अवधी कवि पं. रामगुलाम त्रिपाठी
अरिनाशक-दुर्गाशतकम्
पं. रामगुलाम त्रिपाठी इलाहाबाद जनपद के कवि थे। इनकी प्रमुख कृति 'अरिनाशक दुर्गाशतकम्' प्राप्त हुई है। शीर्षक से भ्रम होता है कि यह संस्कृत भाषा की रचना है, किंतु वस्तुतः यह अवधी भाषा का काव्य है। डा० भास्कराचार्य त्रिपाठी ने स्तरीय संपादन एवं सुललित श्लोक रूपान्तरण के साथ संस्कृत में इसकी भूमिका लिखी है, जिससे कवि-काल संवत् 1920-1982 अर्थात् सन् 1863 से 1925 ई० ज्ञात होता है। प्रस्तुत कृति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इस में कविता की पारंपरिक शैली में पराधीन भारत के राष्ट्रीय शोक और राष्ट्रीय मुक्ति की तड़प का प्रतिबिंबन मिलता है। एक सवैया इस प्रकार है, जिससे इस कृति के रचनाकाल का निर्धारण किया जा सकता है :
देवन की सब आस बिहाय कै प्रेम बढ़ाइ करौं यशगाना।बीति गये दिन सम्वत साठि भयो तन जीरन वृद्ध महाना।।तू जौ निरास करौ जननी तौ कहौ केहिं के ढिग मोर ठेकाना।रामगुलाम को सेवक मानि गणेश की मातु हरौ दुख नाना।।६४।।
यदि कवि के जन्म-वर्ष में साठ का योग किया जाय, तो इस कृति का रचना-काल 1923 ई० ठहरता है। यदि 1857 ई० के राष्ट्रीय संग्राम को आधार माना जाय, तो इसका रचना-काल 1917 ई० सिद्ध होता है। 1857 ई० को आधार मानना बहुत असंगत न होगा। उस राष्ट्रीय संग्राम की लोकव्याप्ति, और वह भी उत्तर भारत में, सर्वविदित है। नितांत काल्पनिक रचनाएँ भी अपने युगीन संदर्भ से सर्वथा निरपेक्ष नहीं होतीं, यह अब नया तथ्य नहीं है। फिर इस कृति में 'अरि' का स्पष्ट उल्लेख न कर के कूट शैली का प्रयोग किया जाना भी इस दिशा में एक संकेत है। उक्त संपूर्ण कालखंड में पूरे भारतीय समाज का सबसे बड़ा 'अरि' ब्रिटिश साम्राज्य रहा है। 'भयो तन जीरन वृद्ध महाना' में महान् शब्द तन के विशेषण-रूप में तो नहीं ही प्रयुक्त हुआ होगा। पूरी रचना में कवि की जो परिपक्वता दिखती है, उसे देखते हुए कवि से ऐसी आत्मश्लाघा की उम्मीद नहीं की जा सकती। संभव है, बुढ़ापे की अतिशयता के अर्थ में उक्त शब्द का प्रयोग हुआ हो। यह भी संभव है कि समूचे भारत का मानवीकरण कर के उसकी विशालता का संकेत किया गया हो। पूरी रचना में गहरा शोक समाया है। भले ही यह कवि का निजी शोक रहा हो, पर इसमें उस युग के राष्ट्रीय शोक का प्रतिबिंबन भी होता है। शोक का कारण कवि इन शब्दों में व्यक्त करता है:
कौरव क्रूर कुबुद्धि को ठानि हरी जिमि पारथ की सब साजू।मान्यो नहीं कहे कृष्णहु के बिदुरै करि दूर भये महराजू।।दीन दुखी सुत पांडव के सहि संकट शांति गहे तजि लाजू।श्री यदुवीर सहायक भे हति दुष्टन दीन अकंटक राजू।।११।।तैसेहिं ए सब क्रूर कुबुद्धिन भाग हमार हर्यो छल ठानी।पंचहुँ के कहे माने नहीं मोहि वृद्ध अकिंचन आरत जानी।।श्री जगदंब सुनो विनती शरणागत पालिनि वांछित दानी।कीजै सहाय विलंब विहाय कै रामगुलामहिं किंकर मानी।।१२।।
प्रस्तुत अंश में 'भाग हमार हर्यो छल ठानी' की व्याख्या 1857 ई० में दिये गये एक किसान के वक्तव्य से होती है :
'साहब, जंगल, पेड़, नदियाँ, कुँए, सारे गाँव, सभी तीर्थ-स्थान सरकार के हो गये हैं। उसने सब कुछ ले लिया है, हर चीज ले ली है। x x x '[लो : सेंट्रल इंडिया ड्यूरिंग द रिबेलियन आफ 1857 ऐंड 1858;सुरेंद्र नाथ सेन द्वारा 'एट्टीन फिफ्टी सेवेन' में उद्धृत, पृ.34]
ईस्ट इंडिया कंपनी और ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने भारत के साथ कैसा छल किया था, यह अब अविदित नहीं है। ईस्ट इंडिया कंपनी की एक रिपोर्ट का कुछ अंश इस प्रकार है :
'इस देश के लिए उस विशाल साम्राज्य के महत्त्व का आकलन इस बात से नहीं किया जाना चाहिए कि इस देश के निर्माता भारतवासियों द्वारा अपने माल के उपभोग से कितना फायदा उठाते हैं, बल्कि इस बात से किया जाना चाहिए कि उससे राज्य की धन-संपत्ति में प्रतिवर्ष कितनी बड़ी वृद्धि होती है।'[1812 ई० के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी की रिपोर्ट, 'आज का भारत', रजनी पामदत्त, पृ. १४१ पर उद्धृत]
बीसवीं सदी तक आते-आते इस छल और लूट में कई गुना वृद्धि हो गयी। इस अवधि में निर्यात में बड़ी तेजी से वृद्धि हुई। बीसवीं सदी के प्रशासन की स्थिति लार्ड कर्जन के इस वक्तव्य से स्पष्ट होती है :
'प्रशासन और शोषण यहाँ साथ-साथ चलते हैं।'[1905 ई० में लार्ड कर्जन का वक्तव्य, 'आज का भारत', पृ० १५१ पर उद्धृत]
1914 ई० तक भारत के साथ व्यापार करने वाली कंपनियों, निर्माताओं और जहाज कंपनियों को कुल मिलाकर जितना लाभ होता था, उससे कहीं ज्यादा बड़ी राशि यहाँ लगी हुई ब्रिटिश पूँजी के मुनाफे तथा सीधे नजराने के रूप में इंग्लैंड चली जाती थी। वस्तुतः ब्रिटिश साम्राज्यवाद ने भारतीय सामंतवाद को एक नया और अत्यंत क्रूर रूप प्रदान किया, जिसमें दया, क्षमा, करुणा, दान आदि पारंपरिक सामंती मूल्यों का कोई स्थान नहीं था। पुराने जमींदार, जो वसूली में दया दिखाते थे, उनको बेदखल कर के ब्रिटिश साम्राज्य ने क्रूर गुंडों को जमींदार बना दिया। ये वही नवसामंत थे, जो पं. रामगुलाम त्रिपाठी जैसे कृषकों का भाग छलपूर्वक हर रहे थे।
पूरी कृति में गहरे ऐकांतिक विक्षोभ की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। यह विक्षोभ ऊपर वर्णित नवसामंतों के उत्पीड़न से उपजता है, जिन्हें ब्रिटिश शासन का समर्थन प्राप्त था। संगठित सत्ता का सहयोग प्राप्त किए इन नव सामंतों के विपरीत कवि अकेला है। उसका अकेलापन तत्कालीन भारतीय समाज (अथवा कम-से-कम कृषक समुदाय) के असंगठन का प्रतीक है। असहाय एकाकी कवि के लिए आध्यामिक शक्ति के अतिरिक्त अन्य कोई अवलंब सचमुच नहीं था :
राम के गुलाम को भरोस एक तेरो अम्ब।बिनती सुनाय द्वार करत पुकार है।।१००।।
पूरी कृति में घनीभूत शोक का स्थायीभाव इसे करुणरस-प्रधान काव्य बनाता है। रौद्र इसका अंगी रस है। दुःख-निवेदन के क्रम में कवि अभिधा की संपूर्ण शक्ति निचोड़ देता है:
हाथ गिरै यदि झूठ लिखौंअरु जीभ गिरै जो कहौं कछु झूठी॥४३।।
इस गिरा का आधार यह है कि कवि के लिए 'गुरु गणपति शिव शारदा' आदि महज मिथकीय विश्वास नहीं हैं, बल्कि सचमुच के और शाश्वत अस्तित्व हैं। ऐसा लगता है कि शोक में डूबा एकाकी कवि नित्य कोई छंद रचता है और अपने अंतःकरण में और अनुराग बढ़ाने के लिए कोई बाजा (संभवतः कोई तंत्रीवाद्य) बजा कर छंद का गायन करता है:
'गान करौं तिहरो यश पावनबाज बजाइ कै प्रेम बढ़ावौँ ।।१०।।'
देवी के क्रुद्ध रूप का आवाहन करते समय रस रौद्र हो जाता है और वर्ण भी भावानुकूल :
खङ्ग के प्रहार ते
गिराय शीश बाय मुख
योगिनी जमाति खून
घट घट घटकत।।
राम के गुलाम को
शरण अनुमानि महा
काली अति कोप ठानि
चट चट चटकत।।
बैरिन के मुण्ड को
मरोरि तोरि दासहित
करन उठाय महि
पट पट पटकत।।७।।
समूचे काव्य में कवि ने हिंदी छंदों का इस्तेमाल किया है। कुछ लोकछंद भी हैं। भाषा और शिल्प पर कवि का अधिकार है। संस्कृत के शुद्ध शब्दों के साथ देशज और फारसी शब्दों का संयोग इसे एक खूबसूरत भाषिक 'मोज़ैक' का स्वरूप प्रदान करता है :
परम परे परमेश्वरी, दुर्गा दया दराज।उभय लोक में अम्बिका, राखहु मेरी लाज।।
विस्तार-भय से यहाँ अलंकार आदि की चर्चा नहीं की जा रही है, क्योंकि हर छन्द में रीति, गुण और अलंकार पिरोए हुए हैं।
अंत में पुनः यह निवेदन है कि यद्यपि इस काव्य में निजी शोक की अभिव्यक्ति हुई है, किंतु यह तत्कालीन भारत का राष्ट्रीय शोकगान है। कवि एक शत्रु का विनाश करके लोकमंगल स्थापित करने की विनती जगदंबा से करता है:
एक को मारि अनेकन कोसुख दीजै दया करि कै जगदम्बा।दुःख अनेकन को हरियेहठि बेगि न कीजिय मातु विलम्बा।।४४।।
इस प्रकार सच्चे अर्थों में यह लोकोपकार की संदर्भगत अन्तःप्रेरणा से संवलित एक सिद्ध काव्यकृति है।
शिवशंकर मिश्र
रीडर, हिंदी विभाग,
जनता स्नातकोत्तर महाविद्यालय,
अजीतमल, औरैया, उ.प्र.


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