संदेश

जुलाई, 2010 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

मूरतें -शिवशंकर मिश्र

                                    एक पुरानी धार्मिक इमारत ढहा दी गयी थी और उससे भी पुरानी एक दूसरी धार्मिक इमारत के खँडहर धरती के गर्भ में गंभीरता से खोजे जा रहे थे। लाशों से भरी रेलगाड़ी की बोगियां एक शहर से दूसरे शहर पहुँच चुकी थीं। चलती गाड़ियों से लड़के फेंके जा रहे थे। रेलगाड़ियाँ खूनी हो गयी थीं। अखबारों में भूख से मरने वालों की खबरें नदारद थीं। उनकी जगह दंगों में मरने वालों की खबरों ने ले ली थी। ...करीब बीस साल बाद मैं अपने गाँव जा रहा था। जरूरी था। भाई ने पत्र में लिखा था कि बेटे का ब्याह है और जमीन का बँटवारा होना है। मौके से सब रिश्तेदार रहेंगे। रिश्तेदारों के सामने बाँट-बखरा होने से बाद में कुछ कहने-सुनने की बात नहीं रहेगी। ...बँटवारा है तो ख़राब चीज, लेकिन महानगर में बीस साल रहकर जमीन के छोटे से टुकड़े का महत्त्व समझ में आ गया था। ...सारे भय और आतंक के बावजूद जमीन के एक टुकड़े के मालिकाना हक़ का एहसास अच्छा लग रहा था... । डीजल, पेट्रोल और तकनीक के बाद एक जमीन ही तो है, जिसकी कीमत ...