"बादल को घिरते देखा है' (नागार्जुन) और "मेघदूतम् (कालिदास)
"मेघदूतम्" संस्कृत गीतिकाव्य परम्परा का वह सृजन है, जिसने न सिर्फ भारतीय भाषाओं की कविता को प्रभावित किया, बल्कि विश्वकविता पर भी गहरा प्रभाव छोड़ा। विश्व की अधिकांश भाषाओं में इसके अनुवाद प्रकाशित हुए और इससे प्रेरित रचनाएँ भी की गयीं। 'मेघदूतम्' की विश्वव्यापी उपजीव्यता अब अध्ययन का नया विषय नहीं है। प्रस्तुत अध्ययन हिन्दी कवि नागार्जुन की कविता "बादल को घिरते देखा है" पर इस आशय से केन्द्रित है कि किस सीमा तक यह कविता 'मेघदूतम्" से प्रेरित है और समानान्तर भी, इसका अध्ययन किया जाय।
नागार्जुन हिन्दी के संस्कृतज्ञ प्रगतिशील कवि रहे हैं। एक तरफ उन पर कालिदास का गहरा प्रभाव है, दूसरी तरफ वे उस प्रभाव से टकराते हुए नया सौन्दर्यबोध भी निर्मित करते हैं। उनकी यथार्थाग्रही दृष्टि "मेघदूतम्" के मिथकीय चरित्रों और स्थानों का भौतिक सत्यापन करना चाहती है:
'कहाँ गया धनपति कुबेर वह
कहाँ गयी उसकी वह अलका?
नहीं ठिकाना कालिदास के
व्योमप्रवाही गंगाजल का!
ढूँढा बहुत परन्तु लगा क्या
मेघदूत का पता कहीं पर?
कौन बताये वह छायामय
बरस पड़ा होगा न यहीं पर!'
वस्तुतः नागार्जुन और कालिदास के युग में कई शताब्दियों का अन्तर है। दोनो के युगीन यथार्थ और कविता-सम्बन्धी प्रतिमान भिन्न हैं। प्रगतिवादी प्रतिमानों से कालिदास का मूल्यांकन कदाचित् अन्याय है। अपने अभिजात और कल्पनाप्रधान सौन्दर्यबोध के भीतर कालिदास औचित्य के प्रति पूर्ण सजग हैं। वे मेघ का वास्तविक रूप भी प्रस्तुत करते हैं "धूमज्योतिः सलिलमरुतां सन्निपातः" दूसरी तरफ- "कामार्त्ता हि प्रकृतिकृपणाश्चेतनाचेतनेषु' कहकर वे औचित्य भी स्थापित करते हैं। नागार्जुन की कविता में बार-बार 'बादल को घिरते देखा है' की आवृत्ति एक तरफ कविता को प्रगीतात्मक बनाती है और दूसरी तरफ कल्पना के बदले देखे हुए यथार्थ के वर्णन का संकल्प व्यक्त करती है। 'मेघदूतम्" प्रबन्ध प्रगीत है और "बादल को घिरते देखा है" मुक्त प्रगीत। इस तरह 'बादल को घिरते देखा है' आकार में छोटी रचना है। 'देखा है' पर बल देने के कारण नागार्जुन का चित्रण उतना विशद नहीं है, जितना कालिदास का। दृश्यों के यथार्थ चित्रण के माध्यम से अपनी कविता का सौन्दर्य-विधान करने में सफल हुए हैं, लेकिन इसका यह तात्पर्य नहीं कि 'मेघदूतम्' में पर्यवेक्षण है ही नहीं।
इसके विपरीत 'मेघदूतम्' में और भी विशद पर्यवेक्षण है, किन्तु मिथों, धार्मिक विश्वासों और कल्पना के संयोजन के साथ। 'मेघदूतम्' में एक छोटा-सा इतिवृत्त है, जो रामगिरि से लेकर अलकापुरी तक के मार्ग का वर्णन करने का पूरा अवसर देता है। इसके विपरीत "बादल को घिरते देखा है" में हिमालय और उसके आस-पास के परिवेश और बादल का प्रेक्षणजन्य चित्रण मात्र है, किन्तु कवि अपने प्रगतिशील सौन्दर्यबोध की मर्यादा में रहते हुए 'मेघदूतम्' के समानान्तर दृश्य-संयोजन करने में सफल हुआ है। इस प्रसंग में दिलचस्प यह है कि नागार्जुन भाषा से लेकर दृश्य-प्रसंगों तक निरन्तर कालिदास से प्रेरित हुए हैं। यह प्रेरणा उन्हें समानान्तर और मौलिक दृश्य-विधान निर्मित करने में प्रवृत्त करती है। 'मेघदूतम्' में राजहंस हैं और नागार्जुन की कविता में हंस हैं। नागार्जुन के हंस उदरम्भरी के लिए प्रयासरत हैं। वे तिक्तमधुर कमलनाल खोज रहे हैं। किन्तु, कालिदास के राजहंस भी पाथेय लिये हुए हैं। नागार्जुन 'बिसतन्तु' शब्द का प्रयोग करते हैं:
कर्तुं यच्च प्रभवति महीमुच्छिलीन्ध्रामवन्ध्यां
तच्छ्रुत्वा ते श्रवणसुभग गर्जितं मानसोत्काः।
आ कैलासाद्विसकिसलयच्छेदपाथेयवन्तः
सम्पत्स्यन्ते नभसि भवतो राजहंसा सहायाः ।।11।। पू.मे. ।।
इस सन्दर्भ में श्री दयाशंकर का उल्लेख कालिदास का कथन है, "हंसों के भोजन बिसतन्तु (बिसकिसलयच्छेद) और नागार्जुन (तिक्तमधुर बिसतन्तु) दोनों के यहाँ है। कालिदास के राजहंस अपने लम्बे मार्ग का ख्याल करके बिसतन्तु का संग्रह करके उड़ान भरते हैं। उनका ध्यान पेट-पूजा की ओर है, स्वाद की ओर नहीं। इस प्रकार कालिदास के हंस राही हैं और उनके पास भोजन की गठरी भी है। भोजन के मामले में नागार्जुन के हंसों की स्थिति कालिदास के राजहंसों से भिन्न है। यद्यपि वे हिमालय की झीलों में डेरा डाल चुके हैं, लेकिन उनके पास भोजन (बिसतन्तु) का संग्रह नहीं है। इसीलिए वे उसकी खोज में लगे हैं। नागार्जुन के हंसों का ध्यान मात्र पेट-पूजा ही नहीं, बल्कि बिसतन्तु के स्वाद 'तिक्तमधुर की ओर भी है।" (दस्तावेज, नागार्जुन और कालिदास, अप्रैल-जून 2000, 29)
'कालिदास के राजहंस अपने लम्बे मार्ग का ख्याल करके बिसतन्तु का संग्रह करके उड़ान भरते हैं। उनका ध्यान पेट-पूजा की ओर है, यह तो ठीक है, किन्तु स्वाद की ओर उनका ध्यान नहीं है; यह संकेत कहाँ से प्राप्त हुआ?
इसी प्रकार भोजन के मामले में नागार्जुन के हंसों की स्थिति कालिदास के राजहंसों से भिन्न है। यद्यपि वे हिमालय की झीलों में डेरा डाल चुके हैं। उनके पास भोजन (बिसतन्तु) का संग्रह नहीं है। इसीलिए वे उसकी खोज में लगे हैं, यह कथन उचित प्रतीत नहीं होता। कालिदास के राजहंस लम्बे पथ पर हैं, इसीलिए पाथेय ले जा रहे हैं। जब गन्तव्य तक पहुँच जायेंगे तो ये भी ताजे कमलनाल की खोज करेंगे। अपने उसी लेख में दयाशंकर जी का विचार इस प्रकार का है-
'मेघदूत के वस्तु-संयोजन को कालिदास की कल्पनाशक्ति जहाँ एक स्तर पर समृद्ध आकर्षक और विश्वसनीय बनाती है. वहीं दूसरे स्तर पर उसे कहीं-कहीं अविश्वसनीय भी। असल में कालिदास सामन्ती व्यवस्था के युग में पैदा हुए थे और अपने समय के राजतन्त्र से सीधे जुड़े भी थे। इसीलिए उनके अनुभव और भावजगत् का एक अहम हिस्सा आभिजात्य जीवन के यथार्थ से सम्बन्धित था। (वही. पृ.22)
भले ही कालिदास के 'भावजगत् का एक अहम हिस्सा आभिजात्य जीवन के यथार्थ से सम्बन्धित रहा हो, मार्ग में जाते हुए हंसों के द्वारा कमलनाल का पाथेय ले जाने जैसे सूक्ष्म प्रेक्षण से उत्पन्न चित्र उनकी व्यापक दृष्टि का पता देते हैं। इसी श्लोक में कालिदास धरती को उर्वर बनाने वाले कुकुरमुतों का भी चित्रण करते हैं- महीमुच्छिलीन्ध्रामवन्ध्याम्। कुकुरमुत्तों का स्थान 'आभिजात्य जीवन के यथार्थ' में तो नहीं रहा होगा। हिन्दी कविता में भी 'कुकुरमुत्ता' का प्रवेश बहुत बाद की घटना है। दूसरी तरफ धरती की उर्वरता की लोकमंगलकारी चिन्ता! नागार्जुन की उक्त कविता का एक दृश्य इस प्रकार है:
'दुर्गम बर्फानी घटी में,
शतसहस्र फुट ऊँचाई पर,
अलख नाभि से उठने वाले,
निज के उन्मादक परिमल-
के पीछे धावित हो-होकर
तरल तरुण कस्तूरी मृग को
अपने पर चिढ़ते देखा है,
बादल को घिरते देखा है।'
"मेघदूतम्" में 'आसीनानां सुरभितशिलं नाभिगन्धं मृगाणाम्' कह कर कालिदास हिमालय की शिलाओं की विशेषता बताते हैं, जो कस्तूरी मृगों के उन पर बैठने के कारण सुगन्धित हो गयी हैं। नागार्जुन का दृश्य-विधान स्वतन्त्र रूप से एक तरल तरुण कस्तूरी मृग पर आद्धृत है, किन्तु इसकी भी प्रेरणा एक तरफ 'नाभिगन्धं मृगाणाम्' से प्राप्त की गयी है, दूसरी तरफ कबीर से कस्तूरी कुंडलि बसै मृग ढूँढै बन माँहि'। "बादल को घिरते देखा है" का एक महत्त्वपूर्ण दृश्य-विधान चकवा चकवी प्रसंग में मिलता है:
'ऋतु बसन्त का सुप्रभात था
मन्द मन्द था अनिल बह रहा
बालारुण की मृदु किरणे थीं
अगल-बगल स्वर्णाभ शिखर थे
एक दूसरे से विरहित हो
अलग-अलग रहकर ही जिनको
सारी रात बितानी होती-
निशाकाल के चिर अभिशापित
बेबस उन चकवा चकई का
बन्द हुआ कन्दन फिर उनमें
उस महान सरवर के तीरे
शैवालों की हरी दरी पर
प्रणय कलह छिड़ते देखा है
बादल को घिरते देखा है।'
यहाँ प्रणय कलह शब्द "मेघदूतम्" (उत्तरमेघ-4) से लिया गया है। सम्भव है कालिदास के अकुंठ और प्रगल्भ शृंगार के समानान्तर नागार्जुन ने तियग्विषयक वियोग का चित्रण किया हो। यह एक मर्मस्पर्शी चित्र बन पड़ा है। "मेघदूतम्" में एक स्थान पर उपमा के रूप में 'चक्रवाकी' का प्रयोग हुआ है- 'तां जानीथाः परिमितकथां जीवितं मे द्वितीयम्। दूरीभूते मयि सहचरे चकवाकीमिवैकाम्।'
किन्तु यह नागार्जुन की प्रेरणा का स्रोत नहीं है। सम्भव है "कुमारसम्भवम्" के चकवाक के दो भिन्न-भिन्न विरह प्रसगों (कु.सं. 5/26 और कु. सं.- 8/32) से नागार्जुन ने यह प्रेरणा ली हो। लेकिन जो भी हो, इस प्रेरणा के मूल में अलकापुरी के शोक-रहित प्रगल्भ श्रृंगार के समानान्तर मध्यवर्गीय वर्जनाबोध से युक्त तियग्विषयक संयोग और वियोग के चित्रण की भावना ही रही है। "बादल को घिरते देखा है' का अन्तिम दृश्य-विधान है:
शत शत निर्झर निर्धारिणी कल
-मुखरित देवदारु कानन में,
शोणित धवल भोजपत्रों से
छायी हुई कुटी के भीतर,
रंग-बिरंगे और सुगन्धित
फूलों से कुन्तल को साजे
इन्द्रनील की माला डाले,
शंख-सरीखे सुघड़ गलों में,
कानों में कुवलय लटकाये,
शतदल लालकमल वेणी से
रजत-रचित मणिखचित कलामय
पानपात्र द्राक्षासवपूरित
रखे सामने अपने-अपने
लोहित चन्दन की त्रिपदी पर
नरम निदाग बाल कस्तूरी-
मृगछालों पर पल्थी मारे
मदिरारुण आँखों वाले
उन उन्मद किन्नर किन्नरियों की
मृदुल मनोरम अंगुलियों को
वंशी पर फिरते देखा है,
अमल धवल गिरि के शिखरों पर
बादल को घिरते देखा है।'
निश्चित रूप से यह अंश अत्यन्त प्रभावशाली है और सम्भवतः इस अंश की भाषा और वर्णन पर कालिदास का अत्यधिक प्रभाव भी है। इस अंश में कवि 'मेघदूतम्', 'कुमारसम्भवम्' और 'रघुवंशम्' से शब्दों और दृश्यों की प्रेरणा ग्रहण करता है। किन्तु सब कुछ के बावजूद दृश्यसंयोजन कवि का अपना है। मदिरारुण आँखों वाले उन उन्मद किन्नर किन्नरियों की मृदुल मनोरम' अँगुलियां एक दूसरे के शरीर पर फिरने के बदले वंशी पर फिरती है। यह नागार्जुन की मध्यवर्गीय नैतिकता की उपज है शायद। प्रस्तुत अंश में नागार्जुन की यथार्थनिष्ठा भी प्रभावित होती है। ये किन्नर-किन्नरियाँ कौन हैं, जो कालिदास की नायिकाओं की तरह न सिर्फ पुष्पाभरण से युक्त हैं. बल्कि 'इन्द्रनील' की माला पहने हैं, जिनके 'द्राक्षासवपूरित' 'पानपात्र रजत-रचित और 'मणिखचित' है?
दयाशंकर जी ने अपने लेख में 'इन्द्रनील' के सन्दर्भ में लिखा है- "सम्भव है 'इन्द्रनील' शब्द कालिदास से सूझा हो, लेकिन इन्द्रनील के साथ एक और मणि का उल्लेख न करने और दूसरी ओर उसे हार के बजाय 'माला' कहने से लगता है कि वह नीलम जैसे मंहगे माणिक्य की नहीं; सामान्य नीले पत्थर मूँगे की माला हो। (वही. पृ 35)
यदि इन्द्रनील को नीलम न मानकर मूँगा मान भी लिया जाय तो रजत-रचित मणिखचित पानपात्रों का क्या किया जाय ? नागार्जुन ने कालिदास से किन्नर किन्नरी शब्द ग्रहण करने के बावजूद उनके मानस में अपने समय के स्वाधीनता आन्दोलन के अनुकूल स्वतन्त्रता, प्रजातन्त्र, सामान्य मनुष्य की केन्द्रीयता वाला आधुनिक अर्थ समाहित कर लिया है। (वही. पृ.37)
कविता अपने युग से असम्पृक्त नहीं रह सकती। नागार्जुन प्रगतिवादी कवि है। वे अपनी सामाजिक जिम्मेदारी के प्रति सजग हैं। सम्भव है उन्होंने किन्नर किन्नरियों के माध्यम से स्वाधीनता आन्दोलन के अनुकूल स्वतन्त्रता, प्रजातन्त्र आदि अर्थों के साथ भावी जन-जीवन की समृद्धि की कामना 'रजत रचित मणि खचित कलामय पानपात्रों' के माध्यम से की हो। किन्तु यह 'मिथ' कविता के स्वभाव के विपरीत है, क्योंकि यह कविता मिथकीय चरित्रों और स्थानों की कल्पित धारणाओं का खंडन करती चलती है और अन्ततः किन्नर किन्नरियों के मिथ में पर्यवसित हो जाती है। किन्नर किन्नरियों के प्रसंग में 'देखा है' क्रियापद भी उपयुक्त नहीं लगता। उल्लेखनीय है कि यही क्रियापद पूरी कविता को एकान्विति और प्रगीतात्मकता प्रदान करता है। कविता का सबसे मौलिक दृश्यविधान यहाँ है-
मैंने तो भीषण जाड़ों में
नभचुम्बी कैलाश शीर्ष पर
महामेघ को झंझानिल से
गरज गरज भिड़ते देखा है।'
यहाँ नागार्जुन मेघ का अत्यन्त प्रभावशाली चित्र बनाते हैं, जो उनकी यथार्थनिष्ठा के अनुकूल है और मौलिक भी। "मेघदूतम्" बड़ी कलात्मक सृष्टि है। "बादल को घिरते देखा है" उसकी तुलना में छोटी कविता है। इस कविता की विशेषता यह है कि कवि "मेघदूतम्" से प्रेरित भी है और समानान्तर भी।
शिवशंकर मिश्र
रीडर हिन्दी विभाग,
जनता महाविद्यालय
अजीतमल, (औरैया) उ.प्र.
206121

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