्रमा और मंगल की जमीन के टुकड़े बिकाऊ हो गये थे। इंटरनेट पर पूरी दुनिया उपलब्ध थी। जो इंटरनेट पर उपलब्ध नहीं था, वह दुनिया में शामिल नहीं था। या वह एक अलग दुनिया थी, जिसकी सुध किसी को नहीं थी। सोनबरसा में यही बदलाव हुआ कि कोस भर दूर एक सड़क बन गयी, जिस पर गिट्टी वाले ट्रकों, तिनपहिया टेम्पो और इक्का-दुक्का बसों का आना-जाना शुरू हो गया। गाँव में बिजली नहीं है। चार साल से खम्भे गड़े हैं। कुछ लोगों ने टेलीविजन खरीद लिये हैं। बैटरी से टेलीविजन चला कर वे धार्मिक सीरियल देखते हैं। मुनुआ हर सीरियल देखने जाता है लाठी के सहारे। सब से आगे बैठना चाहता है वह। सोनबरसा की काली-काली मिट्टी सोना बरसाती है। कातिक-अगहन में धान और फागुन-चैत में खेसारी की पकी सुनहरी फसलें सचमुच सोना बरसाती हैं। जब से खेसारी पर सरकारी रोक लगी, उसकी कीमत और बढ़ गयी। गाँव वाले इस रोक-टोक से बेपरवाह हैं। ...बाप-दादों के जमाने से होती आ रही है खेसारी की खेती। ...कोई नयी बात है क्या? सरकारी मुलाजिम भी इस ओर कुछ खास ध्यान नहीं देते। अब खेसारी के बोरों को ट्रैक्टर या बैलगाड़ी पर लादकर बाजार भी नहीं ले जाना पड़ता। आढ़तिये दिन डूबने पर खुद आ जाते हैं। चपड़ी-साँवली खेसारी। भीतर सोने के रंग की दो दालें। चने जैसा स्वाद। चने के बेसन में खेसारी की मिलावट कर देने से पता भी नहीं चलता और स्वाद भी बढ़ जाता है। आस-पास के हलवाई लड्डू और नमकीन में यही बेसन इस्तेमाल करते हैं। आम तौर पर गाँव वाले इसी की दाल खाते हैं। तीज-त्योहार पर इसी के बेसन से तरह-तरह के व्यंजन बनाये जाते हैं। मजूरों को इसी की मजूरी दी जाती है। वे इसी की दाल और इसी की रोटी खाते हैं। गाय-भैंस को भी यही खिलायी जाती है। नचकऊ पाँड़े की अलग समस्या है। उनके पास जमीन बहुत कम है। जो है भी, उसे वे बटाई पर उठा देते हैं। घर में न बैल हैं, न हल। साल भर का राशन मुश्किल से अँटता है। ब्राह्मण हैं। मजूरी भी नहीं कर सकते। जजमानी भी नहीं है। खेसारी की दाल और खेसारी की ही रोटी बनती है उनके घर। कभी एक जून, कभी दोनों जून। खेसारी का खाना ही अपंगता का कारण है, कुछ ऐसा रहस्य वैज्ञानिकों ने खोज निकाला था। पता नहीं यह कहाँ तक सच है, लेकिन यह सच है कि सोनबरसा में कई लोग लँगड़े हैं, ज्यादातर माता-पिता पोलियो की दवा को सन्देह की दृष्टि से देखते हैं। मुनुआ मुस्कराते हुए पहुँचता है। सरकारी मुलाजिम उसे दवा नहीं पिलाते। कहते हैं, यह छोटे बच्चों के लिए है। फिर भी नहीं हटता वह। लाठी के सहारे खड़ा रहता है मुस्कराते हुए। जब सरकारी मुलाजिम चलने को होते हैं, वह फिर पहुँच जाता है उनके पास।
‘डाक्टर साहेब हमें एक-दो बोतल यही दवाई दे देते.....।’
-आँखों में उम्मीद की चमक के साथ कहता है मुनुआ।
‘क्या ऽऽ ?’
- सब चौंक जाते हैं।
‘जैसे बच्चों को दो बूँद पिलाने से फायदा हो जाता है, तो हम एक दो बोतल पी लें, तब भी फायदा नहीं होगा.....?’
मुलाजिम चकित होकर उसकी ओर देखते हैं। फिर हँसने लगते हैं सब। लाठी टेके मुनुआ मुस्कराता रहता है। होंठों और गालों की कँपकँपी बढ़ जाती है। गाँव के हर अपंग ने अपनी नियति को स्वीकार कर लिया है। लेकिन मुनुआ अलग किस्म का लड़का है। हर पराजय के बाद किसी आगामी विजय का इन्तजार करने का धैर्य है उसमें, बेवकूफी की आखिरी हद तक। हर काम में आगे रहना चाहता है वह।
लड़के हैरान थे। शंकरगढ़ की ओर जाने वाला एक भी ट्रक नहीं आ रहा था। सारे ट्रक गिट्टी लदे आ रहे थे और शहर की ओर जा रहे थे। ट्रकों की हेडलाइट में लड़कों की पेशानी की सिकुड़नें दिख जाती थीं।.....ऐसा न हो कि नाच खतम हो गया हो। ...हो सकता है लखटकिया पेटल राजा की कुर्सी खींचकर सबको हँसा रहा हो। लड़कों की बेकरारी हद पार कर गयी। आखिरकार सब ने दौड़ने का फैसला किया। लेकिन फिर वही समस्या। ...मुनुआ कैसे दौड़ेगा?
‘अगर संकरगढ़ तक दौड़कर नहीं पहुँचा, तो असिल नचकऊ पाँड़े का पूत नहीं।’
- मूँछ पर ताव देते हुए बोल पड़ा मुनुआ, हालाँकि अभी पूरी मूँछे नहीं उगी थीं उसकी। उसने दौड़ना शुरू कर दिया और अभी दो-चार कदम भी नहीं दौड़ पाया था कि गिर पड़ा।
‘लो ससुर। दौड़ने चले थे.....।’
- लड़कों की बातें। आपस में ऐसे ही बोलते हैं लड़के। गाली-गलौज को कोई बुरा नहीं मानता। मुनुआ बुरी तरह हाँफ रहा था। उŸार देने की स्थिति में नहीं था वह। अभी उसकी साँसें थमी भी नहीं थीं कि दूर सड़क पर शंकरगढ़ की ओर जाने वाले ट्रक की हेडलाइट चमकी। लड़कों के मन चमक उठे। सब खड़े हो गये बीच सड़क पर। ट्रक खड़ा हो गया। सारे लड़के जल्दी-जल्दी चढ़ गये। मुनुआ नीचे ही खड़ा रहा। वह कैसे चढ़े.....?
‘ए, उतरो। अब इस मलेपंज को चढ़ाओ। .....भैया डरेबर साहेब, तनिक रुके रहना।’
- ड्राइवर की तरफ वाली खिड़की पीटते हुए चिल्ला रहे थे लड़के। दो लड़कों ने उतर कर मुनुआ को सहारा दिया। अब वह भी चढ़ गया ट्रक पर लाठी समेत।
‘चलो डरेबर साहेब।’
- लड़कों का सामूहिक स्वर।
ट्रक चल पड़ा। अब रफ्तार तेज हो गयी। लड़कों की उमंगों ने भी रफ्तार पकड़ ली। मुनुआ का हाँफना बन्द हो गया था। लाठी के सहारे सन्तुलन बनाये खड़ा था वह। बाकी लड़के तो इससे पहले भी ट्रक पर बैठे थे। मुनुआ के लिए यह पहला मौका था। धरती और आकाश के बीच उड़ रहा था वह। धुँधले उजाले में सड़क किनारे के पेड़, खेत और गाँव नाच रहे थे। रफ्तार का असर सब के दिमाग पर था। सब मस्ती में थे। ट्रक के पिछले हिस्से में खड़े थे सब। गतिहीन जिन्दगी की एकरसता टूट रही थी।
‘इस बार मुनुआ भी चल रहा है लीला देखने।’
‘एक बात है कि मुनुआ है बीर आदमी।’
- लड़के चुहल कर रह थे।
‘काहे का बीर? लंगड़-खंगड़ ससुर। आज इसी की वजह से देर हो गयी। बीरता तो तब है, जब चलतिया टरक से कूद पड़े।’
‘खबरदार। गलत बात मत बोलना हाँ।’
- मुनुआ ताव खा गया।
‘गलत बात बोल रहा हूँ? तुम लँगड़े नहीं हो?’
‘हूँ तो हूँ, मगर जिस चीज में तुम अपने को आगे समझते हो, बद लो।’
‘तुम चलतिया टरक से कूद सकते हो...?’
‘तुम कूद सकते हो.....?’
‘हम लोग तो दो-दो पैर वाले हैं।
‘तुम डेढ़ टाँग के आदमी, तुम बोलो!’
‘न कूदूँ तो असिल नचकऊ का नहीं।’
- ललकार दिया मुनुआ ने सीना ठोंक कर।
‘कूदो।’
‘तुम कूदो।’
‘पहले तुम तो कूदो।’
शंकरगढ़ आ गया था। ड्राइवर ने रफ्तार कम कर दी थी। मुनुआ के मन में कशमकश चल रही थी। कोई पढ़ाई में पास होता है। कोई कुश्ती जीतता है। कोई मोटर साइकिल चला लेता है। कोई ट्रैक्टर। एक मुनुआ है, जो कभी किसी काम का नहीं सिद्ध होता- न घर में, न बाहर। बहुत हुआ, तो गाय-गोरू लेकर सिंवान तक चला गया। बस। उसके दिमाग में वीरता के कुछ चूके हुए प्रसंग नाच गये। ...एक दिन, जब रामजियावन पहलवान को पेचिश हो रही थी और वे बार-बार लोटा लेकर खेतों की ओर भाग रहे थे, मुनुआ पहुँच गया, उनके पास।
‘आज हमें भी दाँव सिखा दो ओस्ताद।’
- लाठी टेकर मुस्कराते हुए बोला मुनुआ।
‘हियाँ पेटमुर्री उठी है और तुम्हें दाँव सीखने की सूझी है? पहले जिउ-जाँगर तो ठीक होने दो, फिर सीख लेना तुम भी दाँव।’
- लोटा लिये रामजियावन खेतों की ओर बढ़ गये। मुनुआ लाठी टेके खड़ा रहा वहीं, गाँव से बाहर बबूल के झाड़ के पास...।
...एक बार एक बहुत बड़े अभिनेता चुनाव लड़ रहे थे। उन्होंने फिल्मों में झुंड के झुंड पहलवानों को परास्त कर दिया था। सारे हथियार बेकार साबित कर दिये थे। ऊँची से ऊँची दीवार लाँघ गये थे। बड़ी-बड़ी इमारतों को बूट की ठोकरों से गिरा दिया था। मुनुआ ने खुद देखा था टेलीविजन में। चलती रेलगाड़ी की छत से कूदकर दूसरी रेलगाड़ी पर सवार हो गये थे अभिनेता। उन्हीं दिनों कोई ऐसा ही करतब दिखाने के सिलसिले में उनका दाहिना हाथ घायल हो गया था। चूँकि चुनाव लड़ रहे थे, इसलिए गाँव-गाँव जाना पड़ रहा था उन्हें। गाड़ी से उतरकर हाथ जोड़ लेते वे। मुस्कराते और छोटा वाला भोंपू निकाल कर भाषण देते। लेकिन लोग इतने से सन्तुष्ट नहीं हो रहे थे। वे अभिनेता से हाथ मिलाना चाह रहे थे। छूना चाह रहे थे। अभिनेता को लगा कि बिना लोगों से हाथ मिलाये चुनाव जीतना सम्भव नहीं है। आखिरकार उन्होंने हाथ मिलाने का फैसला कर लिया। लोग बहुत सँभाल कर चहेते अभिनेता का हाथ छू रहे थे। अभिनेता ने मुनुआ की ओर हाथ बढ़ाया। मुनुआ को वीर सिद्ध होने का एक दुर्लभ अवसर साक्षात् दिखा। मन की सारी वीरता का उपयोग करते हुए तान दिया उसने अपना पूरा शरीर लाठी के सहारे और दबा दिया कसकर अभिनेता का हाथ। अभिनेता चिहुँक उठे। अंगरक्षकों ने उसे धक्का देकर अभिनेता से अलग किया। वह गिर पड़ा। उठता, इसके पहले ही पुलिस वालों ने घेर लिया उसे।
‘पकड़ो साले को। यह तो आत्मघाती हमलावर लगता है।’
पुलिस वालों की मार से फिर गिर गया वह। विजय की खुशी काफूर हो गयी। डर के मारे घिघ्घी बँध गयी। मुँह से बोल नहीं निकल रहे थे।
‘छोड़ दो साहेब। अमलावर-हमलावर कुछ नहीं है, बकलोल है ससुरा।’
- गाँव वालों ने मुनुआ की मदद की। अभिनेता का काफिला आगे बढ़ गया था। पुलिसवाले भी चले गये।
‘आज नाक कटा दी तुमने सोनबरसा की.....।’
- बाद में सब खीझ रहे थे मुनुआ पर।
‘काहेऽऽ?’
‘गाँव में कोई भला आदमी आये, तो भलमनसाहत दिखानी चाहिए कि उजड्डपनऽऽ.....?’
‘इलिम फिलिम की बात और है, बाकी कलाई की ताकत में मुझसे कोई नहीं बढ़ सकता।’
- दबी जबान में बोला मुनुआ।
‘पुलिस पकड़ ले जाती तो सारी बहादुरी गायब हो जाती।’
- गाँव वालों ने डाँट लगायी।
चुप हो गया मुनुआ। मुस्कान पहले ही गायब हो गयी थी, अब सिर भी झुक गया। वह अपने घर चला गया और एक अँधेरे कोने में लेट गया झिंगली चारपाई पर। ...पुलिस पकड़ ले जाती तब?
ट्रक की रफ्तार काफी कम हो गयी थी। उसे वीर सिद्ध होने का एक अवसर फिर दिख रहा था। ...चोट-चपेट न लग जाय। ...फिर ठीक भी तो हो जायेगी चोट। ...जान चली गयी तो? ...डरेबर बिरिक मार दे और यह मौका भी चला जाय तो?.....तो?
‘जैऽऽहूऽऽ.....।’
- बजरंगबली का जैकारा बोलते हुए मुनुआ ने लगा दी छलाँग, लेकिन ट्रक से बाहर धरती और आकाश के बीच अपने को निराधार पाकर उसकी घिघ्घी बँध गयी। जैकारा चीख में बदल गया, आवाज के अनजाने स्तरों से निकली हुई चीख, जिसे चलते ट्रक पर सवार लड़कों ने क्रमशः मन्द होते सुना। वे बहुत घबरा गये थे। किसी के मुँह से बकार नहीं फूट रहा था। ट्रक रुकवाने के लिए वे ड्राइवर की खिड़की पीट रहे थे। ट्रक रुकते ही कूद पड़े लड़के। सब दौड़कर वहाँ पहुँचे, जहाँ मुनुआ मुँह के बल औंधा पड़ा था बीच सड़क पर। रामलीला शुरू थी। दूर तक बँधे लाउडस्पीकर के भोंपुओं से रामलीला का संगीत और चरित्रों के संवाद सुनायी पड़ रहे थे। मुनुआ हिल-डुल नहीं रहा था। कराह भी नहीं सुनायी पड़ रही थी। उजाला इतना नहीं था कि खून के बारीक छींटों को देखा जा सके।
‘ऐ! देखो धुकधुकी चल रही है कि नहीं।’
- लड़कों की घबराहट और बढ़ गयी। सबने मिलकर सीधा किया उसे। एक लड़के ने उसके सीने और पेट के पास कान लगाया। फिर सब ने बारी-बारी से उसके सीने और पेट के पास कान लगाया। खड़े हो गये सब उसके चारों ओर। चुपचाप। दिमाग नहीं काम कर रहा था किसी का। ...मुनुआ को सम्हालें कि रामलीला देखें। आखिरकार एक उपाय सूझ ही गया लड़कों को। अपने-अपने गमछों से उन्होंने मुनुआ के हाथ-पैर बाँधे और उसी की लाठी में उसे लटका कर रामलीला पंडाल की ओर चल पड़े।
लोटाढ़ और सोनबरसा वालों में हर साल लड़ाई होती है। कुश्ती में कभी लोटाढ़ वाले जीतते हैं, कभी सोनबरसा वाले। हार का बदला शंकरगढ़ की रामलीला में लिया जाता है। इस साल लोटाढ़ वालों को अलग बैठाया गया और शंकरगढ़ वालों को अलग। बल्लियों में रस्सी बाँधकर भेदक बाड़े बने हैं। सोनबरसा वाले बाड़े की ओर मुनुआ को लेटा दिया गया। हाथ-पैर खोल दिये गये। पीछे के दर्शकों का ध्यान इधर गया। फिर वे इसे रामलीला के किसी आने वाले दृश्य की तैयारी मानकर सन्तुष्ट हो गये। लड़के आँखें फाड़े रामलीला देखने लगे। उन सबका चित्त रामलीला में पूरी तरह रम गया था। मंच पर रावण धनुष उठाने के लिए खड़ा हो चुका था। पर्दे के पीछे से आकाशवाणी हो रही थी-
‘ऐ रावण.....। तेरी लंका में आग लगी हैऽऽऽ.....।’
ठीक उसी समय घायल जानवर की चिघ्घाड़ की तरह सुनायी पड़ी मुनुआ की कराह। दर्शकों ने इसे भी आकाशवाणी समझा। लड़कों का ध्यान फिर मुनुआ की ओर गया। उन्हें तसल्ली हुई कि मुनुआ जिन्दा है।
‘चुप ससुर! कहीं लोटाढ़ वालों ने सुन लिया तो नाक कट जायेगी सोनबरसा की।’
- लड़कों ने दबी जबान में डाँटा मुनुआ को। पता नहीं उसने लड़कों की डाँट सुनी या नहीं, लेकिन फिर नहीं सुनायी पड़ी उसकी कराह। देर रात तक चलती रही रामलीला। सब तल्लीन होकर लीला देखते रहे।
रामलीला खतम हुई, तो इस बार सब पैदल लौटे मुनुआ को लाठी में लटकाये हुए। अब वह लगातार कराह रहा था- क्षीण कराह। लड़के बारी-बारी से कन्धा बदलते हुए ढोये जा रहे थे उसे।
‘मुन्नू भाई.....! मुन्नू भाई.....।’
- बीच-बीच में वे मुनुआ को पुकारते, लेकिन मुनुआ होश में नहीं था। आते-जाते ट्रकों की रोशनी लड़कों पर पड़ती, तो डर जाते वे।
‘ए भाई, खलेटी की पगडंडी पकड़ लो। सड़क छोड़ो। दूरी भी कम हो जायेगी।’
अब वे पगडंडी पर चल रहे थे। कोई कुछ बोल नहीं रहा था। रात का आखिरी पहर था। चारों ओर सन्नाटा पसरा था। मुनुआ की कराह और हाँफते लड़कों की साँसों के सिवा कुछ नहीं सुनायी पड़ता था। आस-पास के गाँव, सिंवान और पेड़-पौधे- सब चाँदनी में नहाये थे।
सोनबरसा पहुँचे लड़के, तो भोर होने में थोड़ी ही देर थी। चन्द्रमा अस्त हो गया था। लड़कों ने मुनुआ को उसके दरवाजे पीपल तले लेटा दिया और जल्दी-जल्दी हाथ-पैर खोलकर भाग गये। नचकऊ सो रहे थे। मुनुआ कराहता रहा- अवचेतन से लगातार निकलती क्षीण कराह।
दिन चढ़ आया था। नचकऊ पाँड़े थाली पीटते हुए पूरे गाँव की परिक्रमा कर आये थे। गाँव के बड़े-बुजुर्ग शौच आदि से निवृत्त होकर और अपने-अपने खेतों का चक्कर लगाकर आ गये थे। नचकऊ के दरवाजे पूरा मजमा लग गया था। मुनुआ जमीन पर पड़ा कराह रहा था। अब वह होश में था। चेहरे पर खून की पपड़ियाँ जम गयी थीं कहीं-कहीं। उन पर मक्खियाँ भिनभिना रही थीं। माई गोद में मुनुआ का सिर लेकर विलाप कर रही थी। बुजुर्गों के आते ही मुँह ढँक लिया माई ने। विलाप में कोई फर्क नहीं पड़ा। छोटे बच्चे पहले से जमा थे। बुजुर्गों ने आते ही बच्चों को भगा दिया। मुनुआ के चारों ओर खड़े हो गये सब लोग। नचकऊ ने अपनी फरियाद पहले ही कर दी थी पंचों से।
‘कौन-कौन लड़के थे तुम्हारे साथ?’
- बुजुर्गों ने मुनुआ से पूछा। कराहों के बीच बड़ी मुश्किल से उसने लड़कों के नाम बताये। लड़के बुलाये गये। वे डरे हुए थे। ...पता नहीं पंच लोग क्या सजा बोल दें? ...पता नहीं क्या जुर्माना लगा दें?
‘तुम लोगों ने मुनुआ को धक्का देकर चलतिया टरक से गिरा दिया...?’
लड़कों की आँखें धरती में गड़ी जा रही थीं। बीच-बीच में वे कनखियों से एक दूसरे की ओर देखते। बुजुर्ग अपने को डर रहे थे। ...उजड्ड लड़के। ...कोई हुकुम उदूली न कर दें।
‘कौन...माई का लाल...मुझे धक्का देकर गिरा सकता है...?’
- लड़के कुछ कहते, इससे पहले ही बोल पड़ा मुनुआ। आज वह रुक-रुक कर बोल रहा था, थकी-थकी आवाज में।
‘लेकिन.....मैं कूदा.....बाकी.....कोई नहीं कूदा.....। चलतिया टरक से कूदना...मजाक नहीं है.....। चोट-चपेट तो...लगेगी ही...। उसकी...पर-पंचाइत छोड़ो...। ...ये नियाव करो.....कि सच्चा बीर कौन है.....।’
- थोड़ी देर बाद फिर बोला मुनुआ।
लड़कों ने एक-दूसरे की ओर देखा। फिर सब मुस्कराते हुए नारा लगाने लगे-
‘सच्चा बीरऽऽ! मुन्नू पाँड़ेऽऽ!’
‘सच्चा बीरऽऽ! मुन्नू पाँड़ेऽऽ!’
मुनुआ के चेहरे पर जीत की मुस्कान खिल उठी। ठीक उसी समय नाक और होंठों के बीच अचानक उठे तेज दर्द से कराह उठा वह। खून की पपड़ियों पर बैठी मक्खियाँ उड़ गयीं। नारों के बीच कराह दब गयी। बुजुर्ग एक दूसरे का चेहरा देखने लगे। नचकऊ पाँड़े थाली फेंक कर अपना सिर पीटने लगे। हर्जाने की रकम से मुनुआ का इलाज कराने की उनकी उम्मीद पर पानी फिर गया। माई उसी तरह विलाप करती रही। उस समय किसी की समझ में नहीं आया कि यह मुनुआ की आखिरी मुस्कान है और आखिरी चीख भी...।
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