शिवशंकर मिश्र का 'अन्तिम उच्चारण' - रामप्रकाश कुशवाहा
पुस्तक - अंतिम उच्चारण (कहानी संग्रह),
कहानीकार - शिवशंकर मिश्र
प्रकाशक - सहयात्रा प्रकाशन, प्रा. लिमिटेड,
सी - ५२ / जेड - ३, दिलशाद गार्डन, नयी दिल्ली - ११००९५
समकालीन कथाकारों में शिवशंकर मिश्र को विरल और अद्वितीय बनाने वाली विशेषता सिर्फ उनके कवित्वमय आत्मीय अभिव्यक्ति-शिल्प में ही नहीं है, बल्कि अपनी कहानियों की कथावस्तु की उस शोधपूर्ण खोज में भी है, जो किसी को भी नहीं दुहराती, न तो स्वयं को और न ही दूसरों को। उनकी कहानियां कथा-साहित्य में अब तक छूटे हुए और अब तक उपेक्षित या बहिष्कृत विषयधर्मी कथानक की खोज भी है। संभवतः इसीलिए उनके कहानी-संग्रह "अंतिम उच्चारण" की कहानियों को पढ़ना-पूरी तैयारी और धैर्य के साथ भारतीय समय और समाज के समुद्र में खोज-भावना से की गयी अत्यंत गंभीर किन्तु, अत्यंत रोचक और अविस्मरणीय लेखकीय गोताखोरियों से गुजरना है। उनकी कहानियां अपने पहले पाठ के बाद भी इस टिप्पणी की तरह पढ़ने को बची रह जाती हैं कि घटना के वास्तविक कारण का अभी पता लगाया जा रहा है।
शिवशंकर मिश्र ने अपनी गिनी-चुनी कहानियां जैसे हजारों गद्य-कविताओं से बुनी हैं। गुलेरी की तरह ही उन्होंने भी बहुत कम ही लिखा है; लेकिन उनकी कहानियों की निर्माण सामग्री सीधे जिंदगी से लिए गए अनुभवों के ठोस पत्थरों से निर्मित हैं। शिवमूर्ति की तरह उनकी भी कहानियां अवधी अंचल की लोकभाषा-सर्जना तथा आस्वादधर्मिता का खजाना लुटाती चलती हैं। समकालीन कथावस्तु होते हुए भी उनकी कहानियों की रचनाधर्मिता पर अनुकरणपरक सामूहिकता या तात्कालिकता का असर नहीं है। उनकी कहानियां पढ़कर ऐसा लगता है, जैसे उन्होंने जिंदगी भर का अपना निरीक्षण और चिंतन अपनी कुछ ही कहानियों में निवेशित कर दिया है।
उनकी प्रायः सभी कहानियां अपने पाठकों को एक विशेष दार्शनिक अंतर्दृष्टि सौंपती चलती हैं। यह अंतर्दृष्टि वे किसी ऐसे पात्र या चरित्र के माध्यम से उभारते हैं, जो या तो कोई बच्चा होता है या तो बचपन को जीने वाला ऐसा मंद-बुद्धि या फिर आदर्शवादी चरित्र का, जिसने विकास के क्रम में उपजीं सभ्यता की उन तमाम चालाकियों को जानने-समझने बूझने और जीने से इनकार कर दिया है, जिसे एक गलत दौर का जीवन-समय सृजित करने वाले तमाम लोग जी रहे हैं। वे बहुत चुपके से उस एक चुने हुए प्रतिनिधि चरित्र के माध्यम से अपनी कहानी को गुजरते समय की पड़ताल और सभ्यता-विमर्श बना देते हैं। इस केंद्रीय प्रतिनिधि पात्र को पहचानकर उसके साथ होते ही कहानी और सभ्यता-विमर्श के सारे भेद खुलने लगते हैं। उनकी कहानियों में मिलने वाले इस पात्र को शिशु-चेतनाधर्मी, निष्पाप, प्रागैतिहासिक, आदिम साम्यवादी या फिर सात्विक चेतना और संवेदनशीलता के वाहक किसी देवदूत का अचेतन रूपक भी कहा जा सकता है। अपनी कहानियों में पाठ के वर्णन के लिए जैसा बाल सुलभ खिलंदड़ा अंदाज शिवशंकर मिश्र बार-बार लगभग सभी कहानियों में अपनाते हैं, वह उनकी कहानियों के वस्तु और शिल्प का संस्मरणात्मक हिस्सा इतनी सहजता और स्वाभाविकता के साथ लगता है कि उनके प्रतीकात्मक और बौद्धिक आयामों, उनकी गहराई और विस्तार की ओर सहसा हमारा ध्यान ही नहीं जाता।
उनकी पहली ही कहानी 'अंतिम उच्चारण' को ही लें तो प्रथमदृष्टया मंद-बुद्धि का एक समस्या-बालक लगने वाला तथा अपने पिता की असामयिक मृत्यु का कारण भी बनने वाला बाल चरित्र 'बई' की जात-कुजात की वर्जनाओं को न समझ पाने वाली नासमझ, किन्तु मानवीय एवं समदर्शी सामाजिकता अपने प्रतीकात्मक महत्त्व के साथ-साथ जाति-विमर्श की नयी संभावनाओं का भी द्वार खोलती है। एक अबोध बच्चे की मानसिक यात्रा से वयस्कों के जीवन-बोध को प्रश्नांकित करने वाली यह कहानी कब एक बच्चे की रोचक कहानी के माध्यम से भी सामने आता है मूर्खताओं की शृंखला प्रस्तुत करते-करते बड़ों के सभ्यता-विमर्श की कहानी बन जाती है, पता ही नहीं चलता। इस कहानी का मुख्य पात्र 'बई' समय के साथ ऐसा ही मंद बुद्धि होने के कारण कभी भी वयस्क न होने वाला चरित्र है। 'पखावज' कहानी में यही चरित्र प्रागैतिहासिक जमाने के मनुष्यों की मिथकीय सृष्टि स्वर्ग के अधिपति इंद्र में बदल जाता है। पूरी कहानी आदिम मनुष्य के जीवन-बोध के पैमाने पर आधुनिक मनुष्य की प्रगति के निहितार्थों और रहस्यों को समझने और समझाने की मुस्कानयुक्त आह्लाद्पूर्ण कोशिश है। आधुनिक मनुष्य को प्राप्त वैज्ञानिक सुविधाओं से प्राचीन मनुष्य के कल्पना-लोक स्वर्ग का अधिपति इंद्र भले ही पिछड़ा हुआ और दया का पात्र लगता हो, यह कहानी का कुछ ही हिस्सा पढ़ने पर पाठक को ईमानदारी से बता दिया जाता है कि कहानी का आश्चर्यलोक इंद्र की नहीं, बल्कि आधुनिक मनुष्य की लीला का रोचक वृत्तान्त प्रस्तुत कर रहा है। यहाँ तक कि स्वर्ग का सामान्य प्रतीत होने वाला वर्णन भी मानव सभ्यता का गंभीर विमर्श उपस्थित करता चलता है!
यद्यपि शिवशंकर मिश्र की कहानियों का अनूठापन बचपन के खिलंदड़ा अंदाज में बड़ों की कहानी लिखने के कारण भी है; लेकिन पाठक जैसे ही पूरी कहानी पढ़ता है, कहानी वयस्कों की शातिर दुनिया पर अविकृत और निर्दोष बचपन द्वारा किए गए गंभीर व्यंग्य का अत्यंत गंभीर और सुचिंतित-सुनियोजित पाठ सामने लाती है। सहज-सामान्य लगने वाली आधुनिकता सहसा विकास के स्थान पर विनाश की प्रस्तावना लगने लगती है। जहाँ चीजें पर्यावरण विनाश की गंभीर त्रासदी के साथ स्थायी क्षति के साथ घट रही हैं। उनकी कहानियों का विविध-संरचनात्मक कलात्मक वैशिष्ट्य उनकी 'बाबा की उघन्नी' जैसी कहानी के माध्यम से भी सामने आता है।
इस कहानी में एक ही यथार्थ का कई-कई पाठ और भाष्य पाठक के सामने अत्यंत रोचक और तुलनात्मक परिदृश्य उपस्थित करता है। कहानी में उपस्थित चरित्रों के नियंत्रण और पकड़ के बाहर का यथार्थ इतना अबूझ, रहस्यमय, दैवी और डरावना लगने लगता है कि चीजें भूत-प्रेत होने के स्तर तक अबूझ होती जाती हैं। 'बाबा की उघन्नी' में यह बहुआयामिता प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष दोनों ही स्तरों पर कहानी की बनावट का सुनियोजित हिस्सा है। प्रथम द्रष्टया गाँव के किसी संस्मरण की तरह लगाने वाली यह कहानी अपने अर्थ-सम्प्रेषण का एक समानांतर पाठ भी किसी रहस्य की तरह छिपाए चलती है। जीवन का जीना और उसका यथार्थ जितना ही कठिन और दुरूह होता जाता है, चाबी के गुच्छे पर बाबा की उंगलियाँ उतनी ही कसती जाती हैं। कहानी के प्रारम्भ में जो चाभी संयुक्त परिवार पर कार्यात्मक नियंत्रण का प्रतीक है, स्थितियां और खराब होने पर भूत-प्रेत भगाने में सक्षम लोहे की ताबीज में बदल जाती है। जिजीविषा का यह अतार्किक पक्ष दरअसल परिस्थितियों के समक्ष असहायता और निरीहतापूर्ण समर्पण ही है। किंकर्तव्यविमूढ़ता और अशक्तता की चरम परिणति और स्थगन भाव। जहाँ एक सीमा के बाद सामूहिकता भी सुरक्षा नहीं कर पाती, बल्कि त्रासदी का कारण बन जाती है। इस कहानी में कुटुंब जैसी आदिम संस्था पूंजीवादी- व्यक्तिवादी दौर में स्वयं को न बदल पाने की कीमत अपने एक सदस्य के मृत्यु के रूप में चुकाती है। कहानी में विवाह की खर्चीली तैयारी और आर्थिक चुनाव की बाध्यता में इलाज से वंचित नचकऊबहू का मरना अर्थाभाव में हुई मृत्यु से अधिक एक शहादत लगती है।
'पखावज' में कहानीकार ने प्राथमिक और द्वितीयक- किसान और बाजार सभ्यता दोनों को आमने-सामने ला खड़ा किया है। इस कहानी में स्वर्ग की परिकल्पना श्रम से विरत रहकर सुख-भोग करने वाले उच्च-वर्ग की जीवन-चर्या के रूप में किया गया है, जिसे साफ-साफ उसकी सूक्ष्मतम विशेषताओं के साथ पहचाना जा सकता है। इस कहानी को एक कथात्मक फैंटेसी के रूप में ही लिखा गया है। कहानी में स्वर्ग के अधिपति के रूपक के माध्यम से पूंजीवादी सभ्यता के उच्च वर्ग का अंकन होने के बावजूद लोक भी पूरी सहृदयता के साथ चित्रित हुआ है। सभ्यता की मुख्य-धारा से उपेक्षित और बहिष्कृत होने के बावजूद लोक के पास जीवन आदिम स्वस्थ लय जीवन के आदर्श मूल पाठ की तरह सुरक्षित है। उच्च स्तरीय सभ्यता की औचारिकतापूर्ण कृत्रिमता या बनावटीपन जो दरअसल बाजार की पेशेवर दक्षता ने एक कला के रूप में विकसित किया है, सामंतवाद के प्रतिनिधि आचरण से आच्छादित इन्द्र के चरित्र को किसी सामंत राजा की तरह चित्रित कर खड़ा कर दिया है। इस कहानी में स्वर्ग के अधिपति का चरित्र सामंतवादी युग से लेकर वैश्विक पूंजीवादी युग के विकास के सभी चरणों के शासक का अद्यतन व्यवहार-चित्र प्रस्तुत करता है।
सत्ता कोई भी हो, उसका हर सुर आत्म-दर्प का ही होता है। उसकी परंपरा और संस्कार में आज भी सामंतयुगीन व्यक्तिवादी अतीत छिपा हुआ है। इस कहानी का उत्तरार्द्ध इस दृष्टि से अधिक रोचक अद्यतन होता चला गया है कि कहानीकार ने निरंतर बदलते पूंजीवाद के सापेक्ष निरंतर आधुनिक और उच्च तकनीक युक्त होते जाते स्वर्ग की दिलचस्प कल्पना की है, यह भी संकेत किया है कि पुरुष-सत्तात्मक स्वर्ग में स्त्रियों की बन्दी भूमिका देवता (पुरुषों) का मनोरंजन करना ही था, आज की सच्चाइयों और प्रवृत्तियों का प्रतिबिम्बन करने वाली इस कहानी में स्त्रियों का शोषण करने वाली पुरुष प्रधान सभ्यता के अतीत और वर्तमान दोनों के ही चेहरे साफ-साफ देखे जा सकते हैं। आधुनिक सभ्यता के लिए विशेष रूप से सृजित इस कहानी में स्वर्ग का कुरुचिपूर्ण होते जाना हमारे बुद्धिजीवी वर्ग और उसके आदर्शों का कुरुचिपूर्ण और प्रमादी होते जाना है। 'पखावज' कहानी की सफलता इसमें है कि फैंटेसी तत्वों के बावजूद यह कहानी अत्यंत साफ-साफ अपने निष्कर्षों को पाठकों तक पहुँचा देती है।
संख्या में कम होते हुए भी शिवशंकर मिश्र की इन कहानियों के अविस्मरणीय होने का रहस्य संभवतः यही है कि उनकी कहानियों के कथानक कल्पना सृजित न होकर वास्तविक जीवनानुभवों और स्मृतियों से जैसे चुने गए हैं। यही कारण है कि उनकी कहानियों के अपवादात्मक-असामान्य चरित्र भी जीवन में घटित विरल घटनाओं का एक हिस्सा लगते हैं। "मुनुआ की वीरगति" कहानी में मुनुआ के विकलांग होने का वास्तविक कारण जिसके लिए कहीं गरीबी, कहीं व्यवस्था द्वारा क्षेत्र के विकास का अभाव, वर्जित एवं विषाक्त प्रभाव वाली खेसारी की खेती तथा समुचित टीकाकरण के अभाव में सक्रिय पोलियो के विषाणु आदि कारण जिसकी पृष्ठभूमि पर मुनुआ जैसे विकलांग का जन्म संभव हो पाता है। कहानीकार ने जानबूझकर दो-चार रोचक वाक्यों में निबटा दिया है। पोलियोग्रसित अशक्त मुनुआ के दूसरे दौर की त्रासदी, जिसे कथाकार नें कथात्मक प्रस्तुति के लिए चुना है, अस्तित्व की सार्थकता और अस्मिता की सामाजिक स्वीकृति के प्रश्न को जीवन और मृत्यु के बीच आत्मघाती वरण तक ले गया है। बहुत ध्यान से पढ़ने पर ही यह रहस्योद्घाटन हो पाता है कि बिलकुल सामान्य और लगभग आत्मघाती सी लगाने वाली मुनुआ की मृत्यु वास्तव में एक हत्या ही है। उसकी मृत्यु के पीछे भी व्यवस्था की उपेक्षा और असमर्थता ही जिम्मेदार है। एक मारक विकल्पहीनता को जीने वाली जनसंख्या और उसके युवापीढ़ी के एक रात की जीवन-चर्या का चित्रण जिस निस्संगता और तटस्थता से शिवशंकर मिश्र ने किया है-घटनाओं और शब्दों के स्तर पर समाप्त हो जाने के बाद भी इस कहानी की अभिव्यक्ति-यात्रा कभी समाप्त नहीं होती। साधनहीनता के अभिशाप में पल रहा सामूहिक जीवन की साझा ऊब सिर्फ मनोरंजन से मिले सुख की खोज में रामलीला देखने हेतु शंकरगढ़ पहुँचने की समस्या को रात के अँधेरे में वास्तविक जीवन-संघर्ष में बदल देती है। गिट्टी लेने जाने वाली ट्रकों की प्रतीक्षा ही जीवन के रोमांचक भविष्य की प्रतीक्षा है। त्रासदी को उपेक्षित कर जी गयी एक करुण उत्सवधर्मिता का दौर चलता रहता है। परिहास में दी गयी चुनौती को स्वीकार करते हुए अपनी बहादुरी सत्यापित करने के लिए विकलांग मुनुआ चलती ट्रक से छलांग लगा देता है। समय पर प्राथमिक चिकित्सा न मिलने से घायल मूर्छित मुनुआ एक ओर मृत्यु की ओर कदम बढ़ा रहा होता है, दूसरी ओर उसके मृत्यु के मूल्य पर मनोरंजन करते साथी एक विकल्पहीन त्रासदीपूर्ण जीवन को सिर्फ साक्षी-भाव से जीते रहने और प्रतीक्षा करते रहने के लिए विवश हैं। किसी सैनिक अभियान और युद्ध की तरह मात्र श्रम के नियोजन से लगभग मुफ्त मनोरंजन हेतु की गयी इस यात्रा की वास्तविक कीमत जो न सिर्फ भयावह है, बल्कि मुनुआ के विडंबनात्मक मृत्यु के साथ व्यवस्था के नियामकों के सामने एक व्यंग्यात्मक प्रश्न-चिन्ह भी छोड़ जाती है। बहुचर्चित अलगावबोध और अमानवीकरण जैसी निषेधात्मक प्रवृत्तियां इस कहानी में अतिरिक्त मूल्य की तरह लगभग मुफ्त में उपस्थित हैं।
भारतीय समाज में हाशिए के बाहर का बहिष्कृत एवं लगभग निष्क्रिय कुंठित सामान्य उपेक्षित लोक का उदार असावधान मतदाता इतना निरीह हो चुका है कि अपने नागरिक अधिकारों की मांग भी नहीं कर सकता। स्वतन्त्र भारत के आर्थिक एवं जातीय लोकतंत्र का सूक्ष्मतम अवलोकन शिवशंकर मिश्र की लम्बी कहानी 'मुजरिम' में देखा जा सकता है। शिवशंकर मिश्र की अन्य कहानियों की तरह यह कहानी भी वर्णनात्मक और महाकाव्यात्मक दोहरी संरचना वाली होने से एक कथारूपक के रूप में बहुविमर्शात्मक संभावनाओं वाली एक औपन्यासिक कहानी है। कुछ-कुछ मन्नू भंडारी के प्रसिद्ध उपन्यास 'महाभोज' की तरह शिवशंकर मिश्र की 'मुजरिम' कहानी को लम्बी कहानी न कहकर लघु कलेवर का महाकाव्यात्मक उपन्यास कहना गलत न होगा। भारतीय समाज का उत्तर मार्क्सवादी एवं समाजशास्त्रीय विश्लेषण इस कहानी को महत्वपूर्ण बनाता है। इस एक कहानी के विश्लेषण से जाति-विमर्श के लिए आवश्यक वे सारे तथ्य एवं निष्कर्ष जुटाए जा सकते हैं, जो भारतीय जाति-व्यवस्था के उन पक्षों को भी अनावृत्त करता है, जिस ओर प्रायः हमारा ध्यान ही नहीं जाता। यह कहानी परंपरागत जातिवादी भारतीय समाज के विभिन्न अछूते पक्षों की ओर भी पाठकों का ध्यान आकर्षित करता है। उनकी 'मुजरिम' कहानी का विस्तृत विमर्शात्मक विवेचन किसी स्वतन्त्र लेख में करना ही उचित होगा। तब तक इतना ही कहना चाहूँगा कि शिवशंकर मिश्र की कहानियां बिना किसी शोर के हिन्दी कहानी को बिलकुल विरल मौलिक कलात्मक प्रतिमान और विमर्शात्मक आयाम सौंपती हैं।
संपर्क : रामप्रकाश कुशवाहा,
बी-1, श्री साईं अपार्टमेंट, टंडीया,
करौंदी, सुन्दरपुर, वाराणसी (उ.प्र.)
पिन - 221005
ई-मेल : raprku@gmail.com
(कथादेश, नवम्बर 2017 में प्रकाशित समीक्षा)
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