जब-जब देखा : सन्दर्भ नामवर सिंह

जब-जब देखा : सन्दर्भ नामवर सिंह

नामवर जी पर लिखने के लिए मैं उपयुक्त नहीं हूँ। अधिकृत भी नहीं। वजह साफ है, कभी उनका विशेष नैकट्य नहीं मिला। अपनी अजगरी वृत्ति के चलते मैंने कभी कोई चेष्टा भी नहीं की इस हेतु। अस्सीवासी डॉ. शैलेन्द्र सिंह मेरे दुर्निवार मित्र हैं। उनके निरन्तर तकाजों के चलते मैं यह लेख लिखने में प्रवृत्त हुआ। अब प्रश्न यह है कि क्या लिखा जाय? बहुत पढ़ाकू प्रवृत्ति न होने के कारण में यहाँ केवल उन्ही कुछ प्रसंगों का वर्णन करके लेख की इति श्री कर लूँगा, जिनमें कभी उन्हें देखने-सुनने या उनसे मिलने का भी संयोग बना।

नामवर जी को पहली बार इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के एक सेमिनार में देखा। सेमिनार कई दिनों (शायद, सात दिनों) का था। नामवर जी नामवर तो थे ही। उन दिनों हम लोग बी.ए. के छात्र थे, किन्तु 'परिवेश' की गोष्ठियों में आना-जाना शुरू हो गया था। एक दिन बीत गया और नामवर जी नहीं आये। फिर दूसरा दिन भी बीत गया। हम लोग अधीर हो रहे थे। ...कैसे होंगे नामवर सिंह? क्या पहनते हैं? आँय? जहाज से आयेंगे? यह सब सुनकर तो कौतूहल और भी बढ़ गया। आखिरकार नामवर जी आ गये। बिना कालर का कुर्ता, धोती। मूँछें मुँड़ी। पैरों में चप्पलें। थोड़ी देर के अन्तराल के बाद वे पान चबाते हुए मंच पर बैठे। देश के अन्य कई प्राध्यापक पहले से बैठे थे मंच पर। जाड़े के दिन थे और प्रायः सबने सूट पहन रखे थे। सब के बीच धोती और बिना कालर का ऊनी कुर्ता पहने नामवर जी विरल दिख रहे थे। उनका वक्तव्य शुरू हुआ, तो निहायत मद्धम मन्द्र, जिसे सुनने के लिए सबको अतिरिक्त अवधान की जरूरत पड़ रही थी। निचोड़ यह कि उनकी वक्तृता का हम लोगों पर सम्मोहन जैसा असर हुआ।

उन्हें देखने और सुनने का दूसरा मौका ‘हिन्दुस्तानी एकेडमी’ में मिला। वह एक खास आयोजन था, जिसमें जैनेन्द्र, अज्ञेय और हिन्दी के अनेक प्रोफेसरान उपस्थित थे नाना विश्वविद्यालयों के। जिस तरह के भिन्न-भिन्न विचारधाराओं के शिखर पुरुष मचस्थ थे, ऐसे में स्वाभाविक था कि खासी गहमा-गहमी होती। हुई थी। पर यहाँ मैं एक दूसरे प्रसंग का वर्णन करना चाहता हूँ।

उस आयोजन में मैंने एक ऐसा दृश्य देखा जो मेरे लिए अपूर्व था। गलियारे में गहन चिन्तन की मुद्रा में नामवर जी खैनी रगड़ रहे थे..। उस कार्यक्रम में खूब तर्क-वितर्क हुए, पर जहाँ तक मुझे ध्यान है, कुतर्क किसी ने नहीं किये। हम लोग नामवर जी के वाग्वैदग्ध्य से प्रभावित हुए। तब तक हम लोगों ने ‘छायावाद’ और ‘कविता के नये प्रतिमान’ बाँच लिये थे।

यहाँ मैं बारबार ‘हम लोग’ का प्रयोग कर रहा हूँ। इस बहुवचन की व्याख्या होनी चाहिए। उन दिनों इलाहाबाद विश्वविद्यालय में कुछ अराजक और प्रातिभ छात्रों की एक अनौपचारिक मंडली थी। उस मंडली के सभी साथियों से क्षमायाचना करते हुए सिर्फ प्रो. राजकुमार का उल्लेख कर रहा हूँ, जिन्हें आगे चलकर पी-एच.डी. शोधोपाधि हेतु नामवर जी के निदेशन का सुयोग प्राप्त हुआ। उन दिनों तो हम लोग ऐसा सपना भी नहीं देख सकते थे। उधर राजकुमार जे.एन.यू. गये और मैं बी.एच.यू. आ गया। मेरे शोध निदेशक प्रो. रामनारायण शुक्ल और प्रो. प्रभाकर झा (फ्रेंच) थे, लेकिन मित्रता काशीनाथ जी और चौथीराम जी से कुछ ज्यादा ही थी। यहाँ यह उल्लेख न करूँ, तो कृतघ्नता होगी कि पी. एच.डी. हेतु मेरा प्रवेश शुल्क प्रो. शुक्ल ने जमा किया था लमही में मेरा नाटक देखकर। उस नाटक में प्रो. शुक्ल के पुत्र अजय ने सिपाही की भूमिका निभायी थी। यह एक दुर्योग ही है कि इस समय, जबकि ये पंक्तियाँ लिखी जा रही हैं, कुछ ही दिनों पहले डॉ. अजय शुक्ल के निधन की सूचना मिली- भरे-पूरे यौवन में।

इसके बाद कुछ मौके और आये, जब नामवर जी से मिलना हुआ। उन मुलाकातों का वर्णन अनावश्यक विस्तार-भय के कारण नहीं किया जा रहा है। हाँ, एक चीज, जिसने मेरा ध्यान खींचा, वह यह थी कि काशीनाथ जी बड़े भैया का बहुत अदब करते थे और मझले भैया से तो डरते भी थे, जब भी कोई नयी रचना छपती।

इसके बाद उन्हें देखने और सुनने का अवसर मिला बी.एच.यू के रिफ्रेशर कोर्स में, जिसे वे ‘पुनर्नवा’ कहते थे। यह सही है कि नामवर जी मंच और श्रोता देखकर बोलते थे। उनके इस हुनर को ‘कथादेश’ में उन्हीं के तरीके से शीर्षक देकर मानो उनकी ओर से जवाब दिया हो राजकुमार ने ‘कहने में उनके सामने, बात बदल-बदल गयी।’ 

बी.एच.यू. में काशी-महिमा करते-करते नामवर जी बोले-
‘इलाहाबाद में है ही क्या? एक बूढ़ा बरगद और अँगरेजों का बनवाया सीनेट हाल।’

बनारस के लोग गदगद हो रहे थे और मैं और कुमार पंकज प्रतिवाद की मुद्रा में आ ही रहे थे कि नामवर जी ने एक मजाक से प्रसंगान्तर कर दिया और प्रसंगान्त भी -
‘भाई, कुमार पंकज की बात समझ में आती है। जैसे दूल्हन चाहे जितने दिन ससुराल में रहे, पर मायके की निन्दा नहीं सुन सकती।’

एक भेंट आकस्मिक रूप से हो गयी आगरे में। मैं तो डॉ. सुभाष राय के फोन पर चला गया था। बताया गया कि ‘अखिल भारतीय अवधी-भोजपुरी कवि सम्मेलन’ है। मैं ‘सूर-सदन’ के बाहर ही था कि एम्बेसडर से उतरते नामवर जी को देखा। आगे बढ़कर ‘नमस्ते’ किया। अपरिचय भरी एक मुस्कान। मैंने संक्षिप्त परिचय दिया और काशीनाथ जी का संदर्भ भी। फिर तो सारी रात मंच पर संग बैठना। थोड़ी-थोडी देर में मैं पान का बीड़ा बढ़ाता और उनकी सौजन्य भरी मुस्कान देखने को मिलती। हालाँकि वे अध्यक्ष थे और अमूमन अध्यक्ष अन्त में बोलता है, लेकिन नामवर जी का भाषण पहले हुआ। पहले वाक्य में उन्होंने भोजपुरी का प्रयोग किया और ताड़ गये कि श्रोताओं पर असर कम पड़ रहा है। तुरन्त वे बोले-
‘अब खड़ी बोली में बोले के इजाजत दिहल जाव।‘

फिर तो पहले ही वाक्य से तालियाँ। श्रोता प्रभावित तो हुए पर मैंने महसूस किया कि उनका जो जादू बनारस, इलाहाबाद दिल्ली आदि में चलता है, यहाँ लगभग नदारद है। दरअसल गीतकारों के उस मेले में नामवर जी को अजनबी और ईर्ष्या भरी आँखों से देखा जा रहा था।

‘आपने कार्यक्रम में आने की स्वीकृति ही क्यों दे दी? ये '‘कविता के नये प्रतिमान’' समझने वाले लोग नहीं हैं।‘ -पान का बीड़ा बढ़ाते हुए धीमी आवाज में मैंने पूछा।

‘अवधी-भोजपुरी के नाम पर।’ - उनका संक्षिप्त उत्तर।

मेरा नाम पुकारा गया काव्य पाठ के लिए। मैंने तीन गीत सुनाये। एक अवधी में, दूसरा भोजपुरी में और तीसरा खड़ी बोली में। गीत सुनाकर फिर अपनी जगह बैठा।

‘आप के तीनों गीत साहित्यिक है।’ -नामवर जी। 

हो सकता है, औपचारिकतावश कहा हो उन्होंने, पर मेरे लिए यह वाक्य अयाचित पुरस्कार जैसा था। यह मेरी आखिरी भेंट थी उनसे। 

मैंने पहले ही कहा कि शैलेन्द्र जी मेरे ‘दुर्निवार मित्र’ हैं। नामवर जी के लिए भी वे दुर्निवार साबित हुए। बकौल शैलेन्द्र कभी वे नामवर जी के यहाँ रुके थे। उन दिनों नामवर जी बेटी के साथ रहते थे। दिन में नामवर जी कुछ पढ़ रहे थे। बेटी का बेटा, जो न तो अब शिशु रह गया था और न ही किशोर हो पाया था, शैलेन्द्र जी के साथ बाहर बैठा ऊब रहा था।

‘बेटा, तुम्हारे नाना बहुत बड़े विद्वान हैं न?’ -शैलेन्द्र।

‘हाँ।‘

‘तो जाओ नाना से पूछो, तुलसीदास के नाना का क्या नाम था।’

‘नाना, नाना, तुलसीदास के नाना का क्या नाम था?’

‘आँय?’- नामवर जी ने चश्मा उतारा।

‘कौन पूछ रहा है?’

‘शैलेन्द्र अंकल।’

‘शैलेन्द्र!’ -नामवर जी की थोड़ी तेज आवाज।

‘जी।’

‘अन्दर आओ।’

‘हाँ सर।’

‘तुम बताओ क्या नाम था तुलसीदास के नाना का?’

‘सर वो तो तुलसीदास ने लिख दिया है।’

‘क्या लिख दिया है?’

‘जहाँ सुमति तहँ सम्पति नाना।‘

‘नाना का नाम सम्पति, नानी का नाम सुमति। दोनों हमेशा साथ रहते थे।’

नामवर जी का विरल अट्टहास...।

शिव शंकर मिश्र
एसोसिएट प्रोफेसर एवम् अध्यक्ष,
हिन्दी विभाग, जनता महाविद्यालय,
अजीतमल, औरैया.
दूरभाष- 9411016120

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय पोस्ट