सुधीर विद्यार्थी के '(मेरे) हिस्से का शहर'
पुस्तक समीक्षा
सुधीर विद्यार्थी के '(मेरे) हिस्से का शहर'
अन्धाधुन्ध विकास और भूमण्डलीकरण के नाम पर स्थानीयताओं के विनाश के इस दौर में सुधीर विद्यार्थी की किताब 'मेरे हिस्से का शहर' एक रचनात्मक प्रतिपक्ष है- स्थानीयता की तेजस्वी चिताभस्मों और जगमग स्मृतियों का संचय। सुधीर विद्यार्थी की रचनात्मकता न कल्पना का सहारा लेती है, न ही विधा की सुविधा। शुद्ध साहित्यिक लेखन लेखक का काम्य भी नहीं है। 'पहचान बीसलपुर' की तरह उनकी यह पुस्तक भी राष्ट्रीय आन्दोलन और उसके बाद की क्रान्तिकारी गतिविधियों के केन्द्र में रहे शाहजहाँपुर जनपद पर केन्द्रित है। शाहजहाँपुर लेखक का गृहजनपद है। उसकी स्मृति में वह इबारत दर्ज है, जिसमें इस शहर को 'निराली अदा' और 'अनोखी अदा' वाला शहर कहा गया है और यहाँ के बाशिन्दों का इस पर फिदा होना बताया गया है। इस किताब के जरिये लेखक यह पड़ताल करता है कि क्या सचमुच ऐसा है कि यहाँ के लोगों को मिटने में मज़ा है, गम में हॅंसी और तबाही से आशनाई है। यह न तो शाहजहाँपुर का इतिहास है, न ही क्रान्तिकारियों की जीवनी। यहाँ लेखक की केन्द्रीय चिन्ता शहर के इतिहास में दर्ज हो गये लोगों और जिनके साथ जीते-रहते हुए लेखक का वर्तमान अतीत की शक्ल ले चुका है, उनकी चाल, आवाज, आँखों के पानी और साँसों की महक को सहेजना है।
पुस्तक में कुल चालीस लेख है। सबके अपने शीर्षक हैं- अर्थगर्भी कविता जैसे। पहले लेख का शीर्षक है- 'मज़ार में दफ़्न सिर'। इस लेख में 1857 के एक नायक मौलवी अहमद उल्ला शाह फैजाबादी का विवरण है। मौलवी का जिक्र 'गदर के फूल' में बार-बार आता है, लेकिन विशेष विवरण नहीं मिलता। इस तरह यह लेख विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। शीर्षक भी अकारण नहीं है और कहानी, कविता या अन्य दृश्य-श्रव्य माध्यमों की तरह कल्पनाजनित भी नहीं है। फैजाबाद और लखनऊ में अंग्रेजों के खिलाफ अपनी सेना लेकर मौलवी ने सफल युद्ध किये। 21 मार्च 1858 को लखनऊ में पराजित होने के बाद वे शाहजहाँपुर आ गये। 15 जून 1858 को पुवायॉं में राजा जगन्नाथ सिंह ने मौलवी को धोखे से मार डाला और सिर काटकर शाहजहाँपुर के अंग्रेज मजिस्ट्रेट के पास ले गया। इसके लिए ब्रिटिश हुकूमत ने उसे पचास हजार रुपये इनाम दिये। जनता में दहशत फैलाने के लिए मौलवी का सिर शाहजहाँपुर कोतवाली के फाटक पर लटका दिया गया। उसी रात लोधीपुर के कुछ बहादुर युवकों ने मौलवी का सिर कोतवाली के फाटक से उतार लिया और अपने गाँव के एक छोर पर ससम्मान दफना दिया।
दूसरे लेख का शीर्षक है 'काकोरी का प्रस्थान बिन्दु' । यह लेख शहीद राम प्रसाद 'विस्मिल' पर केन्द्रित है- प्रामाणिक अन्तःसाक्ष्यों के साथ। 'विस्मिल' की बहुआयामी प्रतिभा का पता चलता है इस लेख में। तीसरा लेख 'खाके वतन कफ़न में' शहीद अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ पर और चौथा 'जिन्दगी जिन्दादिली' शहीद रोशन सिंह पर। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद हमारे देश में शहीदों के परिजनों की क्या दशा रही, इसकी पड़ताल इन चार लेखों में की गई है- 'एक माँ की आँखें', 'ओ पिता', इतिहास के लिए इतना ही काफी है और 'कोसमा से एक खत'। 'एक माँ की आंखें' में 'विस्मिल' की माँ की वीरता और वैदुष्य का परिचय मिलता है, तो वहीं बाद में उनकी विपन्नता और दुर्दशा का भी पता चलता है। 'ओ पिता' विस्मिल के पिता पर, इतिहास के लिए इतना हो काफी है। अशफ़ाक़ उल्ला ख़ाँ की माँ पर और 'कोसमा से एक खत' विस्मिल की बहन पर केन्द्रित है। 'मदिया कटरा से खण्डहर तक', 'खण्डहर की ग्रामकथा' और 'व्यक्ति से बड़ा होता है देश' इन तीनों लेखों में मैनपुरी षड्यन्त्र केस के क्रान्तिकारियों क्रमशः देव नारायण भारतीय, ठाकुर गंगा सिंह और राजाराम भारतीय का वर्णन किया गया है। इस क्रम में लेखक का कथन महत्वपूर्ण है-
'मेरे लिए वे संघर्ष और बलिदान सिर्फ पूजा की वस्तु नहीं हैं। मैंने उस दौर के लोगों की सिर्फ मूर्तियाँ नहीं गढ़ी हैं। बल्कि उन्हें मनुष्य बने रहने देकर उनसे गुफ्तगू की है। मैने उस आन्दोलन को समग्रता से देखने की कोशिश की है, जिसमें उसकी भक्ति और पक्षधरता के साथ ही कमजोरियों तथा भूलों का भी समावेश है।'
लेखक ने शहीदों, उनके परिजनों और क्रान्तियों पर आँख मूँद कर कलम नहीं चलायी है। इस दृष्टि से 'रंगमरूला में बेदार मंजिल' शीर्षक लेख उल्लेखनीय है। इस लेख में भगवती सहाय 'बेदार' का वर्णन किया गया है, जिन्होंने काकोरी काण्ड में एक व्यक्ति को मुखबिर बनवाया था।
लेखक ने इस किताब में 1857 से लेकर स्मृतिशेष अपने समकालीनों तक कुल घालीस व्यक्तित्वों का बेसिलसिला और प्रामाणिक वर्णन किया है। सब का सिलसिला बनाने वाले दो तत्व हैं। एक जन्मभूमि या कर्मभूमि के रूप में शाहजहाँपुर से सम्बद्धता और दूसरा जगत को मुक्त और सुखकर बनाने हेतु संघर्ष और आत्मबलिदान की प्रवृत्ति। पुस्तक में कुछ लेख राष्ट्रीय आन्दोलन के बलिदानियों उनके सहयोगियों और परिजनों पर केन्द्रित हैं, तो कुछ स्वतन्त्रता के बाद के स्मृतिशेष राजनीतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक कर्मियों पर। हिन्दी के विलक्षण एकांकीकार और कथाकार भुवनेश्वर शाहजहाँपुर के थे। पुस्तक में एक लेख उन पर भी है- 'खानाबदोश'।
उन्नीसवीं शती के उत्तरार्द्ध के एक ब्रजभाषा कवि पं० गौरी शंकर चौबे, अरबी में गीता और संस्कृत में कुरान का अनुवाद करने वाले पं० बशीरुद्दीन, नक्सलबाड़ी की मूलभावना से प्रेरित कामरेड माया प्रकाश, मजदूर कामरेड मास्टर शौकत अली, टीन का भोंपू लेकर अकेले ही अपना चुनाव-प्रसार करते चौधरी लाखनदास और शहीद छात्रनेता रमाकान्त दीक्षित जैसे अनेक वास्तविक चरित्र मिलते हैं इस किताब में, जिन्होंने अपने-अपने स्तर से जीवन को मुक्त और बेहतर बनाने का उद्योग किया और कुछ तो उसी राह में काम आ गये।
ऐसे समय में जब कि उत्तर आधुनिकता शहरों की खुशबू समाप्त कर रही है, लेखक ने इस किताब के जरिये अपने शहर की खुशबू को सहेजने का एक उपक्रम किया है।
हाँ, इतना अवश्य कहना होगा कि सुधीर विद्यार्थी के हिस्से का शहर बहुत बड़ा है और उसे बड़ा मानता है उनका इतिहास-बोध। इतिहास के अन्त की घोषणा और स्मृतियों के लोप के प्रयत्न वाले इस दौर में 'मेरे हिस्से का शहर' इतिहास और स्मृतियों की ओर से उठा प्रतिपक्ष का हाथ है। इस पुस्तक के माध्यम से लेखक ने अपने जिये शहर को वह लौटना चाहा है, जो उसे उम्र के सबसे महत्वपूर्ण समय में अनुभव और स्मृति के रूप में दिया है। अनुभवों और स्मृतियों के संचय का यह पहला भाग है। दूसरे भाग के लिए लेखक पूछता है, "अगले भाग की प्रतीक्षा आप कर सकेंगे क्या?' मैं समझता हूँ, भास्कर स्मृतियों के ऐसे संचय की पाठक अवश्य प्रतीक्षा करेंगे।
समीक्षित पुस्तक- ‘मेरे हिस्से का शहर’
लेखक - सुधीर विद्यार्थी
प्रतिमान प्रकाशन, शाहजहाँपुर।
शिव शंकर मिश्र
एसोसिएट प्रोफेसर
हिन्दी विभाग जनता महाविद्यालय
अजीतमल, औरैया-206121
'लेखन' (जनधर्मी - लेखन का आलोचनात्मक सिलसिला) अंक -9 , अक्टूबर - 2010 में प्रकाशित।

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