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स्मृति में कामतानाथ- शिवशंकर मिश्र

            कामतानाथ जी का नाम तो पहले से सुन रखा था, कुछ कहानियाँ भी पढ़ी थीं, पर मिलना काफी बाद में हुआ- दुधवा नेशनल पार्क में आयोजित ‘शब्दयोग’ के एक अनौपचारिक कार्यक्रम में। दुधवा तक पहुँचना बाद में हुआ, कामतानाथ जी से मिलना लखनऊ में ही हो गया। जिस कार से मुझे दुधवा तक जाना था, उसी से कामतानाथ जी को भी चलना था। इससे पहलेे मैंने सिर्फ तस्वीर देखी थी उनकी- कलँगी जैसे बाल, सुगठित क्लीन शेव्ड चेहरा। फिर ‘शब्दयोग’ के उन पर केन्द्रित विशेषांक में एक चित्र देखा था- बिना कालर के कुर्ते में। बाल वैसे ही- कलँगी जैसे। हाँ, अब वे पूरी तरह सफेद थे। ठोड़ी पर तर्जनी। दूर देखती आँखें। साक्षात् मिले, तो जींस और टी शर्ट में थे। चेहरा वही। हाँ, अब उसके कई-कई आयाम थे।             बड़े लेखक की बगल में बैठने के एहसास से मैं गौरवान्वित भी हो रहा था और थोड़ा आतंकित भी। आतंक और आकर्षण- दोनों में कहीं न कहीं ‘कालकथा’ के आकार की भी भूमिका रही होगी। तब तक मैंने यह उपन्यास नहीं पढ़ा था। सिर्फ आकार देखा था। बाद में, जब पढ़ा, तो एक रात में ही...

पखावज वृत्तान्त- शिवशंकर मिश्र

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महाराज इन्द्र के दरबार में संगीत की सभा बैठी। दरबारियों ने महाराज से निवेदन किया कि वे स्वयं पखावज बजायें........और एक ताजा मिढ़ा हुआ पखावज महाराज के सामने हाजिर किया गया। तमाम दरबारी उत्सुक होकर बैठे.....लेकिन पखावज से कोई कर्णप्रिय बोल नहीं निकला। बदले में वह भाँय−भाँय करके रह गया। महाराज ने पखावज को इधर−उधर से देखा। दरबारियों ने भी पखावज का ही निरीक्षण किया। महाराज के बजाने में तो कोर−कसर थी नहीं। बाकी दिनों तो वे बहुत मीठा बजाते थे। लोग हैरान हुए......काफी देर में एक दरबारी ने, जो खुद भी कभी पखावज बजता था, खड़े होकर निवेदन किया,  ''महाराज, यह जो भाँय−भाँय कर रहा है, शायद भात मॉँग रहा है!''  भात मँगवाया गया। पखावज के चमड़े में मसाला और सियाही थी। दूसरी तरफ भात लगाया गया। फिर क्या था! पखावज के मधुर बोलों में दरबारी,अप्सराएं और नंदनवन सब झूम उठे। राजमहल की दीवारें हिलने लगीं.....लेकिन यह क्या! लोग अवाक् रह गये। महाराज ने पखावज को अपने से दूर झिटक दिया और कहा, ''इसे महल के पिछवाड़े नाले में फेंक दिया जाय।'' दूसरे दिन जब महाराज का दरबार लगा था, मेहनत−मजूरी क...

स्मृति में गोरख - शिवशंकर मिश्र

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शायद वह सन् अस्सी की गर्मियों की कोई दोपहर थी, जब मैं पहली बार दिल्ली पहुंचा- उन दिनों चलने वाली अपर इंडिया एक्सप्रेस से। पूरे महानगर में जिस एक अदद आदमी से पहचान के आधार पर मैं दिल्ली पहुंचा था, वे थे गोरख पांडेय। पहली बार इलाहाबाद में 'परिवेश' की एक गोष्ठी में देखा और सुना था उन्हें। बार-बार दाढ़ी सहलाते और सिगरेट के गहरे कश लेते हुए वे गहन चिंतन की मुद्रा में बोल रहे थे और प्रभावित कर रहे थे। गोष्ठी के अंत में 'दस्ता' की ओर से मैंने अनिल सिंह तथा कुछ और साथियों के साथ मिल कर गोरख का एक गीत गाया- धुन बदल कर। रामजी भाई बताया करते थे कि गोरख खुद भी गाते हैं और वे इस तरह नहीं, बल्कि इस तरह गाते हैं। फिर वे अपनी आवाज में उन धुनों को सुनाते। कुछ धुनों का मैं अनुकरण करता और कुछ को बदल देता। उस दिन बदली हुई धुन वाला जो गीत गाया गया, वह था- 'केकरा नावें जमीन पटवारी, केकरा नावें जमीन?' इस गीत की धुन एक होली गीत पर आधारित है। उस सपाट धुन में मुझे गायकी का मजा न मिलता और मैं इस गीत को पूरबी की तरह गाता था। अपने ही गीत को बदली हुई धुन में सुनते हुए गोरख लगभग ल...