सुबह के आठ बजते-बजते रोज की तरह खाकी कमीज और चौड़ी मुहरी का उटँग पाजामा पहनकर अनंतराम दफ्तर के लिए रवाना हो गये- साइकिल से। एक बीड़ा पान वे घर से खाकर चले और दूसरा बीड़ा गमछे के छोर में बाँध लिया। अनंतराम का घर गाँव में था और दफ्तर शहर में। गाँव से शहर की दूरी चौबीस किलोमीटर थी। अनंतराम एक बीड़ा पान मुँह में दबाकर यह दूरी साइकिल से डेढ़-दो घंटों में पूरी कर लेते थे। लौटते समय फिर यही सिलसिला। अब की बार गमछे के छोर में बँधा पान का बीड़ा काम आता। यों अनंतराम की नौकरी में कोई ऐसी बाध्यता नहीं थी कि खाकी कमीज पहनी जाय, फिर भी वे हमेशा खाकी कमीज और चौड़ी मुहरी का सफेद पाजामा पहनते थे। दरअसल खाकी कमीज पहनने की वजह यह थी कि अनंतराम थे तो चतुर्थ श्रेणी सरकारी कर्मचारी, पर उनका कोई रुतबा नहीं था, ऐसा उन्हें लगता था। इस वजह से वे खाकी कमीज पहनते और खुद को पुलिस के सिपाही जैसा रुतबेदार महसूस करते थे।
दिन के तीन बजे तक सब कुछ सामान्य ढंग से होता रहा-रोज की तरह। तकरीबन साढ़े तीन बजे, जबकि सभी अधिकारी और कर्मचारी काफी व्यस्त हो गये थे, गेट के बाहर फूटते पटाखों, लाउडस्पीकर पर बजते हनुमान-चालीसा और बीच-बीच में लगाये जाने वाले जैकारों के मिले-जुले शोर ने सब का ध्यान खींच लिया। सब चौंक गये और खिड़कियों से बाहर झाँकने लगे। गेट के पास गुलमुहर के नीचे एक वैन खड़ी थी। कुछ लोग लाठियाँ लिये खड़े थे। एक आदमी दूसरे के कंधे पर सवार था और बीच-बीच में जैकारे लगवाने लगता था।
’बोलो बजरंग बली की....’ -दूसरे के कंधे पर सवार आदमी चीखता।बाकी लोग कहते- ‘जै...!’
‘बोलो भोले भंडारी की...’
‘जै...!’
बोलो अनंतराम की....
’जै....!’
लोगों की समझ में यह बात तो आ गयी कि आज अनंतराम की नौकरी का आखिरी दिन है, लेकिन ये जैकारे लगाने वाले कौन हैं और ये लाठियाँ क्यों लिये हैं, यह किसी की समझ में नहीं आया। इस जिज्ञासा के साथ लोग बाहर का दृश्य कुछ देर तक देखते रहे, फिर अपनी-अपनी फाइलों में व्यस्त हो गये। इस बीच अनंतराम के चेहरे पर जो आत्मगौरव दीप्त हो रहा था, उस पर किसी का ध्यान नहीं गया। अचानक साहब की घंटी बजी। अनंतराम पर्दा हटाकर साहब के कमरे में घुस गये।
’अनंतराम ये कौन लोग है?’
’सब अपने भाई हैं साहेब।’’हूँ। ये लाठियाँ क्यों लिये हैं?’
’साहब सब के पैर खराब हैं।’
’हूँ। तुम्हारे तो ठीक हैं!’
’हाँ साहब भगवान की महिमा।’
’कितने भाई हो?’
’मुझे भी लेकर सात भाई और दो बहनें साहेब।’
’सात भाई और दो बहनें?’
’हूँ पिताजी क्या करते थे?’
’इसी महकमे में एक हाकिम के खानसामा थे साहेब।
उन्हीं ने मुझे नौकरी दिलायी थी।’
’ठीक है। तुम जा सकते हो। बेस्ट ऑफ लक।
फंड और पेंशन के कागजात दो-चार दिन में पूरे हो जायेंगे।’
थोड़ी देर अनंतराम हाथ जोड़े खड़े रहे कि शायद साहब हाथ मिलायें, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। साहब फाइलों में व्यस्त हो गये। बाहर लाउडस्पीकर पर हनुमान-चालीसा बजता रहा, पटाखे फूटते रहे, बीच-बीच में जैकारे लगते रहे और अनंतराम हाथ जोड़े-जोड़े पूरे दफ्तर का चक्कर लगाते रहे। सब ने कुछ न कुछ कहा। सबने सुखद भविष्य की शुभकामनाएँ दीं, पर हाथ किसी ने नहीं मिलाया। दरअसल अनंतराम उस दफ्तर में चतुर्थ श्रेणी के अकेले कर्मचारी थे। उनकी आँखों के सामने कई अधिकारी और कर्मचारी रिटायर हुए। सबके रिटायरमेंट पर पार्टी हुई और मालाएँ पहनायी गयीं, लेकिन अनंतराम के साथ ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। इसका अँदेशा उन्हें पहले से था। अब तक जो लोग रिटायर हुए, वे या तो अधिकारी थे या तृतीय श्रेणी कर्मचारी। उनकी अपनी-अपनी यूनियनें थीं। यूनियन की ओर से विदाई दी गयी। अनंतराम चतुर्थ श्रेणी के इकलौते कर्मचारी थे। उन्हें कौन विदाई देता...? यह सब समझते हुए उन्होंने आज के कार्यक्रम की तैयारी पहले से की थी-पूरे परिवार के साथ।
दफ्तर की सीढ़ियाँ उतरकर वे जैसे ही गुलमुहर के नीचे खड़ी वैन के पास पहुँचे, जैकारे तेज हो गये। सभी भाइयों ने अनंतराम को गुलाब की मालाएँ पहनायीं। इस बीच गुलमुहर की कुछ पंखुड़ियाँ गिरकर अनंतराम की मालाओं में उलझ गयीं और कुछ धरती में गिर गयीं। थोड़ी देर जैकारे लगते रहे, फिर सब चुप। सिर्फ हनुमान-चालीसा बजता रहा-बार-बार। अब उनकी चिन्ता का विषय था कि अनंतराम की साइकिल घर तक कैसे पहुँचे। हालाँकि अनंतराम वही खाकी कमीज और उटँग पाजामा पहनकर दफ्तर आये थे, जो रोज पहनते थे, फिर भी गुलाब की छः मालाएँ पहनकर वे साइकिल चलाते, यह शोभाजनक न होता और बाकी भाइयों के पैर खराब थे, वे साइकिल न चला पाते।
दफ्तर बंद होने का समय हो गया था। सब अपने-अपने वाहन स्टार्ट कर रहे थे और अनंतराम अपने भाइयों के साथ मशविरा कर रहे थे कि साइकिल कैसे घर तक पहुँचे। ऐसे तो हर रोज वे साइकिल से ही आते-जाते थे। चौबीस किलोमीटर साइकिल चलाते-चलाते उनकी पिंडलियों में दर्द होने लगता, जाँघें भर आतीं, पर हर महीने मिलने वाली तनख्वाह का ध्यान आते ही सारी थकान दूर हो जाती। लेकिन आज की बात अलग थी। आज के बाद से यह रोज-रोज की दौड़ बंद हो जायेगी, यह सोचकर वे अलसा रहे थे। आज उनका भी मन वैन में बैठने को हो रहा था। गुलाब की मालाओं की खुशबू और फंड की जमा रकम एकमुश्त मिलने के अनुमान से उनका मन महक रहा था। हनुमान-चालीसा लगातार बज रहा था। दफ्तर के सारे लोग एक-एक कर अपने-अपने वाहनों से अपने-अपने घरों को रवाना हो रहे थे। माहौल में पेट्रोल की गंध फैल रही थी। अलसाये अनंतराम साइकिल का हैंडिल थामे खड़े थे। शेष पाँच भाई साइकिल कैसे घर तक पहुँचे, इस चिंता में डूबे अपनी-अपनी लाठियों के सहारे खड़े थे। लाउडस्पीकर वाले के कंधे पर सवार मंथवा की भी चिंता का विषय अनंतराम की साइकिल ही थी।
‘काहे हो पाँड़े महराज? अब किस बात की देरी है?‘ -ड्राइवर ने अनंतराम और उनके भाइयों की किंकर्त्तव्यविमूढ़ता तोड़ी।
‘ड्राइवर साहेब, साइकिल कैसे ले चलें...? और हाँ, लाउडस्पीकर वाला कहाँ बैठेगा?‘
‘ड्राइवर साहेब, साइकिल कैसे ले चलें...? और हाँ, लाउडस्पीकर वाला कहाँ बैठेगा?‘
‘महराज यह आठ सीट वाली वैन है, जैसे आठ, वैसे नौ। तुम लोग गाड़ी में बैठो और एक रस्सी का जुगाड़ करो, तो साइकिल छत पर लगे स्टैंड में बाँध दें।‘
रस्सी तो नहीं मिली, लेकिन ननकउना ने अपनी लुंगी उतार कर दे दी। वह अनंतराम का सबसे छोटा भाई था। ड्राइवर ने लुंगी से कैरियर में साइकिल बाँध दी। समस्या हल। माला पहने अनंतराम आगे की सीट पर और लँगोट-कुर्ता पहने ननकउना, तथा लुंगी-कुर्ता पहने शेष पाँच भाई पीछे की सीटों पर सवार हो गये। उनकी लाठियाँ कभी वैन की छत से टकरा जातीं, कभी आपस में।
‘ए भाई, लाठियाँ सीट के नीचे रख दो-पिछली बार की तरह।’ -ड्राइवर ने कहा।जैकारे जो थोड़ी देर के लिए बन्द हो गये थे, फिर शुरू हो गये, लेकिन वैन के शीशे बन्द होने के कारण अब वे भीतर ही घुट कर रह जाते। लाउडस्पीकर पर बजता हनुमान-चालीसा भीतर न सुनाई पड़ता और जैकारे बाहर न निकल पाते, फिर भी पीछे की सीटों पर बैठे छहों भाई जैकारे लगाये जा रहे थे और आगे की सीट पर बैठे अनंतराम के दिमाग में पिता बचई पाँड़े की झलकियाँ नाच रही थीं। .....पंजों के बल उचक-उचक कर चलते थे बचई पाँड़े। ...धोती-बंडी और टायर की चप्पलें। ...भले ही वे पंजों के बल चलते रहे हों, पर लाठी का सहारा नहीं लेना पड़ता था। ...महीने दो महीने में कभी दो-चार दिन के लिए वे गाँव आते। ...बाकी समय यूनीवर्सिटी के एक हास्टल में मेस चलाते थे। ...बाद में उसी हास्टल का एक विद्यार्थी कोई अधिकारी हो गया। ...शादी हुई थी, लेकिन पता नहीं क्यों अकेले रहता था। जहाँ ट्रांसफर होता, बचई को साथ ले जाता। ...बचई उसके खानसामा थे। ...बचई पाँड़े गाँव के सबसे गरीब ब्राह्मण थे, लेकिन सबसे कुलीन। लिहाजा सब उनका पैर छूते। ...आखिरी बार वे गाँव आये, तो छड़ी के सहारे चल रहे थे।
‘जा रे अनंता, तू नौकरी कर। हाकिम बोला कि बचई पाँड़े तू तो बूढ़ा हो गया, अब जा आराम कर। हाँ, तुम्हारा कोई लड़का हाईस्कूल या कम से कम आठवीं पास हो तो भेज देना। चपरासी का पद खाली है।’
- अब की बार बचई पाँड़े बोलते, तो खाँसी आने लगती-बुरी तरह।...अगले दिन अनंतराम आठ पास की मार्कशीट लेकर डरते-डरते बस से गये थे-पिता के बताये पते पर।
‘हूँ। तेरा बाप तो अँगूठाटेक था, इस वजह से उसकी नियुक्ति नहीं की जा सकती थी। उसने बहुत दिनों तक मुझे खाना खिलाया। तुम्हारी नियुक्ति चतुर्थ श्रेणी में हो जायेगी। नौकरी कर और मेरा खाना-वाना बना दिया कर। रहने की जगह मैं दे दूँगा।’
-...हाकिम ने कहा था। ...साल भर बाद हाकिम रिटायर हो गया। ...तब तक अनंतराम ने नई साइकिल खरीद ली थी और रोज घर से आने-जाने लगे थे।
अभी वे थोड़ी ही दूर गये थे कि ड्राइवर ने अचानक ब्रेक लगायी। अनंतराम का माथा डैशबोर्ड से टकराया और स्मृतियों का सिलसिला टूट गया। पीछे बैठे छहों भाई एक-दूसरे से टकरा गये और जैकारे बन्द हो गये। जिन लाठियों के सहारे वे अपना संतुलन बनाते थे, उन्हें सीट के नीचे रख देने से वे खुद को असहाय महसूस कर रहे थे। बड़ी मुश्किल से वे फिर अपनी-अपनी जगहों पर बैठे और सीट पर उँगलियों की पकड़ मजबूत की। वे फिर से जैकारे शुरू करने जा ही रहे थे कि स्पीड ब्रेकर आ गया। वे फिर टकरा गये एक-दूसरे से। सड़क पर कहीं गड्ढे आते, कहीं स्पीड ब्रेकर। कभी आगे चलती गाड़ी में ब्रेक लगती। हर झटके के साथ वे अपनी-अपनी सीटों से नये सिरे से विस्थापित होते और कभी-कभी वैन की फर्श पर गिर पड़ते। कभी किसी की कुहनी किसी को लगती, कभी किसी का घुटना। वे अनंतराम के उत्साह से उत्साहित थे और पहली बार चार पहिया गाड़ी पर बैठने का सुख लेना चाह रहे थे, लेकिन हर झटका उनके उत्साह और सुख की अनुभूति को बुरी तरह झकझोर देता। आगे की सीट पर बैठे अनंतराम कभी यादों में खो जाते, कभी फंड के रुपयों के उपयोग के बारे में कुछ सोचने लगते। उनका बड़ा मन था कि आज वे नेताओं की तरह खुली जीप में हाथ जोड़कर खड़े-खड़े चलते, लेकिन कोई ऐसी गाड़ी मिल नहीं पायी। यों यह पूरा सफर मुश्किल से चालीस-पैंतालीस मिनट का था, लेकिन इस अवधि में अनंतराम ने पता नहीं क्या-क्या सोच लिया और पीछे बैठे छहों भाइयों ने पता नहीं क्या-क्या देख लिया और पता नहीं क्या-क्या भोग लिया। वे पहली बार शहर आये थे। मोटर-गाड़ियों की इतनी बड़ी भीड़ उन्होंने पहले कभी नहीं देखी थी। उस भीड़ वाले चौराहे पर खड़ा ट्रैफिक पुलिस उन्हें सबसे ज्यादा रुतबे वाला हाकिम समझ में आया, जिसके एक इशारे पर सैकड़ों गाड़ियाँ खड़ी हो जाती थीं। तरह-तरह के कपड़े पहने युवक-युवतियों, रँगी-पुती बड़ी-बड़ी इमारतों और सलीके से लगे पेड़ों की कतारों को देख-देख कर वे विस्मित हो रहे थे। पता नहीं पैर खराब होने की वजह से या किसी दूसरी वजह से अनंतराम के सिवा किसी की शादी नहीं हुई थी। सबकी उम्र पचास के ऊपर हो जाने के कारण अब शादी की कोई संभावना भी नहीं थी। उनके मन की दशा अजीब थी। पता नहीं कौन-कौन सी दमित इच्छाएँ उनके भीतर उठतीं और अगले ही पल कुचल जातीं...।
दिन ढलने में अभी थोड़ी देर थी। लोग खेतों खलिहानों में काम कर रहे थे। हनुमान-चालीसा दूर तक सुनायी पड़ रहा था। लाउडस्पीकर बँधी वैन गाँव की पगडंडी की ओर मुड़ते देख लोग ठिठक गये। ऊबड़-खाबड़ पगडंडी पर वैन हिचकोले खा रही थी। अनंतराम के छहों भाई हिचकोलों से बुरी तरह आपस में टकरा रहे थे, लेकिन इस समय उन सबकी और अनंतराम की भी हार्दिक इच्छा यह थी कि गाँव का हर आदमी आज उन्हें चार पहिया गाड़ी पर सवार देख ले। आपस में टकराने से उन्हें चोट लग रही थी, लेकिन चोट-चपेट की परवाह किये बगैर वे फिर जैकारे लगाने लगे। अब वे पूरी ताकत लगा कर जैकारे लगा रहे थे, ताकि गाँव का हर आदमी सुन ले; लेकिन पता नही क्यों वे माइक्रोफोन का इस्तेमाल नहीं कर रहे थे और वैन के शीशे बन्द होने से हर जैकारा भीतर ही घुटकर रह जाता। हनुमान-चालीसा लगातार बजता रहा।
‘बस महराज।’ -निहायत सँकरी गली के मुहाने पर ब्रेक लगाते हुए ड्राइवर ने कहा।‘काहे हो...?’ -अनंतराम सहित सभी भाई एक साथ बोल पड़े। वे चाहते थे कि वैन दरवाजे तक चले।
‘अरे भाई, इतनी सँकरी गली में गाड़ी कैसे घुसेगी? दोनों तरफ नाबदान का पानी बह रहा है। गली में कीचड़ है। पहिया फँस गया, तो क्या होगा?’
‘तो खोलो गेट और इतना समझ लो कि रुपैया हम दरवाजे पर पहुँच कर ही गिनेंगे।’-अनंतराम ने आखिरी दाँव लगाया। ड्राइवर आसानी से तैयार हो गया। पहले उसने आगे का गेट खोला, फिर पीछे का। सबसे पहले अनंतराम उतरे, फिर लाउडस्पीकर वाला। पाँच भाइयों ने पहले उँगलियों की छुअन से, फिर आँखों से अपनी-अपनी लाठियों की पहचान की और बारी-बारी से वैन से उतर गये। लाठियाँ हाथ में आ जाने से वे खुद को आत्मनिर्भर महसूस कर रहे थे।
‘ए, पहले मेरी लुंगी तो निकालो!’ - लँगोट-कुर्ता पहने ननकउना चिल्लाया।
ड्राइवर ने कैरियर में लुंगी से बँधी साइकिल नीचे उतारी, जिसे माला पहने अनंतराम ने थाम लिया।छोटे भाई को लुंगी मिल गयी। लाठी और लुंगी मिल जाने से अब वह अपने आपको पूर्ण महसूस कर रहा था। इस बीच लाउडस्पीकर वाले ने लाउडस्पीकर बन्द कर दिया। हनुमान-चालीसा बन्द...। उसकी जगह गाँव का सन्नाटा उभर आया, जो अनंतराम और उनके भाइयों को बेहद नागवार लगा।
‘ए, हमें भी तो उतारो।’ -मंथवा चिल्लाया। वह अपने से नहीं उतर सकता था।
लाउडस्पीकर वाले ने उसे वैन से उतार कर कंधे पर बैठा लिया। मंथवा इसी तरह चलता है। कभी आस-पास के गाँवों से कबड्डी खेलने का बुलावा आता है, तो गाँव की टीम के लड़के उसे कंधे पर बैठा कर ले जाते हैं। हालाँकि वह कबड्डी नहीं खेल सकता, लेकिन उसकी जैसी ललकार कोई दूसरा नहीं लगा सकता। वह फिर जैकारे लगवाने लगा। कीचड़ भरी तंग गली में फिसलन से बचते हुए वे जैकारे लगाते चले जा रहे थे। मंथवा तरह-तरह के देवी-देवताओं की कल्पना करता और उनके नाम के जैकारे लगवा रहा था-
‘बोलो गाँउ देउता की......’ बाकी लोग कहते- ‘जै...!’
‘बोलो दखिनहिया महरानी की....’
‘बोलो दखिनहिया महरानी की....’
‘जै...!’
‘बोलो बाँके बिहारी की....’
‘बोलो बाँके बिहारी की....’
‘जै...!’
मंथवा का पूरा नाम अमरनाथ है। वह अनंतराम का दूसरे नंबर का भाई है। अमरनथवा का संक्षिप्त रूप मंथवा हो गया, उसी तरह जैसे अनंतराम का नंतवा; लेकिन चूँकि अनंतराम सरकारी मुलाजिम थे, इसलिए गाँव के लोग उनका पूरा नाम लेते थे-सम्मानपूर्वक।
‘बोलो गंगा मैया की...’‘जै...!’
’बोलो बजरंग बली की....’
’बोलो बजरंग बली की....’
‘जै...!’
‘बोलो अनंतराम की.....’
‘बोलो अनंतराम की.....’
’जै....!’
-देवी-देवताओं के जैकारों के बाद अब मंथवा लगातार अनंतराम के जैकारे लगवा रहा था और ‘जै’ बोलने वालों में खुद अनंतराम भी शामिल थे। गुलाब की मालाओं की खुशबू और दोन ओर की नालियों में जमे नाबदान के पानी की बदबू के अंतर्विरोध से साइकिल घसीटते अनंतराम के मन की महक तनिक भी कम नहीं हुई। जैकारों का शोर गाँव के सन्नाटे को चीर रहा था और हर प्राणी पर उसका असर अलग-अलग हो रहा था। गाँव के सारे कुत्ते इकट्ठा हो गये और उस हुजूम के पीछे चलने लगे। वे भौंके जा रहे थे-लगातार। पता नहीं वे जैकारों में शिरकत कर रहे थे या उनका प्रतिपक्ष रच रहे थे इस तरह।
अनंतराम की औरत और दोनों लड़कों के शरीर में बिजली की सी फुर्ती समा गयी। औरत दौड़ कर भीतर गयी और थाल सजाने लगी। एक लड़का चारपाइयाँ निकालने लगा। दूसरा हरिजन बस्ती की ओर दौड़ गया- बीन-बैंड पार्टी बुलाने के लिए। अनंतराम और उनके सभी भाई दरवाजे पर पहुँच गये। अब सब चुप...। मालाएँ पहने अनंतराम ने साइकिल दीवार से टिका कर खड़ी की। दीवार के ऊपर स्वास्थ्य विभाग के कुछ निर्देश गेरू से लिखे गये थे। मिट्टी के उस बड़े खपरैल मकान की दालान की बाहरी दीवारें और खंभे अनंतराम ने बाद में कभी ईंटों से बनवा दिये थे। चूने की पुताई के ऊपर स्वास्थ्य विभाग की इबारतें दूर से चमकती हैं- भित्ति-चित्र की तरह। गाँव वाले इबारत की तरह नहीं पढ़ते इन्हें; ‘बुखार कोई भी हो, मलेरिया हो सकता है। ...बुखार होने पर खून की जाँच अवश्य करायें। मलेरिया एक जानलेवा बुखार है।’ आदि-आदि...।
अनंतराम चारपाई पर बैठ गये, बाकी भाई दूसरी चारपाइयों पर। कुत्तों ने भौंकना बंद कर दिया और अब वे सँूघ-सूँघ कर सारा मामला समझना चाह रहे थे। तब तक अनंतराम की औरत थाल सजाकर बाहर आयी। उसने नयी साड़ी पहनी थी, पैरों में महावर लगाया था और थाल में हल्दी, दूब, फूल, अक्षत और जलते दीपक लेकर अनंतराम की आरती उतार रही थी... अनंतराम का चेहरा दमक रहा था...। दरवाजे पर बहते खुले नाबदान की बदबू से निरपेक्ष थे वे। अनंतराम की आरती उतारने के बाद वह मंथवा की आरती उतारने लगी।
‘अरे भौजी, आरती-बंदन बाद में कर लेना, पहले कुछ पानी-पिंगल कराओ। गला तो सूख गया ससुर।’ - जैकारे लगवाते-लगवाते मंथवा की आवाज बैठ गयी थी।
आरती का थाल वहीं रख कर औरत भीतर गयी और गुड़ की तीन भेलियों को सिल पर रख कर लोढ़े की चोट से उन्हें नन्हीं डलियों की शक्ल देने लगी जल्दी-जल्दी। बड़े लड़के ने दरवाजे पर लगे हैंडपंप से पानी निकाला। सातों भाइयों ने गुड़ की एक-एक डली खा ली और लोटे से पानी पी लिया बारी-बारी से। गुड़ की एक-एक डली खाकर और एक-एक लोटा पानी पी कर उन्होंने शरीर में नयी ऊर्जा महसूस की।
‘अरे तुम लोग काहे खड़े हो? चारपाई पर बैठो और पानी पियो।’ -अनंतराम ने ड्राइवर और लाउडस्पीकर वाले से कहा। वे न तो चारपाई पर बैठे और न ही उन्होंने पानी पिया।
...बाँभन के घर कौन चारपाई पर बैठे और कौन बर्तन जूठा करे? ड्राइवर मुसलमान था और लाउडस्पीकर वाला हरिजन। अनंतराम ने उत्साह में कह तो दिया, लेकिन पल भर बाद ही अपनी भूल को महसूस किया और इसका परिहार इस तरह किया कि कटोरे से गुड़ की डलियाँ खुद ही निकाल कर दोनों की हथेलियों पर गिरा दीं। बड़े लड़के ने हैंडपंप चला दिया, दोनों ने अँजुरी से पानी पी लिया। अभी तक सब वैन में एक साथ बैठे थे-सटकर, लेकिन दरवाजे पर पहुँच कर अनंतराम और उनके भाइयों का ब्राह्मणत्व जाग उठा। अब वे ड्राइवर और लाउडस्पीकर वाले की छुअन से भरसक बच रहे थे। लाउडस्पीकर वाला ड्राइवर की छुअन से बच रहा था। गाँव पहुँच कर सब अपनी-अपनी जाति-मर्यादा की रक्षा के प्रति सजग हो गये।
‘महराज हमारा हिसाब कर दो, हम लोगों को दूसरी जगह जाना है।’
अनंतराम ने खाकी कमीज की इकलौती जेब से रुपये निकाले। रुपये गिनते समय उनके चेहरे की दमक पता नहीं कहाँ खो गयी।
‘पकड़, तेरे तीन सौ।’ -लाउडस्पीकर वाले से बोले अनंतराम। उसने दोनों हथेलियाँ फैला दीं, जिन पर अनंतराम ने सौ-सौ के तीन नोट गिरा दिये।‘हूँ, तुम्हारे सात सौ।’
‘चालिस और दे दो पंडिज्जी।’
‘काहे का चालिस?’
‘टोल टैक्स का।’
‘उसकी बात तो पहले से नहीं हुई थी।’
चालीस रुपयों के लिए देर तक झिकझिक होती रही। माला पहने अनंतराम अपने पक्ष पर दृढ़ थे और ड्राइवर अपनी बात पर। छहों भाई लगभग तटस्थ थे। उनके मन में शहर की झलकियाँ नाच रही थीं। कुत्ते फिर भौंकने लगे। पता नहीं, इस समय उनकी प्रतिबद्धता किसके प्रति थी? आखिरकार अनंतराम ने चालीस रुपये नहीं दिये। भुनभुनाता ड्राइवर चला गया। हालाँकि इस किचकिच और एक हजार रुपये एक मुश्त खर्च हो जाने से अनंतराम के मन का उल्लास थोड़ा प्रभावित हुआ, लेकिन अगले ही पल चालीस रुपये बचा लेने की तसल्ली से उल्लास फिर जाग उठा।
‘ए, नाऊ और पंडित को बुलाओ!’ - अनंतराम ने बड़े लड़के की ओर गर्दन घुमाकर कहा। इस बीच गाँव के तमाम बच्चे और वयस्क अनंतराम के दरवाजे पर इकट्ठा हो गये थे।
‘अरे हम हिंयाँ खड़े हैं बेटा अनंतराम! कथा की बैठकी कराओ। दिन डूबने के बाद हमें नहीं दिखता।’ - उस भीड़ में लंबी दाढ़ी वाले झल्लर पंडित उचक कर बोले। वे बारहों महीने सिर्फ एक धोती पहनते थे। जरूरत पड़ने पर धोती को पूरे शरीर पर लपेट लेते। जाड़ों में शाल ओढ़ लेते। बस।
‘गैधुरिया तो होने वाली है, पोथी कैसे बाँचोगे?’ -मंथवा बोला।
‘सो बात नहीं बेटा मंथे, पोथी तो कंठस्थ है; राह नहीं सूझती। हमें घर तक कौन पहुँचायेगा?’
‘हम पहुँचायेंगे और कौन?’ -ननकउना ने झल्लर पंडित को आश्वस्त किया।
‘पूरे गाँव में कथा सहेज कर आ रहा हूँ महराज।’ - गोलई नाऊ बोले।
वे मुड़ा-चुड़ा रेशमी कुर्ता पहन कर आये थे। दोनों आँखें खराब थीं, कुछ-कुछ झलकता था। उसी शेष दृष्टि से बहुत अच्छी तरह दाढ़ी बनाते थे। अनंतराम की औरत ने सुबह ही नाबदान के दोनों ओर की जगह गाय के गोबर से लीप दी थी और झाड़ू से नाबदान की भी सफाई कर दी थी, फिर भी खुले नाबदान की बदबू ज्यादा कम नहीं हुई थी। गोधूली हो गयी थी। पूरा गाँव हल्के धुँधलके में डूब गया था। पशुओं के झुंड सिवान से गाँव की ओर लौट रहे थे। आकाश में कौओं के अनुशासित झुंड चुप-चाप उड़े जा रहे थे उत्तर की ओर। सामने की झोपड़ी में खूँटे से बँधा बछड़ा कुलाँचे भर रहा था। गाय रँभा रही थी। ननकउना ने बछड़े का बंधन खोल दिया और भीतर से दोहनी ले आया। बछड़ा गाय के थन में मुँह मार-मार कर दूध पी रहा था। ननकउना ने बछड़े को जबरन घसीट कर खूँटे से बाँध दिया और दोहनी लेकर गाय का दूध दुहने लगा।
‘ए छोटका एक कपड़ा लेकर आ; गाय को डंस लग रहे हैं और हमें भी।’ अनंतराम का छोटा लड़का एक गन्दा कपड़ा लेकर गाय और ननकउना को लगने वाले ‘डंस’ उड़ाने लगा। जानवरों की चमड़ी को बींध सकने वाली लम्बी सूँड़ के इन मच्छरों को गाँव वाले डंस कहते हैं, जिनकी वहाँ कमी नहीं थी। लोग इन बातों पर विशेष ध्यान नहीं देते-
‘मसा-माछी तो रहेंगे ही, उनके लिए कोई अलग मुलुक बना है का ?’
इस बीच बीन और बैंड वाले आ गये। वे देर तक स्वर मिलाते रहे। इसका गाय पर अच्छा असर पड़ा, लेकिन जब ढोल की थाप सुनायी पड़ने लगी, गाय ने दूध चढ़ा लिया। ननकउना फिर भी दुहने की कोशिश करता रहा, लेकिन जैसे ही तुरही और मुद्दी के बैंड वालेबड़े ढोल की आवाज सुनायी पड़ी, गाय पूरी तरह भड़क गयी।
‘आज बिजुली नहीं आयेगी का हो?’ -झल्लर पंडित जोर से बोले।
‘बिजुली होगी, अभी हमने कटिया नहीं फँसायी।’
-अनंतराम का बड़ा लड़का बोला।
-अनंतराम का बड़ा लड़का बोला।
‘तो लगाते क्यों नहीं कटिया-फटिया?’
-अनंतराम ने आदेशात्मक प्रश्न किया।
-अनंतराम ने आदेशात्मक प्रश्न किया।
गाँव के ज्यादातर लोग कटिया लगाकर बिजली जलाते हैं। बाकी लोगों की कटिया चौबीसों घंटे लगी रहती, लेकिन चूँकि अनंतराम खुद को सरकारी आदमी समझते हैं, इसलिए दिन में कटिया निकलवा देते हैं। कब बिजली महकमे का छापा पड़ जाय और बदनामी हो! रात में कोई डर नहीं। ...पहले तो रात में कोई जाँच करने आयेगा नहीं और आया भी, तो ‘चोर-चोर’ कहकर लाठियों से मारकर बिछा देंगे। कटिया लगते ही अनंतराम का घर, दरवाजा, झोपड़ी, वहाँ उपस्थित लोग और दीवार पर लिखी स्वास्थ्य-विभाग की इबारतें -सब रोशनी में नहा उठे।
‘आज बिजुली कुछ कमजोर है का हो?’-झल्लर पंडित फिर चीखे। ननकउना ने उनका हाथ पकड़ कर कथा वाली जगह तक पहुँचा दिया था, लेकिन उन्हें कुछ दिख नहीं रहा था और वे खड़े थे। बीन और बैंड के संगीत की पृष्ठभूमि में सब चीख-चीख कर बातें कर रहे थे।
‘जब रतौंधी हो रही है, तो बिजुली तो कमजोर लगेगी ही।’ -मंथवा घिसट कर झल्लर पंडित के पास आ गया था और अब उनसे चुहल कर रहा था। नाली के उत्तर पार गोबर से लिपी जगह पर अनंतराम की औरत ने दो कंबल मोड़कर बिछा दिये थे-समानांतर।
‘कहाँ बैठें ननकऊ?’
‘हिंयई बैठो पंडित।’- ननकउना कंबल के पास झल्लर पंडित को पहुँचा कर बोला।
‘ए बेटा ननकऊ, दूब, हल्दी, अच्छत, फूल, अबीर वगैरह का इंतजाम करो।’
‘सब तुम्हारे सामने रखा है। दिख नहीं रहा है का?’ -मंथवा बोला।
‘आँय?’-झल्लर पंडित आस-पास रखी पूजा-सामग्री टटोलने लगे। अब वे अबीर, हल्दी और आटे से आड़ी-तिरछी लकीरें खींचकर कमल की आठ पंखुड़ियों की आकृति वाली बेदी बनाने की कोशिश कर रहे थे। हर लकीर या तो अपने गंतव्य तक पहुँच न पाती या गंतव्य से आगे बढ़ जाती। झल्लर पंडित लकीरें खींच तो देते, पर खिंची हुई लकीर को ठीक से देख न पाते। नतीजतन बेदी की जगह लाल, पीले, सफेद रंगों की एक बेतरतीब अल्पना बन गयी। वहीं एक लोटे में जल रख दिया गया, उसमें आम की हरी टहनियाँ डाल दी गयीं और उनके ऊपर घी का दीपक जला दिया गया।
‘ए बचऊ अनंतराम कपड़ा-लत्ता उतारो और हाथ-मुँह धोकर आओ बैठो दोनों परानी।’-झल्लर पंडित जल्दी में थे।
अनंतराम ने पाजामा उतार कर लुंगी पहन ली और हाथ-मुँह धो लिया। हाँ, खाकी कमीज और गुलाब की मालाएँ उन्होंने नहीं उतारीं। पति-पत्नी दोनों कथा सुनने के लिए बिछे कंबल पर बैठ गये। बीन और बैंड का समवेत बजता रहा। अनंतराम की दोनों पुत्रवधुएँ नाचती रहीं और पंडित कथा बाँचते रहे। हालाँकि झल्लर पंडित भरसक तेज आवाज में कथा बाँच रहे थेे, फिर भी उस मिले-जुले शोर में कुछ भी सुनायी नहीं पड़ रहा था। हाँ, बीच-बीच में मंथवा शंख बजाता, तो सब मान लेते कि कथा का एक अध्याय खतम हो गया। सब हाथ जोड़ लेते और बुदबुदाते:
‘जै हो भगवान सत्तनरायेन की।’इस बीच गाँव के और लोग भी कथा सुनने आने लगे। अनंतराम के पाँचों भाई उन्हें चारपाइयों पर बैठा रहे थे। सब अपनी-अपनी गाय-भैंस के बिचक जाने का आत्मीय उलाहना दे रहे थे:
‘बचऊ संझा बेरी ई घम्मड़वा न बजवाते तो हमारी भैंस न बिचकती। आज बच्चों के पेट में गोरस नहीं जायेगा। हाँ!’‘आज एकादसी है का हो?’
‘आज तीज है। तुम्हें एकादसी लग रही है?’
‘तो अनंतराम कथा काहे सुन रहे हैं?’
‘भैया आज से रिटाएल हो गये।’ - अनंतराम के पाँचों भाई लोगों का कौतूहल शांत कर रहे थे।
‘तो अब तनखाह नहीं मिलेगी?’
‘पिनसिन मिलेगी।’
‘घर बैठे..?’
‘हाँ।’
स्त्रियाँ अलग बैठी थीं जमीन पर। पुरुष चारपाइयों पर बैठे थे। बीन और बैंड बज रहे थे। लोग चीख-चीख कर बातें कर रहे थे। कोई चुप नहीं था। बीच-बीच में कुत्ते भौंकने लगते। अनंतराम और उनकी पत्नी हाथ जोड़े बैठे थे- चुपचाप। झल्लर पंडित तेज आवाज में कथा बाँच रहे थे। थोड़ी देर बाद मंथवा ने चौथी बार शंख बजाया। बीन, बैंड और ढोल की मिली-जुली आवाजों के बीच एक असंगत स्वर लोगों ने सुना। सब ने हाथ जोड़ लिये-
‘जै हो भगवान सत्तनरायेन की!’‘अब एक अध्याय और बचा।’
‘और क्या? पाँच अध्याय तो है ही।’-लोगों की बातें।
कथा का पाँचवा अध्याय शुरू हो गया था। कौन सुन रहा है कौन नहीं, इसकी चिंता छोड़ कर झल्लर पंडित जल्दी-जल्दी कथा बाँचे जा रहे थे। बीन-बैंड बज रहे थे। लोग आपस में बातें कर रहे थे। अनंतराम की पुत्रवधुएँ और उनके साथ आस-पास की कुछ स्त्रियाँ नाच रही थीं। ठीक उसी समय अनंतराम की चीख सबके कानों में पड़ी।
‘मंथवा मंथवा ए मंथवा!’ -अनंतराम बुरी तरह चीख रहे थे। सब चौंक गये।‘ए बजनिया बाजा-गाजा बंद करो।’ - मंथवा ने तेज आवाज में कहा।
बीन-बैंड बन्द। स्त्रियों का नृत्य भी बन्द हो गया।
‘हाँ भैया हाँ भैया। हम तो हिंयई बैठे हैं। बोलो का बात है?’-घबराया हुआ मंथवा बार-बार अनंतराम को झकझोर रहा था।
‘मुझे कुछ ओढ़ा दे रे। बहुत जाड़ा लग रहा है। कपार फटा जा रहा है।’ -अनंतराम की आवाज काँप रही थी।
‘गर्मी के महीने में जाड़ा काहे लग रहा है हो?’ -कई लोग एक साथ बोल पड़े।
‘ए, जल्दी से कंबल ले आओ।’ -मंथवा ने अनंतराम के लड़कों को ललकारा।
लड़के दौड़ कर भीतर गये और जब तक कंबल ओढ़ाते, अनंतराम को उल्टियाँ होने लगीं। झल्लर पंडित द्वारा बनायी गयी बेतरतीब अल्पना के रंग अनंतराम की उल्टियों से बदरंग हो गये। चमकते लोटे और आम की हरी टहनियों पर उल्टी के छींटे पड़ गये। झल्लर पंडित जल्दी-जल्दी कथा बाँचे जा रहे थे।
‘ए पंडित, बंद करो कथा-वार्ता। भैया अब बैठ नहीं पायेंगे।’- मंथवा और पाँचों भाई बोल पड़े।‘ए बेटा, ऐसा न करो। बीच में कथा छोड़ना महापाप है। अनंतराम को खटिया पर पौढ़ा दो। दुलहिन तुम बैठी रहो। चार अध्याय हो चुके हैं, बस एक अध्याय बाकी है। हम छिन भर में कथा पूरी बाँच देंगे।’ - झल्लर पंडित ने अपनी बात कही।
अनंतराम को बाहर बिछी चारपाइयों में से एक पर लेटा दिया गया। कंबल ओढ़ाने के बावजूद वे काँप रहे थे। सब अनंतराम की चारपाई के इर्द-गिर्द खड़े हो गये। सब एक साथ बोल रहे थे। हर आदमी कोई-न-कोई नुस्खा सुझा रहा था, पर उस अफरा-तफरी में कोई किसी की सुनने को तैयार नहीं था।
‘ए, पानी ले आओ!’
‘ए, रजाई ले आओ!’- इसी चिल्ल-पों के बीच झल्लर पंडित जल्दी-जल्दी कथा बाँचे जा रहे थे और शायद खुद ही सुन भी रहे थे। अनंतराम की औरत बेदी के पास बैठी जरूर थी, लेकिन उसका सारा ध्यान अपने पति की ओर था और पति की रक्षा के लिए मन ही मन दखिनहिया माई का सुमिरन कर रही थी।
‘बोलो सत्तनरायेन भगवान की...’ -थोड़ी देर बाद झल्लर पंडित बोले।
‘जै’ बोलने वाला कोई नहीं था। सब अनंतराम की चारपाई घेरकर खड़े थे। झल्लर पंडित ने मंथवा को कई बार पुकारा कि आखिरी बार शंख बजा दे, लेकिन वह अनंतराम के पास बैठा था और पंडित की बात सुन नहीं पा रहा था या शायद जान-बूझ कर अनसुनी कर रहा था। आखिरकार झल्लर पंडित ने अपने पोपले मुँह से शंख में फूँक मारी। शंख की आवाज किसी एकाकी विलाप-सी सुनायी पड़ी।
‘अरे नाऊ ठाकुर? कहाँ गये?’-शंख बजा कर झल्लर पंडित इधर-उधर देखते हुए बोले।
‘हाँ महराज, हम तो तुम्हारे पास ही खड़े हैं।’
‘आँय? हमें कुछ सूझ नहीं रहा है। देखो कपूर कहाँ है। भगवान की आरती हो जाय जल्दी से।’
‘हमें का समझते हो महराज? का हमें कुछ सूझ ही रहा है?’
गोलई नाऊ और झल्लर पंडित थोड़ी देर बेदी के पास रखी चीजें टटोलते रहे। बीन और बैंड वाले अपने-अपने बाजों के साथ अलग खड़े थे-चुपचाप। बाकी लोग अनंतराम की चारपाई को घेरकर खड़े थे।
‘महराज, ई है कपूर।’ -गोलई नाऊ ने टटोलकर और सूँघकर कपूर खोज लिया।
‘अब दियासलाई ढूँढ़ो गोलई। हम तो आँधर हो गये ससुर।’
‘हम तो तुमहूँ से पुराने आँधर हैं!’
काफी खोज-बीन के बाद माचिस मिल गयी। नाऊ-पंडित-दोनों ने परस्पर सहयोग से आरती का दीप जला दिया।
‘जै हो भगवान सत्तनरायेन की।’ -हाथ जोड़कर झल्लर पंडित ने पहली आरती ली।
‘जाओ गोलई, सबको आरती दिखा दो।’
गोलई आरती का थाल लेकर घूमते रहे, लेकिन उस गहमा-गहमी में किसी को आरती लेने की सुध नहीं थी। सब अनंतराम के पास खड़े थे। बीन और बैंड वाले अलग खड़े थे। उन्हें आरती दिखाने की जरूरत नहीं समझी गोलई ने। वे अछूत थे। झल्लर पंडित अब अनंतराम की चारपाई के पास आ गये थे किसी तरह और महामृत्युंजय मंत्र पढ़ने लगे। मंत्र पढ़कर हर बार वे लोटे का पानी अनुमान से अनंतराम की चारपाई की ओर छिड़क देते।
‘मंथवा मंथवा ए मंथवा।’ - अचानक अनंतराम चीखने लगे।‘हाँ भैया हाँ, हम तो हिंयई बैठे हैं तुम्हारे पास।’ - मंथवा बोला।
‘देख मेरे कंबल में साँप घुसा है का रे?’- अनंतराम बहुत घबराये हुए थे।
‘साँप?’ - सब चौंक कर पीछे हट गये। झल्लर पंडित लोटा लेकर ऐसे भागे कि उनका एक पैर नाली में पड़ गया और वे गिर गये। लोटा अलग और वे अलग।
‘उठो उठो महराज, कैसे गिर गये?’- गोलई नाऊ ने सहारा देकर झल्लर पंडित को उठाते हुए कहा।
‘का बतायें गोलई, बुढ़ापा बड़ी खराब चीज है ससुर। सब साँप-साँप चिल्लाने लगे, तो हमें लगा कहीं हमें न डँस ले।’
‘तुम्हें कैसे डँसता? तुम तो मंतर पढ़ रहे थे?’
‘सो तो तुम ठीक कह रहे हो, मगर जिउ-जंतु का कौन भरोसा?’ -थोड़ा रुककर पंडित फिर बोले-
‘ए गोलई, मेरा लोटा ढूँढ़ लो और हमें बंबा तक ले चलो। हाथ-गोड़ में चहला-माटी लग गया है। कुल देह असुद्ध हो गयी ससुर।’
गोलई हैंडपंप चला रहे थे और झल्लर पंडित हाथ-पैर धुल रहे थे।
‘कहाँ है साँप, हमें तो कहीं नहीं दिख रहा है।’
-कंबल झटकते हुए ननकउना बोला। लोग जो थोड़ी देर पहले अनंतराम की चारपाई से दूर हो गये थे, फिर उनकी चारपाई घेरकर खड़े हो गये। अनंतराम की औरत चारपाई के पास इस तरह खड़ी थी, मानो जक बँध गयी हो। अब वह लगातार बैन कर रही थी-
‘‘दोहाई दखिनहिया माई की।’’ दोहाई दखिनहिया माई की।’’पूरे गाँव में यह इकलौता ऐसा परिवार था, जिसमें अलगौझी नहीं हुई थी और जिसका हर सदस्य अनंतराम के लिए जीता और मरता था। वही अनंतराम आज इस तरह मूर्च्छित पड़े थे। मंथवा अनंतराम की चारपाई के पास बैठा हाथ मल रहा था। शेष पाँचों भाई लाठियाँ लिये खड़े थे। बिजली की रोशनी में उन्हें अँधेरा दिख रहा था। अनंतराम के दोनों लड़के दौड़ पड़े और थोड़ी ही देर में दोनों आ गये-एक डाक्टर बंगाली को लेकर और दूसरा पासी टोले की भगतिन दाई को लेकर। दोनों ने अपने-अपने ढंग से उपचार शुरू कर दिया। डाक्टर बंगाली ने आते ही अनंतराम को एक सुई ‘पुदीन हरा’ की और दूसरी किसी दर्दनिवारक की लगा दी।
‘अभी ठीक हो जायेगा। बुखाड़ से बरबरा ड़हा है।’भगतिन दाई ने लोहबान सुलगवा दिया। माहौल में गोबर, भूसे और नाली की गंध के साथ-साथ लोहबान की गंध घुल गयी।
‘ए साले पुदइयावाले, खाने देगा या नहीं? तू कह दे, तो अभी पत्तल उठा कर फेंक दूँ। हाँ, हम हैं बचई पाँड़े!’
-सपने में अनंतराम पिता बचई पाँड़े का एक वीरतापूर्ण संवाद बोल रहे थे, जो किसी समय बहुत मशहूर हुआ था। हुआ कुछ यूँ था कि पुदई मिसिर का बेटा ललोरी मिसिर विधायक हो गया था और गाँव में एक निमंत्रण में आया था। यों मंथवा ने कभी भी जमीन में अपने हक की बात नहीं की थी; फिर भी लोग बचई को चिढ़ाने के लिए कह देते-
‘पाँड़े महराज, मंथवा जमीन में अपना हिस्सा माँग रहा है।’बचई पाँड़े को यह बात बर्दाश्त के बाहर लगती। किसी ने न्योता खाते बचई पाँड़े से तिकड़म कर दी कि ललोरी विधायक मंथवा की जमीन बाँटने को कह रहे हैं। अनंतराम के दिमाग में पिता संबंधी स्मृतियों के इस शानदार प्रसंग का आना स्वाभाविक था, लेकिन इससे भगतिन दाई का पलड़ा भारी पड़ गया। जनमत भी दाई के पक्ष में था। अभी तो भगतिन दाई अबूझ संयुक्ताक्षरों वाले मंत्र पढ़ रही थीं, लेकिन जब अनंतराम के मुँह से साफ-साफ सुन लिया कि ‘हम हैं बचई पाँड़े’, तो बचई पाँड़े की वंदना के बैन करने लगीं-
‘आवऽ बिराजऽ देउता आवऽ हो बचई पाँड़े! काहे के रूठल हउअ, बोलऽ हो बचई पाँड़े! किरपा के कइ द भरमार हो बचई पाँड़े!’ आदि-आदि।
झूम-झूम कर विचित्र विरागी धुन में यह नया गीत गा रही थीं भगतिन दाई। उन्होंने अनंतराम के सिर पर बचई पाँड़े की सवारी मानकर गीत गाते-गाते कई सवाल पूछे, लेकिन अनंतराम ने किसी का जवाब नहीं दिया। वे चुप पड़े थे मूर्च्छित। लोग मूर्तिवत खड़े थे। हँा, कोई डंस किसी को डँसता,तो कुछ पलों के लिये वह विचलित होता और अगले ही पल यह कौतुक देखने लगता -दत्तचित्त। सबको यह पक्का यकीन हो गया था कि अनंतराम के सिर पर बचई पाँड़े का भूत सवार है।उपचार के क्रम में भगतिन दाई का बैन जारी था। रात गहराने लगी थी।सिवान में सियार बोलने लगे थे। भगतिन दाई बचई पाँड़े के भूत की मनुहार में लंबे विलाप जैसा गीत गाये जा रही थीं। लगातार दो बैन चल रहे थे -एक भगतिन दाई का,दूसरा अनंतराम की औरत का।वह लगातार दखिनहिया माई के बैन कर रही थी। भगतिन दाई का बैन तेज विलाप जैसा था और पूरे टोले में सुनायी पड़ रहा था। पृष्ठभूमि में सियारों की हुआ-हुआ। अनंतराम की औरत का बैन स्वगत आलाप की तरह था -मद्धम।झल्लर पंडित का महामृत्युंजय-जप चल रहा था -समानांतर।इस तरह अनंतराम का उपचार चार स्तरों पर चल रहा था -भगतिन दाई की प्रेत-चिकित्सा, अनंतराम की औरत की दखिनहिया माई की दुहाइयाँ, डाक्टर बंगाली की ‘पुदीनहरा‘ और दर्द निवारक की सुई और झल्लर पंडित का महामृत्युंजय। लोहबान की गंध माहौल को और रहस्यमय बना रही थी। डाक्टर बंगाली लगातार अपना पक्ष रख रहा था-
‘कुछ ऊत-भूत नहीं है। अभी बुखाड़ उतड़ जायेगा, तो भूत भी भाग जायेगा। सिड़ पड़ लगाताड़ पानी गिड़ाते ड़हो थोरा-थोरा।’डॉक्टर बंगाली के पक्ष में कोई नहीं था, फिर भी ननकउना अनंतराम के सिर पर लोटे से पानी की धार गिरा रहा था-लगातार। अनंतराम की यह दशा देखकर उनकी औरत अकुला उठी। उसे लगा अभी पल भर में उसका सब कुछ लुट जायेगा। उस बेकली में उसने पति की रक्षा के लिए दखिनहिया माई को सवा मन लड्डू चढ़ाने का संकल्प ले लिया। ठीक उसी समय अनंतराम की आँखें खुल गयीं और वे उठकर बैठ गये। उनकी औरत ने अपने संकल्प और अनंतराम के स्वस्थ होने के बीच कार्य-कारण संबंध मान लिया। भगतिन दाई ने प्रेत चिकित्सा का, डाक्टर बंगाली ने अपनी सुई का और झल्लर पंडित ने महामृत्युंजय का प्रभाव माना।
‘मंथवा?' -अनंतराम बोले। उनके गले में पड़ी गुलाब की मालाओं के फूलों की पंखुड़ियाँ कुछ मुड़ गयी थीं और कुछ टूट कर गिर गयी थीं। खाकी कमीज पसीने से तर थी।
‘हाँ भैया।‘
‘एक गमछा दे दे। बहुत पसीना हुआ है और पानी भी पिला दे, गला सूख रहा है।‘
-इतना कह कर अनंतराम ने मालाएँ उतारीं और छोटे लड़के को थमा दीं। अब वे कमीज के बटन खोल रहे थे। रात गहरा गयी थी। गाँव के सन्नाटे में झींगुरों की रीं रीं लगातार सुनायी पड़ रही थी। बीच-बीच में सियारों की हुआ-हुआ। बीन-बैंड वाले चले गये थे। अब सब सामान्य थे और एक-एक कर अपने-अपने घरों की ओर जा रहे थे।
‘ए ननकऊ हमें घर तक पहुँचा दो बेटा और अनंतराम रोज गायत्री मंत्र का एक सौ आठ बार जप जरूर करो, सब ठीक हो जायेगा।‘ -झल्लर पंडित बोले।
‘अरे हाँ हो।' -झल्लर पंडित को कुछ याद आया-‘पँजीरी और चन्नामृत तो बाँटा ही नहीं गया। लाओ हमारा प्रसाद दे दो, बाकी गाँव में कल बँटवा देना।’
’पँजीरी और चन्नामिरित में तो भैया ने उल्टी कर दी थी।‘
‘अरे ?‘
‘ए बेटवा अनंतराम, जल्दी से बचई महराज का चौरा बनवाओ। पूजा माँग रहे हैं।‘ -भगतिन दाई ने कहा।
‘ए महड़ाज, अब सब ठीक है। फिड़ कोई बात हो, तो बुलवा लेना। हम तो तुम्हाडे़ गाँव में ही ड़हते हैं। बाकी कुछ नहीं।‘ -डाक्टर बंगाली ने कहा।
‘डाक्टर साहेब पैसा ?‘ -मंथवा ने पूछा।
‘पैसा कहाँ चला जायेगा? हम फिड़ आकड़ लेे लेंगे। पहले अनंता बाबू को ठीक तो होने दो।‘
अनंतराम की औरत भीतर चली गयी थी। जल्दी से एक कटोरी में घी-गुड़ और एक लोटा पानी लेकर आ गयी। अनंतराम घी-गुड़ खाने लगे, तो औरत ने दक्खिन की ओर मुँह करके आँचल पसारते हुए फिर से अपना संकल्प दुहराया-बुदबुदाते हुए।
गाँव के लोग चले गये थे। बिजली की रोशनी में अनंतराम और उनके परिवार के सभी सदस्य चुप बैठे थे। औरतें जमीन पर और मर्द चारपाई पर। मंथवा अकेला ऐसा मर्द था , जो जमीन पर बैठा था -अनंतराम की चारपाई के पास। दोनों पुत्रवधुओं ने लंबे घूँघट में मुँह छिपा रखे थे। अब सब चुप थे। झींगुरों की रीं-रीं लगातार सुनायी पड़ रही थी। बीच-बीच में सियार बोलने लगते, तो गाँव के सारे कुत्ते इकट्ठा होकर उनके खिलाफ भौंकने लगते।
‘मंथवा‘ - अनंतराम ने चुप्पी तोड़ी। ‘हाँ भैया!‘
‘भगतिनिया बाबू का चौरा बनवाने की बात काहे कह रही थी?‘
‘तुम अपने मुँह से बाबू का नाम ले रहे थे। कह रहे थे हम हैं फलाने पाँड़े।‘
-मंथवा से पहले अनंतराम की औरत बोल पड़ी।
-मंथवा से पहले अनंतराम की औरत बोल पड़ी।
‘अरे ! हमें तो कुछ याद नहीं!‘ - अनंतराम विस्मय के साथ बोले।
’और सुनो, जैसे ही मैने दखिनहिया माई को सवा मन लड्डू चढ़ाने की मनौती मानी,तुम्हारी आँखे खुल गयीं।‘ -अनंतराम की औरत ने अपनी बात पूरी की और बहुओं को डाँट लगायी-
‘ए बहुओं तुम लोग का कर रही हो? चलो, रोटी-पानी का इंतजाम करो।‘ अनंतराम थोड़ी देर चुप रहे फिर अचानक फफक कर रोने लगे-
‘बाबू ने ही नौकरी दिलायी थी। आज नौकरी खतम हो गयी, तो जरूर आये होंगे।‘
अनंतराम को इस तरह भावुक होते देख कर परिवार के हर सदस्य के मन में यह पक्का विश्वास बैठ गया कि बाबू की सवारी फिर हुई है अनंतराम के ऊपर। सब साँसें रोके खड़े थे। थोड़ी देर बाद अनंतराम संयत हुए, तो सब की जान में जान आयी।
‘देख रे, कुछ रोटी पानी का डौल बैठा कि नहीं।‘ -अनंतराम ने अपनी औरत से कहा ।
वह दौड़ कर भीतर गयी और तुरंत लौट आयी-
‘चलो सब जने बियारी करो।'
‘ए भौजी हम कहाँ जायेंगे? हमारा खाना हिंयई पहुँचवा दो।‘ -मंथवा जहाँ बैठ जाता, बैठ जाता है। कहीं आये-जाये, तो कैसे?
‘अब बिजुली बुता दे?'
जब सब लोग बियारी अर्थात् रात का खाना खाकर बाहर आ गये और औरतों ने भी खा लिया, तो अनंतराम के छोटे लड़के ने पूछा।
‘बुताओगे नहीं तो औंघाई कैसे आयेगी?‘ -मंथवा ने जवाब दिया।
‘कैसे बुताओगे, बटन तो है ही नहीं ?‘ - अनंतराम का प्रश्न।‘कटिया निकाल देंगे।‘
‘चलो ठीक.'
कटिया निकलते ही सब कुछ एक रहस्यमय अँधेरे में डूब गया। रात आधी बीत गयी थी। अब न तो सियार बोल रहे थे, न कुत्ते। सिर्फ झींगुरों की रीं रीं सुनायी पड़ रही थी। अँधेरे में सब के मन में पिता के भूत का भय समाया था। फिर उन्हों ने सोचा अपने पिता हैं, पुरखा हैं, अपना अनिष्ट काहे करेंगे? इस आश्वस्ति के साथ दिन भर के थके लोग लेटते ही सो गये। कभी किसी को कोई सूँड़ वाला मच्छर काटता, तो वह पल भर के लिये चिहुँकता, फिर सो जाता। हाँ, दोनों पुत्र वधुएँ लगभग सारी रात गिंगियाती रहीं- बारी-बारी से।
अगले दिन भोर होने से पहले ही अनंतराम के परिवार के सभी सदस्य घर के पास वाले पोखरे के किनारे उगे नये पीपल के पेड़ तले एक चबूतरा बनाने में लग गये। मंथवा पोखरे के किनारे बैठ कर ललकार रहा था। अनंतराम के दोनों लड़के फावडे़ से मिट्टी खोदते और दोनों पुत्र वधुएँ मिट्टी के झौए उठा-उठा कर पीपल की जड़ में डाल रही थीं। शेष चारों भाई मिट्टी के ढेलों को तोड़ने और चबूतरे को समतल करनेे में लगे थे। अनंतराम और उनकी पत्नी ने भी इस काम में हाथ बटाना चाहा, लेकिन घर के सभी सदस्यों ने एक स्वर से उन्हें मना कर दिया-
‘जाओ तुम लोग नहा-धोलो। पूजा तो तुम्ही लोगों को करनी है।‘
‘हमें काहे की पूजा करनी है? पूजा मंसेरू करते हैं कि मेहरारू?‘ -अनंतराम की पत्नी ने कहा।
‘कौन जाने, तुम्हें भी बैठना पड़े।‘
आखिरकार दोपहर होते-होते बचई पाँडे का चौरा बन गया।
‘ए बड़का, अब तू फावड़े वाला काम बंद कर और जा बजार से एक लाल लँगोट ले आ। अगरबत्ती भी ले लेना।‘ -मंथवा ने कहा।
लाल लँगोट आ गयी थी और अगरबत्त्ती भी। अनंतराम चौरे पर चढे़ और पहला काम किया कि पीपल की जड़ में एक लोटा पानी डाला, फिर पीपल के तने में लाल लँगोट बाँध दी और कुछ अगरबत्तियाँ जला कर पीपल की जड़ के पास खोंस दीं। अब अनंतराम आँखें मूँदे हाथ जोडे़ बैठे थे। वे पिता की आकृति का स्मरण करना चाहते, लेकिन दिमाग में दूसरी-दूसरी बातें आ-जातीं।
........ ‘फंड और पेंशन के कागजात दो-चार दिन में बन जायेंगे।‘ ..... कितना होगा फंड? ....पता नहीं पिनसिन कितना बनेगी ? ......वगैरह-वगैरह।
अनंतराम को उम्मीद थी कि जब वे चौरे पर बैठेंगेे तो उनके सिर पर पिता की सवारी होगी और वे अभुआने लगेंगे।
दिन ढल गया था। उजास अभी बाकी थी। गाँव की पगडंडी में पशुओं के खुरों की चोट से धूल उड़ रही थी। घरों के ऊपर धुआँ उठने लगा था। कौओं के झुंड उत्तर की ओर उड़े जा रहे थे चुपचाप। अनंतराम ने हाथ -पैर धुले और अगरबत्ती-माचिस लेकर चौरे की ओर गये। कुछ अगरबत्तियाँ जला कर उन्होने पीपल के तने की आरती उतारी, फिर अगरबत्तियों को जड़ के पास मिट्टी में खोंस दिया और आँखें मूँद कर हाथ जोड़ लिए। इस तरह वे देर तक बैठे रहे, लेकिन दिमाग में पिता की आकृति की जगह दूसरी-दूसरी चीजें नाचती रहीं। इसी समय एक तर्क दिमाग में आया। ......भूत-प्रेत तो वे होते हैं, जिनकी अकाल मौत होती है, जो किसी के मारने-काटने से मरते हैं; बाबू के प्राण तो बड़ी आसानी से निकले थे। ....सुबह नहा कर आये, तो रजाई माँगने लगे। .......काँप रहे थे।.....रजाई दे दी गयी, फिर भी काँपना नहीं बंद हुआ। ... दो-तीन घंटे बाद मंथवा चिल्लाया था- ‘ए, बाबू की देह बिल्कुल ठंडी है। साँस भी नहीं चल रही है।‘
....बाबू कैसे भूत बन गये? ‘जा रे बड़का, भगतिनिया को बुला ले आ।‘ -घर पहुँच कर अनंतराम ने बड़े बेटेे से कहा।
‘काहे‘ -अनंतराम की औरत ने टोंका।
‘तू हर काम में टोंक-टाँक करती है आने दे भगतिनिया को, तो बतायें।‘
भगतिन को पीठ पीछे सब ‘भगतिनिया‘ कहते हैं और सामने पड़ने पर ‘भगतिन दाई‘।
‘अच्छा सुन, इधर आ और पास।‘ -पता नहीं क्या सोचकर थोड़ी देर बाद अनंतराम ने औरत को पास बुलाया।
‘बताओ, का बात है ?‘ -अनंतराम की औरत चारपाई के पास जमीन पर बैठ गयी।
’देख, हम ठहरे सरकारी मुलाजिम। हम भूत-प्रेत नही मानते और भगतिनिया के कहने से तो बिल्कुल नहीं। हाँ, तुम लोग कहते हो तो मानना पड़ता है। अच्छा ये बता कि कल मेरे मुँह से बाबू का नाम निकला था, यह,बात सही है ?‘
‘कितनी बार पूछोगे? कल ही बताया कि तुम साफ-साफ बाबू का नाम ले रहे थे।‘
‘पूजा में कुछ चूक हो गयी का?‘ - अनंतराम बुदबुदाये।
‘काहे?‘
‘हम चौरे पर इतनी देर बैठे रहे, मगर बाबू की सवारी नहीं हुई।‘
‘हम का बतायें? जरूर पूजा पसारी में कुछ कमी हुई होगी। भगतिनिया से पूछो।‘
‘इसीलिए तो बुलवाया है। ए छोटका, देख अँधियर हो रहा है; बिजुली जला दे।' कटिया लगते ही अनंतराम का दरवाजा रौशन हो गया। दीवार पर लिखी स्वास्थ्य विभाग की इबारतें चमकने लगीं। झोपड़ी में बँधी गाय को ‘डंस‘ बींध रहे थे और वह बार-बार पैर चला रही थी। बछड़ा कुलाँचे भर रहा था। खुले नाबदान में पूँछ वाले कीड़े रेंग रहे थे। मंथवा आ गया। गाँव की तिनमुहानी पर वह पान की दूकान लगाता है। सुबह कोई लड़का कंधे पर बैठा कर उसे दूकान पर पहुँचा देता है। बदले में वह एक बीड़ा पान खिला देता है मुफ्त में।शाम को फिर यही सिलसिला। बाकी पाँचों भाई भी आ गये। वे खलिहान से आ रहे थे और ऊपर से नीचे तक भूसे में सने थे। वे मिलकर गाँव में किसी का खेत बटाई पर ले लेते हैं। अनंतराम ट्रैक्टर की जुताई और खाद-बीज का पैसा दे देते हैं। पाँचों भाई जी-जान से मेहनत करते हैं और इस तरह साल भर खाने का अनाज जुटा लेते हैं।
‘ए बेटवा हमारा हाथ-गोड़ धुलवा दो। तनिक देई-देउता को सुमिरने जोग तो हो जाऊँ। पूरी देह भूसा से अटी है। सरपंच के खलिहान में ठेसर लगा है। वहीं मजूरी कर रही थी।‘ -भगतिन दाई आ गयी थीं। सिर बँधा था। नाक और मुँह बँधे थे। मैली धोती की लाँग बँधी थी। बिजली की रोशनी में वे किसी दूसरी दुनिया का जीव लग रही थीं।
‘देखो बेटवा चाहे कोई अकाल मौत मरे, चाहे सकाल। मरने के बाद सब भूत हो जाते हैं। हाँ कोई परगट हो जाता है, कोई नहीं। रही बात तुम्हारे सिर पर सवारी की, तो यह जान लो कि पुरखा लोग आसानी से सवारी नहीं करते। कुछ देह हिलाओ-डुलाओ, कुछ बैन-बिलाप करो, तब जाकर उनकी सवारी होती है। और हाँ, तुम्हारे बाप हैं, पुरखा हैं उन्हें भूत मत कहो। बाँभन भूत बनता है, तो उसे बरम कहते हैं।‘
‘और जब मुसलमान भूत बनते हैं तब ?‘ -मंथवा ने पूछा।
‘जिन्न कहते हैं उसे।‘ -भगतिन दाई ने सबकी शंकाओं का समाधान कर दिया और अपनी झोपड़ी की ओर चलने को हुईं, तभी अनंतराम काँपने लगे।
‘ए दाई, हमें जाड़ा लग रहा है। ए ननकउना, कुछ ओढ़ा दे हमें।‘ -बड़ी मुश्किल से बोल पाये अनंतराम और चारपाई पर लेट गये -गुड़ी-मुड़ी होकर।
‘गरमी के महीने में जाड़ा काहे लग रहा है...? ....लगता है बचई महराज की सवारी हो गयी।‘
-भगतिन दाई बुदबुदाईं और तुरंत अभुआने लगीं। वे धरती पर दोनों हथेलियाँ पटक रही थीं, सिर झटक रही थीं और झूम-झूम कर बैन कर रही थीं-
‘आवऽ बिराजऽ अपनेऽ थाने हो बाँभन देउता, लरिका-परानी आपन राखऽ हो बाँभन देउता...’ आदि-आदि।
सिवान में सियार बोल रहे थे। गाँव में कुत्ते भौंक रहे थे। भगतिन दाई अभुआये जा रही थीं। बाकी लोग मूर्ति की तरह खड़े थे। इस बीच अनंतराम को रजाई ओढ़ा दी गयी थी, पर उनका काँपना बंद नहीं हुआ था। ’ए ननकउना, पानी पिला दे। गला सूख रहा है। कपार फटा जा रहा है।‘ -काँपती आवाज में बोले अनंतराम। भगतिन दाई का अभुआना जारी था। पानी पीते ही अनंतराम को उल्टियाँ शुरू हो गयीं। थोड़ी देर बाद अचेत हो गये वे। घर के सारे लोग घबराये हुए खड़े थे। अनंतराम की औरत पछता रही थी कि दखिनहिया माई को आज ही सवा मन लड्डू क्यों नहीं चढ़ा दिया।
‘नहीं साहेब, आज साइकिल पंचर हो गयी, इसी से लेट हो गया।‘
-अचानक अनंतराम बड़बड़ाने लगे। भगतिन दाई का अभुआना और बैन बढ़ता ही जा रहा था, जिसे सुनकर टोले के और लोग आ गये। इसी बीच अनंतराम का बड़ा लड़का डाक्टर बंगाली को बुला लाया।
‘अडे! अनंता बाबू को तो बहुत तेज बुखाड़ है।‘ -अनंतराम की नब्ज देखकर डाक्टर बंगाली ने कहा।
‘साहेब उल्टी भी हो रही थी। बीच-बीच में आँय-बाँय भी बक रहे हैं।‘ -मंथवा बोला।
‘अभी सब ठीक हो जायेगा। -दर्द निवारक और ‘पुदीन हरा‘ की सुई लगाते हुए डाक्टर बंगाली ने कहा।
‘हाँ, इनके सिड़ पड़ पानी डालते ड़हो।‘
भगतिन दाई देर तक अभुआती रहीं, बैन करती रहीं। अनंतराम की औरत कभी अनंतराम को देखती और कभी दक्खिन की ओर मुँह करके आँचल पसार देती। अनंतराम का छोटा लड़का झल्लर पंडित की उँगली पकड़ कर ले आया उन्हें। आते ही उन्होंने महामृत्युंजय का जप शुरू कर दिया। शेष लोग मूरत बने खड़े थे। बीच-बीच में डाक्टर बंगाली की आवाज सुनाई पड़ती-
‘औड़ डालो पानी। अभी ठीक हो जायेगा।‘
पृष्ठभूमि में कुत्तों और सियारों की आवाज सुनायी पड़ती। तकरीबन घंटे भर बाद अनंतराम उठ बैठे।
‘अरे पानी पिलाओ रे, गला सूख रहा है और बहुत पसीना हो रहा है। कुछ कपड़ा लत्ता दे दो, तो देह पोछूँ।'
भगतिन दाई अब शांत थीं। अनंतराम का स्वस्थ हो जाना उन्होंने अपनी पूजा का, अनंतराम की औरत ने दखिनहिया माई की कृपा का, झल्लर पंडित ने महामृत्युंजय के जप का और डाक्टर बंगाली ने दर्द निवारक सुई का परिणाम माना। अनंतराम आज घबरा गये थे। कल की बात उन्हें स्वाभाविक लगी थी। ...बाबू ने दिलायी थी नौकरी। नौकरी खतम हो जाने पर वे हाल-चाल देखने के लिए आये होंगे, लेकिन आज...? ....नाराज हैं क्या बाबू ?
‘बिजुली बुतायें?‘ -रात का खाना हो जाने के बाद अनंतराम के लड़के ने पूछा।
‘आज न बुताओ।‘ -अनंतराम डरे हुए थे।
‘बुताओगे नहीं, तो औंघाई कैसे लगेगी?‘ -मंथवा ने कहा।
‘अच्छा बुता दो‘ -अनंतराम की दबी हुई आवाज।
कटिया निकलते ही सब कुछ अँधेरे में डूब गया। सिवान में सियार बोल रहे थे। कुत्ते गाँव की सरहद पर खड़े होकर उनका प्रतिवाद कर रहे थे। हर खटके पर अनंतराम चौंक जाते। बार-बार दिमाग में पिता की आकृति उभरती, लेकिन हर बार अधूरी, हर बार विकृत। इसी बीच अचानक उन्हें लगा कि पिता का प्रेत आकर उनकी चारपाई पर बैठ गया। वे बुरी तरह डर गये, घिघ्घी बँध गयी उनकी। बोलना चाहें, पर आवाज ही न निकले। बिजली की सी फुर्ती से वे उठ कर खड़े हो गये।
‘ए बड़का के बाबू , हम हैं हो।‘ -अनंतराम की औरत बोली, तो वे सहज हुए।
‘का बात है?‘ -चारपाई पर बैठते हुए अनंतराम ने पूछा।
‘बड़का कह रहा है कि बाबू को जाड़ा देकर बुखार आता है। कहीं मलेरिया तो नहीं है। भीत पर लिखा है कि मलेरिया का बुखार जाड़ा देकर आता है?‘
‘ध्यान नहीं दिया।‘
‘बड़का कह रहा था कि लिखा है।‘
‘तुम लोग तो कह रहे थे कि मेरे मुँह से बाबू का नाम निकला था।‘
‘हाँ, यह बात भी सही है।‘ हम तो कहेंगे दवा-दुआ दोनों करो। बाबू का चौरा बन ही गया। उनकी पूजा करो और कल सरकारी अस्पताल में दिखा भी दो।‘
पति-पत्नी की खुसर-फुसर की पृष्ठभूमि में झीगुरों की रीं रीं और छहों भाइयों के खर्राटे सुनायी पड़ रहे थे।
अगले दिन सुबह-सुबह अनंतराम और बड़े बेटे में कहा-सुनी हो गयी। लड़के के दहेज में अनंतराम ने मोटरसाइकिल ली थी। लड़का उससे चलने को कह रहा था, पर अनंतराम साइकिल से चलने के पक्ष में थे।
‘तेल पियेगी ससुर..!‘ -गुस्साये अनंतराम ने कहा।
आखिरकार साइकिल से ही दोनों लोग सरकारी अस्पताल गये। सामने की दीवार पर लाल रंग के मोटे अक्षरों में लिखा था ‘सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र‘। अस्पताल के बाहर मरीजों और तीमारदारों की भीड़ थी। मुख्य इमारत की छत गिर जाने के कारण बाहर बिछी चारपाइयों पर मरीजों को लेटा दिया गया था। उनकी बगल में लोहे के स्टैंड लगाकर ग्लूकोज की बोतलें लटका दी गयी थीं। एक डॉक्टर, जिसकी दाढ़ी शायद दस दिन से नहीं बनी थी, पैथालॉजिस्ट पर चिल्ला रहा था-
‘हर मरीज की तिल्ली बढ़ी है। किसी को वाइवेक्स के लक्षण है, किसी को फैल्सीपेरम के और तुम हर रिपोर्ट निगेटिव दे रहे हो, ऐसा क्यों? क्या तुम्हें नहीं पता कि लोग मलेरिया या मच्छरजनित रोगों से मर रहे हैं?‘
‘सर, आप मुझे क्यों डाँट रहे हैं? सी.एम.ओ. साहब का आदेश मानूँ या आपका?‘ -पैथालाजिस्ट।‘क्या सी.एम.ओ. चाहते हैं कि लोग इन बीमारियों से मरते रहें और वे जिले को मलेरिया-मुक्त दिखाते रहें? डब्लू.एच.ओ. की रिपोर्ट नहीं पढ़ते क्या सी.एम.ओ.?‘
‘सर, इस मामले में मैं कुछ नहीं कर सकता। आप चाहें, तो सी.एम.ओ. साहब से खुद बात कर लें।‘
‘क्या बात कर लूँ ? डब्लू.एच.ओ. की रिपोर्ट नहीं पढ़ते क्या सी.एम.ओ.?‘
-डॉक्टर ने गुस्से में आला मेज पर पटक दिया और कुर्सी पर बैठ गया सिर थाम कर। थोड़ी देर बाद उसने जेब से कोई गोली निकाली और बोतल के पानी से उसे गटक लिया। अनंतराम और उनका बड़ा लड़का डॉक्टर की सूरत देखते खड़े रहे इस बीच।
‘हाँ, अनंतराम।‘ - थोड़ी देर में डॉक्टर संयत हुआ, तो सामने पड़ी पर्ची देख कर बोला।
‘हाँ साहेब।‘
‘यहाँ बैठिए।‘- एक स्टूल की ओर इशारा करते हुए डॉक्टर ने कहा।
‘क्या तकलीफ है?‘
‘साहेब हमारे सिर पर पिता की सवारी होती है।‘
‘क्या मतलब?‘-डॉक्टर ने अनंतराम के लड़के की ओर देखते हुए पूछा।
‘हाँ हाँ, ठीक है। कैसे पता चला कि पिता का भूत सवार होता है?‘
‘डॉक्टर साहब, इनके पिता मर गये हैं और अब भूत बन कर इनके सिर पर सवार हो जाते हैं।‘ -लड़के ने कहा।
‘भूत नहीं बरम कह।‘-अनंतराम ने लड़के की भूल सुधारते हुए कहा।‘हाँ हाँ, ठीक है। कैसे पता चला कि पिता का भूत सवार होता है?‘
अनंतराम ने अपने को पुराना सरकारी मुलाजिम बताते हुए विस्तार से ‘सत्य नारायण व्रत कथा‘ के दौरान हुई घटना का वर्णन किया।
‘फिर कभी हुआ ऐसा?‘
‘फिर कभी हुआ ऐसा?‘
‘हाँ साहेब अगले दिन उसी टैम पर।‘
‘उसी टाइम पर?‘
‘हाँ साहेब।‘
‘सिर में दर्द, बदन में ऐंठन?‘
‘हाँ साहेब, बहुत जाड़ा लग रहा था। उल्टी भी हो रही थी बार-बार।‘
‘ठीक है। इस पर लेटिए।‘
-बेड की ओर इशारा करते हुए डॉक्टर बोला।
अनंतराम लेट गये। आज भी वे खाकी कमीज और उटँग पाजामा पहन कर आये थे। डॉक्टर ने उनकी कमीज हटा कर नाभि के नीचे एक ओर उँगली रखी। अनंतराम चिहुँक उठे।
-बेड की ओर इशारा करते हुए डॉक्टर बोला।
अनंतराम लेट गये। आज भी वे खाकी कमीज और उटँग पाजामा पहन कर आये थे। डॉक्टर ने उनकी कमीज हटा कर नाभि के नीचे एक ओर उँगली रखी। अनंतराम चिहुँक उठे।
‘दर्द हो रहा है?‘
‘हाँ साहेब।‘
‘ठीक है। उठिए। आइए स्टूल पर।‘
डॉक्टर ने टॉर्च जला कर अनंतराम की जीभ देखी और आँखें भी। फिर पर्ची में जाँच और दवा लिखने लगा। लिखते-लिखते उसने फिर सिर थाम लिया दोनों हाथों से। ...क्लोरोक्वीन के सिवा अस्पताल में कोई दवा नहीं, जबकि मैलेरियल पैरासाइट क्लोरोक्वीन के अभ्यस्त हो गये हैं। ...आफ्टर क्लोरोक्वीन सल्फाडाक्जिन ऐंड पाइरीमेथामीन...। कितने दिन तक असर रहेगा? प्राइमाक्वीन का भी अब कोई मतलब नहीं। ...लिवर पर कितनी चोट पहुँचायी जाय? ...आर्टीमेथर अल्फा बीटा, लेकिन ये दवाएँ तो हम लिख भी नहीं सकते...!
‘हूँ आप क्या करते हैं ?‘ -लड़के की ओर देख कर डॉक्टर ने पूछा। ‘पढ़ता हूँ.‘
‘किस क्लास में?‘
‘एम.ए. प्रीवियस, हिंदी।‘
‘ठीक है। अभी इनका ब्लड टेस्ट करा दीजिए। रिपोर्ट कल मिलेगी और निगेटिव मिलेगी। कल मैं यहाँ नहीं रहूँगा।'
‘क्यों सर?‘
‘बीहड़ में ट्रांसफर कर दिया गया है। खैर, वह सब छोड़िए। आप को ठीक होना है, तो मैं अलग से एक कागज पर इंजेक्शन लिख देता हूँ। बाजार से लेकर चार इंजेक्शन लगवा लीजिए लगातार।‘
‘क्या नाम है सर?‘ -लड़के ने पूछा।
‘रैपीथर ए बी। हिप में लगेगा। हाँ, नागा नहीं होना चाहिए।‘
‘यहाँँ से खैरात में कोई दवा नहीं मिलेगी?‘ -अनंतराम ने पूछा।
‘मिलेगी। मैंने लिख दी हैं। खाना खाने के बाद उन्हें भी खा लीजिएगा। खून का नमूना लेकर पैथालाजिस्ट चार गोलियाँ देगा। भरपेट खाना खाकर चारों गोलियाँ खा लीजिएगा। बाजार से छः गोलियाँ और ले लीजिए। छः घंटे बाद फिर दो गोली। अगले दिन दो गोली , फिर अगले दिन दो गोली।..‘
इतना कहकर डॉक्टर ने फिर सिर थाम लिया और बुदबुदाने लगा-
‘बेसिक दवा तो क्लोरोक्वीन है। दवा तो है, लेकिन मलेरियल पैरासाइट इसके आदती हो गये हैं।‘
‘हूँ छोड़िए सब। ये चार इंजेक्शन लगवा लीजिए। एक-दो दिन बुखार आयेगा। उस समय पैरासिटामाल खा लीजिए। फिर ठीक हो जायेगा। घर के सारे लोग मच्छरदानी का प्रयोग करें।‘
‘पिता की सवारी वाली बात साहेब?‘-अनंतराम ने प्रश्न किया।
‘कुछ नहीं वह भी वाइवेक्स मलेरिया का एक लक्षण है।‘
अनंतराम अस्पताल से लौटे तो गाँव के कई लोग हाल-चाल लेने आ गये।
‘अरे तुम छोड़ो सुई-फुई का चक्कर। जितने की सुई खरीदोगे, उतने का घी खरीद लो और खाओ। जब देह में ताकत रहेगी तो रोग अपने आप दूर हो जायेंगे। रही बात बचई महराज के बरम की, तो उसमें डाक्टर-बैद क्या करेंगे ? पिता हैं, पुरखा हैं; पूजा माँग रहे हैं तो करो पूजा। चौरा बन ही गया है...!‘
अमूमन सब का मत इसी प्रकार था।‘हम भी यही कह रहे थे, मगर बड़का सुई खरीद लाया और अब बंगाली डाक्टर को सुई लगाने के लिए बुलाने गया है।‘ -अनंतराम ने बेबसी जाहिर की।
रैपीथर के चार इंजेक्शन लग जाने के बाद अनंतराम स्वस्थ हो गये थे। हालाँकि दो दिनों तक बुखार आता रहा, वे आँय-बाँय भी बकते रहे, लेकिन पिता का वह मशहूर संवाद फिर कभी नहीं बोले वे। इस बीच चौरे पर पूजा का काम मंथवा ने सम्हाल लिया। अनंतराम न तो अभुवा पाते थे, न ही बैन कर पाते थे। कुछ बुदबुदा देते थे बस। मंथवा को सुबह-शाम कोई-न-कोई चौरे पर पहुँचा देता। वहाँ वह खूब अभुआता था, फिर तरह-तरह के बैन-
‘आव ऽ आव ऽ बाबू हमरे, बाबू मोरे बपई। आवऽ बिराजऽ थाने आवऽ पाँड़े बचई...।‘ -मंथवा का आशु कवित्व।
अब सनीचर और मंगलवार को चौरे पर रोगियों की भीड़ भी आती है। आज सनीचर है। मंथवा चौरे पर बैठा अभुआ रहा है। इसी बीच उसने देखा कि भौजाई दोनों पुत्र-वधुओं के साथ आ रही हैं।
‘बरम बाबा की जै‘ -ऐसा कहते हुए तीनों ने मंथवा के पैर छुए।
‘बताओ, का बात है?‘-अभुआते हुए बोला मंथवा।
‘महराज इन दोनों को अँतरा आता है और आयँ-बाँय भी बकती हैं।‘
‘अँतरा?‘
‘एक दिन बुखार आता है फिर दूसरे दिन नहीं आता। तीसरे दिन फिर आ जाता है। दोनों में हारी-हूँसा लगा रहता है। आज एक बीमार तो कल दूसरी। पता नहीं का है -तिरिया चलित्तर है कि कुछ रोग दोख है ?‘
‘जाओ , सब ठीक हो जायेगा।‘
-ऐसे अवसरों पर मंथवा ‘ठड़ी बोली‘ अर्थात् खड़ी बोली बोलता है। विचित्र हुंकार के साथ उसने बगल में रखी राख की एक चुटकी हथेली पर रखी और पुत्र वधुओं की ओर फूँक दी।भोर हो गयी थी। मुँह अँधेरे में ही सब लोटों में पानी लेकर खेतों की ओर जा रहे थे। बछड़ा कुलाँचे भर रहा था। गाय लेटी थी। पीपल के पेड़ पर चिड़ियों की चह-चह। अनंतराम और उनके परिवार के ज्यादातर सदस्य फारिग होकर आ गये थे। मंथवा घुटनों के बल घिसटता हुआ पोखरे तक चला गया था आज। फारिग होकर स्नान। स्नान के बाद चौरे पर पिता के ब्रह्म की पूजा। बाकी लोग दरवाजे पर बैठे थे -चारपाइयों पर। अनंतराम की पत्नी जमीन पर बैठी थीं -पति की चारपाई के निकट। बड़ी पुत्रवधू बर्तन माँज रही थी -नाली के पास। तीन छोटे बच्चे दरवाजे पर धूल उड़ा रहे थे और खिलखिला रहे थे। ये अनंतराम के नाती हैं। दो संतानें बड़े लड़के की और एक छोटे लड़के की। सब दो से चार साल के बीच।
‘छोटकी कहाँ गयी रे? -अनंतराम की पत्नी ने पूछा।‘अभी सो रही हैं।‘-बड़ी पुत्र वधू ने कहा।
‘ई सोने की बेला है ? ऐसा नखरा ? जा जाके जगा उसको।‘
बड़ी पुत्रवधू घर के भीतर गयी और फौरन दौड़कर आ गयी -
‘अम्मा!‘
‘हाँ।‘
‘भीतर चलो। हमें कुछ गड़बड़ी लग रही है।‘
‘काहे की गड़बड़ी? कंगाल की बेटी धनी घर में आयी है, तो कुछ नाज-नखरा तो दिखायेगी ही।‘
‘काहे की गड़बड़ी? कंगाल की बेटी धनी घर में आयी है, तो कुछ नाज-नखरा तो दिखायेगी ही।‘
अनंतराम की औरत बड़बड़ाते हुए भीतर गयी। बछड़ा उसी तरह कुलाँचे भर रहा था। गाय उसी तरह लेटी थी। सुबह की नम हवा बह रही थी। हालाँकि हवा के संग गलियों की गन्दगी की गन्ध भी आ रही थी, फिर भी हवा प्राणदायिनी लग रही थी।
‘काहे रे छोटका? गाय की सानी-पानी हुई कि नहीं?‘
‘कक्कू, हमने सानी-पानी सब कर दिया है, मगर गाय उठ ही नहीं रही है।‘
‘का बात है? तबियत गरू है का?‘
‘हम का जानें?‘
‘चल देखते हैं।‘
‘अरे इसकी तो जीभ निकल आयी रे...!‘
हाय राम गाय तो मर गयी...। हे भगवान! बाल-बच्चों का गोरस चला गया।‘
-लाठी के सहारे खड़ा ननकउना रो रहा था। उसके एक हाथ में खाली दोहनी थी। अनंतराम हाथ मलते हुए कभी इधर जा रहे थे, कभी उधर। मंथवा तरह-तरह से अभुआ रहा था। बैन कर रहा था। नसरीन की बतखें पोखरे में तैर रही थीं और वह एकटक मंथवा को घूर रही थी। अनंतराम की पत्नी ने छोटकी की चादर उठायी तो चौंक गयी-
‘काहे री छोटकी? छोटकी? बोलती क्यों नहीं? -अनंतराम की पत्नी ने छोटकी को झिंझोड़ते हुए कहा।
‘ए अम्मा , धुकधुकी बंद है।‘
‘तुझे कैसे पता चला?‘
‘अभी हमने इसकी छाती पर कान लगाया, तो कुछ नहीं सुनायी पड़ा।‘
दोनों स्त्रियों ने एक पल के लिये एक दूसरे को देखा और रोना-पीटना शुरू कर दिया -
‘हाइ मोर करेजा !‘ ‘हाइ मोर बहिनिया !‘ ‘हाइ मोर हथिनिया !‘ आदि-आदि।
भीतर का रोना-धोना सुनकर अनंतराम भीतर गये। मंथवा ने भी ये आवाजें सुनीं, तो पूजा बंद कर घिसटते हुए दरवाजे तक आ गया और जमीन पर बैठ गया। बाकी भाई और दोनों लड़के बाहर खड़े थे। वे समझ रहे थे कि गाय के मरने की खबर भीतर पहुँच गयी, इसलिए रोना-धोना मचा है।
‘का बात है? काहे रोई-रोहट मची है?‘ -भीतर पहुँचकर अनंतराम ने पूछा।
‘ का बतायें ? बज्जर गिर पड़ा छाती पर। छोटकी नहीं रही।‘
‘देखो, घबराओ नहीं। जो होना था, हो गया। तुम्हारा फोन कहाँ है?‘
-औरत ने चीखते हुए जवाब दिया और फिर विलाप में व्यस्त हो गयी। थोड़ी ही देर में आस-पास के स्त्री-पुरुष इकट्ठा हो गये। स्त्रियाँ भीतर गयीं और रोने में शामिल हो गयीं। पुरुष बाहर खड़े थे। सब चुप थे। किसी को कुछ सूझ नहीं रहा था।
थोड़ी देर में अनंतराम बाहर आये और बड़े लड़के को पास में बुलाया। दोनों लड़के पिता के पास आ गये।‘देखो, घबराओ नहीं। जो होना था, हो गया। तुम्हारा फोन कहाँ है?‘
‘माई ने संदूक में रख दिया है।‘
‘जा निकलवा ले और छोटकी के नैहर वालों को खबर कर दे, नहीं तो बाद में बवाल करेंगे।‘
‘का खबर करें?‘
‘यही कि छोटकी नहीं रही।‘
‘नहीं रही...?‘
-दोनों लड़के एक साथ बोल पड़े। दोनों दौड़ते हुए भीतर गये। छोटा लड़का औरतों की भीड़ को चीरते हुए बीवी की लाश से लिपट गया। फिर उठ कर उसे झिंझोड़-झिंझोड़ कर पुकारने लगा-
‘ए मनोरमा!’
‘ए मनोरमा!’
लाश में कोई हरकत नहीं हुई, तो फूट-फूट कर रोने लगा वह। बड़ा लड़का मोबाइल फोन लेकर आया।
‘बाबू , इसमें तो बैटरी ही नहीं है।‘
‘तब?‘
‘कहो, तो कटिया लगा कर चार्ज कर लें।‘
‘कर ले और जल्दी से इसके नैहर में खबर भेज दे और हाँ फटफटिया में तेल है कि नहीं?‘
‘है।‘
‘बाबू !‘
-दोनों लड़के एक साथ बोल पड़े। दोनों दौड़ते हुए भीतर गये। छोटा लड़का औरतों की भीड़ को चीरते हुए बीवी की लाश से लिपट गया। फिर उठ कर उसे झिंझोड़-झिंझोड़ कर पुकारने लगा-
‘ए मनोरमा!’
‘ए मनोरमा!’
लाश में कोई हरकत नहीं हुई, तो फूट-फूट कर रोने लगा वह। बड़ा लड़का मोबाइल फोन लेकर आया।
‘बाबू , इसमें तो बैटरी ही नहीं है।‘
‘तब?‘
‘कहो, तो कटिया लगा कर चार्ज कर लें।‘
‘कर ले और जल्दी से इसके नैहर में खबर भेज दे और हाँ फटफटिया में तेल है कि नहीं?‘
‘है।‘
‘तो जाकर जल्दी से कफन और सुहागिन का सारा सिंगार खरीद कर आ जा। किसी का ट्रैक्टर भी किराये पर लेना होगा।‘
मोबाइल चार्ज हुआ तो बड़ा लड़का अनंतराम के पास आया। ‘बाबू !‘
‘हाँ‘
‘तुम्हारे खाते में साढ़े पाँच लाख रुपये आये हैं।‘ -लड़के ने धीरे से कहा।
‘आँय?‘ -अनंतराम चौंक गये।
‘तुझे कैसे पता चला?‘
‘फोन में संदेश आया है।‘
‘तुम्हारे खाते में साढ़े पाँच लाख रुपये आये हैं।‘ -लड़के ने धीरे से कहा।
‘आँय?‘ -अनंतराम चौंक गये।
‘तुझे कैसे पता चला?‘
‘फोन में संदेश आया है।‘
‘तो सुन, अब किसी से कुछ न कहना। यह फंड की रकम है।‘
‘बेटा माँग में सिंदूर डाल दो।‘
माँग में सिंदूर डाल कर छोटकउना फफक कर रोने लगा-
अनंतराम पर इस खबर का अजीब असर हुआ। अपार उत्साह समा गया उनके मन में। वे साढ़े पाँच लाख में कुछ और रकम जोड़ने लगे...। ...लड़के की दूसरी शादी तो करनी ही पड़ेगी! ...जवान लड़का! कब तक बिना औरत के रहेगा? ..और शादी होगी, तो कुछ दैजा-दहेज भी मिलेगा! बच्चे अब धूल नहीं उड़ा रहे थे। वे भौंचक सब कुछ देख रहे थे। सब से छोटा माँ के निष्प्राण शरीर से लिपट गया। कोई हरकत न होने पर बच्चा माँ को मारने लगा।
‘ए! हटाओ इसको।‘-अनंतराम ने कड़क आवाज में कहा।कफन और सुहागिन के सारे सिंगार आ गये थे। फुट्टू मिस्त्री ने हरे बाँस की टिकठी बना दी थी। दिन चढ़ते-चढ़ते छोटकी के पिता और भाई आ गये थे। पहले तो वे खूब किच-किच करते रहे, लेकिन जैसे ही झल्लर पंडित ने ‘रामचरितमानस‘ के एक दोहे के दो चरण- ‘हानि लाभ जीवन मरण जस अपजस बिधि हाथ‘ सुनाये और अनंतराम ने अकेले में लड़की के पिता को दस हजार रुपये देने का वादा किया, वे संतुष्ट हो गये।
छोटकउना से औरतों ने कहा -‘बेटा माँग में सिंदूर डाल दो।‘
माँग में सिंदूर डाल कर छोटकउना फफक कर रोने लगा-
‘महीनों से कहती थी कि तबियत खराब है। एक दिन खराब रहती तो अगले दिन ठीक रहती। हमने समझा, बहाना कर रही है।‘
छोटकी का सिंगार हो चुका था। जो महावर उसके पैरों में लगायी गयी, वही घर की सारी स्त्रियों ने अपने-अपने पाँवों में लगायी। मृत्यु के बाद के सारे विधान विधि पूर्वक किये गये। तीनों बच्चे आँखें फाड़े सब कुछ देखते रहे चुपचाप और जब सरपंच का ट्रैक्टर आया और अर्थी उठ गयी, तो वे फिर धूल उड़ाने लगे। गेंदे और गुलाब के कुछ फूल धूल में गिर गये थे। बच्चे धूल के संग फूलों को भी उछालने लगे। बछड़ा उसी तरह कुलाँचें भरता रहा। गाय उसी तरह लेटी थी - निस्पंद।

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