1857 : सामासिकता का लोकपाठ - शिव शंकर मिश्र
समास संस्कृत व्याकरण की एक व्यवस्था है, जिसमें दो या दो से अधिक शब्दों को मिलाकर एक समस्त पद की रचना की जाती है। यह समस्त पद एक भिन्न अर्थ देता है, जो इसमें प्रयुक्त सभी शब्दों से भिन्न होता है। भिन्न होते हुए भी यह अर्थ निकलता उन्हीं शब्दों से हैं। संस्कृति के सन्दर्भ में इसका प्रयोग दो या दो से अधिक संस्कृतियों के मेल से बनने वाली संस्कृति के अर्थ में किया जाता है। वस्तुत: अंग्रेजी के 'कम्पोजिट कल्चर' शब्द के हिन्दी अनुवाद के रुप में सामासिक संस्कृति शब्द का प्रयोग किया जाता है। सामान्यतया संस्कृतियाँ सामासिक होती हैं। यद्यपि उनमें टकराव अधिक होते हैं, किन्तु दीर्घकालीन प्रक्रिया में वे टकराते-टकराते जाने-अनजाने एक-दूसरे के कुछ मूल्यों को आत्मसात करती है। इस तरह संस्कृति का समास बनता है। कौन सा तत्व कहाँ से आया, यह पहचान कठिन हो जाती है। भारतीय संस्कृति इसका सबसे उपयुक्त उदाहरण है। इस अत्यन्त समृद्ध और प्राचीन महादेश में बहुत पहले से दूर देशों के लोग आते रहे। कौतूहल और लोभवश वे यहाँ आये। कुछ आये और चले गये और कुछ यहीं के वासी हो गये। भारतीय संस्कृति का समास बनता रहा। इस समास के कई स्तर हैं, किन्तु यहाँ प्रयोजन 1857 के संग्राम के दौरान बनने वाले सांस्कृतिक समास से है। उस समास की अभिव्यक्ति लोकगीतों में किस भांति हुई है; कुछ उदाहरणों के द्वारा उस सांस्कृतिक समास की लोकस्मृतियों की यत्किंचित् मीमांसा ही लक्ष्य है।
1857 के राष्ट्रीय संग्राम के सन्दर्भ में रजनी पाम दत्त का मत इस प्रकार है:
1857 का विद्रोह बुनियादी तौर पर पुराने दकियानूस और सामन्ती शक्तियों तथा पदच्युत राजाओं द्वारा अपने अधिकारी और विशेष सुविधाओं की मांग के लिए किया गया विद्रोह था। विद्रोह के इस प्रतिक्रियावादी स्वरुप के कारण जनता के व्यापक समर्थन का अभाव रहा और उसे विफल हो जाना पड़ा।('आज का भारत' रजनी पाम दत्त, पृष्ठ 317)
जैसे भी हो, पदच्युत लोग अपनी-अपनी सत्ता पाने के लिए लड़ रहे थे, किन्तु उन दिनों उनमें तात्कालिक एकता बनी थी। विजेता और विजित एक साथ मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ रहे थे। बहादुरशाह जफर को प्रतीक बनाकर हिन्दू सामन्त अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ रहे थे। नाना साहब पेशवा, अजीमुल्ला खाँ, राणा बेनी माधो राजा देवी बख्श सिंह आदि लड़ रहे थे- अंग्रेजों के खिलाफ। ये सब सामन्त थे। इंग्लैण्ड में औद्योगिक क्रान्ति का आरम्भ 1760 ई0 से माना जाता है। पलासी का युद्ध 1757 में हुआ। इसके बाद भारतीय पूँजी के इंग्लैण्ड पहुँचने में जो बाधाएँ थीं, वे समाप्त हो गयीं। औद्योगिक क्रान्ति में गतिशील पूँजी की अनिवार्य आवश्यकता को श्री दत्त ने स्वयं रेखांकित किया है :
आविष्कार अपने आप में निष्क्रिय किस्म के होते हैं। इनमें से अनेक महत्त्वपूर्ण आविष्कार संचालन के लिए आवश्यक पर्याप्त शक्ति एकत्र होने के इंतजार में शताब्दियों तक बेकार पड़े रहे। यह शक्ति हमेशा मुद्रा के रूप में और ऐसी मुद्रा के रूम में होनी चाहिए जो कहीं जमा न हो, बल्कि गति में हो। भारत की संचित निधि के इस देश में आने से पहले किसी ऐसी शक्ति का अस्तित्व नहीं था, जिसे पर्याप्त कहा जा सके और यदि जेम्सवाट अपने समय से पचास वर्ष पहले हुए होते तो अपने आविष्कार के साथ न जाने कब खत्म हो गये होते। इस प्रकार भारत की लूट संचय का गुप्त स्रोत थी, जिसने इग्लैण्ड में औद्योगिक क्रान्ति को सम्भव बनाने में अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका अदा की।('आज का भारत' रजनी पाम दत्त. पृष्ठ 136)
रजनी पाम दत्त ने 1857 के विद्रोह को ऐतिहासिक विकासक्रम की दृष्टि से 'प्रतिक्रियावादी' कहा है, अन्यथा मानव-मुक्ति की कोई भी चेष्टा प्रतिक्रियावादी नहीं होती। औद्योगिक क्रान्ति ऐतिहासिक विकास की दृष्टि से अग्रगामी हो सकती है, किन्तु इसके मूल में ही मनुष्य को लूटने और गुलाम बनाये रखने जैसी घिनौनी और प्रतिगामी सोच निहित रही है। इसके विपरीत 1857 में भारत की बिखरी हुई शक्तियाँ एकजुट हो रही थीं, उस ब्रिटिश सत्ता के विरुद्ध जो भारत की लूट लगभग दो सौ वर्षों से कर रही थी। 1857 में महाविद्रोह के दौरान ऐसा लगता है, जैसे सारे अन्तर्विरोध मुल्तवी हो गये हों।
इस संग्राम में राजाओं, सामन्तों और बेगमों के साथ हिन्दू सामन्त मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ रहे थे। अवध, बुन्देलखण्ड और बिहार में स्त्रियाँ और किसान लड़ रहे थे। इस राष्ट्रीय समास के अपने कारण भी थे। यह आकस्मिक नहीं है कि पलासी का युद्ध 1757 ई० में हुआ और उसके ठीक सौ साल के बाद 1857 को महासंग्राम हुआ। उन्नीसवीं सदी में भारत में बहुत अधिक अकाल पड़े।('आज का भारत' रजनी पान दत्त. पृष्ठ 148)
सदी के पूर्वार्द्ध में सात बार अकाल पड़े, जिनमें लगभग पन्द्रह लाख लोग भूख से मर गये। सदी के उत्तरार्द्ध में चौबीस बार अकाल पड़े, जिनमें सरकारी आंकड़ों के अनुसार दो करोड़ से अधिक लोगों की भूख से मृत्यु हुई। इधर भारत में लोग भूख से मर रहे थे और खाद्यान्न बाहर भेजा जा रहा था। 1849 तक 38 लाख पौंड की कीमत का अनाज बाहर गया। अकाल, भूख और अत्याचार से बिलबिलाती जनता और सत्ताच्युत सामन्त सब का शत्रु एक था। उस समय ईस्ट इण्डिया कम्पनी का दुश्शासन। इसीलिए लोग एक हुए सांस्कृतिक समास तो बना ही, एक तरह का सामाजिक समास भी बना। 1857 के संग्राम के दौरान बनने वाले दोनों समास न 'प्रतिक्रियावादी' थे, न प्रतिगामी। स्वतन्त्र भारत में दोनों समासों की बहुत आवश्यकता थी, काश वे होते! औपनिवेशिक शासन ने जाते-जाते उस सांस्कृतिक और सामजिक समास का विग्रह करना आवश्यक समझा और इसमें उसे सफलता भी मिली। किन्तु 1857 में उन्हें इसमें सफलता नहीं मिली थी। लोकमानस ने इन शुभ और बलिदानी स्मृतियों को सँजोया है। राणा बेनी माधो, बिरजीस कदर और हजरत महल के साथ अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ रहे थे। अंग्रेज सेनापति ने पत्र भेजकर राणा बेनी माधो को प्रभावित करना चाहा। एक ब्रज लोकगीत में यह प्रसंग इस तरह आता है :
पत्र के पढ़त बस बढ़त भो क्रोध उरभृकुटी कमान मानो रद फरकान है।कहना गुलाम सन काढ़े ना कलाम ऐसोकब्जा है कर में औ सब्जा पैरान है।दब जांय रंण में सो छत्रिन को काम नहींराखना स्वतन्त्र देस खास अरमान है।('अमृत लाल नागर रचनावली' भाग 9. पृष्ठ 207)
यह दूरदर्शी और दृढ़ सामासिकता थी, जिसका 'खास अरमान' देश को स्वतन्त्र कराना था। यह समस्त भारतीयों का साझा लक्ष्य था। यहाँ क्षत्रिय का धर्म और देश की स्वतन्त्रता मानो एक दूसरे के पर्याय बन गये हों। यह क्षत्रिय धर्म बहादुरशाह, बिरजीस कदर और हजरत महल के साथ मिलकर अंग्रेजों के विरुद्ध लड़ने की प्रेरणा दे रहा है। काव्यगाषा भी सामासिक बन रही है। कलाम का 'काढ़ना', 'गुलाम', 'कब्जा', 'सब्जा' आदि का ब्रजभाषा में इस्तेमाल उस सामासिकता के ही मुताबिक है।
अयोध्या के पास सरयू नदी के तट पर गोंडा के राजा देवी बख्श सिंह ने अंग्रेजों से युद्ध किया। एक अवधी लोकगीत में यह ओजमयी स्मृति इस तरह संचित है :
गोंडा सहर ते पल्टन चलिभै, लमती कहै तकायि रहे।तम्मू ऊपर तम्मू गड़िगै, तम्मू तमू छायि रहे।जाय फौज लमती मा पहुँची, मार मार डिंडियाइ रहे।फौज के मालिक मानसिंह और तोप के पुरैया।दागे तोप दइउ अस गरजे, फाटि झरारा नैया।हज्जारों गोरा बहिगे, चिल्लाते बप्पा दैया।अंगरेज कै मेम बोली, राजा धनि धनि तोरी मैया।भागि चलो बिल्लाइत साहेब, राजा से पार न पैया।('अमृत लाल नागर रचनावली' भाग 9. पृष्ठ 206)
अवध क्षेत्र के शंकरपुर के निकट भीरा नामक गाँव में राणा बेनी माधो सिंह की अंग्रेजों से मुठभेड़ का प्रसंग एक अवधी लोकगीत में इस प्रकार वर्णित है :
भीरा केरी लन्दन लागि निसानी।सन सत्तावन भारत बिगड्यो गौरमिंट घबरानी।बिगड़ उठी झाँसी के सेरनी लक्ष्मीबाई मरदानी।राना का सबजा नरपति की हथिनी मचलानी।अवध बीच जब आये फिरंगी घर-घर में मैदानी।('अमृत लाल नागर रचनावली' भाग 9. पृष्ठ 206')
इस गीत में अंग्रेजों के विरुद्ध अवध के हर घर में मोर्चा बना था, ऐसा कहा गया है। यह इतिहास नहीं है, बल्कि गीत के माध्यम से प्राप्त एक साक्ष्य है। सम्भव है यह पूर्ण सत्य न हो, किन्तु पूर्णतया असत्य हो; यह भी सम्भव नहीं। यह महासंग्राम, जिसमें अवध और बिहार के किसान भी सम्मिलित में प्रतिक्रियावादी विद्रोह मात्र नहीं था।
जौनपुर के चाँदा नामक गाँव में काला काँकर के विसेनवंशी राजा का युद्ध हुआ। अवधी के एक लोकगीत का यह अंश इस संदर्भ में प्रस्तुत है :
'काले काँकर के विसेनबाचाँदे गाड़े बा निसनवा।'('कविता कौमुदी' भाग 5, पृष्ठ 97)
भोजपुरी में 1857 के एक नायक कुँवर सिंह की वीरता से सम्बन्धित अनेक गीत मिलते हैं। यह गीत इस प्रकार है :
लिखि लिखि पतिया के भेजलँ कुँवर सिंहए सुन अमर सिंह भाय हो राम।चमड़ा के टोड़वा दाँत हो काटे किछतरी के धरम नसाय हो राम।बाबू कुँवर सिंह भाई अमर सिंहदोनो अपने हैं भाय हो राम।बतिपुर के कारण से बाबू कुँवर सिंहफिरंगी से रेढ़ बढ़ाय हो राग।दानापुर से जब सजलस हो कम्पूकोइलवर में रहे छाय हो राम।लाखा गोला तुहुँ के गानि के हो मरिहौंछोड़ बरहरवा के राज हो राम।('भोजपुरी लोकगीत भाग-1. डॉ० उपाध्याय, पृष्ठ 52')
यहाँ क्षत्रिय का धर्म दाँत से चमड़े का स्पर्श होने के कारण नष्ट होने का वर्णन है। वस्तुतः उस समय सब का धर्म नष्ट हो रहा था। अपनी-अपनी धार्मिक जड़ों को पकड़कर सब एक हो रहे थे। उस समय धर्म प्रतिमामी भूमिका नहीं निभा पा रहा था, बल्कि वह एक बड़े आर्थिक, सामाजिक सांस्कृतिक और राजनीतिक परिवर्तन की प्रेरणा दे रहा था।
1857 में बाबू कुँवर सिंह के शौर्य का वर्णन श्री प्रसिद्ध नारायण सिंह ने एक भोजपुरी गीत में इस प्रकार किया है :
'छप छप गोरन के काटि चललरनभूमि रकत से पाटि चललजे जहें मिल ते तहे मुअलसासन के सोरि उखारि चलल''अइसन सेना बलिदानी लेमद में मातल तूफानी ले।आइल रन में रिपु के आगेजब कुँवर सिंह सेनानी ले।खच-खच खंजर तरवारि चललसंगीन कृपान कटारि चलल।बर्छा बर्धी की बरखा मेंबहि लाल लहू के धार चलल।'('भोजपुरी' वर्ष 4. अंक 3-6. जन0, 1956)
यह रचना लोकगीतों से इस अर्थ में किंचित् भिन्न है कि इसके रचनाकार का नाम ज्ञात है, जब कि सामान्यतया लोकगीत निर्वैयक्तिक होते हैं। उनकी रचना व्यक्ति नहीं समूह करता है, किन्तु इससे बहुत आसानी से यह निर्णय नहीं लेना चाहिए कि किसी भी लोकगीत का कोई रचनाकार होता ही नहीं।('द बैलेड' सिजविक, पृष्ठ 11)
1857 से सम्बन्धित जो लोकगीत मिलते हैं, उनमें मेरठ के सदर बाजार की लूट, भारतीय सामन्तों और स्त्रियों द्वारा जगह-जगह अंग्रेजों से लड़े गये युद्ध और बेगमों पर किये गये अत्याचार का वर्णन मिलता है। 1857 में अंग्रेजों ने वाजिद अली शाह से अवध की गद्दी छीन ली और लखनऊ से उन्हें निर्वासित कर दिया। शाह की बेगमों के विलाप से सम्बन्धित एक अवधी लोकगीत इस प्रकार है :
कुसुमा पर पड़ी। उसने कुसुमा के पिता को कैदखाने में डाल दिया। बलपूर्वक कुसुमा को पालकी में बैठाकर वह ले जाने लगा। रास्ते में कुसुमा ने मिर्जा से बाबा के सरोवर में पानी पीने की इच्छा प्रकट की और अन्ततः उसी सरोवर में कूदकर प्राण त्याग दिये। एक गीत अंश यहाँ प्रस्तुत है :
तनिक डोलिया थमाओ मिरजवा
बाबा के सगरवा मुँहवा धोइत हो ना।
बाबा के सगरवा सुन्दर बढ़इल पनिया
हमरे सगरवा पनिया पीयो हो ना।
तोहरा सगरवा मिरजा नित उठि होइहैं
बाबा के सगरवा दुर्लभ होइहैं हो ना।
एक घूँट पियली दूसर पेट पियली
तिसरे में गयी हैं तराई होना।
रोइ रोइ जलवा डलावै राजा मिरजा
फँसि आवै घोंघिया सेंवरिया हो ना।
मुँहवा पटुका दे के रोवे राजा मिरजा
मोरे मुँह करिखा लगवलू हो ना।
सिर पै पगड़िया बाँधि हँसे भैया बाबा
दूनो कुल राखेत बहिनी कुसुमा हो ना।
('भोजपुरी लोकगीत' भाग-1. डॉ० उपाध्याय, पृष्ठ 52)
ये वे स्त्रियाँ थीं, जो दोनों ओर से शोषित हो रही थीं। 1857 में उन्होंने विलाप किये तो युद्ध भी किये। लक्ष्मी बाई ने युद्ध किया और वीरगति को प्राप्त हुई। लखनऊ में बेगम हजरत महल ने अग्रेजों के विरुद्ध युद्ध किया।
('अमृत लाल नागर रचनावली' भाग 9. पृष्ठ 217)
अपनी सांगठनिक क्षमता के बल पर उन्होंने ग्यारह महीनों तक अंग्रेजों को टक्कर दी। इसी प्रकार राजाओं, सामंतों और ईस्ट इण्डिया कम्पनी की भारतीय सेना के सारे सैनिक सामन्त नहीं थे। वे किसान भी थे। या किसानों के बेटे थे।('महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण'- डॉ० राम विलास शर्मा)
इस प्रकार 1857 का संग्राम भारतीय राष्ट्रीय स्वाभिमान की अभिव्यकि है। इस दौरान भारतीय समाज में आदर्श मानसिकता उत्पन्न हुई। भिन्न-भिन्न संस्कृतियों के टकराव तथा समाज के अन्य अन्तर्विरोध कुछ दिनों के लिए गौण हो गये। सबने मिलकर शत्रु की पहचान की और उससे युद्ध करने के लिए एकजुट हुए। यह हमारी संस्कृति की सामासिकता का आधुनिक पाठ था, जिसे अंग्रेजों ने जाते-जाते नष्ट किया या करना चाहा। हिन्दी क्षेत्र के लोकगीतों में इस मानसिकता की शुभ स्मृतियाँ आज भी संचित है।
सन्दर्भ :-
'आज का भारत' रजनी पाम दत्त, पृष्ठ 317
'आज का भारत' रजनी पाम दत्त. पृष्ठ 136
'आज का भारत' रजनी पान दत्त. पृष्ठ 148
'अमृत लाल नागर रचनावली' भाग 9. पृष्ठ 207
'अमृत लाल नागर रचनावली' भाग 9. पृष्ठ 206
'अमृत लाल नागर रचनावली' भाग 9. पृष्ठ 206
'कविता कौमुदी' भाग 5, पृष्ठ 97
'भोजपुरी लोकगीत' भाग-1. डॉ० उपाध्याय, पृष्ठ 52
'भोजपुरी लोकगीत' वर्ष 4. अंक 3-6. जन0, 1956
'द बैलेड' सिजविक, पृष्ठ 11
'इंडियन एंटीक्वेरी भाग 40, पृष्ठ 165
'भोजपुरी लोकगीत' भाग-1. डॉ० उपाध्याय, पृष्ठ 52
'अमृत लाल नागर रचनावली' भाग 9. पृष्ठ 217
'महावीर प्रसाद द्विवेदी और हिन्दी नवजागरण' डॉ० राम विलास शर्मा
-डॉ० क्षमाशंकर पांडेय की पुस्तक '1857: स्मृति और यथार्थ' से साभार।
शिव शंकर मिश्र
अध्यक्ष हिन्दी विभाग,
जनता महाविद्यालय
अजीतमल, औरैया।


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