वह 30 जुलाई, 1983 का दिन था, जब मैं पी.एच0डी0 में प्रवेश के लिए बी0एच0यू0 गया था। दिन भर क्षमाशंकर जी के साथ शोध.निदेशक की तलाश करता रहा, पर किसी के पास नया शोधार्थी लेने की जगह नहीं थी। दोपहर ढल गयी थी। मेरे मन में हताशा थी और सिर में दर्द भी हो रहा था। मैं इलाहाबाद लौटना चाहता था।
'आइए कॉफी पी जाय।' - क्षमाशंकर जी ने कहा।
'काफी तो महँगी होगी।'
'नहीं भैया, महामना ने छात्रों के लिए सारी व्यवस्था की है। यहाँ खाने.पीने की चीजें काफी कम पैसों में मिल जाती हैं।'
'मैत्री जलपान गृह' और पूरे विश्वविद्यालय का स्थापत्य बहुत आकर्षक लग रहा था। मैं सब कुछ बेगानेपन के साथ देख रहा था। जहाँ तक मुझे याद है, दो रुपयों के कूपन से हम लोगों को एक.एक रसगुल्ला तथा कॉफी मिल गयी थी। शायद रसगुल्ले का या कॉफी का कुछ ऐसा असर हुआ कि मेरा सिरदर्द गायब हो गया, पर मन में हताशा और बेगानगी बनी रही। मैं इलाहाबाद के लिए लौटने की सोच ही रहा था कि एक युवक आया और मुझसे बोला, 'आपको डॉ0 अवधेश प्रधान बुला रहे हैं।'
'मैत्री' के अहाते के एक कोने में, जहाँ कुछ लताओं का झुरमुट एक अलग प्रकोष्ठ बना रहा था, गुरुशरण सिंह के पंजाबी नाटक 'इंकलाब जिन्दाबाद' के हिन्दी अनुवाद का अभ्यास चल रहा था। प्रधान जी ने शायद कभी इलाहाबाद में 'हिन्दुस्तान' की भूमिका में मेरा अभिनय देखा था। यहाँ वे स्वयं यह भूमिका निभा रहे थे। यह प्रधान जी की गुणग्राहिता ही थी कि उन्होंने उक्त भूमिका के लिए मेरा नाम प्रस्तावित किया। यह जानकर कि अगले दिन लमही में प्रेमचंद के घर के सामने मंचन होना है, मैं राजी हो गया। थोड़ी ही देर में प्रो0 रामनारायण शुक्ल आ गये। लम्बी गान्धार मूर्ति। धोती कुर्ता। बैक ब्रश लम्बे अधपके बाल। मुँह पान की पीक से भरा हुआ। ऊँचा माथा, बहुरेखीय। क्लीनशेब्ड चेहरे पर मौजूद चेचक के स्थायी निशान चेहरे की आभा को तनिक भी कम नहीं करते थे। शायद मेरे बारे में उन्हें बता दिया गया था। मेरे अभिवादन का उत्तर अभय मुद्रा में हाथ उठा कर दिया उन्होंने। मुँह में पान होने की वजह से कुछ बोले नहीं, पर आँखों में गहरी आत्मीयता झाँक रही थी।
'तो कल आप मेरे ही साथ चलिएगा।' बिना पान की पीक थूके मुँह थोड़ा ऊपर उठाकर बोले वे। जी, जब तक वे अस्वस्थ नहीं हुए थे, यह उनके सम्भाषण की स्थायी भंगिमा होती थी।
अगले दिन एक दिलचस्प घटना हुई। उन दिनों प्रो0 शुक्ल एक मोपेड से चलते थे। वे यथासमय आ गये। मैं पहले से ष्बिरला छात्रावासष् के सामने खड़ा था। हम दोनों मोपेड पर सवार हुए। उन दिनों मैं अपेक्षया मोटा था। प्रो0 शुक्ल भी अपनी लम्बाई के अनुरूप मोटे थे। वे मोपेड का एक्सीलेरेटर खींचते रहेए मोपेड 'घों घों' करती रही, पर आगे नहीं बढ़ी।
'हम दोनों ही स्थूल हैं जी। लगता है यह वाहन हम लोगों का वहन नहीं कर पायेगा।' -विनोदपूर्वक बोले वे।
आखिरकार उन्होंने मुझे हिन्दी विभाग की छात्राओं ने जो आटो बुक कराया था, उसमें बैठा दिया। कुछ दिन पहले ही मेरी दादी का निधन हुआ था और मुझे मुंडित होना पड़ा था। सफेद कुर्ते-पाजामे की गन्दगी भी छिपायी नहीं जा सकती थी। छात्राएँ रास्ते भर मुझसे चुहल करती रहीं, पर मैं बिल्कुल चुप रहा। दरअसल किसी गम्भीर भूमिका में आने से पहले मैं बिल्कुल चुप हो जाता हूँ। उक्त नाटक में तो हिन्दुस्तान की भूमिका में उतरना था। बहरहाल मैं लमही तक आँखें मूँदे बैठा रहा सिर झुकाये। छात्राओं के विनोदपूर्ण कटाक्ष अनुत्तरित रहे।
हम लोग लमही पहुँचेए तो बूँदा-बाँदी शुरू हो गयी। बार-बार लगता कि नाटक नहीं हो पायेगा। हम लोगों ने निर्णय लिया कि अगर नाटक नहीं हो पाता तो कुछ गीत ही हो जायँ। मैंने सुन रखा था कि प्रो0 शुक्ल लमही से लोकसभा का चुनाव लड़ चुके थे। किसी पार्टी के टिकट पर नहीं, बल्कि अपनी जनवादी परिवर्तनकामी समझ और प्रतिबद्धता के आधार पर- निर्दल। दरअसल उन दिनों वे स्वयं एक पार्टी हुआ करते थे। जहाँ तक प्रतिबद्धता की बात है, मैं इस सम्बन्ध में निवेदन करना चाहूँगा कि गम्भीर व्याधि और अंततः पहाड़ जैसे शोक से ग्रस्त होकर भी उनकी प्रतिबद्धता प्रभावित या परिवर्तित नहीं हुई। हाँ, सक्रियता अवश्य प्रभावित हुई।
'क्या यहाँ ढोल-हारमोनियम मिल सकेगा', -मैंने पूछा।
'आइए हम लोग गाँव के लोगों से सम्पर्क करें। इस तरह कुछ दर्शक भी जुट जायेंगे और कुछ वाद्य भी मिल सकते हैं।'
हम दोनों गाँव की परिक्रमा करते रहे। मैंने गौर किया कि गाँव का लगभग हर आदमी प्रो0 शुक्ल से परिचित था। सबसे कुशल-क्षेम करते रहे वे। धोती का एक छोर हाथ में पकड़े गाँव की गलियों में घूमते हुए वे सच्चे लोकनायक लग रहे थे। आखिरकार हम लोग ढोल-मजीरा हासिल कर पाये। हम लोगों के पीछे-पीछे बच्चों और नवयुवकों का एक झुंड दर्शक के रूप में आ गया। बूँदा-बाँदी बंद नहीं हुई, पर तेज भी नहीं हुई। मुझे ढोल की मुँदरियाँ चढ़ाते देख वे बोले-
'तो आप ढोल बजायेंगे?'
'जी, कामचलाऊ। कोई मजीरा बजा देता, तो अच्छा रहता।'
'चलिए, मैं प्रयास करता हूँ।'
'यह तो बहुत अच्छा होगा।'
मैंने फिर से उनका चेहरा देखा। उनकी संगीत चेतना की मुझे कोई जानकारी नहीं थी। गले में ढोल लटका कर मैं खड़ा हुआ। और साथी भी थे। डॉ0 अवधेश प्रधान का सुंदर गायन मैं पहले भी सुन चुका था। क्षमाशंकर जी भी मेरे साथ स्वर लगाते थे इलाहाबाद के कार्यक्रमों में। बनारस की टीम के और भी साथी थे। प्रो0 शुक्ल ने बहुत अच्छा मंजीर.वादन किया। बूँदा.बाँदी चलती रही। हम लोग गीत गाते रहे। दर्शकों की भीड़ जुटती रही। मेकअप तो हम लोग कुछ करते नहीं थे पर पाजामे वाला 'हिन्दुस्तान' मुझे उचित नहीं लग रहा था। मैंने प्रो0 शुक्ल से थोड़े संकोच के साथ यह समस्या बतायी। उन्होंने फौरन अपनी धोती उतार कर मुझे दे दी।
'तब तक के लिए आप अपना पाजामा हमें दे दीजिए।'
मेरा पाजामा, जब वे पहनने लगे तो वह उनके टखनों के ऊपर नहीं जा सका। लिहाजा जब तक नाटक होता रहा, वे पालथी मारे बैठे रहे। नाटक में सिपाही की भूमिका में अजय थे। जी, डॉ0 अजय शुक्ल जो दुर्दैववश अब भौतिक रूप में हमारे बीच नहीं हैं। नाटक सम्पन्न हुआ और दौड़ कर मैंने प्रो0 शुक्ल की धोती उन्हें दी।
यों उस दिन का मौसम ठीक नहीं था। दिन दुर्दिन था. मेघाच्छन्न। बूँदा-बाँदी हो ही रही थी, पर दर्शक डटे रहे। नाटक में मेरा अभिनय सब को अच्छा लगाए पर प्रो0 शुक्ल विशेष प्रभावित हुए।
'हाँ, आप किसी विशेष प्रयोजन से बनारस आये हैं?' - मुझे अकेले में ले जाकर उन्होंने पूछा।
'जी।'- मैंने अपनी समस्या बतायी।
'अपने टेस्टीमोनियल्स मुझे दे दीजिए और अपनी शोध.सम्बन्धी रुचि भी बता दें। जगह सचमुच किसी के पास नहीं है। आप कोई अन्तःआनुशासनिक विषय चुनें।'
जी, उन दिनों वे आप कहते थे मुझे। मैंने तीन-चार विषय बताये।
'ठीक है। आपका एडमिशन अगले सत्र में हो सकेगा।'
'हो, तो जायेगा...?'
'होगा क्यों नहीं जी?'
अगले दिन मैं इलाहाबाद आ गया- अपने गाँव। बी0एच0यू0 में मेरा पंजीयन हो पायेगा या नहीं। मन में कभी सकारात्मक बातें आतीं, कभी नकारात्मक। हाँ, प्रो0 शुक्ल का आश्वस्त करता वाक्य बार-बार दिमाग में नाच जाता - 'होगा क्यों नहीं जी?'
लगभग दो महीने बाद मुझे प्रो0 शुक्ल की खूबसूरत इबारत वाला पोस्ट कार्ड मिला। पत्र कुल मिलाकर दो वाक्यों का था। कुछ इस तरह-
'प्रिय, आप का पंजीयन हो चुका है। आयें और छात्रावास के लिए आवेदन कर दें।'
...मेरा रा पंजीयन बिना फीस जमा किये कैसे हो गया? ...हो सकता है पंजीयन की प्रबल सम्भावना हो गयी हो! मैं बी0एच0यू0 गया, तो पता चला कि मेरी फीस भी प्रो0 शुक्ल ने जमा की।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के गुरुओं से इस हद की आत्मीयता कभी नहीं मिली थी। एक-आध अपवाद के सिवा। मुझे कबीर की 'साखी' याद आयी- 'सतगुर हमसूँ रीझि करि...।'
गुरु के शिष्य पर रीझने का प्रत्यायन हुआ मुझे।
मुझे याद नहीं पड़ता कि शोधकार्य हेतु कभी हम लोग औपचारिक रूप से साथ बैठे हों। अस्सी पर पप्पू की दूकान में चाय पीते हुए सिनाप्सिस बन गयी और कभी अस्सी घाट की सीढ़ियों पर तो कभी बाँस फाटक की सिन्दूरी रंग से पुती ठंडाई की दूकान में या लंका पर केशव की पान की दूकान के सामने शोध सम्बन्धी विमर्श हो जाता। विमर्श राह चलते हुए भी हो जाता। हाँ, केवल विमर्श। अमर्ष का कोई प्रसंग मेरे जेहन में नहीं है।
हाँ, कभी किसी ने उनसे मेरे सम्बन्ध में तिकड़म कर दी थी कि कैसा शोधार्थी मिला कि पप्पू की दूकान में भाँग खाकर आप की ही नकल उतारता है। भेंट होने पर उपालम्भ भाव से वे बोले- 'अजी, तुम तो पप्पू की दूकान में मेरी नकल उतारते हो।'
'हाँ, जो मुझे अभिनेय लगते हैं, उनका अभिनय करता हूँ।' - मैंने अपना बचाव किया।
'ठीक कह रहे हो जी। तुम कलाकार हो। अभिनय तुम्हारा धर्म है।' -वे तत्काल दार्शनिक अंदाज में बोले।
'तो तात, मैं आप को अभिनेय लगा?'
मेरे उनके सम्भाषण में 'आप' से 'तुम' की आवाजाही बनी ही रही। कभी तात' कह देते, कभी 'भद्र'। शायद 'भद्र' कहने का आधार 'बाणभट्ट की आत्मकथा' के मंचन में मेरी 'सुगत भद्र' की भूमिका रही हो। उक्त नाटक में वे स्वयं 'भट्ट' की भूमिका में थे- मात्र कौपीन, विशाल लोमश काया।
'जी।' - उनके प्रश्न का मैंने उत्तर दिया।
'कैसे भैया?'
'अपनी विलक्षणताओं के साथ एक नायकीय सम्भावना आपको अभिनेय बनाती है।'
'नहीं जी। सम्भावना तक ही तो सीमित रह गया।' -पछतावे के साथ वे बोले गंगा की लहरों को देखते हुए।
'नायकविहीन युग में नायकीय सम्भावना भी तो महत्वपूर्ण है।'
'पता नहीं जी।' -वे गम्भीर हो गये।
इस बेतरतीब लेख में दो ऐसे मित्रों का जिक्र आया है, जो दुर्भाग्यवश अल्पवय में ही हम लोगों से बिछड़ गये। डॉ0 क्षमाशंकर पांडेय ने तो अपना सेवाकाल पूर्ण कर लिया था और उन पर केन्द्रित एक लघु लेख मैंने भेज भी दिया है, पर डॉ0 अजय शुक्ल का तो अभी आरोहण काल था- 'लाल फूलों का लहकता झौंर'। अजय जी के स्मरण के क्रम में मेरे मस्तिष्क में मुक्तिबोध का यह बिम्ब नाच रहा है। इसका एक आधार भी है। बात 1 जनवरी, 1986 की है। भारतेन्दु जन्मशती के सप्तदिवसीय आयोजन के सिलसिले में देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों के हिन्दी के प्राध्यापक आये थे। दिन में अकादेमिक कार्यक्रम होते और शाम को सांस्कृतिक आयोजन। 1 जनवरी, 1986 की शाम 'कवि दरबार' का कार्यक्रम था। दृश्यकला संकाय के बंगाली प्राध्यापक ने हम सबको रूपान्तरित करके कहा. 'एइ बाबा, ढाई घंटा ऐसे ही बैठो।'
प्रो0 शुक्ल को बड़ी-बड़ी काली मूँछें लगा दी गयीं। वे धूमिल की भूमिका में थे। क्षमाशंकर जी को धोती-कुर्ता पहनाया गया। वे 'प्रसाद' की भूमिका में थे। मुझे भारतेन्दु की भूमिका मिली थी और अजय को मुक्तिबोध की। दृश्यकला संकाय के कुशल प्राध्यापकों ने हम सबको इस तरह रूपान्तरित किया था कि हम लोग अपना-अपना रूप खोकर तदाकार हो गये थे, जिनका अभिनय करना था। अजय जी की तब मूँछें या तो आयी नहीं थीं या उतनी सघन और बड़ी नहीं थीं, जितना बाद में हो गयी थीं। जैसे भी हो, दृश्यकला संकाय के प्राध्यापकों की कुशलता के चलते वे दिख नहीं रही थीं। फिर उन्हें एक बिना जली बीड़ी थमा दी गयी। मंच पर वे लगातार बीड़ी पीने का अभिनय कर रहे थे।
'मालवीय भवन' में कार्यक्रम चल रहा था। प्रेक्षकों में तत्कालीन कुलपति प्रो0 आर0 पी0 रस्तोगी भी थे और जैसा कि पहले कहा गया, अनेक विश्वविद्यालयों के प्राध्यापकगण भी। अजय को लगातार बीड़ी पीते देख कुलपति महोदय ने तत्कालीन विभागाध्यक्ष प्रो0 त्रिभुवन सिंह से पूछा-
'ये मंच पर बीड़ी क्यों पी रहे हैं?'
'सर ये मुक्तिबोध का अभिनय कर रहे हैं।'
किसी को लग सकता है कि प्रो0 शुक्ल पर लिखते हुए मैं डॉ0 अजय शुक्ल पर केन्द्रित होकर विषयान्तर कर रहा हूँ। जी नहीं, यह विषयान्तर नहीं, बल्कि प्रो0 शुक्ल के अन्तःकरण का निहायत मार्मिक विषय है- उनके जीवन का आखिरी शोक...!
अजय जी पर अलग से लिखने की जरूरत महसूस कर रहा हूँ। लिखूँगा। फिलहाल इतना ही। इस सिलसिले में यह अंतिम लेख नहीं, बल्कि प्रातिपदिक है।
डॉ0 शिवशंकर मिश्र
पूर्व एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग,
जनता महाविद्यालय, अजीतमल, औरैया.
सम्प्रति : सँड़वा खुर्द, काँटी, प्रयागराज.
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