पाठ और पुनः पाठ

शिवशंकर मिश्र का 'अन्तिम उच्चारण'-

यथार्थ की महाकाव्यात्मक प्रस्तुति करती बहुविमर्शी कहानियों का संवेदनाधर्मी कथा-लोक


रामप्रकाश कुशवाहा

अपने प्रकाशन के लगभग छः-सात वर्ष बाद शिवशंकर मिश्र के कहानी-संग्रह "अन्तिम उच्चारण" की कहानियों को एक बार फिर पढ़ना-पूरी तैयारी और धैर्य के साथ भारतीय समय और समाज के समुद्र में खोज-भावना से की गयी ऐसी लेखकीय गोताखोरियों से गुजरना है, जिसकी उपलब्धियों का तात्कालिक आकलन करना संभव ही न रहा हो। यद्यपि उनकी कहानियाँ अपने पहले पाठ में भी अखबार में छपी किसी ध्यानाकर्षक घटना की तरह एक साँस में स्वयं को पढ़वा ले जाती हैं। फिर भी इस टिप्पणी को पढ़ने की तरह बची रह जाती हैं कि घटना की अभी जाँच चल रही है या घटना के वास्तविक कारण का पता लगाया जा रहा है।

वस्तुतः शिवशंकर मिश्र के कथाकार को विरल और अद्वितीय बनाने वाली विशेषता सिर्फ उनके कवित्वमय आत्मीय अभिव्यक्ति-शिल्प में ही नहीं है, बल्कि अपनी कहानियों की कथावस्तु की उस शोधपूर्ण खोज में भी है; जो किसी को भी नहीं दुहराती। न तो स्वयं को और न ही दूसरों को। उनकी कहानियाँ कथा-साहित्य में अब तक छूटे हुए और अब तक उपेक्षित या बहिष्कृत विषयधर्मी कथानक की खोज भी हैं।

शिवशंकर मिश्र की कहानियों की एक और विशेषता अपनी ओर ध्यान आकर्षित करती है, उनकी प्रायः सभी कहानियाँ अपने पाठकों को एक विशेष दार्शनिक अंतर्दृष्टि सौंपती चलती हैं। यह अंतर्दृष्टि वे किसी ऐसे पात्र या चरित्र के माध्यम से उभारते हैं, जो या तो कोई बच्चा होता है या तो बचपन को जीने वाला ऐसा मंद-बुद्धि का या फिर आदर्शवादी चरित्र, जिसने विकास के क्रम में उपजी सभ्यता की उन तमाम चालाकियों को जानने-समझने बूझने और जीने से इंकार कर दिया है। जिसे एक गलत दौर का जीवन-समय सृजित करने वाले तमाम लोग जी रहे हैं। वे बहुत चुपके से उस एक चुने हुए प्रतिनिधि चरित्र के माध्यम से अपनी कहानी को गुजरते समय की पड़ताल और सभ्यता-विमर्श बना देते हैं। इस केंद्रीय प्रतिनिधि पात्र की पहचान कर उसके साथ होते ही कहानी और सभ्यता-विमर्श के सारे भेद खुलने लगते हैं।

उनकी कहानियों में मिलने वाले इस पात्र को शिशु-चेतनाधर्मी, निष्पाप, प्रागैतिहासिक, आदिम साम्यवादी या फिर सात्विक चेतना और संवेदनशीलता के वाहक किसी देवदूत का अचेतन रूपक भी कहा जा सकता है। उनकी पहली ही कहानी ''अंतिम उच्चारण" में जो प्रारंभ में 'बई' नाम से भी छपी थी - उसका मुख्य पात्र 'बई' समय के साथ ऐसा ही मंद बुद्धि होने के कारण कभी भी वयस्क न होने वाला चरित्र है । 'पखावज' कहानी में यही चरित्र प्रागैतिहासिक जमाने के मनुष्यों की मिथकीय सृष्टि स्वर्ग के अधिपति इंद्र में बदल जाता है। पूरी कहानी आदिम मनुष्य के जीवन-बोध के पैमाने पर आधुनिक मनुष्य की प्रगति के निहितार्थों और रहस्यों को समझने और समझाने की मुस्कानयुक्त और आह्लादपूर्ण कोशिश है। आधुनिक मनुष्य को प्राप्त वैज्ञानिक सुविधाओं से प्राचीन मनुष्य के कल्पना-लोक स्वर्ग का अधिपति इंद्र भले ही पिछड़ा हुआ और दया का पात्र लगता हो; कहानी का कुछ ही हिस्सा पढ़ने पर पाठक को ईमानदारी से बता दिया जाता है कि कहानी का आश्चर्यलोक इंद्र की नहीं बल्कि आधुनिक मनुष्य की लीला का रोचक वृत्तान्त प्रस्तुत कर रहा है। यहाँ तक कि स्वर्ग का सामान्य प्रतीत होने वाला वर्णन भी मानव सभ्यता का गंभीर विमर्श उपस्थित करता चलता है। स्वर्ग के यूटोपिया को मानवोचित संभावनाओं के साथ प्रस्तुत करने का आग्रह स्वयं ही अभिव्यक्ति का एक रोचक अवसर और घटना बन जाता है -

"स्वर्ग की शोभा सदा एक सी रहती। राज महल जगर-मगर करता रहता। नंदन वन खिला-खिला रहता। दिन उजले रहते, रातें भी उजलीं। अप्सराएँ प्रतिदिन एक ही तरह का दृश्य देखा-देख कर ऊब जातीं । (पृष्ठ 67)

शिवशंकर मिश्र की कहानियाँ बचपन से लेकर प्रौढ़ावस्था तक की हरसंभव जीवन-दृष्टियों का एक साथ निवेश करती चलती हैं। जीवन-दृष्टियों के इस निवेश और आवाहन में साक्षर-निरक्षर, समझदार और नासमझ सभी तरह के लोक की उपस्थिति दर्ज होती है। यही कारण है कि वे मासूमियत और विडम्बना को साजिशों और शरारतों के साथ-साथ दर्ज कर पाते हैं। शिव शंकर मित्र ने अपनी कहानियों में यथार्थ और उसे जीते चरित्रों से बिल्कुल छेड़छाड़ नहीं कि है, फिर भी उनकी कहानियों में सक्रिय तीसरी आँख जीवन की सच्चाइयों और विडम्बनाओं के रोचक चित्र खींचती रहती है। साथ ही आधुनिकता, मार्क्सवाद और वैज्ञानिक प्रश्नों को उठाती हुई भी, जीवन के स्थायित्व के लिए आवश्यक उन आदिम संरक्षणीय मूल्यों और सामूहिक श्रम।

शिवशंकर मिश्र ने अपनी गिनी-चुनी कहानियाँ जैसे हजारों गद्य-कविताओं से बुनी हैं। गुलेरी और शिवमूर्ति की तरह ही उन्होंने भी बहुत कम ही लिखा है। लेकिन उनकी कहानियों की निर्माण सामग्री सीधे जिन्दगी से लिए गए अनुभवों के ठोस पत्थरों से निर्मित हैं। समकालीन कथावस्तु होते हुए भी उनकी कहानियों की रचनाधर्मिता पर अनुकरणपरक सामूहिकता या तात्कालिकता का असर नहीं है। उनकी कहानियाँ पढ़कर ऐसा लगता है जैसे उन्होंने जिंदगी भर का अपना निरीक्षण और चिंतन अपनी कुछ ही कहानियों में निवेशित कर दिया है। यही कारण है कि शिवशंकर मिश्र की कहानियों को पढ़ते समय उत्पन्न अपने पाठकीय उद्वेलनों को शब्दबद्ध करना मेरे लिए आसान नहीं रहा है।

'अन्तिम उच्चारण' की कहानियों को पढ़ने के बाद जब-जब भी मैंने उस पर कुछ लिखने की कोशिश की, उनकी कहानियों में उपस्थित सघन सम्वेदधर्मिता और कथावस्तु की महाकाव्यात्मक व्याप्ति के कारण हर बार ऐसा लगता रहा कि वे सुबह-शाम में मूल्यांकित की जाने वाली कहानियाँ नहीं हैं। शिवशंकर मिश्र के कहानी संग्रह 'अन्तिम उच्चारण' की कहानियों में कथाकार का लम्बा अनुभव एवं विचार-लोक समाहित है। भारतीय समाज का इतना दीर्घकालिक और सूक्ष्म निरीक्षण उनकी कहानियों में है कि उनके रेखांकन के लिए भी लेखक के तरह के ही समय-साध्य धैर्य और श्रम की जरुरत पड़ेगी इस समीक्षा के लिखने में हुए विलम्ब का एक कारण वैचारिक भी था। पढ़ते समय शिवशंकर मिश्र जी की कुछ कहानियाँ एक नयी सैद्धांतिकी की मांग करती मुझे लगी थीं- मुझे लगा था कि उनकी कहानियों के लेखन की तरह उनकी कहानियों की समीक्षा भी एक समय-साध्य रचना-प्रक्रिया से गुजरने पर संभव हो पाएंगी बिलकुल वैसे ही जैसे उनका ईमानदार कहानीकार अपने चरित्रों को जीते हुए काफी मंथन के बाद ही अपनी कहानियों को लिख पाता है।

कभी जन-कवि गोरख पाण्डेय के अन्तरंग साथी रहे शिवशंकर मिश्र मार्क्सवादी विचारधारा के प्रति लम्बा समर्पित जीवन जीने के बाद भी प्रगतिशील फार्मूलों और फैशन वाली राजनीतिक कहानियाँ लिखने से बचते रहे हैं। उनका जीवन के पक्ष में एक ईमानदार संवेदित कथाकार बने रहना मेरे लिए आश्चर्य और श्रद्धा का विषय रहा है। उनकी कहानियों को इतने वर्षों बाद दूसरी बार पढ़ते हुए सबसे पहले तो यही प्रश्न उठा कि ये कहानियाँ यदि अवधी अंचल के किसी गाँव के रोचक चरित्रों और घटनाओं को आधार बनाकर लिखी गयी आंचलिक या संस्मरणात्मक कहानियों के रूप में ही पाठकों द्वारा पढ़ी गयी होंगी तो लगभग अपठित ही रह गयी होंगी। ऐसा इसलिए भी हुआ होगा कि अपनी कहानियों में पाठ के वर्णन के लिए जैसा बाल-सुलभ खिलंदड़ा अंदाज शिवशंकर मिश्र बार-बार लगभग सभी कहानियों में अपनाते हैं, वह उनकी कहानियों के वस्तु और शिल्प का संस्मरणात्मक हिस्सा इतनी सहजता और स्वाभाविकता के साथ लगता है कि उनके प्रतीकात्मक और बौद्धिक आयामों, उनकी गहराई और विस्तार की ओर सहसा हमारा ध्यान ही नहीं जाता। इस सच्चाई को स्वीकार करते हुए कि निरंतर अधिक जटिलतर होते जाते संसार से प्राप्त अपने वास्तविक अनुभवों को कथा में रूपांतरित करना आसान कार्य नहीं है। वह भी इस शर्त के साथ कि कथा में उठाए जाने वाले प्रश्न और जिज्ञासाएं किताबी या तात्कालिक रुझानों से प्रभावित न होकर जिंदगी की ओर से होंगी।

उनकी पहली ही कहानी 'अन्तिम उच्चारण' को ही लें तो प्रथम द्रष्टया मंद-बुद्धि का एक समस्या लगने वाला बालक तथा अपने पिता की असामयिक मृत्यु का कारण भी बनने वाला बाल चरित्र 'बई' की जात-कुजात की वर्जनाओं को न समझ पाने वाली नासमझ, किन्तु मानवीय एवं समदर्शी सामाजिकता अपने प्रतीकात्मक महत्त्व के साथ-साथ जाति-विमर्श की नयी संभावनाओं का भी द्वार खोलती है। एक अबोध बच्चे की मानसिक यात्रा से वयस्कों के जीवन-बोध को प्रश्नांकित करने वाली यह कहानी कब एक बच्चे की रोचक मूर्खताओं की शृंखला प्रस्तुत करते-करते बड़ों के सभ्यता-विमर्श की कहानी बन जाती है पता ही नहीं चलता-

"अभी वह नहीं समझ सका था कि हवा, बारिश, धूप-छाँव, सूरज चाँद और तारों की तरह धरती सबकी नहीं होती। वह टुकड़ों में बँटी होती है। टुकड़ों पर अलग-अलग लोगों का मालिकाना होता है, सबका नहीं। खेतों में उगी फसलें और पेड़ों में लगे फल सबके नहीं होते। उससे नहीं रहा गया...." (पृष्ठ 17)

यद्यपि कलात्मक वैशिष्ट्य की दृष्टि से यह कहा जा सकता है कि शिवशंकर मिश्र की कहानियों का अनूठापन बचपन के खिलंदड़ा अंदाज में बड़ों की कहानी लिखने के कारण भी है; लेकिन पाठक जैसे ही पूरी कहानी पढ़ता है कहानी वयस्कों की शातिर दुनिया पर अविकृत और निर्दोष बचपन द्वारा किए गए गंभीर व्यंग्य का अत्यंत गंभीर और सुचिंतित-सुनियोजित पाठ सामने लाती है। सहज-सामान्य लगाने वाली आधुनिकता सहसा विकास के स्थान पर विनाश की प्रस्तावना लगने लगती है। जहाँ चीजें पर्यावरण विनाश की गंभीर त्रासदी के साथ स्थायी क्षति के साथ घट रही हैं। उनकी कहानियों का विविध-संरचनात्मक कलात्मक वैशिष्ट्य उनकी 'बाबा की उघन्नी' जैसी कहानी के माध्यम से भी सामने आता है। इस कहानी में एक ही यथार्थ का कई-कई पाठ और भाष्य पाठक के सामने अत्यंत रोचक और तुलनात्मक परिदृश्य उपस्थित करता है। कहानी में उपस्थित चरित्रों के नियंत्रण और पकड़ के बाहर का यथार्थ इतना अबूझ रहस्यमय, दैवीय और डरावना लगने लगता है कि चीजें भूत-प्रेत होने के स्तर तक अबूझ होती जाती हैं। 'बाबा की उघन्नी' में यह बहुआयामिता प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष दोनों ही स्तरों पर कहानी की बनावट का सुनियोजित हिस्सा है। प्रथमद्रष्टया गाँव के किसी संस्मरण की तरह लगने वाली यह कहानी अपने अर्थ-सम्प्रेषण का एक समानांतर पाठ भी किसी रहस्य की तरह छिपाए चलती है। जीवन का जीना और उसका यथार्थ जितना ही कठिन और दुरूह होता जाता है, चाबी के गुच्छे पर बाबा की उँगलियाँ उतनी ही कसती जाती हैं। कहानी के प्रारम्भ में जो चाभी संयुक्त परिवार पर कार्यात्मक नियंत्रण का प्रतीक है; स्थितियाँ और खराब होने पर भूत-प्रेत भगाने में सक्षम लोहे की ताबीज में बदल जाती है। जिजीविषा का यह अतार्किक पक्ष दरअसल परिस्थितियों के समक्ष असहायता और निरीहतापूर्ण समर्पण ही है। किंकर्तव्यविमूढ़ता और अशक्तता की चरम परिणति और स्थगन भाव, जहाँ एक सीमा के बाद सामूहिकता भी सुरक्षा नहीं कर पाती बल्कि त्रासदी का कारण बन जाती है। 'बाबा की उघन्नी' कहानी में नचकऊबहू की मृत्यु ऐसी ही त्रासदी है, जिसमें कुटुंब जैसी आदिम संस्था पूंजीवादी- व्यक्तिवादी दौर में स्वयं को न बदल पाने की कीमत अपने एक सदस्य के मृत्यु के रूप में चुकाती है। कहानी में विवाह की खर्चीली तैयारी और आर्थिक चुनाव की बाध्यता में इलाज से वंचित नचकऊबहू का मरना अर्थाभाव में हुई मृत्यु से अधिक एक शहादत लगती है। किसी यथार्थ को उपस्थित करते समय वयस्क एवं बाल जीवन-दृष्टियों की सहगामी प्रस्तुति कथ्य के वर्णन को सिर्फ रोचक बनाने के लिए ही नहीं है, बल्कि जीवन के हर संभव आयाम को कहानी में निवेशित करने के आग्रह के कारण भी है।

उनकी 'पखावज' कहानी को ही देखें तो इस एक ही कहानी के माध्यम से शिवशंकर मिश्र ने प्राथमिक और द्वितीयक किसान और बाजार सभ्यता को आमने-सामने ला खड़ा किया है। इस कहानी में स्वर्ग की परिकल्पना श्रम से विरत रहकर सुख-भोग करने वाले उच्च-वर्ग की जीवन-चर्चा के रूप में किया गया है, जिसे साफ-साफ उसकी सूक्ष्मतम विशेषताओं के साथ पहचाना जा सकता है। दरअसल पखावज कहानी को शिवशंकर मिश्र ने एक कथात्मक फैंटेसी के रूप में ही लिखा है। कहानी में स्वर्ग के अधिपति के रूपक के माध्यम से पूंजीवादी सभ्यता के उच्च वर्ग का अंकन होने के बावजूद लोक पूरी सहृदयता के साथ चित्रित हुआ है। सभ्यता की मुख्य-धारा से उपेक्षित और बहिष्कृत होने के बावजूद लोक के पास आदिम स्वस्थ लय जीवन के आदर्श मूल पाठ की तरह सुरक्षित है। उच्च स्तरीय सभ्यता की औचारिकतापूर्ण कृत्रिमता या बनावटीपन जो दरअसल बाजार की पेशेवर दक्षता में एक कला के रूप में विकसित किया है। स्वर्ग के अधिपति के सनकीपन, उसका घृणा-प्रसारक शुचिता-बोध और जन से अलग होने जीने का अमानवीय श्रेष्ठता-बोध, जिसके कारण जूठा होने का आरोप लगाकर स्वर्ग का अधिपति पखावज को गंदे नाले में फिंकवा देता है; सामंतवाद के प्रतिनिधि आचरण से आच्छादित इन्द्र की आज के लोकतान्त्रिक युग में परिकल्पनात्मक अश्लीलता का समानांतर एवं सांकेतिक विमर्श कहानीकार में इंद्र के चरित्र को किसी सामंत राजा की तरह चित्रित कर खड़ा कर दिया है। इस कहानी में स्वर्ग के अधिपति का चरित्र सामंतवादी युग से लेकर वैश्विक पूंजीवादी युग के विकास के सभी चरणों के शासक का अद्यतन व्यवहार-चित्र प्रस्तुत करता है। अनेक रोचक और सूत्रात्मक टिप्पणियों के माध्यम से भी 'समरथ के नहीं दोष गुसाईं' की तरह सत्ता और शासक के सदैव सही होने की उक्ति को 'महाराज ने पखावज को इधर-उधर से देखा। दरबारियों ने भी पखावज का ही निरीक्षण किया। महाराज के बजाने में तो कोई कमी हो नहीं सकती! (पृष्ठ ६७) जैसी टिप्पणियों में है।

सत्ता कोई भी हो, उसका हर सुर आत्म-दर्प का ही होता है। उसकी परंपरा और संस्कार में आज भी सामंतयुगीन व्यत्तित्वादी अतीत छिपा हुआ है। कहानीकार इस सत्य के रेखांकन का प्रयास 'अप्सराओं द्वारा गाये गये गीत के इस बोल पर कि 'अति विचित्र गणनाथ आज मिरदंग बजावैं' पर असहिष्णु राजा की यह टिप्पणी कि मृदंग मैं बजा रहा हूँ या गणेश?' इस कहानी का उत्तरार्द्ध इस दृष्टि से अधिक रोचक, अद्यतन होता चला गया है कि कहानीकार ने निरंतर बदलते पूंजीवाद के सापेक्ष निरंतर आधुनिक और उच्च तकनीक युक्त होते जाते स्वर्ग की दिलचस्प कल्पना की है और यह भी संकेत किया है कि पुरुष-सत्तात्मक स्वर्ग में स्त्रियों की बन्दी भूमिका देवता (पुरुषों) का मनोरंजन करना ही था। आज की सच्चाइयों और प्रवृत्तियों का प्रतिबिम्बन करने वाले स्वर्ग में स्वर्ग के निष्कर्मी देवताओं द्वारा अप्सरा नृत्य के स्थान पर धरती लोक से आयातित पोर्न फिल्मों से मनोरंजन करना जितना व्यंग्यात्मक है, उससे अधिक विलासी देवताओं से संबंधित प्राचीन पौराणिक कल्पनाओं का ही स्वाभाविक विकास है। यह कहानी ऐसा दर्पण प्रस्तुत करती है, जिसमें स्त्रियों का शोषण करने वाली पुरुष प्रधान सभ्यता के अतीत और वर्तमान दोनों के ही चेहरे साफ-साफ देखे जा सकते हैं। शिवशंकर मिश्र ने आधुनिक सभ्यता को लेकर कई महत्वपूर्ण विमर्शात्मक वक्तव्य इस कहनी में विविध कथा सन्दर्भों में दिये हैं। जैसे कि 'हम संतुष्ट नहीं हो सकते। होना भी नहीं चाहते। स्पर्द्धा और विकास के लिए संतोष बहुत हानिकारक प्रत्यय है महाराज !'(74), तथा इतिहास कि स्मृतियों से पोषित प्रतिशोध भावना पर कहानीकार की यह व्यंग्यात्मक टिप्पणी कि 'स्वर्ग में स्मृतियों का भार बहुत है' तथा 'यहाँ किसी को मरने का अधिकार तो प्राप्त नहीं है। पता नहीं कब से जीते आ रहे हैं लोग। आगे भी जीते रहेंगे। सबके मन में सहस्राब्दियों पुरानी स्मृतियाँ समायी हैं, अच्छी-बुरी सब तरह की।' (पृष्ठ ७६)

कहना न होगा कि आधुनिक सभ्यता के लिए विशेष रूप से सृजित इस कहानी में स्वर्ग का कुरुचिपूर्ण होते जाना हमारे बुद्धिजीवी वर्ग और उसके आदर्शों का कुरुचिपूर्ण और प्रमादी होते जाना है। 'पखावज' की सफलता इसमें है कि फैंटेसी तत्वों के बावजूद यह कहानी अत्यंत साफ-साफ अपने निष्कर्षों को पाठकों तक पहुँचा देती है।

संख्या में कम होते हुए भी शिवशंकर मिश्र की इन कहानियों के अविस्मरणीय होने का रहस्य संभवतः यही है कि उनकी कहानियों के कथानक कल्पना सृजित न होकर वास्तविक जीवनानुभवों और स्मृतियों से जैसे चुने गए हैं। यही कारण है कि उनकी कहानियों के अपवादात्मक-असामान्य चरित्र भी जीवन में घटित विरल घटनाओं का एक हिस्सा लगते हैं। वास्तविक जिंदगी पर आधारित होते हुए भी यदि उनका कहानीपन सुरक्षित है और वे एक बड़े कथाकार होने की प्रीतिकर प्रतीति करा पाते हैं, तो इसलिए कि खदान से निकले हीरे को तराश कर चमका देने वाले कुशल शिल्पी की तरह उनमें भी वह अंतर्दृष्टि और कलात्मक दक्षता है, जो न सिर्फ जीवन में घटे सामान्य के असामान्यता की पहचान करने और कहने में सक्षम है, बल्कि उसके भीतर निहित विचारणीय की विमर्शात्मक एवं विकासात्मक संभावनाओं को दिखला पाने में भी।

'मुनुआ की वीरगति' कहानी को ही लें, तो मुनुआ के विकलांग होने के वास्तविक कारण जिसके लिए कहीं गरीबी, कहीं व्यवस्था द्वारा क्षेत्र के विकास का अभाव, वर्जित एवं विषाक्त प्रभाव वाली खेसारी की खेती तथा समुचित टीकाकरण के आभाव में सक्रिय पोलियो के विषाणु आदि कारण- जिसकी पृष्ठभूमि पर मुनुआ जैसे विकलांग का जन्म संभव हो पाता है; कहानीकार में जानबूझकर दो-चार रोचक वाक्यों में निबटा दिया है। पोलियोग्रसित अशक्त मुनुआ के दूसरे दौर की त्रासदी जिसे कथाकार में कथात्मक प्रस्तुति के लिए चुना है- अस्तित्व की सार्थकता और अस्मिता की सामाजिक स्वीकृति के प्रश्न को जीवन और मृत्यु के बीच आत्मघाती वरण तक ले गया है। बहुत ध्यान से पढ़ने पर ही यह रहस्योद्घाटन हो पाता है कि बिलकुल सामान्य और लगभग आत्मघाती सी लगाने वाली मुनुआ की मृत्यु वास्तव में एक हत्या ही है। उसकी मृत्यु के पीछे भी व्यवस्था की उपेक्षा और असमर्थता ही जिम्मेदार है। एक मारक विकल्पहीनता को जीने वाली जनसंख्या और उसके युवापीढ़ी के एक रात की जीवन-चर्या का चित्रण जिस निस्संगता और तटस्थता से शिवशंकर मिश्र ने किया है- घटनाओं और शब्दों के स्तर पर समाप्त हो जाने के बाद भी इस कहानी की अभिव्यक्ति-यात्रा कभी समाप्त नहीं होती । साधनहीनता के अभिशाप में पल रहा सामूहिक जीवन की साझा ऊब सिर्फ मनोरंजन से मिले सुख की खोज में रामलीला देखने हेतु शंकरगढ़ पहुँचने की समस्या को रात के अँधेरे में वास्तविक जीवन-संघर्ष में बदल देती है। गिट्टी लेने जाने वाली ट्रकों की प्रतीक्षा ही जीवन के रोमांचक भविष्य की प्रतीक्षा है त्रासदी को उपेक्षित कर जी गयी एक करुण उत्सवधर्मिता का दौर चलता रहता है। परिहास में दी गयी चुनौती को स्वीकार करते हुए अपनी बहादुरी सत्यापित करने के लिए विकलांग मुनुआ चलती ट्रक से छलांग लगा देता है। समय पर प्राथमिक चिकित्सा न मिलने से घायल-मूर्छित मुनुआ एक ओर मृत्यु की ओर कदम बढ़ा रहा होता है, दूसरी ओर उसके मृत्यु के मूल्य पर मनोरंजन करते साथी एक विकल्पहीन त्रासदीपूर्ण जीवन को सिर्फ साक्षी-भाव से जीते रहने और प्रतीक्षा करते रहने के लिए विवश हैं। कहानीकार में कहीं भी इसे शब्दों के माध्यम से दर्ज नहीं किया है कि ट्रक के सामने किराये के आश्वासन के साथ नहीं, बल्कि अपने संख्या-बल के आधार पर कुचल दिए जाने की संभावना का दुःसाहसपूर्ण सामना करने वाले युवकों की जेब में न ही धन है और न ही सामर्थ्य कि वे मुनुआ के जीने-मरने या उसे समय से चिकित्सा सुविधा दिलवाने की परवाह करा सकें। सब कुछ अपरिहार्य नियति की तरह घटित होता है। कुछ-कुछ 'पूस की रात' कहानी के हल्कू के कम्बल न होने जैसी साधारण साधनहीनता की तरह इस कहानी में भी पूरी त्रासदी साधन ही मनोरंजन हेतु सघनता में ही घटित होती है। किसी सैनिक अभियान और युद्ध की तरह मात्र श्रम के नियोजन से लगभग मुफ्त मनोरंजन हेतु की गयी इस यात्रा की वास्तविक कीमत, जो न सिर्फ भयावह है; बल्कि मुनुआ की विडंबनात्मक मृत्यु के साथ व्यवस्था के नियामकों के सामने एक व्यंग्यात्मक प्रश्न-चिन्ह भी छोड़ जाती है। बहुचर्चित अलगावबोध और अमानवीकरण जैसी निषेधात्मक प्रवृत्तियां इस कहानी में अतिरिक्त मूल्य की तरह लगभग मुफ्त में उपस्थित हैं। "अंतिम उच्चारण" की तरह यह कहानी भी त्रासदी को प्रहसन के शिल्प में प्रस्तुत करती हुई प्रेमचंद के कफ़न कहानी की भी याद दिला जाती है ।

इसमें संदेह नहीं कि भारतीय समाज बहुआयामी होता जा रहा है। इस विकास की जटिलता ने सामान्य को छोड़कर असामान्य कथानक बुनने की अनंत त्वरित संभावनाएं कथाकारों को दी हैं। इससे वह हाशिए के बाहर का बहिष्कृत एवं लगभग निष्क्रिय कुंठित सामान्य लोक उपेक्षित हुआ है, जिसकी भूमिका निर्वाचन-पर्वों में उदार-असावधान मतदाता बनने मात्र की रह गयी है। वह इतना निरीह हो चुका है कि अपने नागरिक अधिकारों की मांग भी नहीं कर सकता। स्वतन्त्र भारत के आर्थिक एवं जातीय लोकतंत्र का सूक्ष्मतम अवलोकन शिवशंकर मिश्र की लम्बी कहानी 'मुजरिम' में देखा जा सकता है। शिवशंकर मिश्र की अन्य कहानियों की तरह यह कहानी भी वर्णनात्मक और महाकाव्यात्मक दोहरी संरचना वाली होने से एक कथारुपक के रूप में बहुविमर्शात्मक संभावनाओं वाली एक औपन्यासिक कहानी है। कुछ-कुछ मन्नू भंडारी के प्रसिद्ध उपन्यास 'महाभोज' की तरह शिवशंकर मिश्र की 'मुजरिम' कहानी को लम्बी कहानी न कहकर लघु कलेवर का महाकाव्यात्मक उपन्यास कहना गलत न होगा। भारतीय समाज का उत्तर मार्क्सवादी एवं समाजशास्त्रीय विश्लेषण इस कहानी को महत्वपूर्ण बनाता है। इस एक कहानी के विश्लेषण से जाति-विमर्श के लिए आवश्यक वे सारे तथ्य एवं निष्कर्ष जुटाए जा सकते हैं, जो भारतीय जाति-व्यवस्था के उन पक्षों को भी अनावृत्त करता है; जिस ओर प्रायः हमारा ध्यान ही नहीं जाता। यह कहानी परंपरागत जातिवादी भारतीय समाज के विभिन्न अछूते पक्षों की ओर भी पाठकों का ध्यान आकर्षित करता है। उनकी 'मुजरिम' कहानी का विस्तृत विमर्शात्मक विवेचन किसी स्वतन्त्र लेख में करना ही उचित होगा।तब तक इतना ही कहना चाहूँगा कि शिवशंकर मिश्र की कहानियाँ बिना किसी शोर के हिन्दी कहानी को बिलकुल बिरल मौलिक कल्पनात्मक प्रतिमान और विमर्शात्मक आयाम सौंपती हैं।


संदर्भित पुस्तक- अंतिम उच्चारण (कहानी संग्रह) / लेखक-शिवशंकर मिश्र/प्रकाशक- सहयात्र प्रकाशन प्रा. लिमिटेड, सी-52/जेड-3, दिलशाद गार्डन, दिल्ली-95/मूल्य-200/-

संपर्क-
रामप्रकाश कुशवाहा
विभागाध्यक्ष हिंदी,
राजकीय महिला स्नातकोत्तर महाविद्यालय,
गाजीपुर, (उ०प्र०) पिन-२३३००१
मोबाइल संपर्क-०९४५१३४२७३०
ई-मेल - raprku@gmail.com

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