बुधवार, 7 जुलाई 2010

मूरतें -शिवशंकर मिश्र

                                    एक पुरानी धार्मिक इमारत ढहा दी गयी थी और उससे भी पुरानी एक दूसरी धार्मिक इमारत के खँडहर धरती के गर्भ में गंभीरता से खोजे जा रहे थे। लाशों से भरी रेलगाड़ी की बोगियां एक शहर से दूसरे शहर पहुँच चुकी थीं। चलती गाड़ियों से लड़के फेंके जा रहे थे। रेलगाड़ियाँ खूनी हो गयी थीं। अखबारों में भूख से मरने वालों की खबरें नदारद थीं। उनकी जगह दंगों में मरने वालों की खबरों ने ले ली थी। ...करीब बीस साल बाद मैं अपने गाँव जा रहा था। जरूरी था। भाई ने पत्र में लिखा था कि बेटे का ब्याह है और जमीन का बँटवारा होना है। मौके से सब रिश्तेदार रहेंगे। रिश्तेदारों के सामने बाँट-बखरा होने से बाद में कुछ कहने-सुनने की बात नहीं रहेगी। ...बँटवारा है तो ख़राब चीज, लेकिन महानगर में बीस साल रहकर जमीन के छोटे से टुकड़े का महत्त्व समझ में आ गया था। ...सारे भय और आतंक के बावजूद जमीन के एक टुकड़े के मालिकाना हक़ का एहसास अच्छा लग रहा था... । डीजल, पेट्रोल और तकनीक के बाद एक जमीन ही तो है, जिसकी कीमत दिनों दिन बढ़ रही है।...अपनी जमीन। ...अपना गाँव। मेरे मन में गाँव की छवियाँ  तैर उठीं... । गाँव... । खेत... । ताल... । ताल की कच्ची मिट्टी... । बचपन... । मिट्टी की मूरतें... । सादिक... । मैंने जो भी खिलौने बचपन में खेले थे, सब सादिक के बनाये थे। ...मेरे खेत ताल के किनारे हैं। ...ताल में कुंजीबेरा... । महानगर की भीड़ में चलते हुए भी मरे मन में कुंजीबेरा खिल गये। ...कुंजीबेरा से जुड़ा बचपन का वह प्रसंग। ...मुंशी जी पढ़ा रहे हैं...

'बीती रात कमलदल फूले... ।'
हम लोग पढ़ रहे हैं...
'बीती रात कमंडल फूले  ... ।'
'गधाऽऽ !'

 - मुंशी जी ने सब की पिटाई की...फिर श्यामपट्ट पर कमल का फूल बना दिया ... 'कमंडल नहीं कमलदल...!' मैंने कमल का फूल देखा ही नहीं था। ...एक दिन बाबा के साथ खेतों की ओर गया। ...ताल में कुंजीबेरा के फूल....! ...कमल। ...मेरा कमल... । मेरे मन में कुंजीबेरा ही कमल हो गया। एक दिन अकेले गया। घुस पड़ा ताल में। शायद बीच वाले कुंजीबेरा और बड़े हों... । मैं घुसता जा रहा हूँ... । कुंजीबेरा के ढेर सारे फूल! ...मैं फूल देख रहा हूँ। बस अब थोड़ी ही दूर रह गया फूलों का झुरमुट... । अरे!...अरे..! पानी... नाक तक... । ...अब...अब नाक से ऊपर। गुडुप...गुड़... गुड़ गुडुप...गुडुप। अजीब विकलता...। मैं पुकारना चाहता हूँ किसी को, लेकिन बोल नहीं पा रहा हूँ... । मुंह खोलते ही पानी अन्दर घुसने लगता है। कुछ सुनाई नहीं  पड़ रहा है। ...कुछ दिख नहीं रहा है। ..सारी पीड़ाएं सिमटकर घुसती जा रही हैं कपाल में... । गहरा अन्धेरा ...। ...भयानक पीड़ा...। ...कोई धक्का दे रहा है। ...फिर धक्का। ...कोई मुझे अपने कंधे पर लाद रहा है। ...मेरा पेट दबा रहा है कोई। ...मुंह से पानी निकल रहा है। ...आँखें खुलीं। अरे! सादिक चच्चा...! उस दिन से सादिक रोज मुझे कुंजीबेरा की माला और मिट्टी के खिलौने देते थे सांझ को, जब वे सिंवान से लौटते थे पशुओं के संग ।  पता नहीं अभी सादिक होंगे या नहीं ? ...होंगे भी तो कैसे होंगे? ...साढ़े सात बज रहे हैं। ...शाम हो गयी होगी गाँव में। यहाँ, महानगर के इस जंक्शन पर न तो सुबह होती है, न शाम। ... हमेशा एक सा उजाला... । उफ! इतनी भीड़! लोगों का विशाल झुरमुट...। धक्का... । फिर धक्का... । ...मन की छवियाँ खो जाती हैं... । बचते-बचाते  अपना डिब्बा तलाशता हूँ। लेकिन इस भीड़ में कोई कैसे बच सकता है धक्का-मुक्की से? काफी मशक्कत के बाद अपनी बर्थ पर पहुँच पाया। नीचे की बर्थ मिली है। पानी की बोतल और बैग वगैरह यथास्थान रखकर बैठ गया मैं। अच्छा रहा। समय से आ गया। गाड़ी  ने सीटी दे दी। कुछ यात्रियों को छोड़ने उनके जो  परिजन आये थे, उतरने लगे। ...धक्का! धक्क धक्क .... धक्क धक्क... । लम्बी साँस... । जूतों के फीते खोलना चाहता हूँ, लेटने के लिए। मत खोलो फीते, मन का एक कोना कहता है। पता नहीं कब क्या हो। ...जलती हुई आँखों को आराम देने के लिए पल भर पलकें बंद किये रहता हूँ। ...आँखें खोलो। आंखें खोलो। ...यह भीतर की आवाज है। मैं आस-पास के लोगों के चहरे देख लेना चाहता हूँ। सामने की नीचे वाली बर्थ पर दो लोग बैठे हैं। दोनों चुप हैं। दोनों अलग-अलग हैं। मेरे ऊपर की बर्थ पर कोई अभी से लेता है। शायद बीमार है। मेरी तरफ की सबसे ऊपर वाली बर्थ पर एक अधेड़ झुक कर बैठे हैं और चश्मा लगाए कुछ लिख रहे हैं। उन्हें देखने के लिए मुझे गर्दन खूब बांयी ओर घुमानी पड़ी और आँखों को अस्वाभाविक ढंग से ऊपर ले जाना पडा। यह लगभग अभद्रता ही थी, जिस पर मुझे थोड़ी झेंप भी आयी। कोई किसी को नहीं देख रहा है। या न देखने का दिखावा कर रहा है हर आदमी। सब एक दूसरे को देखते हैं, लेकिन नजर बचा कर। कभी धोखे से नजर मिल जाती है, तो लोग  झटके से गर्दन घुमा लेते हैं। मैं खुद कितना छुईमुई हो रहा हूँ! ...इन दिनों रेलगाड़ी का सफर! वह भी रात में! बाप रे...! मैं हरगिज ऐसा न करता। लेकिन और करता भी क्या? भतीजे का ब्याह कोई रोज-रोज तो होगा नहीं। गर्मी की छुट्टियां। शादी-ब्याह। यात्रियों की आपाधापी। इसी गाड़ी में रिजर्वेशन मिल पाया। ...गाडी रफ्तार पकड़ चुकी है। ...धक धक धक धक धक... । पीछे की बर्थ पर बातें चल रही हैं -
'सीधी सी बात है। जब दो देश बन ही गये, तो हिन्दू हिदुस्तान में रहें और मुसलमान पाकिस्तान में।'

'और मस्जिदों का क्या होगा?'

'हिन्दुस्तान की मस्जिदें गिरा दो और पाकिस्तान के मंदिर गिरा दो।'

मैं इन लोगों के चहरे नहीं देख पा रहा हूँ। अब मैं जूतों के फीते खोलकर लेट जाता हूँ। दिन भर की दौड़-धूप के बाद जलती हुई आँखें अपने आप मुंद  जाती हैं। ...आवाजें भीतर कहीं डूब जाती हैं... । ...छवियाँ जाग जाती हैं...। गाँव की...। जमीन की... । मिट्टी की... । मूरतों की... । सादिक की... । सादिक के बिना गाँव की तस्वीर बन ही नहीं पा रही है... । जिस तरह फुट्टू लोहार के बिना हर-फार नहीं बन सकता, गोलई नाऊ के बिना हजामत नहीं बन सकती, ननकाई सोनार के बिना गहना-गुरिया नहीं बन सकता और घुरहू पंडित के बिना शादी-ब्याह नहीं हो सकता, उसी तरह सादिक के बिना गाँव की तस्वीर नहीं बन सकती... । ...बनने लगीं... । बनने लगीं तस्वीरें...। गाँव की...। सादिक की... । घुटनों तक धोती। मारकीन की बंडी। कंधे पर गमछा। घुटा सिर। मुंड़ी दाढ़ी। नीचे झुकी खिचडी मूंछें। ...असाढ़ में किसी का छप्पर उठवा रहे हैं सादिक। ...आंधी-पानी में किसी की टूटी बंड़ेर में थूनी लगा रहे हैं। ...सावन-भादों की आधी रात को किसी के घर में निकले काले सांप को मार रहे हैं। ...गर्मी में किसी के घर आग लग गयी है। सादिक आग बुझा रहे हैं। ...किसी की गाय के पेट में बच्चा फँस गया है। चलो सादिक के पास। हर काम को करने की जुगत है सादिक के पास... ।

...छुक छुक छुक छुक छुक छुक...

गाड़ी स्टेशनों पर रुकती। झटका लगता। आँखें खुल जातीं। तरह-तरह के लोग घुस आते डिब्बे में। ...मैं डर जाता। सोये हुए लोग जाग जाते। शायद हर आदमी डर रहा है। कोई नहीं सो रहा है। सब यूं ही आँखें बंद किये हैं। ज्यों ही नए लोगों की भीड़ घुसती है, पहले से बैठे या लेटे हुए लोग एक-दूसरे को देखने लगते हैं। अब वे झटके से गर्दन नहीं घुमाते। पल दो पल नजरें मिलाकर नये आगंतुकों के बारे में अपनी -अपनी आशंकाओं को आपस में बाँटते हैं। ...मैं खुद कितना बदल गया हूँ। आदमी के चहरे पर जिन साम्प्रदायिक चिन्हों को देखना मैंने बहुत पहले छोड़ दिया था, आज उन्हीं की तलाश कर रहा हूँ लोगों के चेहरों में।
' चाऽऽई ...!' चाऽऽई...!'

'पुड़ीऽऽऽ!' 'पुड़ीऽऽऽ !'

'पूड़ी सब्जीऽऽ पूड़ी सब्जीऽऽ!'

सीटीऽऽऽ... । झटका... ।

धक्क धक्क...धक्क धक्क...धक धक धक धक... ।

गाड़ी महानगर से बहुत दूर निकल आयी है। मेरे आस - पास के लोग फिर सो गये हैं। या शायद आँखें बंद कर ली हैं उन्होंने। अब सामने वाली बर्थ खाली है। जो लोग उस पर बैठे थे, अब ऊपर अपनी - अपनी बर्थ पर चले गये हैं। मेरी तरफ की सबसे ऊपर वाली बर्थ के अधेड़ अब भी कुछ लिखे जा रहे हैं। भीतर उजाला है। बाहर काली रात... । कहीं कहीं कुछ टिमटिमाती रोशनियाँ दिख जाती हैं। गाँव होंगे... । गाँव, खेत, पेड़, ताल - पोखरे... । सब डूबे हैं अँधेरे में। ...सबेरा होगा। चरवाहे पशुओं के झुण्ड लेकर आ जायेंगे। पेड़ नाचने लगेंगे। जलती हुई आँखों की पलकें मुंद जाती हैं। ...माटी की छवियाँ जाग उठती हैं। ...मिट्टी की मूरतें। तरह-तरह की मूरतें। मोटा सेठ, ठिगना कारिन्दा, चिरई -कौआ, मोटर-गाड़ी, बैलगाड़ी... । ...सिंवान में पशुओं को संगोह कर सादिक एक पेड़ की छाया में बैठे हैं। पोखरे से कच्ची मिट्टी लेकर मूरतें बना रहे हैं। पशुओं पर भी नजर है। किसी की फसल न उजाड़ दें। दोपहर हो गयी है। बाकी चरवाहों को गाँव भेज दिया है उन्होंने  खाने के लिए। सादिक का खाना भौजाई किसी चरवाहे से भेज देंगी। रोटी--अचार  की पोटली। पानी पोखरे का। ...मूरतें धूप में सूख रही हैं। ...एक और बनानी है। नेता जी हेलीकाप्टर से आये थे। तभी से है दिमाग में... । ...बन गयी। ...बन गयी हेवलीकलट्टर की मूरत। अब बस। अरे...! धूप में मूरतें कहीं-कहीं दरक गयी हैं। सादिक कच्ची मिट्टी से मूरतों की दरारें भर रहे हैं। फिर सुखाना होगा इन्हें धूप में। अब कुंजीबेरा की मालाएं बनानी हैं... । सांझ हो गयी। गाँव से बाहर धूल उठ रही है। भीतर धुँआ। सादिक पशुओं के संग गाँव में घुस रहे हैं। गलियों में बच्चे खेल रहे हैं। सादिक उन्हें मूरतें और मालाएं बाँट रहे हैं। बच्चे खिल उठे... । उनकी ख़ुशी देख कर सादिक खिलखिला रहे हैं...।
...छुक छुक छुक छुक छुक छुक... ।

गाड़ी सीटी दे रही है। मेरे पीछे की बर्थ पर लोग बातें कर रहे हैं -

'क्यों, रफ्तार कम हो रही है न ?'

'हाँ, शायद कोई स्टेशन आने वाला है।'

धक्क...धक्क... धक्क...चींऽऽऽ!

'कौन सी जगह है भाई ?'

'पता नहीं।'

'यहाँ तो कोई चाय वाला भी नहीं है।'

'आउटर है। '

थोड़ी देर गाड़ी खड़ी रहती है। सब चुप...। गाड़ी सरकती है। अब स्टेशन। कई लोगों ने पढ़ा -

'अलीगढ़।'

' अलीगढ ?'

'हाँ, अलीगढ़।'

'चायऽऽऽ! चायऽऽऽ ! चायऽऽऽ ! चायऽऽऽ !'

'पुड़ेऽऽऽ! पुड़ेऽऽऽ ! पुड़ेऽऽऽ ...!'

चाऽऽईऽऽ चाऽऽईऽऽ ...!'

महिला एनाउंसर की आवाज। कोई ऊंघता हुआ आदमी कह रहा है-

'भाई साहब लाइट बुझा दीजिये।'

'जलने दीजिये।'

'जलने दीजिये।'

'उजाला जरूरी है।'
तरह - तरह की आवाजें और तरह-तरह के मत। मैं भी नहीं चाहता कि लाइट बुझाई जाय। उजाले के पक्ष में ज्यादा लोग हैं। एक बेकाबू भीड़ घुसी आ रही है। उजाले में मैं सब की शिनाख्त कर लेना चाहता हूँ। हर चहरे को गौर से देख रहा हूँ। दाढ़ी... । मूंछ... । झुर्रियां... । दाग... । लम्बे-लम्बे बाल... । खूँखारियत... । मासूमियत... । हताशा... । जिन्दगी... । हर चेहरा आदमी का है।

धक धक धक धक... ।

गाड़ी खड़ी है। एक दूसरी गाड़ी जा रही है।
सामने की बर्थ पर एक युवती आ गयी। उसकी गोद में बच्चा है। ...क्या और कोई नहीं है इसके साथ? ...है। ...यह नौजवान शायद इसका पति है। उसे पीछे की बर्थ मिली है। दोनों आँखों ही आँखों में कुछ कहते हैं। नौजवान अपनी बर्थ पर चला जाता है। मेरे सभी पड़ोसी युवती को घूरते हैं। मैं भी, लगातार लिखने वाले अधेड़ भी और ऊपर का बीमार भी। क्या जाति होगी इसकी...? क्या धर्म होगा इसका...? पहनावे से कुछ समझ में नहीं आ रहा है। पीछे की बर्थ पर बातें चल रही हैं -

'आदमी के साथ सबसे बड़ी मुश्किल यही है कि उसे
 चहरे या पहनावे से नहीं समझा जा सकता।'

'अरे भाई चहरे की बात मत करो। कौन जाने कब एक जोड़ा मासूम
 आँखों वाला कोई चेहरा अपराजेय समझी जाने वाली मीनार को ढहा दे।'

अब भी मेरे सभी पड़ोसी युवती को घूर रहे हैं।
मैं भी, लगातार लिखने वाले अधेड़ भी और मेरे ऊपर का बीमार भी। सब उसकी जाति और धर्म जान लेना चाहते हैं। देख देखकर। सूंघ सूंघकर। बच्चा रोने लगता है। युवती उसे चुप कराती है। बच्चा चुप नहीं होता। रोता जा रहा है।
...सीटीऽऽऽ।

...झटका।

धक्क...धक्क...धक्क...धक्क।

चल पड़ी गाड़ी। ...बच्चा रोता जा रहा है। युवती...युवती नहीं माँ। माँ चुप कराना चाहती है बच्चे को। बच्चा चुप नहीं होता। माँ बच्चे की आँखों में आँखें डालकर कुछ देर देखती है। बच्चे की आँखों में माँ उतर आई। माँ के आँचल में दूध उतर आया। बच्चा छिप गया आँचल में। माँ लेट गयी। दूध पिला रही है बच्चे को। न माँ किसी को देख रही है, न बच्चा। बच्चा चुप है। अब कोई किसी को नहीं देख रहा है।

छुक छुक छुक छुक... ।

गाड़ी चली जा रही है। मेरी  आँखों की जलन कम नहीं हो रही है। पलकें फिर मुंद जाती हैं। ...लीला हो रही है। गाँव में रामलीला हो रही है। आज बियाह होगा। मंडली मनीजर रामखेलावन जी माइक्रोफोन पकड़ कर बोल रहे हैं -
'भाइयों और बहनों एक बार प्रेम से बोलिए राजरामचन्द्र की...'

'जैऽऽऽ!'

'भाइयों-बहनों भगवान राम और माता जानकी के विवाह की लीला है आज। हमने लीला को और रोचक बनाने के लिए इस बार भगवान की बारात में हाथी ले आने की योजना बनायी थी। लेकिन बड़े दुःख की बात है कि चन्दा कम मिलने से हम हाथी नहीं ले आ सके। अब जैसी है भगवान की लीला है। प्रेम से देखिये। एक बार प्रेम से बोलिए राजारामचंद्र की...'

'जैऽऽऽ !'

छुक छुक छुक छुक छुक छुक छुक छुक... ।

...लीला शुरू। प्रार्थना चल रही है -

'रामसिया नमवा बड़ा अनमोल, बड़ा अनमोल, राधे गोविन्द हरी बोल हरी बोल... ।'

प्रार्थना ख़तम। ... मंच पर नचनिया। भजन गा रहा है और नाच दिखा रहा है-

'दिखाया चीर कर सीना तो सीता राम लिक्खा था।'

अब ब्यास जी चौपाई गा रहे हैं। पर्दा गिरा। फिर उठा। दशरथ जी मंच पर। जनकपुर से दूत आये। पत्रिका बांची गयी। अब बारात सज रही है। बिंदा भगत की मंडली ने बीन बजाना शुरू कर दिया। लेकिन यह क्या...? पीछे के दर्शक चौंक गये। वे खड़े हो गये और शोर मचाने लगे -

'ह इ देखो! हाथी!'

'हाथी ?'

'हाँ रे देख पीछे। चला आ रहा है हाथी।'

कोई मंच की ओर नहीं देख रहा है।
...छुक छुक छुक छुक... ।

...रामखेलावन जी बार-बार मंच पर आकर बोल रहे हैं -
'एक बार प्रेम से बोलिए राजा रामचंद्र की ...'

'जय' बोलने वाला कोई नहीं। सब हाथी देख रहे हैं।

'भाइयों और बहनों कृपया शांती का सहजोग कीजै। भगवान की लीला है। विघ्न मत डालिए।'

लेकिन लोग रामखेलावन जी की बात पर ध्यान नहीं दे रहे हैं... । वे तो हाथी देख रहे हैं... । मझोले कद का हाथी... । पीठ पर सजीवन। हाथी धीरे-धीरे मंच के पास पहुँच रहा है। रामखेलावन जी, व्यास जी, दशरथ जी- सब चौंक पड़े। हाथी कभी रामखेलावन जी को धक्का मार रहा है, तो कभी किसी दर्शक को। जब मंच खाली होता, हाथी अपनी लीला दिखाता। मंच के एक कोने से दूसरे कोने तक दौड़ता। हाथी पर सवार सजीवन तरह-तरह की आवाजें निकालता -

'गरगत्त गरगत्त !'

'घिट पिट कीऽऽ घिट पिट कीऽऽ !'

सब भूलकर लोग हाथी देख रहे हैं । ...छुक छुक छुक छुक... । गाड़ी चली जा रही है। माँ सोयी है। बच्चा सोया है। ऊपर वाले सज्जन शायद बैठे-बैठे ही सो रहे हैं। पीछे की बर्थ पर बातें चल रही हैं। बाहर अँधेरा है। भीतर उजाला... । गाँव में मिट्टी के तेल वाली फोन्नोगैस का उजाला... । लीला ख़तम। अब हाथी परदे के पीछे जा रहा है। उसके पीछे-पीछे सभी दर्शक। ... सब जान लेना चाहते हैं कि कौन बना था हाथी और कैसे ? सजीवन को पीठ से उतार कर और झरेखू बांवारूपी के कंधे से हाथ हटाकर अंगड़ाई लेते हुए सादिक खड़े हुए।
'धन्नि है! धन्नि है सादिक!'

सादिक खिलखिला रहे हैं। उनके तम्बाकू से काले दांत साफ दिख रहे हैं...। ...छुक छुक छुक छुक.,,। झरेखू बांवारूपी चिल्लाया -
'अरे पहले मेरे मूड़ से सूँड़ तो उतारो!'

जल्दी-जल्दी सादिक उसके सिर से पुआल ठूंस कर बनाए हुए काले कपड़े का सूँड़ उतारते हैं। अपने शरीर से हाथी वाला काला झिंगोला उतार रहे हैं और झरेखू को निर्देश दे रहे हैं-

'हे झारेखुआ मेरी पिठांह से ई रसरी तो खोल और ई रजाई-गद्दा तो उतार!'

...छुक छुक छुक छुक छुक छुक ... । गाड़ी चली जा रही है।  सामने माँ सोयी है। बच्चा सोया है। सब सोये हैं। मेरे भीतर गाँव की छवियाँ जाग रही हैं... । रफ्तार कम हो रही है। शायद कोई स्टेशन आने वाला है। पीछे की बर्थ पर फिर बातें शुरू हो गयीं-

'कौन सी जगह आने वाली है?'

'पता नहीं...।'

सीटीऽऽऽ... ।

धक्क धक्क धक्क चींऽऽऽ... ।

'चाऽऽ चा गरम...चाऽऽ चा गरम... चाऽऽ चा गरम... ।'

'कौन सा स्टेशन है यार ?'

कई लोग नाम पढ़ते हैं । ...भीड़ अन्दर घुसी आ रही है। कुछ लोग उतर रहे हैं। झटके से ऊपर वाले महाशय की कापी गिर गयी और कई लोगों के पैरों के तले कुचल गयी। मैंने कापी उठायी। पन्ने खुल गए थे। हर पन्ने में लाल स्याही से 'रामराम' लिखा था। ...अरे यह क्या? कापी थमाते हुए महाशय मुझे इस तरह क्यों घूर रहे हैं?...तिलक लगे मस्तक पर इतनी सिकुड़नें ? ...चश्मे के भीतर से झांकती आँखों में इतनी नफरत ? ...ओह! शायद मेरी दाढ़ी! ...बाप रे! महीने में एक बार कैंची से दाढ़ी छोटी कर लेने का आलस लगता है आज अच्छी कीमत वसूलेगा। मेरा बार-बार मन करता है कि उठकर उन्हें नाम बता दूं। नाम बताने से  जाति और धर्म मालूम हो जाएगा और मैं सुरक्षित हो जाऊंगा। ...लेकिन बिना पूछे नाम बताना भी तो अटपटा लगता है। बच्चा कुनमुनाया...। हाथ-पैर चलाने लगा और रोने लगा...। भीड़ आ रही है, जा रही है। तरह-तरह के चहरे। लेकिन इस समय तो मुझे उन्हीं का चेहरा डरावना लग रहा है। सीटीऽऽऽ...। धक्क धक्क ...। गाड़ी ने रफ्तार पकड़ ली। मेरे सामने की सबसे ऊपर वाली बर्थ पर लेटे हुए आदमी ने मुझसे जगह का नाम पूछा। बीच की बर्थ वाले ने टाइम पूछा। अब वे मुझे नहीं घूर रहे हैं। मैं लेट गया हूँ। बच्चा शांत है। माँ दूध पिला रही है । वे फिर 'राम राम' लिखने लगे शायद। मेरी पलकें फिर मुंद जाती हैं। ...सादिक भी लिख रहे हैं राम का नाम। ...लिखेंगे कैसे? ...गा रहे हैं। ...होली जल रही है। ...सादिक की कमर में ढोलक बाँधी जा रही है। ...पहली फाग सादिक गा रहे हैं -
'लै लइए राम का नाम, पहिले देबी सारदा गाइ लइए।'

सादिक गा रहे हैं। साथ में सब गा रहे हैं। सादिक गा भी रहे हैं और ढोल भी बजा रहे हैं -

'बिम्मलकड़...! बिम्मलकड़...!'

...छुक छुक छुक छुक...

              दूसरी फाग ग्रामदेवता को समर्पित। सादिक शुरू की दो फागों में हर साल नेतृत्व करते हैं। गाँव का नाम सँड़वा, तो ग्रामदेवता साँड़ेबीर। सादिक गा रहे हें -

' सँड़वा के साँड़ेबीर बाबा तोहरी सरन ढोलक बाजे.... ।'

सब गा रहे हैं। अब सादिक केवल ढोल पीट रहे हैं -

'' बिम्मलकड़ ! बिम्मलकड़ !''

...छुक छुक छुक छुक छुक...

                गाड़ी चली जा रही है। ...स्टेशन आ रहे होंगे। सवारियां चढ़ -उतर रही होंगी। हो सकता है, वे मुझे घूर रहे हों। लेकिन मैं आँखें नहीं खोल पा रहा हूँ। ...छुक छुक छुक छुक... । सब कुछ नाच रहा है दिमाग में। सचमुच नाच रहे हैं सादिक... । घर-घर। किसी का घर नहीं छोड़ रहे हैं। सबको न्योता दे रहे हैं -
 'हे भाई महलूद हो रहा है। आना जरूर। हे कलुआ की माई कलुआ को जरूर भेजना। सीताराम दद्दा जरूर आना। हे भौजाई नचकउना को भेज देना। धियान रखना ! हाँ ! बड़का बतासा आया है। बाजार से। मौलवी साहब आये हैं। सहर से। सब लोग आना।'

...छुक छुक छुक छुक छुक...

...छिन भर में पूरे गाँव की परिक्रमा करके बड़के भाई द्वारा बनवाई बंडी और धोती पहन ली सादिक ने। सिर पर गोली टोपी भी लगा ली। ...मौलूद शुरू। मौलवी साहब तखत पर बाकी सब नीचे बैठे हैं। सब का ध्यान मौलवी साहब की बातों पर और सादिक का ध्यान इस बात पर भी कि कहीं कोई कुकुर-माकर बताशा न जुठार दे। इसलिए एक डंडा भी रख लिया है उन्होंने। सब मौलवी साहब का मुंह ताक रहे हैं। सादिक मौलवी साहब की बगल में रखी बताशे की टोकरी ताक रहे हैं।

...छुक छुक छुक छुक ... ।

...सब खड़े हो गए। सब गा रहे हैं -
' या नबीऽऽ सलामलैकाऽऽ... ।'

बस इतना ही याद है सादिक को। अब क्या करें ? ...अब सिर्फ मुंह डोला रहे हैं वे।

...छुक छुक छुक छुक...।

गाना ख़तम। मौलूद ख़तम। ...अब सादिक एक-एक का नाम लेकर पुकार रहे हैं। बताशा बाँट रहे हैं। ...उलींच रहे हैं आह्लाद। जो नहीं आ सकते, उनके घर जा रहे हैं बताशा देने।

...छुक छुक छुक छुक...।

मेरी आँख खुल गयी। सब सो रहे हैं। बच्चा जाग रहा है। बच्चा मेरी ओर देख कर मुस्करा रहा है। ...क्या हो गया ? बच्चा अब चकित होकर मुझे घूर रहा है। अरे! अरे! बच्चा रोने वाला है। बच्चा मुझे देख कर चकित क्यों हुआ ? रुआंसा क्यों हो गया ?अनायास ही मेरा दाहिना हाथ अपनी बढ़ी हुई दाढ़ी छूने लगा। ...किस जाति का होगा बच्चा...? क्या धर्म होगा इसका...? अरे! अरे मैं पागल हो गया हूँ क्या...? ...मैं बच्चे की ओर देख कर मुस्कराता हूँ। शायद बदले में बच्चा भी मुस्करा दे। ...मुस्करा रहा है बच्चा। आँखों की जलन कम हुई। ...नींद आ गयी। ...आश्वस्ति की आख़िरी परछाईं बच्चे के ऊपर मंडरा रही है। परछाईं बच्चे को खाने के लिए बताशे और खेलने के लिए मिट्टी की मूरतें दे रही है। ...दृश्य बदल गया। ...अचानक अन्धेरा। बाहर भी अन्धेरा। भीतर भी अँधेरा। अँधेरे में गाड़ी चली जा रही है...।

'हाय अंधेरा...!'

तरह- तरह की आवाजें। अफरा-तफरी। लोग भाग रहे हैं। गिर रहे हैं एक-दूसरे पर। किसी बोगी से लोगों के चीखने की आवाजें आ रही है। औरतों की चीख... । बच्चों की चीख...। आदमी की चीख।

'गाड़ी में बम!
'
'किसने रखा बम?'

'कौन जाने किसने रखा बम?'

'नहीं मालूम ? फौरन पता करो, कौन किस जाति का है, कौन किस धर्म का है?'

...कोई कड़क कर कह रहा है। ...अब वे टार्च लेकर एक-एक का चेहरा देख रहे हैं अँधेरे में। ...हाय, मेरी दाढ़ी ! ...अब क्या हो ? अचानक टार्च मेरी ओर। टार्च की रोशनी में मैं किसी को नहीं देख  पा रहा हूँ। ...सब मुझे देख रहे हैं। ...सब मेरी दाढ़ी टटोल रहे हैं।

'किस जाति की है यह दाढ़ी ? किस मजहब की है ?'
-वही कड़कदार आवाज। ...मैं बता देना चाहता हूँ अपना नाम।

जाति और धर्म। खूब कोशिश करता हूँ, लेकिन मुंह से आवाज नहीं निकलती...।

'मार साले को !'

...मेरी नींद खुल गयी। ...अजीब सपना था। नींद खुली तो देखा कि सचमुच लोग मार रहे हैं एक आदमी को । उसके पूरे बदन पर केवल एक जांघिया है। लम्बा सांवला जवान। गले में ताबीज। लोगों का कहना है कि वह जेबकट है। ...धक धक धक धक .... । एक बुजुर्ग अपनी सदरी और कुरते के नीचे वाली बनियान की कटी हुई जेब दिखा रहे हैं। पूरे पांच हजार थे। हाईकोर्ट जा रहे थे मुक़दमा लड़ने। पुलिस वाले मार रहे हैं। यात्री भी मार रहे हैं। वह आदमी बिल्कुल नहीं बोल रहा है। उसकी नाक से खून बहने लगा। लोग मार रहे हैं और वह बर्थ के नीचे देख रहा है। अचानक वह गिरा और तेजी से बर्थ के नीचे फिसल गया। पुलिस वाले बर्थ के नीचे डंडा घुसेड़ते हैं, लेकिन वह लापता हो गया... । शायद मार के डर से उसने ऐसा किया। बच्चा रो रहा है। माँ चुप करा रही है। मैं उठ बैठा। ...कितनी बेरहमी से मार रहे थे लोग! ... क्या सचमुच वह चोर था ? ...उसके शरीर पर कपड़े क्यों नहीं थे ? ...एक भी शब्द वह बोला क्यों नहीं? लोग लगातार उसी की बातें कर रहे हैं। उसकी ताबीज के मुताबिक़ उसकी जाति और धर्म का अनुमान कर रहे हैं।
....धक धक धक धक ....

               गाड़ी चली जा रही है। भोर होने वाली है। गंदले तांबई उजाले में गाँव, पेड़, पोखरे, आदमी और जानवर नाचती हुई परछाइयों  की तरह झलकने लगे। ...गाड़ी सीटी दे रही है। कोई स्टेशन आने वाला है। रफ्तार कम हो गयी ।
...धक धक धक्क चींऽऽ!
अरे ! मैं आ गया ! मैं झांकता हूँ। ...हाँ यही तो है मेरे गाँव के पास का स्टेशन। चोर वाले प्रसंग में दिमाग इस तरह उलझा कि ध्यान ही नहीं रहा। दो ही मिनट रुकेगी गाड़ी यहाँ। मन होता है कि एक बार सब को देख लूं। शायद वे मुझे अब भी घूर रहे हों। बच्चा मुस्करा रहा हो शायद...। चोर शायद यहीं कहीं छिपा हो. लेकिन यथार्थ मजबूर करता है कि केवल अपने जूते देखो। जल्दी-जल्दी जूते पहनता हूँ। बैग और पानी की बोतल लेकर जल्दी से कूद गया मैं। ...गाड़ी के भीतर एक दुनिया थी। अब अपने गाँव के पास के इस छोटे से स्टेशन पर हूँ। यह एक अलग दुनिया है। कोई चायवाला नहीं। ....सहंजन के कुछ पेड़। कुछ कुत्ते। रेलवे के दो ऊंघते हुए मुलाजिम। क्रासिंग पार करके मैं अपने गाँव की पगडंडी खोजना चाहता हूँ। ...यह तो पक्की सड़क है। धुंधले उजाले में काली सड़क दिख रही है। तीन पहियावाले दो टेम्पो खड़े हैं। ...क्या ये मेरे गाँव जायेंगे ?

'हाँ बाबूजी । निजरब कराओ तो बीस रुपया ,नहीं तो दो रूपये। मगर टैम लगेगा। सवारी फुल होने पर चलेंगे।'

रात भर के सफर की थकान के बाद मुझे बीस रूपये ज्यादा नहीं लगे। टेम्पो चल पड़ा... फट फट फट फट ... । पूछने पर पता चला कि टेम्पो वाला मेरे गाँव का ही लड़का है, जो मुझे नहीं पहचान रहा था। मैं ने उस से पहला समाचार सादिक का पूछा। उस ने सादिक के बारे में जो कुछ बताया ,उससे एक ब्योरा कुछ इस तरह बनता है-

सादिक से दो गलतियां हुईं इस बीच। ...पहली गलती। ...नसीम का छोटा लड़का कई दिनों से अल्ला मियाँ की मूरत के लिए जिद कर रहा था। सादिक ने बहुत सोचा-बिचारा। ...कैसे होते होंगे अल्लामियां? आखिरकार उन्होंने मौलवी साहब की तरह बना दी अल्लामियां की मूरत।

किसी मौलूद में मौलवी साहब आये थे। मौलूद के बाद उन्होंने सादिक को बहुत फटकारा अल्लामियां की मूरत बनाने के लिए। कान पकड़कर उठावाया-बैठवाया और आइन्दा दाढ़ी रखने, नमाज पढ़ने और इस तरह की बेवकूफियों से बाज आने का हुक्म दिया।

...दूसरी गलती। एक बार गाँव में अकाल पड़ा। गाँव वालों ने साँड़ेबीर के चौरे पर अखंड कीर्तन बैठाया। कीर्तन होगा तो पानी बरसेगा। दिन भर होता रहा कीर्तन - ' सीता राम सीता राम ।' शाम को कीर्तनिया जवानों का स्वागत भांग-ठंडाई से हुआ। बाई-बतास से ग्रस्त बुजुर्गों ने अपनी-अपनी मजबूरियां बतायीं और सोने चले गए। अलबत्ता जाते-जाते समझा गये कि कीर्तन खंडित हुआ तो पुन्न के बदले पाप और लगेगा। रात में कीर्तनिया लड़कों को नशा हो गया। हाथों में करताल लिए -लिए वे सो गये। ...सब सो गये। ...क्या करें अकेले सादिक ? ...किसको बुलाने जायं इतनी रात। ...अब तो कीर्तन खंडित! सादिक ने फौरन सोये हुए लड़कों में से एक की करताल छीनी और लगे कीर्तन करने... । सुबह सब ने देखा। अकेले सादिक कीर्तन कर रहे हैं - ' सीता राम सीता राम।'

कीर्तन हुआ। एक दिन। दो दिन। तीन दिन। लोगों ने कई दिनों तक इंतज़ार किया। पानी नहीं बरसा। त्राहि-त्राहि मच गयी। हल-बैल, ट्रैक्टर सब खड़े हो गये। इस बीच तरह-तरह के लोग आये गाँव में। जीप से। कार से। हेलीकाप्टर से। लक-दक कपड़े। एक साधू जैसे नेता जी आये। उन्होंने गाँव वालों को अखंड कीर्तन करने के लिए कहा। गाँव वाले भड़क उठे-

'किया तो कीर्तन ! नहीं बरसा पानी। '

'कैसे किया?'

'कैसे किया!'

'ऐसे किया।'

बताया सब ने कि सादिक ने कीर्तन खंडित होते-होते बचा लिया।

'भाइयों बुरा मत मानियेगा। धर्म-कर्म में तो पवित्रता होनी ही चाहिए।'

'क्या मतलब ?'

'क्या मतलब सादिक मुसलमान है कि नहीं?'

'ये बात !'

गाँव वाले सारा रहस्य समझ गये। मुसलमान से कीर्तन कराओगे और समझोगे भगवान खुश...? आज नेता जी गाँव में ही रुकेंगे। सांझ को नौजवानों की सभा करेंगे और अपनी देख-रेख में करायेंगे कीर्तन। ...नेता जी पूरे पंडित थे। अगले दिन उन्होंने मन्त्र पढ़कर चबूतरे के आस-पास की जमीन पर तांबे के लोटे में आम की टेरी और दूब डालकर जल छिड़का और कहा कि इस भूमि में हिन्दू के अतिरिक्त कोई आया तो अनुष्ठान खंडित। फिर नहीं बरसेगा पानी। ...कीर्तन की बैठकी कराकर महराज जीप में सवार हुए और दूसरे गाँव के दौरे पर निकल गए।

...सादिक हमेशा की तरह सारा दिन सिंवान में थे। कुछ अपने पशुओं के संग कुछ दूसरों के। वे दुबारा अनुष्ठान और इसके नियम-क़ानून नहीं जान पाए थे। शाम को पशुओं को खूंटे तक पहुंचाया,जल्दी से मिट्टी के तेल वाली फोन्नोगैस जलाई और पहुँच गए कीर्तनिया लड़कों के पास। मटुकमन करताल फ़ेंक कर खड़ा हो गया। वह सादिक की बांह पकड़ कर खींचते हुए लक्ष्मण-रेखा के पार ले गया। इस बीच सादिक पूछते रहे -
' का बात है हो बचऊ? कुछ समझ में नाहीं आय रहा। का कौनौ खास बात...?'

'देखो चचा ! धरम-करम का काज कुछ अलग होता है। अभी तक हम लोग इस बात को नहीं समझ पाए थे। अब समझ में आ गया है। अब तक जो हुआ, सो हुआ, मुदा आगे से समझ लो। अब आज का अनुष्ठान तो खंडित ही हो गया। हाँ, आइन्दा धियान रखना !' - तमतमाया मटुक बोला !'

सादिक फटी-फटी आँखों से मटुक का चेहरा देख रहे थे। तब तक मटुक फिर बोला - ''ले जाओ अपनी फोन्नोगैस । हमें इसकी जरूरत नहीं है और यह भी समझ लो चाचा कि अब हम तुम्हारी चतुराई समझ गये हैं। बताशा में चोरी से थूक कर फिर उसे हमें खिलाते हो चोरी-चोरी धरम भरिस्ट करते हो हम लोगों का? अब बहुत मुंह मत खुलवाओ। इसी में खैरियत है कि चले जाओ हियाँ से।'

लड़के ने बताया कि सादिक वहां से चल तो पड़े, लेकिन अपने घर का रास्ता नहीं खोज पाए। फोन्नोगैस लिए वे सिंवान में घूमते रहे सारी रात...। सबेरा होने पर बड़े भाई हाथ पकड़ कर घर ले आये। सुबह के उजाले में फोन्नोगैस सनसना रही थी। उससे रोशनी नहीं निकल रही थी। शीशे में कालिख भर गयी थी। अब सादिक बिल्कुल नहीं बोलते। कहीं नहीं जाते। ऐसा लगता है कि वे लगातार कुछ देख रहे हैं, लेकिन कुछ नहीं देखते। किसी को नहीं पहचानते...। बड़े भाई महीने में एक बार सिर के बाल मुंड़वा देते हैं और लम्बी सफेद दाढ़ी के होठों के बाल कैंची से चुनवा देते हैं।

मेरा गाँव आ गया है। गलियों में बिजली के खम्भे खड़े हैं। उनमे जलते बल्ब निस्तेज लग रहे हैं। सुबह की अजान सुनाई पड़ रही है। मंदिर का घंटा घनघना रहा है। माहौल में गोबर, भूसा, हवन और लोहबान की मिली-जुली गंध तैर रही है। मेरा मन होता है, लौट चलूँ। माटी की छवियाँ टूट चुकी है... 
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[''शब्दयोग'', नयी दिल्ली के प्रवेशांक में ''आश्वस्ति की आखिरी परछाईं'' शीर्षक से प्रकाशित ]

मंगलवार, 8 जून 2010

बाबा की उघन्नी- शिवशंकर मिश्र

                 बारात आयी भी और चली भी गयी। सारा तामझाम हुआ। सारी रस्में पूरी की गयीं।खूब झाँय-झाँय हुआ। खूब झिकझिक हुई। आखिर में बैन करके रोती सियादुलारी भी विदा हो गयी, लेकिन बाबा की चारपाई जहां थी, वहीँ रही।पूरब के दालान में ऐन भंडारघर के सामने। पता नहीं कब से बिछी है यह चारपाई यहाँ... । बाबा के इकलौते पुत्र हीरालाल जी तिवारी कभी-कभी हिसाब करते हैं, तो पाते हैं कि पिछले तीस बरस से बिछी है यह चारपाई यहाँ। इसी पर लेटे रहते हैं बाबा। उठ-बैठ नहीं पाते। शौच आदि के लिए परिवारीजनों पर निर्भर रहते हैं। इन तीस वर्षों में बहुत कुछ बदला। पूरी दुनिया ही बदल गयी। बाबा की अपनी दुनिया थी। अपना परिवार...। अपने खेत... । यह दुनिया भी बदली। दुआर पर बैल कम हो गए। ट्रैक्टर आ गया और यह परिवार ऊपर से अमीर और भीतर से गरीब हो गया। घर में कई बच्चे पैदा हुए और बड़े हो गए। कई बारातें आयीं और गयीं। बाबा की चारपाई अपनी जगह ही रही। यहीं से लेटे-लेटे बाबा सब कुछ देखते-सम्हालते रहे...। कल रात भी वे लेटे-लेटे देखते रहे, जितना देख सकते थे। सुनते रहे, जितना सुन सकते थे। बोलते रहे,जितना बोल सकते थे, हमेशा की तरह। बाजे-गाजे के बीच उनकी आवाज सुनायी नहीं पड़ रही थी।बीच-बीच में संतोख बाबा के पास आता। उनके कान के पास मुंह ले जाकर कुछ कहता और बाबा कांपते हाथों से भंडारघर की चाबियों का गुच्छा उसे थमा देते। जो भी मेहमान आये और गये, सब बाबा के पास आये। नाम बता कर पैलगी की। बाबा ने सब को कांपते हाथों से छुआ। विह्वल हुए। आशीर्वाद दिया और दो-एक मार्मिक बातें कीं, जो बड़ी मुश्किल से लोगों की समझ में आयीं।

                 कल सांझ से आज सबेरे तक कितनी गहमा-गहमी थी यहाँ और अब आधी रात जैसा सन्नाटा पसरा है भरी दोपहर में। लू चल रही है। दुआर पर शामियाना फड़फड़ा रहा है। लाल फाइबर की कुर्सियां बेतरतीब पड़ी हैं। दालान में परिवार के मर्द और घराती मेहमान सोये हैं। उनके खर्राटे सुनाई पड़ रहे हैं और हवा की साँय-साँय। औरतें भीतर हैं, लकड़ी के इस मेहराबदार फाटक के भीतर। मेहराब और किवाड़ पर मांगलिक अल्पनाएं और बारीक बेलबूटे खुदे हैं। मेहराब, साह चौखट, किवाड़ और खम्भे अलकतरे से रंगे हैं। चूने से पुती सफेद दीवार पर फाटक के दोनों ओर औरतों ने पिसे चावल, हल्दी और सिन्दूर के घोल से हथेलियों की छाप मार दी है। बीच-बीच में औरतों के रोने-झगड़ने की आवाजें किवाड़ के पार आ जाती हैं। अभी भोर तक वे गीत गा रहीं थीं। सारी रात गाती रहीं वे। पंडित मन्त्र पढ़ते रहे। औरतें बेटी के गवन के गीत गाती रहीं :

                  ...ऊसर मिट्टी को गोंड़-गोंड़ कर हमने ककड़ी के बीज बो दिए...। पता नहीं मीठी होंगी ककड़ियां या कड़वी ...। पूरे नगर में घूम-घूम कर पिता ने वर खोजा है तेरे लिए। नहीं मालूम क्या लिखा है तेरी तकदीर में...।

                              गहरा अवसाद जगाने वाली धुनें। न ढोल न मजीरा। बारात  खाना खाने बैठी थी, तो औरतों ने गारी के गीत गाये थे। उन गीतों में बजा था ढोल-मजीरा। फिर नहीं बजा। सारी रात कर्मकांड होता रहा। औरतें गीत गाती रहीं...।अब लड़-झगड़ रही हैं दोपहर में। बच्चों का एक बड़ा झुण्ड नीम तले तिकोनी बैलगाड़ी पर खेल रहा है। सब इसी परिवार के बच्चे हैं। सब पांच साल के भीतर। वे कभी तिकोनी बैलगाड़ी के अगले छोर पर चढ़ जाते हैं, तो पिछला उठ जाता है। पिछले पर चढ़ते हैं, तो अगला उठ जाता है। यह उन्हें जादू जैसा लग रहा है।ज्यादा छोटे बच्चे बैलगाड़ी पर नहीं चढ़ पा रहे हैं। वे हाथ उठाकर बड़े बच्चों से गाड़ी पर चढ़ा लेने की शब्दहीन प्रार्थनाएं कर रहे हैं। रो भी रहे हैं। बड़े बच्चे अपने में मस्त हैं। लू चल रही है। नंग-धड़ंग बच्चे लू से बेअसर हैं। वे खेल रहे हैं और शोर मचा रहे हैं। रामलली सबसे अलग खेल रही है। पहले वह मंदिर के पिछवाड़े सुबकती रही देर तक, फिर आम के बाग की ओर चली गयी थी। कच्चे आम तोड़ने का विफल प्रयास करके लौटी है और अब बैलगाड़ी के पास खड़े ट्रैक्टर पर बैठ कर ट्रैक्टर चलाने का खेल खेल रही है। थोड़ी ही देर में वह ऊबने लगी। आज हर खेल थोड़ी ही देर में बेकार लगने लगता है। फिर सियई दीदी का बैन... । ...काहे भेज दिया गया दीदी को, जब वे इतना रो रही थीं...?डकार आई। डकार में केवड़े की गंध। अच्छी नहीं लगी गंध। दो दिन से केवड़े के फूल डाले गये हैं कुंए में। कल अच्छी लगी थी पानी में केवड़े की गंध। आज अजीब-अजीब हो रहा है मन उसी गंध से।

अचानक उसे लगा कि बाबा पुकार रहे हैं। ...सियई दीदी तो गयीं। ...अब किसे पुकारेंगे बाबा ? ...अब कौन सुनेगा छिन-छिन पर बाबा का अढ़ौना? वह दौड़ कर दालान की ओर गयी। सब सोये हैं। लोगों के मुंह खुले हैं। किसी के मुंह में मक्खी घुस गयी तो...?रामलली चिंतित हुई। वनस्पति तेलों के भभके उठ रहे हैं दालान में। रामलली को उबकाई महसूस हुई। बाबा जाग रहे हैं।

' छ्बललियाऽऽ छ्बललियाऽऽ अरे का नाम ? का नाम ? छ्बललियाऽऽ।'
-कफ से जूझती खरखराहट भरी आवाज हाथ काँप रहे हैं। पैर कांपते भी नहीं तीस साल से।

'नाम काहे बिगाड़ते हो बाबा? रामलली कहो रामलली। छ्बलली कहोगे तो नहीं बोलूंगी हाँ।'
- रामलली ने बाबा के मुंह पर बैठी मक्खियों को उड़ाते हुए कहा।

'हाँ... हाँ...का नाम उघन्नी। हाँ उघन्नीऽ। उघन्नी खोजो बिटियाऽऽ।'

-ऐसे ही बोलते हैं बाबा। एक बात को बीस बार। सबका नाम भूल जाते हैं और भूले हुए नाम वाली खाली जगह में कोई दूसरा नाम इस तरह बैठ जाता है कि हट ही नहीं पाता  बाबा के दिमाग से। चारपाई के नीचे से सुतली में बंधी चाबियों का एक बड़ा गुच्छा रामलली ने उठाया और बाबा को थमा दिया। कांपते हाथों से बाबा ने चाबियों का गुच्छा थामा। आँखों के पास हाथ ले जाकर चाबियों का निरीक्षण करना चाहा। आँखें साथ नहीं दे पायीं पूरी तरह। उँगलियों से टटोल कर चाबियों की पहचान की बाबा ने। माथे की सिकुड़नें   कम हुईं। वनस्पति तेलों की गंध के भभके उठ रहे हैं। मक्खियाँ भिनभिना रही हैं। बाबा के मुंह पर अब नहीं बैठ पा रही हैं मक्खियाँ। रामलली उड़ा रही है उन्हें। बाबा ने चाबियों का गुच्छा मुट्ठी में कस कर पकड़ रखा है। धुंधली आखें पता नहीं क्या देख रही हैं। नीम तले बच्चे शोर मचा रहे हैं। बीच-बीच में औरतों के रोने-झगड़ने की आवाजें और हवा की साँय-साँय सुनायी पड़ जाती है। बाबा ये आवाजें नहीं सुन पाते। रामलली सुन रही है हर आवाज। उसे कुछ लेना-देना नहीं इन आवाजों से। दीदी के जाने से आज उसका आज उसका महत्त्व बढ़ गया। अभी थोड़ी देर पहले वह दीदी के वियोग में सब कुछ भूल गयी थी। अब दीदी के जाने से बढ़े हुए महत्त्व के एहसास में मगन है। ...अब बाबा दीदी को नहीं बुलायेंगे। अब तो रामलली ही बची है बाबा की टहल के लिए। वह एकटक बाबा का चेहरा देख रही है और मक्खियाँ उड़ा रही है। बाबा के माथे की सिकुड़नें फिर बढ़ने लगीं।

'का है बाबा?'

'का नाम का नाम...'

'रामलली रामलली।'

- बाबा का वाक्य पूरा नहीं हुआ था कि रामलली बोल पड़ी।

'वो नहींऽ वो नहींऽ। लेखाऽ लेखाऽ लेखा दो। जाओ बुला लाओ का नाम संतोख संतोख संतोख को।'
 - हाथ काँप रहे हैं। कफ से जूझती आवाज बड़ी मुश्किल से निकल रही है।

...लेखा ? ...लेखा कहाँ मिलेगा ? रामलली सोच में पड़ गयी। ...संतोख कक्कू कहाँ गये? ...दालान में तो नहीं हैं। ...उत्तर की अटारी पर तो नहीं हैं? पूरे घर में मिठाइयों और बासी पकवानों के टुकड़े गिरे हैं। हर जगह मक्खियाँ भिनभिना रही हैं। हर कमरे में लोग उल्टे-सीधे लेटे हैं। सब सो रहे हैं। छोटकी काकी आँगन से सटे अपने कमरे में कराह रही हैं। माई आँगन में खड़ी है। काकी और माई में कुछ कहा-सुनी चल रही है।

'इस घर में कोई मरे चाहे जरे, किसी को क्या मतलब ? सबको अपनी-अपनी पड़ी है।'
 - अपने कमरे में कराहती हुई काकी बोल रही थीं।

'ए नचकऊबहू घर को दोख न लगाओ हाँ ! दुआर पर चार आदमी बैठे हैं, तो लीला दिखा रही हो। जब भगवान ने मेहरारू का तन दे ही दिया, तो यह सब तो लगा ही रहेगा।'
 - चिंचियाती हुई माई का चेहरा बहुत खराब लगा रामलली को। कुछ देर वह खड़ी रही आँगन में। अचानक बाबा की बात का ध्यान आया। दौड़ते हुए वह उत्तर की अँटारी की सीढियां चढ़ने लगी। आखिरी सीढ़ी पर पहुँच कर अटक गयी। क्या माँगा है बाबा ने ? उसने खूब कोशिश की, लेकिन नहीं याद आया। क्या कहेगी कक्कू से कि बाबा ने क्या माँगा है ? ...कह देगी बाबा ने बुलाया है।

'काकी हो ! काकी हो ! किवाड़ खोलो। कक्कू को बाबा बुला रहे हैं।' 
- वह किवाड़ पीट रही थी और चिल्ला रही थी।

'भाग जा नहीं तो उखाड़ लूंगी झोंटा। बड़ी आयी बाबा की दूती बनकर। मांग रहे होंगे, जो मांग रहे होंगे। इतनी बड़ी पलटन पड़ी है घर में। और कोई नहीं है ? अभी तो जाकर सोये हैं किसी तरह।' 
- दरवाजा खोलते ही काकी झपट पड़ीं। उनका आखिरी वाक्य पूरा होते-होते वह नीचे की आखिरी सीढ़ी उतर रही थी। फिर अटक गयी वह। ...क्या कहेगी बाबा से ? बड़ी देर तक वह वहीँ खड़ी रही मुंह लटकाए। छोटकी काकी कराह रही हैं। माई से उनकी कहा-सुनी चल रही है। रामलाली को डकार आई । फिर केवड़े की गंध...। पेट से निकल कर मुंह में समा गयी गंध। गहरी उदासी भर गयी मन में...। सब भूल कर वह मकान के पिछवाड़े उल्टी लंगड़ी का खेल खेलने चली गयी। जूठी पत्तलों और कुल्हड़ों का ढेर लगा था वहां। वनस्पति तेलों और बासी पकवानों की महक हवा में उड़ रही थी। कुत्ते पत्तलें चाट रहे थे। वे गुर्रा रहे थे और पत्तलें चाट रहे थे। रामलली उल्टी लंगड़ी का खेल खेल रही थी। अचानक एक कुत्ता दूसरे पर टूट पड़ा। रामलली थोड़ी ही देर खेल पायी थी कि कुत्तों ने एक दूसरे को काट खाया। वह डर गयी। भीतर चली गयी वह डरकर। काकी और माई की कहा-सुनी जारी है। आये दिन इस बड़े परिवार की औरतों में झगड़े होते रहते हैं। ज्यादातर झगड़े खाना बनाने के लिए। एक चूल्हे पर इतने लोगों का खाना...। कौन धिके उपलों और लकड़ी की आंच में...? लेकिन खाना तो बनाना ही पडेगा...। बिना खाना खाए कोई कैसे जियेगा...? बात ज्यादा बढ़ने पर कभी फैसला कर दिया था हीरालाल जी ने। आज भी चलता है वही फैसला। पन्द्रह -पन्द्रह दिन के लिए दो-दो औरतों की पारी बाँध दी थी उन्होंने। इस समय नचकऊबहू की पारी चल रही है खाना बनाने की। लेकिन वह बीमार है। माई समझती है कि वह नखरा दिखा रही है। रामलली पल भर खड़ी रही आँगन में। उसे लड़ते हुए कुत्तों के चहरे याद आये। वह दालान की ओर भाग चली। ...क्या माँगा है बाबा ने ? कदम फिर रुक गए... ।

             सांझ हो गयी है। शामियाना उखड़ गया है। औरतें मकान के पिछ्वाड़ेपोखरे के घाट पर चौथी छुड़ा रही हैं। बीच-बीच में उनके गीतों के बोल सुनाई पड़ते हैं-

'बोये न होतिउँ सरसइया त का दइ पेरउतिउँ होऽ।
जनमी न होतिउँ बिटीवा त का दइ पुजतिउँ होऽ।'

...सरसों न बोई होती, तो क्या देकर तेल पेरातीं ...?
...बेटी का जन्म न हुआ होता, तो क्या देकर पूजा करतीं...?'

वे पोखरे की पूजा कर रही हैं...। ज्यादातर रिश्तेदार चले गए हैं। जो रुके हैं, उनकी चारपाइयाँ दुआर पर बिछी हैं, जहां अभी कुछ समय पहले शामियाना तना था। बाबा की चारपाई अपनी जगह। ऐन भंडारघर के सामने। संतोख लेखा दे रहा है। बाबा के मुंह की ओर बैठा है मोढ़े पर। लालटेन जल रही है दालान में। बिजली नहीं है।

'बिजली काहे नहीं आ रही है हो ?' - दुआर पर बैठे रिश्तेदारों के प्रश्न ।

'बिजली नहीं आयेगी महराज। चोर तार काट ले गए हैं। तीन किलोमीटर तक । तब से अँधियर घुप्प। हाँ! पूरा ऐकेट - पैकेट अंधियर घुप्प ।'

-हीरालाल जी रिश्तेदारों की खातिर -तवज्जो में लगे हैं, दुआर पर, नीम तले। हवा में अब भी जलन है। यहाँ रोशनी का कोई इंतजाम नहीं है। लोग अँधेरे में बैठे हैं। दालान में लालटेन जल रही है,बाबा की चारपाई के पास। बाबा लेखा ले रहे हैं। हाथ काँप रहे हैं। होंठ काँप रहे हैं। आवाज बड़ी मुश्किल से निकल रही है। बातें मुश्किल से समझ में आ रही हैं। संतोख की मुसीबत है आज। हर बात कान में बतानी पड़ रही है । बार-बार उठा - बैठक। एक-एक चीज का लेखा ले रहे हैं बाबा। संतोख का दिमाग चकरा रहा है। एक तरफ कर्ज का बोझ, दूसरी तरफ बाबा का लेखा...।

'सोनहुलाऽ सोनहुलाऽ सोनहुलाऽ कितने थान ? कितने थान ?' - बाबा जानना चाह रहे हैं कि सोने के कुल कितने गहने बने। संतोख का दिमाग चकरा रहा है। वह निर्णय नहीं ले पाता कि क्या कहे, तब तक बाबा गिनाने लगते हैं अपने समय के गहनोंके नाम। ऐरन, बाजू बैरक्खी, हँसुली, हवेल, झुमकी, माथबेंदी और भी पता नहीं क्या-क्या ? संतोख के मुंह से कभी हाँ निकल जाता है, कभी ना। फिर कौन सी चीज कितने भर। यानी कौन चीज कितने तोला, कितने माशा। अब सोने का रेट। ...क्या बता दे संतोख ?

उसने तीस साल पहले की सोने की कीमत का अनुमान किया... । रिश्तेदार चौंक गए। संतोख ने सोने की जो कीमत बतायी, वह प्रचलित कीमत से इतना कम थी कि रिश्तेदार विश्वास नहीं कर सके। अब चांदी। फिर गहनों के नाम। करधन, छागल, पाँवपैजनिया, लच्छा - पटरी, इसी तरह और भी बहुत कुछ। अब फटफटिया। फटफटिया...? मोटरसाइकिल। हर चीज का दाम तीस साल पहले की कीमत का अनुमान करके बताया जा रहा है। दहाई सैकड़ा में। घी, चीनी, कपड़ा, पतरी-दोना, करई-कसोरा। कुछ भी छोड़ नहीं रहे हैं बाबा। बहुत दिमाग लगाना पड़ रहा है संतोख को। हज़ार की चीज सैकड़ा में। सैकड़ा की चीज दहाई में। दहाई की इकाई में। बाबा की आवाज बड़ी मुश्किल से निकलती है। संतोख  को तेज बोलना पड़ता है। नीम तले  चारपाइयों पर बैठे रिश्तेदार अब आपस में बातें नहीं कर रहे हैं। वे बाबा और संतोख की बातें सुन रहे हैं चकित होकर। तीस साल पहले की कीमतें रिश्तेदारों के दिमाग में अँट नहीं पा रही थीं । बाबा के दिमाग में आज की कीमतें नहीं अँट सकतीं। बेटी का ब्याह अब लाख के नीचे हो ही नहीं सकता और बाबा लाख का लेखा सुन नहीं सकते।

'अब जोड़ोऽ। जोड़ो अब। सामलाट लेखाऽ। सामलाट लेखाऽ।' - सब चीजों का लेखा मिल जाने पर बोले बाबा। ...जोड़ हज़ार में होना चाहिए। लाख की गिनती आई कि बाबा की मौत हो सकती है। बाबा की मौत...। काँप उठा संतोख इस कल्पना से... । बाबा के बिना यह घर नहीं चल सकता, यह सामूहिक विश्वास उस परिवार में प्रचलित था। इस विश्वास का अपना आधार था। बाबा इस परिवार के आधार पुरुष हैं। बाबा के इकलौते पुत्र हीरालाल जी। हीरालाल जी के सात पुत्र और तीन पुत्रियाँ। हीरालाल जी के हर पुत्र के चार-चार, पांच-पांच पुत्र। पुत्रियाँ अलग। इस तरह इस विशाल संयुक्त परिवार के मूल पुरुष बाबा ही हैं। बाबा ने ही खरीदे हैं इतने सारे खेत। कैसे खरीदे , यह हीरालाल जी जानते हैं। कभी-कभी हीरालाल जी बाबा के त्याग के किस्से सुनाते हैं। किस तरह बाबा एक धोती खरीद कर उसके दो टुकड़े करवाते और उसी से साल भर काम चलाते थे। किस तरह बाबा ने अब तक केवल एक मिर्जई, पांच सादी और एक रुइहा बंडी पर एक सौ दस साल का जीवन काट दिया। पूरे एक सौ दस साल गिनकर बताते हैं हीरालाल जी बाबा की उम्र। हाँ ब्याह-बारात के लिए दो कलीकाट कुर्तों और दो जोड़ी चमौधा जूतों की भी जरूरत पड़ी। विवादित खेतों पर कब्जा करने के लिए लाठी चलानी पड़ी। चलाई लाठी बाबा ने। ऐसी चलायी कि नामी लठैत हो गए। उसी बीते पराक्रम के प्रतीक रूप में मोटी  लाठी सिरहाने रखी जाती है, जिसे अब बाबा नहीं उठा पाते। जिन दिनों बाबा की नयी उम्र थी, कुछ लोग आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे। बाबा की समझ में यह सब ठीक नहीं था। हाकिम-हुक्काम से बैर करने पर नुक्सान ही होगा... । वे जमीन खरीदने में लगे रहे। मिडिल पास करते ही हीरालाल जी को सरकारी नौकरी मिल गई थी। वे दूर-दूर तक साइकिल से जाते। नौकरी करते। बाबा की ही तरह एक धोती के दो टुकड़े करवाते। उसी से साल भर काम चलाने की कोशिश करते और हर महीने पूरी तनख्वाह बाबा के हाथों में रख देते। बाबा की आँखें छलछला आतीं... । इसी किफायतशारी के चलते इतना बड़ा मकान बनवाया है बाबा ने, कचौड़ीदार। भीतर की दीवारें मिट्टी की और बाहर की ईंट की। बड़ा सा लकड़ी का मेहराबदार फाटक, खम्भेदार दालान। दालान के उत्तर में भंडारघर।इसी के सामने रहती है बाबा की चारपाई। भंडारघर की चाबियों का गुच्छा बाबा खुद अपने पास रखते हैं। तब भी रखते थे, जब दादी जीवित थीं और बाबा दूर -दूर तक जाकर खेत खरीदते थे और अब भी, जब कि बाबा उठ-बैठ भी नहीं पाते। यों इस गुच्छे की हर चाबी नकली है , लेकिन सिरहाने रखी लाठी और चाबियों के इस गुच्छे के बल पर ही बाबा की संप्रभुता टिकी है। दालान में ठीक भंडारघर के सामने चारपाई पर पड़े रहते हैं वे। ऋतुएं आती हैं और जाती हैं, बाबा की चारपाई यहीं रहती है। इसी पर होती हैं उनकी सभी क्रियाएं। हाथ कांपते हैं। पैर कांपते भी नहीं। आँखें कम देखती हैं। कान कम सुनते हैं, फिर भी बाबा इस घर को चला रहे हैं। पिछले तीस सालों से चला रहे हैं इसी तरह। बिस्तर पर पड़े-पड़े वे किस खेत में क्या बोया गया और किस काम में कितना खर्च हुआ, इन सब बातों का ब्योरा और लेखा लेते आ रहे हैं।

'सामलाट लेखाऽ सामलाट लेखाऽ सामलाट लेखाऽ बोलो। बाबा का प्रश्न सुनकर संतोख चौंक गया। वह भी शामिलात लेखा यानी कुल खर्च जोड़ रहा था। तीन लाख के अल्ले-पल्ले जा रहा था कुल खर्च। उसका दिमाग बुरी तरह चकरा रहा था। लाख तो लाख बाबा दस हजार का खर्च सुनते ही असहाय हो जाते हैं। फिजूलखर्ची के चलते परिवार के सत्यानाश की आशंका से मूर्च्छित होने लगते हैं वे। इसीलिये भंडारघर की चाबियों का गुच्छा अपने पास रखते हैं। शादी-ब्याह का खर्च अब लाख से कम नहीं होता और बाबा को लाख के खर्च की सूचना देना प्राणघातक है। इसीलिये कभी तीस साल पहले संतोख ने हीरालाल जी की सहमति से भंडारघर का ताला बदल दिया था। अचानक एक दिन असली चाबियाँ बेकार हो गयीं। नकली चाबियाँ काम आने लगीं। हर रोज संतोख बाबा से चाबी माँगने का नाटक करता है। आज महँगा पड़ रहा है नाटक। बरात विदा होते ही वह खुद जोड़ने लगा था कुल खर्च और कर्ज। ...औरतों के गहने-गिरौं हैं।किसान क्रेडिट कार्ड से सारा पैसा निकाला जा चुका है। ...एक लाख के लगभग दुकानदारों का हो गया है। बेचेने के लिए केवल गेहूं बचा है और गेहूं अभी बहुत सस्ता है। ...गेहूं बेचकर भी क्या पूरा कर्ज अदा हो सकता है ? भूमि विकास बैंक और सहकारी समिति वाले अलग चक्कर लगा रहे हैं। रोती-झगड़ती औरतें,लेखा माँगते बाबा...। नमस्कार करते दुकानदार।चोरों की तरह किसानों को खोजते बैंक वाले...। तहसील वाले...। दुआर पर लेटे बड़के समाधी- सब संतोख के दिमाग में नाच रहे हैं। लालटेन का शीशा गंदा हो रहा है। लौ अभी तेज़ जल रही है।

'चलो एक बोझ उतर गया, हाँ बोझ। उतर गया बोझ। आगे से इसी तरह काम करो हाथ बाँध कर। हाँ! समझे ! हाथ बांधकर। असाढ़। असाढ़ सिर पर है। समझे? असाढ़। खेती में भी तो लागत लगेगी। खेती में। हाथ बांधकर काम करो, नहीं तो बिक जाओगे। हाँ...।'

 -बाबा के होठों पर बारीक मुस्कान तैर रही है। लालटेन का शीशा गंदा होता जा रहा है। लौ बढ़ती जा रही है। संतोख मोढ़े से उठा तो उसे चक्कर सा महसूस हुआ। दीवार का सहारा लेते हुए वह उत्तर की अटारी की ओर चला गया। हीरालाल जी रिश्तेदारों के संग बैठे हैं नीम तले अँधेरे में। हवा के झोंके अब भी चल रहे हैं। नीम की पत्तियाँ अँधेरे में सिहर रही होंगी। कोई पक्षी बीच-बीच में पंख फड़फड़ाता है।बेटी का ब्याह किफायत से हो गया, इस ख़ुशी में बाबा मुस्कराते रहे कुछ देर। अचानक धुंधली आँखों ने बाहर  का अंधेरा देख लिया।

' छ्बललियाऽ छ्बललियाऽ! संतोख संतोख! अरे का नाम। का नाम उघन्नी। उघन्नीऽ उघन्नीऽ उघन्नीऽ।'

 - बाबा लगातार पुकार रहे हैं। एक ही नाम कई-कई बार। रामलली सो गयी थी शायद। संतोख उत्तर की अटारी की ओर चला गया था। हीरालाल जी के बाकी छः बेटे और उनके बेटों के बेटे थक  कर सो गये थे। हीरालाल जी लाठी के सहारे उठे। दस साल हो गये उन्हें सरकारी मुलाजमत से रिटायर हुए। जिस दिन रिटायर हुए, उसी दिन से गठिया के मरीज हो गये। उठ गये, तो बैठ नहीं पाते। बैठ गये, तो उठ नहीं पाते। जैसे ही पैरों ने इजाजत दी, वे दौड़ पड़े। बाबा हीरालाल जी को देख कर जीते हैं और हीरालाल जी बाबा के जीने के लिए जीते हैं, यह मान्यता थी।

'का है बाबू?' - बाबा के कान के पास मुंह ले जाकर हीरालाल जी ने पूछा।

'दादूऽ दादूऽ उघन्नीऽ। उघन्नीऽ खोजो। उघन्नीऽ।'

-बाबा घबराये से लगे। हाथ काँप रहे हैं। नथुने फड़क रहे हैं। हीरालाल जी ने बाबा के सिरहाने से चाबियों का गुच्छा उठाया और उनके कांपते हाथों में थमा दिया। सुतली से बंधा भंडारघर की असली चाबियों का गुच्छा, जो असली होने के कारण बेकार हो गया है। बाबा के दिमाग के भीतरी हिस्से में एक अलग दुनिया है...। वहां ट्रैक्टर की कीमत तीन हजार है और इस खिलौने के लिए यह भी ज्यादा है। खेती की सारी उपज ट्रैक्टर की किस्त   अदा करने में चली जाती है, ज़माना बदल चुका है और नौकरी के  अवसर  कम हो गए हैं, ये खबरें नहीं पहुँची हैं अभी उस दुनिया में। घर के कई लड़कों ने बी.ए., बी.एस-सी. कर लिया है, लेकिन बाबा की दुनिया में कोई मिडिल नहीं पास है। मिडिल किया होता,तो मुलाजमत न मिल जाती अपने हीरालाल की तरह...। इस दुनिया में चलती हैं ये चाबियाँ। और कहीं नहीं है इनका काम। बेकार की चीज हो गयी हैं ये। बाबा के लिए बड़े काम की है इस गुच्छे  की हर उघन्नी-हर चाबी। हुआ यह कि यौवन के पराक्रमी बाबा अब, जबकि वे जीवन के एक सौ दस  शरद पार कर चुके हैं, तीन चीजों से डरने लगे हैं - अलगौझी से, भूतों से और मौत से। अलगौझी की समस्या को बाबा लाठी और उघन्नी के सहारे हल करते हैं। हीरालाल जी के सात पुत्रों और उनके पुत्रों के पुत्रों के बीच आये दिन छोटी-छोटी बातों पर कहा-सुनी होने लगती है। झगड़े होते हैं और हर झगड़े का समाधान अलगौझी के प्रस्ताव के साथ होता है। यों तो बाबा कम सुनते हैं, लेकिन कभी-कभी उनके कानों तक अलगौझी की उत्तेजना भरी बातें आ ही जाती हैं। ऐसे अवसरों पर विचलित हो जाते हैं बाबा। वे मूर्छित न हो जाएँ, इससे बचने के लिए हीरालाल जी के दो पुत्र बाबा को सहारा देकर बैठाते हैं। तीसरा लाठी थमाता है। अलगौझी का नाम लेने वाले को खुद ही चलकर बाबा के पास आना पड़ता है। बाबा कांपते हाथों से लाठी पकड़ते हैं। तीसरा लाठी उठाता है। अलगौझी का नाम लेने वाले की पीठ पर लाठी छुआई जाती है। सारे अंतर्विरोध मुल्तवी हो जाते हैं थोड़ी देर के लिए। सब की चिंता एक, कहीं मूर्च्छित न हो जाएँ बाबा। इस दौरान बुरी तरह कांपते रहते हैं बाबा के हाथ, होंठ  और नथुने। बड़बड़ाते रहते हैं वे थोड़ी देर तक- 'भीख, भीख, भीख मांगोगे ! भीख हाँ! भीख भी नहीं मिलेगी। कोई दरवाजे पर खड़ा नहीं होने देगा। हाँऽ।'

इस तरह लाठी और उघन्नी के सहारे बाबा अलगौझी की समस्या का समाधान करते आ रहे हैं। लेकिन इधर एक नयी समस्या खड़ी हो गयी है। अन्धेरा होते ही भूत दिखने लगते हैं बाबा को। उनके सारे दोस्त और दुश्मन मर गए हैं। अँधेरे में उनकी छवियाँ तैरती हैं।इसीलिये दिन ढलते ही बाबा कसकर पकड़ लेते हैं उघन्नी। सुतली से बंधी लोहे की पुरानी चाबियों के उस गुच्छे की छुअन से भूत पास नहीं आयेंगे, बाबा का विश्वास। अन्धेरा गहरा हो गया था। अब उघन्नी मुट्ठी में आ जाने से भूतों का भय जाता रहा। थोड़ी ही देर में बाबा के खर्राटे सुनाई पड़ने लगे। नीम तले बैठे रिश्तेदार बड़ी देर तक कौतुकपूर्वक बाबा को देखते रहे। अब वे मौसम और जमाने की बातें कर रहे हैं और यह कि किसने कितना दहेज लिया या दिया। कौन कितना कुलीन ब्राह्मण है या किसके खेत में गेहूं की उपज ज्यादा हुई। औरतों के रोने-झगड़ने की आवाजें फिर बाहर आने लगीं। इन आवाजों पर आम तौर पर ध्यान नहीं दिया जाता। घर-घर की बातें हैं ये। बच्चे सो गए हैं। हीरालाल जी के सातों बेटे और उन के बेटों के बेटे इधर-उधर सोये हैं अँधेरे में। कुछ रिश्तेदार भी सो गये हैं। जागने वाले रिश्तेदारों की खातिर-तवज्जो में हीरालाल जी लगे हैं।

गाँव से बाहर होने के कारण इस घर में रात का खाना देर से खाने का रिवाज है। रिश्तेदारों को भूख महसूस हो रही है। वे बात करने के लिए बातें कर रहे हैं। कुछ नहा-धोकर हनुमान चालीसा का पाठ कर रहे हैं। हनुमान चालीसा ख़त्म हो जाने पर भी जब भोजन का बुलावा नहीं आया, तो वे सुन्दरकाण्ड का पाठ करने लगे। कहीं थ्रेशर चल रहा है। भूसे के बारीक कण हवा के साथ आ रहे हैं। वनस्पति तेलों की गंध के भभके अब भी उठ रहे हैं। अचानक किसी औरत के कराहने की आवाज बाहर तक सुनाई पड़ने लगी। फिर सब शांत... । रिश्तेदार बातें कर रहे हैं। पूरा परिवार इधर-उधर सोया है नीम तले। संतोख छत पर है। रात में वह छत पर ही सोता है बन्दूक लेकर। आज वह बन्दूक लोड करता है बार-बार। फिर कारतूस निकाल लेता है...। बड़ी बिटिया के ससुर दुआर पर लेटे हैं। सबेरे विदा कराने पर अड़े हैं। बिटिया के भी गहने-गिरौं रखने पड़े हैं। ...कहाँ मुंह दिखाएँगे? उसे डर लगने लगा अपने आप से...।

नीम तले रिश्तेदार बातें कर रहे हैं। वे ऊंघते हुए इस बड़े परिवार की मिलौझी  और साहुत  की तारीफ  कर रहे हैं। हीरालाल जी बार-बार शिवमंदिर की ओर हाथ उठा कर कहते हैं -

'सब इन्हीं की कृपा है।'

या कभी दालान में लेटे बाबा की ओर इशारा करके कहते हैं - 

'सब इन्हीं का पुन्य-प्रताप है।'

 बीच-बीच में थ्रेशर की आवाज बंद हो जाती है, तो रींवा बोलते हैं - रींऽ रींऽ रींऽ। कहीं दूर से बीन और ढोल की आवाजें आ रही हैं। सुन्दरकाण्ड का पाठ करने वाले रिश्तेदार थक गए हैं या शायद सुन्दरकाण्ड ही समाप्त हो गया है। अचानक कई औरतों के रोने की आवाजें बाहर आने लगीं। जो सोये थे, वे जाग गए। जो जाग रहे थे, वे चौंक गए। हीरालाल जी, उनके सातों बेटे और सभी नाती-पोते, जो जहां थे, वहीँ से आँगन की ओर दौड़े।

' का बात है ? काहे हाहो-बीपो मचा रखा है? आयँ ?'

'नचकऊ बहू नहीं रहीं! ...अरे मोर करेजाऽ!'

-पल भर के लिए एक महिला विलाप बंद करके घूंघट निकालते हुए बोली और फिर विलाप में शामिल हो गयी।
'कैसे ?'

- हीरालाल जी और उनके सभी बेटे एक साथ बोल पड़े।

'अब कैसे मुंह फोर के बताएं...? खून जारी था एक महीना से।' 
- हीरालाल जी की पत्नी ने उन्हें एक कोने में ले जाकर कहा।

'तो दवा-दारू काहे नहीं हुई ? डाक्टर को काहे नहीं दिखाया गया?'

'महीना भर से सब बियाह-काज में दौड़ रहे हैं। किसी को मरने भर की तो मोहलत नहीं। किससे कहें और का कहें ? इतने भारी परिवार में किसी का दुख-दुरापद जानने में ही एक महीना लग जाता है।'

'देखो, अब जो होना था, हो गया। धीरज से काम लो सब लोग। बात अभी फैलने न पाए, नहीं तो नात-मेहमान खाना नहीं खायेंगे। मिट्टी पिछवाड़े रखवा दी जाय। भोर में किरिया-करम होगा। पहले मेहमानों को खाना खिलाओ।'

-हीरालाल जी ने फुसफुसाते हुए कहा। औरतें बैन करके रो रही थीं।

'हाय मोर बहुरियाऽ।'

'हाय मोर करेजा।'

'ए चोप्प अब कोई नहीं रोयेगा। खबरदार।'



xx            xx             xx                               



रिश्तेदारों ने खाना खा लिया है। अब वे सो रहे हैं नीम तले। बाबा दालान में सो रहे हैं। हवा के झोंके अब भी गर्म हैं। नीम पर कोई पक्षी बेचैन होता है बार-बार। लाश पिछवाड़े रख दी गयी है। कुछ औरतें लाश को घेरकर बैठी हैं। ...लाश को अकेले नहीं छोड़ना चाहिए! कुछ उपले सुलगा दिए गये हैं। ...लाश के पास आग जलनी चाहिए! एक  दिया जला दिया गया है। ...लाश के पास रोशनी होनी चाहिए! रह-रहकर औरतें सुबकने लगती हैं।

अचानक बाबा गिंगिंयाने लगे -  'गींऽऽगींऽऽ गींऽऽ।'

-बकार नहीं फूट रहा था। शब्द नहीं निकल पा रहे थे। सोये हुए लोग चौंक कर जाग गए। जो जाग रहे थे, चौंक कर बाबा के पास पहुँच गए। हीरालाल जी लाठी लिए पिछवाड़े खड़े थे। वे जितना दौड़ सकते थे, दौड़ कर बाबा के पास पहुंचे लाठी के सहारे। बाबा रो रहे थे शायद। सब चकित हुए। जो बाबा दादी के मरने पर भी नहीं रोये थे, आज इस तरह क्यों रो रहे हैं?हीरालाल जी को लगा कि नचकऊबहू वाली खबर किसी ने दे दी बाबू को...।

'गींऽऽ गींऽऽ गींऽऽ !' - गिंगिंया रहे हैं बाबा।

'बाबूऽ बाबूऽ !' - हीरालाल जी ने बाबा  के कान के पास मुंह ले जाकर कहा।

'दादूऽऽ दादूऽऽ दादूऽऽ !'

-अब फूटा बकार। निकलने लगे कफ से जूझते हुए शब्द। इस बीच किसी ने लालटेन का शीशा साफ कर दिया था। हाथ, होंठ और नथुने बुरी तरह काँप रहे थे। बहुत डरे हुए लग रहे थे बाबा।

'दादूऽऽ दादूऽऽ जल्दी करो। बत्तिस आना। बत्तिस आना ले आओ। हाकिमऽहाकिम आये हैं। जमपुरी के हाकिम आये हैं। टिकस काट रहे हैं टिकस। अरे जल्दी करो। बत्तिस आना। हाँ बत्तिस आना...।'

रिश्तेदार एक दूसरे का मुंह देखने लगे। हीरालाल जी ने जल्दी से बंडी से एक नोट निकाला, लालटेन के उजाले में देखा और बाबा के हाथों में थमा दिया।

'दोहाई परगना हाकिम की। दोहाई सरकार की। बड़ी कच्ची गिरस्ती। बड़ी कच्ची गिरस्ती सरकार।' आँखें मुंदी थीं। पैर छोड़कर पूरा शरीर काँप रहा था।

'पांच साल की मोहलत सरकार। बस पांच साल। बहुत गरीब असामी सरकार। बड़ी कच्ची गिरस्ती। हाँ सरकार बस पांच साल....।'
              -बुरी तरह गिड़गिड़ा रहे थे बाबा। रिश्तेदार कभी बाबा का मुंह देखते, कभी आपस में एक-दूसरे का। सब चुप थे। बड़ी देर बाद सहज हो पाए बाबा। रिश्तेदार एक-एक कर चारपाइयों  की ओर चले गए। अकेले हीरालाल जी खड़े थे बाबा के पास, लाठी के सहारे। लालटेन की रोशनी में वे बाबा का चेहरा देखते रहे लगातार। अब सहज थे बाबा। चेहरे पर चिंता की कोई रेखा नहीं। दाहिने हाथ की मुट्ठी ढीली पड़ गयी थी। दो रुपये का नोट नीचे गिर गया था। बाबा के खर्राटे सुनाई पड़ रहे थे। हीरालाल जी लाठी के सहारे पिछवाड़े गये। दूर से ही उन्होंने खांसना शुरू कर दिया कि औरतें पर्दा कर लें। पिछवाड़े रखी लाश को घेर कर बैठी औरतें रोते-रोते सो गयी थीं। दीया बुझ गया था। अँधेरे में उपलों के अंगारे चमक रहे थे एक कोने में। बाकी सब धूसर-सा दिख रहा था। लाश, लाश को घेर कर सोयी हुई औरतें, पोखरा, पीपल का पेड़, खेत, जंगल - सब धूसर अँधेरे में डूबे थे। यह क्या चमक रहा है...? अरे! किसी जानवर की आँखें हैं...। कई जानवरों की आँखें हैं। ये तो दूर तक फैले हैं। मरी मिट्टी की गंध इन्हें इतनी जल्दी मिल जाती है ...। अँधेरे में आँखें दिख रही हैं, शरीर नहीं...। आँखें आगे बढ़ रही हैं...। धीरे-धीरे एक साथ...। औरतें सोयी थीं। अँधेरे में चमकती आँखों की घेराबंदी नजदीक आती जा रही थी। हीरालाल जी को डर महसूस हुआ।

''हियाँ सब सो रही हैं और जंगली जानवर घेरे आ रहे हैं। उठो सब लोग! सोना हो तो भीतर जाओ ।' -हीरालाल जी ने डांट लगायी। वे कुकुरनिंदिया सो रही थीं। सब जाग गयीं। जागते ही लाश को देखा। उन्होंने नए सिरे से रोना शुरू कर दिया।

'हाय मोर बहुरियाऽ हो!'

'हाय मोर करेजा!'
एक औरत ने बुझे दीपक को फिर से जला दिया।

'हायऽ हमें कटारी मार गयी रेऽ..!'

'हायऽ हमें लैसंसी मार गयी रेऽ..!'

  - बैन करने की होड़ मच गयी। हीरालाल जी औरतों से थोड़ी दूरी बनाकर खड़े थे। खड़े-खड़े सोच रहे थे। सबेरे हरे बांस कटवाने होंगे...। सुहागिन का कफन लाल साड़ी का होना चाहिए...। उन्हें अपनी माँ की याद आ गयी...। लाल साड़ी में लाश बंधी थी माई की...। हरे बांस की टिकठी...। वे छोटे थे। अँधेरे में आंसू बह चले उनकी आँखों से। थोड़ी ही देर में किरिया-करम के खर्च का अनुमान करने लगे और आंसू कहीं सूख गये।

              गुमसुम पक्षी आकाश की ओर उड़े जा रहे हैं। साँयऽ साँयऽ...! हीरालाल जी ने आकाश की ओर देखा और संतोख को पुकारा। उनकी तेज आवाज पोखरे और मकान से होकर लौट आयी। संतोख भी आ गया। पिता-पुत्र बिना कुछ बोले बाबा के पास गए। संतोख एक बाल्टी पानी ले आया कुएं से। हीरालाल जी ने देखा,बाबा जाग रहे थे। दोनों ने पैताने का बिस्तर लपेटा। मूंज की चारपाई में बाध को काट कर एक  वृत्ताकार  जगह बना दी गयी थी बाबा की कमर से थोड़ा नीचे। दोनों ने पहले बाबा की, फिर चारपाई की वृताकार जगह की सफाई की। इस बीच न संतोख कुछ बोला, न हीरालाल जी। संतोख को थोड़ी राहत मिली। ...अब अब तेरह दिन बिदाई तो होगी नहीं। इस बीच वह बड़ी बिटिया के लिए कलाई-मुलम्मा वाले गहनों का इंतजाम कर सकेगा। दूसरी तरफ तेरही-बरखी का खर्च। हीरालाल जी सोच रहे हैं, अभी बाबा को नचकऊबहू वाली बात न बतायी जाय...। बाबा न सिर्फ मरने से डरते हैं, बल्कि मौत की खबरों से भी उतना ही डरते हैं और इस मृत्युलोक में कोई न कोई मरता ही रहता है...। दूसरों के मरने की खबर से जब इतना परेशान होते हैं, तो यह तो घर की ही औरत थी। जब नचकऊबहू की पारी होती खाना बनाने की, बाबा उड़द की दाल जरूर बनवाते। बाबा को सबसे ज्यादा प्रिय रसाज-बग्जा तो नचकऊबहू के सिवा कोई बना ही नहीं सकता था। जब तक बाबा का मुंह वगैरह धुला कर उन्हें फिर से लेटाया गया, उजास इतना फैल चुकी थी कि लालटेन की रोशनी बेवजह लगने लगी थी।पेट साफ़ होते ही रात का प्रसंग याद आया बाबा को। बाप रे बाप...! जमपुरी  के परगना हाकिम...! लाल-लाल आँखें...! बड़ी-बड़ी मूंछें...! एक क्षण के लिए फिर डर गए बाबा। थोड़ी ही देर में उन्हें पछतावा होने लगा। ...मति मारी गयी थी। बत्तिस आना और दे देते। दस साल की मोहलत मिल जाती... ।

झालाफाली होते-होते हरे बांस काट लिए गए थे। बाजार से लाल साड़ी, लाल चूड़ियाँ, सिन्दूर और सिंगार के दूसरे सामान आ गए थे। खुद नचकऊ गया था बाजार। फिर गया नचकऊ... । अब कहाँ...? थोड़ी ही देर में आ गया वह अंजुरी में फूल लेकर। कुछ फूल गमछे में भी थे। हर फूल महक रहा था। अभी दिन नहीं निकला था, लेकिन चीजें साफ -साफ दिखने लगी थीं। दुआर पर एक जगह गोबर से लीप दी गयी थी। हरे बांस की टिकठी वहीँ रख दी गयी । लाल साड़ी में लिपटी लाश। नचकउना पगला गया है। दौड़कर जाता है। अंजुरी में महकते फूल ले आता है और लाश पर डाल देता है। महीने भर से उसकी मेहरारू डाक्टर को दिखाने के लिए कह रही थी। उसने सोचा था कि ब्याह-काज निपट जाए और खेत-खलिहान का काम हो जाए, तो ले जाएगा डाक्टर के पास...। फिर रुपया तो चाहिए...। रुपया संतोख भैया के पास रहता है...। क्या कह के मांगता रूपया...? इसी हाय-बिस्स में समय निकल गया।
लोग मृतक-कर्म के जरूरी सामान सहेजने में लगे हैं। औरतों ने नचकऊ के मन की दशा को भांप लिया। अचानक औरतों की रुलाई का ऐसा आवेग उमड़ा कि आस-पास के पेड़ों पर चहचहाते पक्षी पल भर के लिए चुप हो गए। बाबा के कानों तक पहुँच गयी रुलाई। अब क्या करें...?हीरालाल जी चिंतित। अर्थी उठने के पहले जैकारे  के पहले ही हीरालाल जी ने बाबा को नचकऊबहू के मरने की खबर दे दी डरते-डरते। बाबा विचलित। कांपने लगा पूरा शरीर पैरों को छोड़कर। हीरालाल जी बहुत डर गये। कुछ हो न जाय बाबू को...।

'जब ऐसी हारी-बीमारी थी , तो हमें काहे नहीं बताया? आँय? काहे नहीं बताया? '- बाबा की बात से हीरालाल जी चकित। क्या कर लेते बाबू...? मौत को टाल सकते थे क्या...?

'बेकार गया। बेकार गया बत्तिस आना। हाँ। अब हम जी कर का करेंगे? का करेंगे जी कर? नचकउना नचकउना नचकउना कि गिरस्ती बिगड़ गयी... । गिरस्ती हाँ... ।'- नए सिरे से पछता रहे हैं बाबा।

''उघन्नीऽ उघन्नीऽ दादूऽ उघन्नीऽ कहाँ है उघन्नीऽ ?'' - वे डरे हुए लग रहे थे। हीरालाल जी ने बाबा के सिरहाने रखा लोहे की चाबियों का गुच्छा उन्हें थमा दिया। बाबा ने कसकर पकड़ लिया गुच्छे को।

''अब दस दिन दस दिन सूदक रहेगा। हाँ हाँ दस दिन। भूत-प्रेत नाचेंगे भूत-प्रेत। दिन-दुपहरिया हाँ।'' बाबा ने फिर एक बार चाबियों के गुच्छे पर पकड़ मजबूत की।

''अब दिन में भी उघन्नीऽ मुट्ठी में पकड़ कर रखनी पड़ेगी। '' - मन में कहा बाबा ने।

''जाओ जाओ। सहूर से सहूर से हाँ सहूर से किरिया-करम करो। बहुत फैरबक्सी नहीं।''

टिकठी जा चुकी थी। कुछ फूल दालान में गिरे थे, कुछ दुआर पर। वनस्पति तेलों की गंध के भभके अब भी उठ रहे थे। मक्खियाँ उजाला होते ही भिनभिनाने लगी थीं। बाबा के पूरे शरीर पर बैठी थी मक्खियाँ। रामलली बाबा के सिरहाने खड़ी थी, लेकिन उसका ध्यान बाबा के मुंह पर बैठी मक्खियों की ओर नहीं था। पता नहीं क्या देख रही थीं उसकी सूजी हुई आँखें। बाबा की भी आँखें खुली थीं।

उघन्नी को मुट्ठी में जकड़े बाबा तेरही-बरखी के खर्च का अनुमान कर रहे थे। बच्चे अन्यमनस्क खड़े थे, जहां अभी टिकठी पड़ी थी। वे धरती पर बिखरे फूलों, अधजली अगरबत्तियों और आटे की गोलियों को सहमे-सहमे देख रहे थे।

[ 'कथादेश', अगस्त - 2007 में प्रकाशित ]

सोमवार, 24 मई 2010

अंतिम उच्चारण- शिवशंकर मिश्र

अंतिम उच्चारण -
                        दस साल का हो जाने पर भी जब तीसरा लड़का बोलने की बजाय महज इशारे करता और लोगों को देख कर निर्मल हँसी हँसता, तो हरखू मिसिर को निराशा हुई। उन्हें लगा कि यह बड़े लड़के की तरह नहीं कि बम्बई से पैसा कमा कर भेजे , घर आने पर खेती के काम में हाथ बँटाये या गाँव में किसी से झगड़ा-टंटा होने पर बाप की बगल में लाठी लिये डटा रहे। एक रात नींद आने से पहले मिसिर को जंगी पाठक के भाई गूंगे पाठक की याद हो आयी। गूंगे पहलवान ने गूँगेपन और थोड़ा बहरेपन के बावजूद अपने परिवार की उन्नति में जो मदद की, गाँव में जब-तब इसके चर्चे चलते- ...कि कैसे गूंगे के रहते गांवदारी के मसलों में जंगी पाठक से लोग हमेशा दबते थे, ...कि कैसे गूंगे पाठक जब खेत में पहुँचते तो मजदूर मुस्तैदी से काम करने लगते, ...कि कैसे एक बार हाथ भर जमीन के लिए लाठियां चलीं और गूंगे शहीद हो गए... आदि-आदि। मिसिर खिल उठे। उन्हें लगा कि अगर दूध-घी की भर्ती की जाय और रियाज-पानी पर जोर दिया जाय, तो घर में जल्दी ही गूंगे पहलवान जैसा एक लठैत तैयार हो सकता है। फिर मिसिर की आँखों में पंचायतों में उनका रुख भांपते लोगों, दखल की हुई बंजर जमीन, डरे हुए मुस्तैदी से हल चलाते मजदूरों और लहलहाती फसलों के कई सपने तैर उठे। शायद इसी उत्साह में अगले दिन जब भैंस की खली और मिट्टी के तेल की खरीद के लिए मिसिर बाजार गए, तो तीसरे लड़के के लिए मारकीन का कुर्ता और चारखाने का जांघिया सिलाते आये। मिसिराइन को निर्देश दिया कि इसे थोड़ा दूध-मट्ठा दे दिया कर। यह पहली बार था, जब कि उसकी ओर ध्यान दिया गया। मिसिर दिन भर खेतों में होते या सरपंच की चौपाल में बैठ कर अपनी हैसियत पुख्ता कर रहे होते। मिसिराइन भोर से देर रात तक घरेलू धंधों में उलझी रहतीं। बड़ा बेटा बम्बई में पैसे कमा रहा होता। मझला प्राइमरी स्कूल में पढ़ने जाता, छुट्टी होने पर दखिनहिया माई के चौरे के पास पीपल की छाँव में गुल्ली-डंडा खेलता या कुछ अनाज झटक कर लाई-गुड और चूरन खरीदने की फिराक में इधर-उधर मंडराता रहता। छोटे को पढाई के काबिल नहीं समझा गया। ...जब बोलता ही नहीं, तो पढेगा क्या? इस तरह पढ़ाई -लिखाई के जंजाल से बचा रहा वह। बच्चों के संग खेलने का बड़ा मन होता। लेकिन उसकी उम्र के लड़के मजाक उड़ाते। छोटे बच्चे उसके संग खेलने में हिचकते, शायद डर जाते थे। वह मुंह लटका कर किसी नुक्कड़ पर खड़ा  हो जाता। आते-जाते कोई दिख जाता तो फिर वही निर्मल हंसी। लोग गंभीर हो जाते, अजनबी आँखों से उसे घूरते और आगे बढ़ जाते। वह उदास हो जाता और चुपके से पड़ोस के मंदिर में घुस जाता। वहां बेडौल चिकने पत्थरों को सूंघने -चाटने और चढ़ाए हुए फूलों को इकट्ठा करने में व्यस्त हो जाता। कम ही कभी ऐसे अवसर आते, जब दोपहरी में मिसिराइन को तेल लगाने के लिए मिसिर कोठरी में बुलाते। खूब आत्मीयतापूर्वक बैठे माता-पिता के चेहरों पर एक विशेष प्रकार का मानवीय भाव दमकता रहता, जो कभी ऐसे ही अवसरों पर दिखता था। वह भी दौड़कर वहां पहुंच जाता। जल्दी ही माता-पिता दृढ़ता से उसे खेलने भेज देते। वह कहाँ जाए..? किसके संग खेले..? कोई तो नहीं खेलता उसके साथ..! मुंह लटकाए वह फिर पड़ोस के मंदिर में पहुंच जाता, जहां तरह-तरह के फूलों, चन्दन और हवन की गंध में एक अलग माहौल मिलता, जो घर के माहौल से बेहतर होता।
                                          छोकरा बाढ़ पर है और आगे चलकर कपड़े छोटे हो सकते हैं, इस भय से मिसिर ने अभी तक उसे नए कपड़े नहीं सिलाए थे। भाइयों के जो पुराने रंगउड़े कपड़े पहनाये गए, उनमें उसकी रूचि नहीं बनी। इस तरह उन कपड़ों के चीथड़े हमेशा मंदिर के पिछवाड़े घूर पर पाए गए। लेकिन आज नए कपड़े पहनकर वह बड़ी देर तक खुद को निहारता रहा और दरवाजे से हो कर गुजरने वालों को दिखाता रहा। नए कपड़ों की चिकनाई से बदन में गुदगुदी होने लगी। उसे लगा कि अब गर्मियों में जब बारातें सजेंगी, झैंयक-झैंयक बाजे बजेंगे और सजे-धजे पुरुष और कुछ एक बच्चे ट्रैक्टर पर सवार होकर कहीं बहुत दूर जायेंगे, मिठाइयाँ खायेंगे, तो उनके संग वह भी जा सकेगा। इस विचार से उसे इतनी खुशी हुई कि कुर्ते का दामन खींचते हुए गाँव की गलियों में दौड़ पड़ा। जो भी मिला, प्रसन्नता से 'हे हे' करके उसका ध्यान खींचा, कुर्ता दिखाया और आगे बढ़ गया। इस तरह गाँव की दो परिक्रमा हो गयी और मन की खुशी नहीं चुकी, तो नहर की ओर दौड़ गया वह। वहां बहते हरे पानी और दूर तक फैले बेतरतीब सिंवान को देखते-देखते कपड़ों की ओर से ध्यान हट गया भूख लग आयी और वह घर की ओर लौट पड़ा। नहर से गाँव की ओर जाने वाली पगडंडी के किनारे-किनारे दरारों वाली काली मिट्टी में पलाश और झरबेरी के तितर-बितर झाड़ खड़े थे। थोड़ी देर तो कुर्ते की जेब में हाथ डाले बिना कुछ देखते हुए चलता रहा वह, लेकिन जल्द ही, लगभग बीस कदम चलने के बाद, झरबेरी के झाड़ में चमकते नन्हे सिंदूरी फलों ने उसका चित्त मोह लिया। दौड़ कर वह झाड़ के निकट उकडूँ बैठ गया। उसे याद आया कि मंदिर में जब एक दिन बहुत-सी औरतों ने जल चढ़ाया था, तो कुछ विचित्र फलों, फूलों और पत्तियों के साथ ये नन्हे सिंदूरी फल भी दिखे थे। ताबड़तोड़ पांच-छः झरबेरियाँ तोड़ते-तोड़ते उंगलियों में कई कांटे चुभ गए। कांटे चुभते, तो वह कान के पास हाथ ले जाकर हिलाता, खून को कुर्ते में पोंछता और झरबेरियाँ तोड़ने-खाने लगता। दोपहर तक झरबेरियाँ खाते-खाते जब तृप्त हो गया और कुर्ता कई जगह से फट गया,तो उसके मन में एक विचार कौंध गया कि जो चीज उसको इतनी भली लगी, वह जरूर सबको भली लगेगी। फिर कुर्ते को उतार कर ढेर सारी झरबेरियों की पोटली बनायी और गाँव की ओर दौड़ पड़ा। वह झरबेरियाँ खाकर खुश होते लोगों की कल्पना कर रहा था। इस कल्पना से मन में कुछ ऐसा उल्लास उमग आया कि बरबस उसके मुंह से 'बईऽऽऽऽ बईऽऽऽऽ ' का उच्चारण फूट पड़ा। 'बेर' कहने की कोशिश में वह 'बईऽऽऽऽ बईऽऽऽऽ' चिल्लाता जा रहा था। पहला उच्चारण था यह उसका ....। दरवाजे-दरवाजे 'बईऽऽऽऽबईऽऽऽऽ' चिल्लाते हुए वह बच्चों को झरबेरियाँ बांटता रहा । बाद में बड़ी उम्र की लड़कियों और बहुओं ने भी झरबेरियाँ लूटने में उत्साह दिखाया। बहुओं के देर से भोजन बनाने या नौजवानों की आवारगी पर झींकते और माला जपते बूढ़ों को भी उसने झरबेरियाँ देनी चाहीं, लेकिन उन्होंने यह समझ कर कि छोकरा चिढ़ा रहा है, झिड़क दिया।किसी-किसी ने तो लाठी भी उठा ली। वह कुछ दूरी पर खड़ा होकर विस्मय से उन्हें देखता और चल देता.... ।
गाँव के मंद उबाऊ जीवन में, जहाँ अतीत की छोटी-छोटी बातों का जिक्र कर के लोग ऊब मिटाते हैं, यह एक महत्वपूर्ण घटना थी। बच्चों के लिए तो पूरा मेला था। उनकी पूरी पलटन उसके पीछे- पीछे गलियों में दौड़ती रही। वे उछल रहे थे और तालियाँ पीट रहे थे। नए सखा को छू रहे थे और बेर मांग रहे थे। बहुत अच्छा लग रहा था उसे। उसका सब कुछ बच्चों को अच्छा लग रहा था आज। भरा-पूरा स्वस्थ शरीर, छोटे-छोटे खड़े बाल,गेहुंआ रंग, शरीर पर भूरे चकत्ते, सदा खुले रहने वाले होठों से बहता लिसलिसा पदार्थ, निर्मल खिलखिलाहट,आँखों में सहज जिज्ञासा और आत्मीयता की चमक, उच्चारण की विफल चेष्टा और सफल संकेत-बच्चों का मन मोह रहा था यह सब। अब तक उसके पिता ने उसका कोई नाम नहीं रखा था। वह घर में सबसे छोटा था, लिहाजा उसको सब छोटका कहते थे। यही उसका नाम था। लेकिन छोटे बच्चों को अपनी उम्र से बड़े सखा को 'छोटका' कहना शायद उचित नहीं लगा। उन्होंने उसके प्रथम उच्चारण को ही उसका नाम मान लिया और उसे 'बई' कहना शुरू कर दिया। बाद में पूरे गाँव ने इस संज्ञा को स्वीकार कर लिया। बई के लिए अपूर्व उल्लास का दिन था वह। घर के अकेलेपन से उबरकर पहली बार वह गाँव के जीवन में शामिल हो गया था- अपने ढंग से।
                 साँझ हो रही थी। आकाश में पक्षियों के काफिले उत्तर की ओर उड़े जा रहे थे।सिंवान से लौटते पशुओं के खुरों से धूल उड़ रही थी गाँव की गलियों में। अँधेरा चुपचाप पसर रहा था। बई की टांगों और आँखों में कच्ची जामुन-सी कसैली थकान महसूस हुई। घर की ओर लौट पड़ा वह- फटे कुर्ते की पोटली में थोड़ी झरबेरियाँ लिए हुए। उसे पूरा विश्वास था कि माई झरबेरियाँ पाकर बहुत खुश होगी। आंगन में ढिबरी जलाती मिसिराइन छोकरे की वजह से होने वाली जगहँसाई से वैसे ही काफी गुस्से में थीं और जब नए कुर्ते की यह गत देखी, तो लाल भभूका हो गयीं।कान उमेठते हुए उसकी पीठ और गाल पर दो-तीन हाथ जड़ दिये उन्होंने और देर तक बड़बड़ाती रहीं, जिसका सारांश यह था कि अभी क्या पिटाई हुई है, बाप के आने पर असली कुटम्मस होगी। डर के मारे वह भीतर कोठरी में दुबक कर बैठ गया, जहां कुछ देर में मिसिराइन ने दीवार के बिलके में जलती हुई ढिबरी रख दी। पहले तो वह बाप के आने का इन्तजार करता रहा -सहमा हुआ, लेकिन जब मिसिर देर तक नहीं आये तो डर-भय भूलकर ढिबरी की सिंदूरी लौ और धुंए को देखने में डूब गया। वह हल्के-हल्के फूंक मारता, ढिबरी की लौ कांपती, फिर स्थिर हो जाती कोठरी को आलोकित करते हुए।मजा मिल रहा था उसे। एक बार फूंक तेज हो गयी, ढिबरी बुझ गयी। अंधेरी कोठरी में ऊबने लगा वह । कुछ देर में प्यास महसूस हुई। माई गुस्से में थी। ...पानी कैसे मांगे ? ...क्या करे? अचानक एक जुगत सूझी.... । अँधेरे में उसने ढिबरी टटोली। मिट्टी का तेल मुंह में जाते ही उसका जी मिचलाने लगा और उल्टियां शुरू हो गयीं।
                                        गोधूली बीत चुकी थी। पीपल के पीछे पूर्णिमा का चाँद झाँकने लगा था, जब मिसिर सरपंच के यहाँ से बैठकबाजी करके लौटे। वे बहुत खुश थे। ख़ुशी की बात यह थी कि हरिजन बस्ती में डाका डालने की जिम्मेदारी सरपंच ने मुख्य रूप से मिसिर को ही सौंपी थी, जिसमें सवर्ण परिवारों के और भी लठैत शामिल थे । मिसिर को यह बिलकुल उचित लगा कि अगर इन सालों को लतियाया नहीं गया,तो फिर कलट्टर के यहाँ बंधुआ मजदूरी के खिलाफ दरखास भेजेंगे। लेखपाल जांच करने आयेगा और बेमतलब घूस देना पड़ेगा।शायद इसी ख़ुशी में हाथ नहीं उठाया मिसिर ने। या इस वजह से भी, कि उनके पहुंचने पर बई का चेहरा घिन से विकृत हो रहा था। बुरी तरह उल्टी  कर रहा था वह। या इस वजह से कि मिसिराइन उसका सिर सहलाते हुए मिसिर को बरज रही थीं कि खुद अपनी करनी से मर रहा है, मार-पिटाई मत करो। पिटाई के लिए हाथ तो नहीं उठाया मिसिर ने, लेकिन गुस्से में बार-बार आँगन से दरवाजे तक चक्कर लगाते रहे। दांत पीसते हुए बड़बड़ाते रहे कि साला पिछले जनम का मुद्दई है, जिसने बदला लेने के लिए औतार लिया है... आदि-आदि।
                                         इस तरह बई गाँव का चर्चित छोकरा हो गया। काम-काज से फुर्सत हो कर लोग गांवदारी के गंभीर मसलों पर बातें करते और जब ऊबने लगते तो उसकी नित नयी वारदातों के चर्चे चलाते। गाँव के किसी भी टोले के बच्चों के खेल और बालकलह में उसे सहज प्रवेश मिल गया था। सांझ को जब बुजुर्ग जम्हाइयां लेते हुए बातें करते और घरों के भीतर औरतें खाना बना रही होतीं, तो बच्चे घुटपहला खेलते। वे बई को आँख मूंदने को कहते। वह आँख बंद कर लेता। बच्चे गीत गाते -
' सिल फूटे सिलौटी फूटे
देखन वाले की आंखी फूटे... ।'
                                        फिर बच्चे खंडहरों में छिप जाते। बई उन्हें खोजने और छू लेने के लिए इधर-उधर छापे मारता। अब वह रोज नए-नए शब्द बोलने की विफल कोशिश करता। कभी बच्चे बई के नेतृत्व में आकाश में उड़ते पंछी जैसे जहाजों को देखते। फेरी वालों की अजीब बेरस आवाजों या आइसक्रीम वालों के भोंपू सुन कर वे गाँव की सरहद तक उनका पीछा करते। कभी घर में कलह करके दरवाजे पर बैठे गंभीर, चिंतित लोगों को वे कौतूहल से घूरते और तालियाँ बजाते हुए भाग जाते ।                                                                                                                                                   
एक    दिन पासियों  के टोले में बारात आयी।
दिन ढलते-ढलते बीन और ढोलक के संगीत के साथ-साथ आग में भुनते सुअर की चिघ्घाड़ पूरे गाँव में सुनाई  पड़ने लगी। सवर्ण घरों के बच्चों को उनके माता-पिता ने वहां जाने की अनुमति नहीं दी। बच्चे रोते रहे। लुकते-छिपते कुछ बच्चे बई के साथ वहां जा पहुंचे। सुअर के पैर बंधे थे। गुदामार्ग में जलती हुई सलाख डाल कर आग की लपटों में पकाया जा रहा था उसे।बच्चे बुरी तरह डर कर भाग गये। कुछ देर में सुअर शांत हो गया...। बीन बज रही थी। ढोलक पर थाप पड़ रही थी। पता नहीं क्या जादू था उस संगीत में कि बच्चे डर-भय भूल कर फिर आ गये। बारातियों को पहले मिर्चवांग [ गुड़ और काली मिर्च का शरबत ] पिलाया गया, फिर महुए की शराब। थोड़ी देर में मशालें जलीं और चमन्नचवा शुरू हो गया - बिना मंच के। नकली घोड़े पर सवार एक आदमी मिर्जा बन कर आ गया - हाथ में चाबुक लिए। वह अपने पैरों पर चलता था, लेकिन बच्चों को लगता, घोड़ा नाच रहा है। पीछे-पीछे सुमांगी नाचता- कागज की लम्बी टोपी लगाये हुए। पखावज और सतावर बजते। बीच-बीच में अचानक मिर्जा चाबुक फटकारता, बाजे बंद हो जाते और सुमांगी तरह-तरह के चुहल करता। इसी बीच मिर्जा ने एक बार चाबुक फटकारा, बाजे बंद हो गए। मिर्जा कड़क कर बोला-
'सुमांगी!'   
'जी सरकार !'
'एक गधा ले आओ! '
' हजूर अब गधे नहीं मिलते! '
' क्यों ?'
'अब सारे गधे नेता हो गए सरकार!'
लोग हँसते-हँसते लोट-पोट हो रहे थे।
बच्चों के लिए तो यह बिलकुल नया तमाशा था। देर रात तक वे आँखें फाड़े वहीँ डटे रहे। इस बीच सभी बच्चों के बाप,चाचा या बड़े भाई आये। वे बच्चों को डांटते-पीटते घर ले गए। बई के लिए कोई नहीं आया। हरखू कहीं गाँव से बाहर गये थे। मिसिराइन पासियों के टोले में जा नहीं सकती थीं। आधी रात को खाने- पीने के लिए पंगत बैठी तो बई भी एक किनारे बैठ गया। बारात और घरात के लोग नशे में चूर थे। वे भावुक हो रहे थे। कोई हँस रहा था। कोई रो रहा था। पहले तो बाँभन के लड़के को खाना खिलाने में संकोच किया उन्होंने, लेकिन बई के हाथ पसार देने पर द्रवित हो उठे। दो-एक निवाले गले के नीचे उतरते ही उसे उबकाइयां आने लगीं। फिर तो भीतर का सारा माल बाहर-मूल ब्याज समेत। बारातियों का सारा मजा किरकिरा हो गया। डांटकर भगा दिया उन्होंने उसे। वह अँधेरी गलियों में भागा जा रहा था, लड़खड़ाते हुए। गलियों में सोये कुत्ते जाग गए और भौंकने लगे। कुछ देर भौंकते रहे। फिर अपना दायित्व निभा कर सो गए। दूसरे दिन पूरे गाँव में यह खबर बिजली की तरह फैल गयी। अक्सर लोग यह चर्चा करते पाए गए कि बइअवा साला तो पगलेट है ही, लेकिन हरखू मिसिर को क्या कहा जाय? उन्हें निगरानी नहीं करनी चाहिए? साला पासियों के यहाँ भच्छाभच्छ खा आया। बड़े कर्मकांडी बनते हैं। आखिर जिस बर्तन में बइअवा खायेगा, उसी में तो खायेंगे। भला बोलो अब हरखू के घर खाने पीने लायक है? इस तरह खासा बात का बतंगड़ बन गया। बात मिसिर के कान तक पहुँच गयी। उन्हें गांवदारी, न्योता-ब्याह और जजमानी का भी संकट दिखाई पड़ा। उन्होंने जमकर बई की धुनाई की और थाली पीटते हुए पूरे गाँव में ऐलान किया कि पंचों, अब हमें इस कुजात से कुछ लेना-देना नहीं और न आज से इसे हम अपने बर्तन में खिलाएंगे। घर लौटकर उन्होंने मिसिराइन को ख़बरदार किया कि आज से यह पम्पूसेट पर रहेगा। रेंड़ के पत्ते पर खाना परोस देना। अंजुरी से पानी पिला देना। ध्यान देना कि घर में घुसने न पाए और इसे छूना मत। ...बहुत कोशिश के बाद भी यह माजरा बई की समझ में नहीं आया। घर में घुसना चाहता, तो पिता लाठी लेकर दौड़ा लेते। अब भी वह गाँव में घूमता। बच्चों के संग खेलना चाहता, बच्चे भी उसके साथ खेलना चाहते, लेकिन ज्यों ही सवर्ण टोले का कोई बड़ा-बुजुर्ग उसे देख लेता, डांटकर भगा देता और सारी घृणा धरती पर थूककर पवित्र हो लेता। सबने अपने-अपने बच्चों को उसके साथ खेलने और उसे छूने की मनाही कर दी थी। पम्पिंगसेट पर कोई बच्चा नहीं जाता था। गाँव से बहुत दूर था पम्पिंगसेट बिना बच्चों के संग खेले वह रह नहीं पाता था। अक्सर वहां पिता उपस्थित होते थे। पिता की उपस्थिति आतंकित करती थी। हरखू पूरी तरह निराश और उदासीन हो गए थे उसकी तरफ से।
गाँव से हटकर दक्खिन की ओर हरिजन बस्ती थी।
अब उसका सारा समय वहीं बीतता। कोई बाधा नहीं थी वहां... । बच्चों के संग घुटपहला और गुल्ली-डंडा खेलता। बच्चों को छू लेता और निर्मल हँसी  हँसता। पानी की कोई कमी नहीं थी। भूख लगने पर दिक्कत होती। सांझ होते-होते थके-हारे स्त्री-पुरुष खेतों से मजदूरी करके लौटते-पोटली में दिन भर की मेहनत का मोल बांधे हुए। झोपड़ों के ऊपर धुंआ उठता। अपने-अपने भाग का कुछ खाना वे बई को दे देते। वह चपड़ी मटर की रोटियों को एकत्र करता और खा लेता। जब अन्न से शरीर में कुछ शक्ति का संचार होता, तो हर झोपड़े के सामने जा कर खिलखिलाता। शायद आभार व्यक्त करता इस तरह। कभी-कभी बस्ती के झोपड़ों के ऊपर धुंआ नहीं उठता था। भूख से बिलबिला उठता वह, तो देर रात को दबे पाँव सवर्ण टोले में प्रवेश करता। घर के पिछवाड़े की सांकल धीरे से खटखटाता। हरखू पम्पिंग्सेट की रखवाली के लिए खेत के किनारे बने झोपड़े में होते। माई धीरे से सांकल खोलती। रेंड़ के पत्ते पर भात और नमक रख देती। वह खाने लगता-सड़प-सड़प। माई लोटे से पानी की धार गिराती। वह अंजुरी से पी लेता। तृप्त होने पर माई को देख कर खिलखिलाता। माई डांट देती-
'चुप नासपीटे, करमजले! कोई सुन लेगा तो सांसत हो जाएगी सारे परिवार की।'
 फिर वह भाग जाता हरिजन बस्ती में। भूख के सिवा कोई बाधा नहीं थी उसके लिए वहां।
तीन साल बीत गए इसी तरह। बहुत कुछ सीख-समझ लिया उसने इस बीच। जांघिये का नाड़ा बांधना सीख लिया, जो सबसे मुश्किल कम था उसके लिए। जाड़े की ठिठुरन भरी रातों में आग, पुआल और कपड़ों से आदमी का रिश्ता समझ लिया। गर्मी की तपती दोपहरियों में पानी और छाँव से जिन्दगी का नाता समझ लिया। दाना-पानी और बच्चों के संग खेले बिना नहीं रहा जा सकता, यह भी समझ लिया। अब भी वह कभी-कभी देर रात को दबे पाँव सवर्ण टोले में घुसता। कुत्ते सो रहे होते। वह धीरे से कुंडी खटखटाता। माई किवाड़ खोलती। रेंड़ के पत्ते पर बचा-खुचा खाना परोस देती। लोटे से पानी की धार गिराती। अंजुरी से पानी पी लेता वह पहले की तरह। कभी-कभी माई बड़े या मझले भाई का कोई पुराना कपड़ा दे देती। अब वह उनके चीथड़े नहीं करता था, फिर भी बहुत कुछ ऐसा था, जो नहीं सीख -समझ सका था वह। सवर्ण टोले के लोग उसे छूते क्यों नहीं? बापू उसे घर में घुसने क्यों नहीं देते? माई रेंड़ के पत्ते पर खाना क्यों देती है? थाली में क्यों नहीं? उसे अंजुरी से पानी क्यों पीना पड़ता है? बड़ी कोशिश के बाद भी ये बातें बिल्कुल समझ में नहीं आयी थीं । एक अजीब परिवर्तन हो गया था उसके अन्दर। खिलखिलाती लड़कियाँ बहुत सुन्दर लगतीं, हर चीज से सुन्दर। हंसते-खेलते लड़के-लड़कियाँ किसी झाड़ , झोपड़ी या अरहर के खेत में छिप जाते । उसका बहुत मन होता कि कोई खिलखिलाती लड़की उसके संग खेले...। फिर वह भी छिप जाय कहीं उसे लेकर...। उसकी सूरत और बेवकूफियों को देख कर चंपा खूब हंसती। बई को बहुत अच्छा लगता। चंपा के काले-कलूटे गालों में पकी झरबेरी-जैसी चमक उग आती। वह खिलखिलाती तो सांवले होंठ और उजले दांतों के बीच एक जादू कौंध जाता। अजीब सम्मोहन ! भूख लगने पर रोटी, प्यास लगने पर पानी, पेट भरा होने पर फूल जितने सुन्दर लगते, उससे भी सुन्दर और आकर्षक था वह जादू ! उससे रहा नहीं गया। एक दिन उसने चम्पा के गाल छू लिए 'तड़ -तड़ ' दो झापड़ जड़ दिए चंपा ने उसके गालों पर। यह छुअन अच्छी लगी उसे... । बहुत अच्छी... । लेकिन एक बात समझ में नहीं आयी। चंपा के चहरे पर घृणा का भाव...? वह बोली-
'पहले ऐना में अपनी सूरत तो निहार ले।'
वह तुरंत समझ गया कि जब तक ऐना में अपनी सूरत नहीं देखेगा,
चंपा उसे छूने नहीं देगी। भूख-प्यास से मोहलत मिलती तो आइने की तलाश में जुट जाता। एक दिन बिसाती आया - साइकिल के आगे-पीछे फीते, चोटियाँ, सोने की-सी दिखती अंगूठियाँ, मोती की-सी चमकती मालाएं, रिबन और पता नहीं क्या-क्या लटकाए। लड़कियों, बहुओं का मेला लग गया उसके चारों ओर । बई ने देखा कि उसके पास छोटे-बड़े कई तरह के आइने हैं। वह दौड़ कर बिसाती के पास पहुँच गया। लड़कियाँ हँस पड़ीं उसे देख कर। बई ने महसूस किया कि निश्चय ही उसका यहाँ आना सब को अच्छा लगा। आत्मीयता की चमक से दीप्त आँखों और निर्मल मुस्कान से आभार व्यक्त किया उसने सब के प्रति। फिर इशारों से आइना माँगा बिसाती से। बिसाती ने आइनों के मोल बता दिए -
'छोटा ऐना दो रुपैया। उससे बड़ा तीन रुपैया। सबसे बड़ा पांच रुपैया। कौन-सा चाहिए ?'
                                                                      बई ने बड़े आइने की ओर इशारा किया।
                                           'तो पांच रुपैया निकालो !'
वह सोच में डूब गया... ।  रुपैया...? ...ऐना रुपैया से मिलता है ? ...चंपा के गाल छूने के लिए पहले ऐना में मुंह निहारना होगा। ...ऐना रुपैया देने पर मिलेगा। ...रुपैया कहाँ मिलेगा...? कैसे बनाया जाता है रुपैया? बहुत कठिन काम लगा यह उसे। उसने चकित हो कर बिसाती की ओर देखा। ...कैसा आदमी है यह? ...इतने सारे ऐना हैं इसके पास। ...एक ऐना दे नहीं सकता? ...उसके पास एक भी ऐना होता,तो बारी-बारी से पूरे गाँव को दे देता। हर आदमी ऐना में अपनी सूरत निहार लेता और लड़कियों के गाल छू लेता । बहुत उदास हो गया वह और धीरे-धीरे सिर झुकाए लौट पड़ा...। लड़कियाँ हंसने लगीं। उसने मुड़कर अचरज से उन्हें देखा। इस हँसी का अर्थ उसकी समझ में नहीं आया...।
                                                                                            असाढ़ के दिन थे। खूब पानी बरस चुका था।
 पेड़-वृक्ष सब धुलकर और भी तरो-ताजा  लग रहे थे। कहीं डौल न बैठने से खूब भूख लग आयी थी बई को। वह इधर-उधर मंडरा रहा था-भूख से विकल...। सैयद पांड़े के खेत में ककड़ी की काफी अच्छी उपज हुई थी इस साल। उनका नाम सियादत्त पांड़े था। लोग ऊब मिटने और मजा लेने के लिए सैयद पांड़े कहते थे। बाद में यही नाम लोकप्रिय हो गया। गर्मी में पांड़े ककड़ियां तोड़ कर बाजार ले जाते। पैसे मिलते। बरसात आने पर ककड़ियां कम फलतीं। जो फलतीं, कड़ी और मोटी हो जातीं। उनके पैसे न मिलते। कोई खरीदता नहीं था। पैसे न मिलें, न सही । बच्चे खायेंगे इस इरादे से उन्होंने ककड़ी की फसल नहीं उजाड़ी थी। लगभग दस बिस्वा खेत में ककड़ी की पियराई विरल लताएँ छ्छ्ड़ी हुई थीं। बीच-बीच में कुछ एक बड़ी ककड़ियां चमक रही थीं। बई को यह सब बहुत भाया...। अभी वह नहीं समझ सका था कि हवा, बारिश, धूप-छाँव, सूरज-चाँद और तारों की तरह धरती सब की नहीं होती। वह टुकड़ों में बँटी होती है। टुकड़ों पर अलग-अलग लोगों का मालिकाना होता है, सब का नहीं। खेतों में उगी फसल और पेड़ों में लगे फल सब के नहीं होते। उससे नहीं रहा गया...। खेत में कूदकर ककड़ियां खाने लगा। तृप्त होने पर भी ताजा नहायी लताओं का सौन्दर्य और ककड़ी का स्वाद लुभाता रहा। उस सौन्दर्य और स्वाद को सार्वजनिक करने का बरबस मन हो आया उसका। ककड़ी खा कर खुश होते बच्चों की कल्पना करके वह इतना प्रसन्न हुआ कि 'ककई-ककई' का उच्चारण फूट पड़ा मुंह से। तार-तार हुए कुरते की पोटली में ककड़ियां भरता, 'ककई-ककई' चिल्लाता और बच्चों में बाँट आता। बच्चे खुश होते। वह खिल उठता... । पोटली की ककड़ियां ख़त्म होतीं, तो फिर तोड़ लाता। पहले तो हरिजन बस्ती में ककड़ियां बांटता रहा, फिर उसे लगा कि उस परम स्वाद से कोई वंचित न रह जाय। इस तरह उल्लास के अतिरेक में सारी मूमानियत और मर्यादा भूल कर सवर्ण टोले में भी जा पहुंचा। पुरुष खेतों में थे। कोई जुताई करवा रहा था। कोई धान की रोपाई करा रहा था। बच्चों ने बहुत दिनों के बाद सखा को पाया, वह भी ककड़ियों के साथ। उन सब ने ककड़ियां खायीं। खुश हुए... ।वह खिलखिला रहा था...। होठों और नाक से बहता लिसलिसा पदार्थ ठोढ़ी पर आ रहा था। मानो भीतर का उल्लास छलक रहा हो। घर-घर ककड़ी बाँटते हुए सैयद पांड़े के भी घर जा पहुंचा वह। कुंडी खटखटायी। पंड़ाइन ने दरवाजा खोला। खिलखिलाते हुए ककड़ियों की पोटली पसार दी उसने पंड़ाइन के सामने...। पंड़ाइन को मामला समझते देर नहीं लगी। पूरे गाँव में केवल उन्हीं के खेत में ककड़ी की फसल हुई थी उस साल। वे आगबबूला हो उठीं। पिछले चार साल से उन्हें कुछ मनोरोग थे शायद। बात करते-करते बेवजह झगड़ने लगती थीं। पांड़े के खेतों में वैसी ही उपज होती, जैसे दूसरों  के खेतों में, लेकिन पंड़ाइन इस बात पर कुढ़ती रहतीं कि उनके खेतों में अच्छत भी नहीं निकलता। गुजारा कैसे होगा...? उनके लड़के हृष्ट-पुष्ट थे। लेकिन उन्हें फ़िक्र बनी रहती कि उनके लड़के दिन पर दिन दुबले होते जा रहे हैं। बड़ी बहू आये अभी तीन साल ही हुए थे, लेकिन उन्हें यह भी उलझन रहती कि यह मुंहझौंसी बाँझ उन्हीं के लड़के की किस्मत में थी...। पूरे गाँव के बारे में दुश्मन होने का शक था उन्हें...। लेकिन चूंकि वे घर की सार-सँभार ठीक से करती थीं और चिंता करती थीं, तो अपनी सम्पत्ति, अपने पति और अपनी संतानों की, इसलिए गाँव में मनोरोगी के रूप में स्वीकृत नहीं हुई थीं।
                    यह घटना मथती रही उन्हें। ...छोकरे की ढिठाई तो देखो कि
मेरे ही खेत की ककड़ी तोड़ी और मुझे ही चिढ़ाने  आ गया। ...ऊपर से हँस भी रहा है। आज ककड़ी तोड़ रहा है, कल डकैती भी कर सकता है। ...धान पकेंगे। ...खलिहान गाँव से बाहर ही रहेगा। ...आग भी लगा सकता है खलिहान में। ...बच्चे दिन भर इधर-उधर टहलते रहते हैं। ...गला भी दबा सकता है उनका। ...जरूर इसमें उसके माई-बाप का भी हाथ रहा होगा। नहीं तो उसकी ऐसी मजाल कि मेरी ही ककड़ी तोड़ कर मेरे ही घर आ गया कि लो ककड़ी खा लो और करेजा तर कर लो। आपे से बाहर हो गयीं पंड़ाइन। पूरे शरीर में क्रोध की लहर उठने लगी । दिन ढलने में अभी कुछ देर थी, जब वे उलाहना देने पहुँच गयीं हरखू के दरवाजे। मिसिराइन ने बहुत समझाया की छोकरा पागल है। लेकिन पंड़ाइन की समझ में बात आयी नहीं ।
'पागल है कि बौरहा। हम नहीं जानते। तुम्हें मना नहीं करना चाहिए।
बिना तुम्हारी मर्जी के इतना बड़ा कांड कर डाला उसने ? आंय ?'
' अरे पंड़ाइन ककड़ी ही तोड़ी है, किसी की मूड़ी तो नहीं
मरोड़ दी। बेमतलब की बात हमें नहीं अच्छी लगती। '
'क्या कहा ? बेमतलब की बात है यह ? मूड़ी
मरोरेगा तो टेंटुआ नहीं दबा देंगे हम उसका ?'
दोनों महिलाएं गला फाड़-फाड़ कर चिल्लाने लगीं ।
कोई किसी की सुनने को तैयार ही नहीं था। ताने-तिश्ने बढ़ते गये।
' तेरा भतार मरे। तू रांड़ हो जा।'
'मेरा काहे ? तेरा भतार मरे । तेरा पूत मरे। '
पंड़ाइन क्रोध में काँप रही थीं -
 'तेरा झोंटा उखाड़ लूंगी डाइन !'
वे लिपट गयीं मिसिराइन से। अन्य महिलाएं और बच्चे तटस्थ
 प्रेक्षक के रूप में खड़े थे। पुरुष खेतों में थे। कुछ बूढ़े, जो काम पर नहीं जा सकते थे, लाठी का सहारा लेकर आ गये थे। दोनों महिलाएं गुत्थम-गुत्था...।इसी बीच पंड़ाइन की धोती की गांठ खुल गयी। किफायतशारी के चलते पेटीकोट पहनती नहीं थीं। बेपर्द हो गयीं वे। मामला संगीन हो गया...। अपमानित पंड़ाइन घर चली गयीं। अपने ही बाल नोचने लगीं।वे काँप रही थीं। सिर पटक रही थीं और गला फाड़ कर चिल्ला रही थीं । बच्चे धोती दे रहे थे -
'माई धोती पहन ले। चुप हो जा।'
लेकिन वे चुप न हुईं।
'हटा ले धोती। आज खून पी के रहूंगी इस डाइन का, तभी धोती
पहनूंगी। चोरी, ऊपर से सीनाजोरी ...? मजाल तो देखो रांड़ की !'
सैयद धान की रोपनी करा कर लौट रहे थे।
रास्ते में ही सारा मामला मिर्च-मसाले के साथ सुन लिया था उन्होंने। घर पहुँच कर मेहरारू का यह हाल देखा, तो संयम खो बैठे। फौरन तमंचा निकाला। कारतूस भरा। कुछ कारतूस कमर में खोंस लिए और पहुँच गये हरखू के घर। हरखू धान की रोपनी करा कर लौटे थे। थके हुए लेटे थे चारपाई पर। सैयद ने ललकारा - 'निकाल अपनी मेहरारू को घर से। आज इसे नंगी नचाएंगे पूरे गाँव में। एक तो तेरे लडके ने ककड़ी तोड़ी, ऊपर से तुम्हारी मेहरारू ने नंगी कर दिया मेरी जोरू को सारे गाँव के सामने। निकाल डाइन को। आज मजा चखाऊंगा।'
हरखू ने सैयद के हाथ में तमंचा देखा। वे तुरंत सजुक हो गए।
सिर में फेंटा बांध लिया और लाठी उठा ली। बोले-
'देखो सैयद ! मेरा छोकरा पागल है। ससुरे को हमने घर से भी निकाल दिया है।
फिर ककड़ी तोड़ी तो कोई हीरा-मोती तो तोड़ नहीं लिया? रही मेहरारू कीबात तो मेहरारू
जानें। हमसे बात करनी है तो जबान सम्हाल कर बात करो, नहीं तो जीभ खींच लूंगा हाँ !'
दोनों ओर से वीरोचित बातें होती रहीं।
सारा गाँव इकट्ठा हो गया था। हरखू ने सोचा कि हाथ पर लाठी मारकर तमंचा छीन लें। उन्होंने लाठी तानी, तब तक ''धाँयऽऽऽ...!'' हरखू वीरगति को प्राप्त हुए.... । चहचहाते पक्षी उड़ गये। सिंवान से लौटते पशु इधर-उधर भागने लगे। तमाशबीन भाग गए। तमाशबीनों में बई भी खड़ा था। वह कुछ भी नहीं समझ पाया । बापू की लाश के पास खड़ा हो गया। हरखू का बेजान जिस्म धरती पर पड़ा था। सिर छितरा गया था। खून के फौव्वारे निकल रहे थे। बापू की लाश के पास माई छाती पीट-पीट कर विलाप कर रही थी। बापू की यह दुर्दशा देख कर या माई का विलाप सुनकर या पता नहीं किस कारण सेअचानक बई चीख पड़ा- 'हू...' और गाँव से बाहर भाग गया।
कई दिनों तक गाँव में सन्नाटा रहा। सैयद गाँव छोड़कर भाग गये। पुलिस ने उनके घर कुर्की कर डाली थी। दिन भर कौए मंडराते। सांझ को दक्खिन के पोखरे में बनमुर्गियाँ चहकतीं । रात को सियार बोलते । कुत्ते रोते। लोगों का कहना था कि यह सब भयानक अपशकुन है। कई दिनों तक शौच-मैदान के सिवा लोग घरों से बाहर नहीं निकले। घरों में रात भर दीये  जलाए जाते। सोते बच्चे रातों को अचानक चीख पड़ते। रात भर स्त्रियाँ पतियों से चिपकी रहतीं। कहीं किसी से भेंट होने पर लोग एक-दूसरे का रुख भांपते, फिर सम्हल कर फुसुर-फुसुर बातें करते -
'बाल्हा रे! ऐसा इस्टीडन्ट? '
'महराज सोनबरसा में ऐसा कब्भी नहीं हुआ ।'
'ई बइअवा साला महाकारनी लौंडा है। चाहे जो करा दे।'
'क्या कहा पुलुस ?'
'भागो महराज पुलुस का क्या भरोसा? '
'पता नहीं ससुरे क्या बात-बेबात पूछें ।'
मृतक संस्कार हो चुका था। दसवें दिन
होने वाली शुध्दि और तेरहवें दिन होने वाले भोज सम्बन्धी कर्म-कांड अभी बाकी थे। हरखू का बड़ा लड़का बम्बई से आ गया था। सैयद अदालत में हाजिर हो चुके थे। गाँव का जनजीवन अभी सामान्य नहीं हो पाया था कि एक दिन गाँव वालों ने उसे देखा। उसने शायद किसी को नहीं देखा... । सूरज निकलने में देर थी। उजाला फैल चुका था। आकाश में कौओं के झुण्ड दक्खिन की ओर जा चुके थे। गाँव के नर-नारी, बच्चे-बूढ़े पेट साफ करने और पगडंडियों को गन्दी करने की गरज से गाँव से बाहर निकल रहे थे। प्रथम दृष्टि शास्त्री जी की पड़ी। देश के एक पूर्व प्रधानमन्त्री की तरह ठिगने होने की वजह से लोगों ने उन्हें यह उपाधि दे दी थी। शास्त्री जी ने उपाधि की मर्यादा के अनुसार निरंतर तालव्य 'श' बोलने का अभ्यास कर लिया था। तुरंत उनहोंने सारी सुर्ती थूक दी। नाक पर गमछा रख लिया और बुदबुदाये -
 'राम-राम ! महा अशुभ! पितरघाती!'
नौरंगी बहू के पेट में मरोड़ थी। लेकिन
वह भी पल भर के लिए ठिठक गयी- 'पिच्च'। सारी घृणा थूककर वह आगे बढ़ गयी। लगभग इसी तरह सबने उसे देखा।उसने किसी को नहीं देखा। 'माई' कहने की विफल चेष्टा में 'बाँईऽऽबाँईऽऽ!' चिल्लाता चला जा रहा था वह। खेतों की मेड़ों पर लड़खड़ाता,सम्हलता, फिर वेग से चल देता। जिस समय उसने गाँव में प्रवेश किया, बछड़े रस्सी तोड़ डालने की कोशिश में कुलांचे भर रहे थे। गायों के थनों में दूध की उत्तेजना भर गयी थी। ...लेकिन वह इन सबसे बेखबर था। बस 'बाँईऽऽ बाँईऽऽ' चिल्लाता चला जा रहा था। सुबह की नम हवा, चिड़ियों की चहचह और गाँव की अलसायी शांति को उसकी चीत्कार नुकसान पहुंचा रही थी।
गाँव के बाहर उत्तर की ओर बंदरहिया बारी है। बंदरहिया बारी में
न तो बन्दर हैं,न बारी। शायद कभी बन्दर भी रहे हों और बारी भी। अब तो केवल नीम, बबूल,गूलर और पीपल के कुछ पेड़ बचे हैं। झाड़-झंखाड़ । कम ही कोई उधर जाता है। भागते-भागते वहीँ गिर पड़ा था बई। दिमाग बिल्कुल सन्न ... । एक गहरा अँधेरा दिमाग में भरता जा रहा था। उस अँधेरे में कुछ भी नहीं दिख रहा था। कुछ देखने, करने, सुनने, बोलने की इच्छा भी नहीं महसूस हो रही थी ... ।
आराम... । बहुत आराम मिल रहा था... । तन-मन पूरी तरह ढीला ... । अनंत विश्राम... । वह अचेत हो गया... । कई दिन, कई रात वह इसी तरह पड़ा रहा... । कभी सूरज की किरणें या बारिश की तेज बौछारें जगा देतीं। भूख-प्यास की अवश प्रेरणा से वह इधर-उधर टहलता, लड़खड़ाते हुए। पीपल के फल, निबोली, बबूल की पत्तियां - जो भी मिल जाता, खा लेता। धरती के गड्ढों में जगह-जगह बरसाती पानी भर गया था। पानी में कुंजीबेरा के दूधिया रंग वाले फूल खिल गये थे... । वह पानी पी लेता। कुछ देर कुंजीबेरा के फूलों को निहारता... । फिर सो जाता...। दिन में चील, कौए और गीध मंडराते। रातों में मेढक और झींगुर बोलते। सियार 'हुआ-हुआ' करते। तरह-तरह के जलजीव और वन्यजीव निकलते। वे उसे सूंघते-चाटते। चलती हुई सांस को महसूस करते। उसके जिस्म में कोई हरकत न होती। उसकी निर्भय अहिंसा पर वे चकित होते और अपनी राह चले जाते, बिना कोई नुकसान पहुँचाये। कभी-कभी नींद खुलने पर बड़ी मुश्किल होती उसे। सोनबरसा के पास ही सोहागी पहाड़ था। सोहागी की चोटियों को काटकर कोई कारखाना बनाया जा रहा था। आये दिन डायनामाइट के धमाके होते। धरती काँप उठती... । वह बुरी तरह डर जाता। दिमाग में तरह-तरह के दृश्य तैरने लगते... । कहीं बहुत से लोग गिर गये हैं... । उनके सिर के टुकड़े बिखरे हैं ... । खून के फौव्वारे बह रहे हैं...। डर कर वह भागने लगता है इधर-उधर... । हर जगह धमाकों की गूँज... । हर जगह धरती कांपती... । कहाँ जाए... ? फिर दिमाग सन्न... । गहरा अँधेरा दिमाग में पसरने लगता... । इस अँधेरे में कुछ भी न दिखता... । कुछ भी सुनायी न देता... । वह अचेत हो जाता... ।
             ...इस बीच कुछ सपने देखे उसने। सपनों का वर्णन संभव नहीं है। वर्णन के लिए भाषा के सिवा कोई साधन नहीं है, जबकि सपने भाषा में नहीं देखे थे उसने। या कम से कम इस भाषा में नहीं देखे थे, जिसमे उनका वर्णन किया जा रहा है -
                                                            प्यास.... । बहुत तेज प्यास.... । गला सूख गया है। जीभ तालू से चिपक गयी है। जान चली जायेगी बिना पानी के।....पोखरा पास में है। वह दौड़कर पहुँचना चाहता है वहां...। पूरी ताकत से कदम उठाता है। लेकिन आगे नहीं बढ़ पाता... । हवा का बहुत तेज झोंका ऊपर उड़ा ले जाता है। ...फिर वह गिर जाता है। पोखरा फिर उतनी ही दूरी पर, जितना पहले था... । बार-बार यही सिलसिला... । अंत में उसे लगा कि छलांग लगा कर नहीं पहुंचा जा सकता पानी के पास... । प्यास बुझाने के लिए लेट कर, धरती को पूरी तरह पकड़ कर ही जाना होगा पोखरे तक... । छाती के बल घिसट कर वह पोखरे के किनारे पहुँच जाता है। ...स्थिर शांत जल... । वह अंजुरी डुबोना चाहता है कि अचानक चौंक जाता है। ....पानी में एक चेहरा... । ...अरे यह तो उसका अपना ही चेहरा है। वह हंसता है और पानी में अपनी निर्मल हँसी का प्रतिबिम्ब देख कर मुग्ध हो जाता है। ...बिना पानी पिए जिया नहीं जा सकता। अंजुरी डुबोने से निर्मल हँसी का अपना ही प्रतिबिम्ब टूट सकता है। क्या किया जाय...? ...एक अजीब कशमकश में फंस जाता है वह। प्राण या प्रतिबिम्ब...? ...आखिरकार वह अंजुरी डुबो देता है... । पानी में हलचल हुई। प्रतिबिम्ब टूट गया... । डूबते सूरज की लाली से लाल पानी में होंठ, दांत, आँखें - अलग-अलग हो गए। वे टेढ़े-मेढ़े होकर तैरने लगे... । ...बहुत उदास हो गया वह। थोड़ी ही देर में पोखरे का पानी फिर स्थिर हो गया। उसे फिर अपना प्रतिबिम्ब दिखने लगा। ...अरे यह क्या? पोखरे के किनारे की कीचड़ हिलने लगी...। ...धीरे-धीरे कीचड़ ऊपर उठने लगी। ...नहीं-नहीं... । यह कीचड़ नहीं है...। कौन है यह...? कौन है यह...? कौन...? चम्पा... । वह बहुत खुश हो गया। बहुत खुश... । वह कहना चाहता है कि चम्पा मैंने अपनी सूरत देख ली। आइने में नहीं,पानी में। ...लेकिन मुंह से बोल फूटते ही नहीं... । चम्पा खिलखिला रही है। वह चम्पा के गाल छूना चाहता है। लेकिन जितना हाथ बढ़ाता है, चम्पा की लम्बाई उतनी ही बढ़ती जाती है। सिर उठा कर चम्पा के होठों और दांतों के बीच बहता जादू देखना चाहता है वह। लेकिन दृष्टि चम्पा के मुंह तक नहीं पहुँच पाती। बहुत सिर उठाने के बाद भी वह चम्पा के सीने से ऊपर नहीं देख पाता। अरे यह क्या...?चम्पा के शरीर में तो यह अंग नहीं था... । स्तन ... । खुले हुए... । स्तनों से दूध की धार बहने लगी.... । नहीं यह चम्पा नहीं है! फिर कौन है...? दूध की धार में नहा उठा वह... । अरे यह तो माई है। माई ! माई! वह खिलखिलाना चाहता है। लेकिन बोल नहीं फूटते ! पूरी ताकत लगा कर एक बार चीखता है। मुंह से निकलता है - 'बाँई...'। ...नींद टूट गयी। सपना नहीं टूटा... । या कम- से- कम सपने का प्रभाव ख़त्म नहीं हुआ। सपने को असलियत समझ रहा था वह। बार-बार 'बाँईऽऽ-बाँईऽऽ!' चीख रहा था। सूरज निकलने में अभी देर थी। लेकिन उजास फैल चुकी थी। बंदरहिया बारी के पेड़ों पर बैठे पंछी चहक रहे थे। उसकी चीख से पंछी एकबारगी चुप हो गये। फिर और तेजी से चहकने लगे...। वह इन सबसे बेखबर था। एक उन्माद - सा छा गया था मन में। एक ही सनक - माई से मिलने की, उससे लिपट जाने की। वह गाँव की ओर दौड़ा जा रहा था।
पति की मृत्यु के बाद से मिसिराइन का अजब हाल था। रात भर नींद नहीं आती थी।
 पता नहीं क्या-क्या बिसूरती रहतीं और भोर होते-होते सो जातीं। फिर दिन चढ़ने पर अचकचा कर उठ जातीं। गृहस्थी की सार-संभार भी नहीं कर पाती थीं। रोटी-पानी बड़ी बहू कर देती। मिसिराइन आँगन में सोयी थीं। दरवाजा खुला था। आँगन में जूठे बर्तन इधर-उधर बिखरे थे। बड़ी बहू उन्हें इकट्ठा कर रही थी। बड़ा लड़का शौच-मैदान के लिए चला गया था। मझले ने गाय का दूध दुह लिया था। बछड़े की रस्सी खोल दी थी और धान के खेतों को देखने चला गया था। बछडा बार-बार गाय के थन में मुंह मार रहा था, लेकिन दूध नहीं निकल रहा था...। 'बाँईऽऽ!' 'बाँईऽऽ!' की दहाड़ मारता बई सीधे आँगन में पहुंचा। बड़ी बहू चौंक गयी। नंग-धड़ंग बई को देख कर बरबस उसके मुंह से निकल पडा-
'हाय दैया!'
 बई को कुछ नहीं दिख रहा था। बस माई दिख रही थी।
 अजीब उन्माद...। सोयी हुई माई से लिपट गया वह। अचकचा कर माई ने आँखें खोलीं। सारी दुर्दशा का कारण साक्षात लिपटा था। माई ने झटक दिया। बई चारपाई से नीचे गिर पडा। फिर माई घूंसे बरसाती रही। रोती रही। ...बहुत दिनों के बाद माई की छुअन मिली थी। घूंसे बहुत भले लग रहे थे बई को... । आंसुओं की बूँदें शरीर पर पड़ रही थीं। उसे माँ के दूध में नहाने की अनुभूति हो रही थी... । गुदगुदी हो रही थी। वह खिलखिला रहा था और 'बाँईऽऽ !' 'बाँईऽऽ !' चिल्ला रहा था। माई ने घसीट कर उसे द्वार पर बैठा दिया। लेकिन वह माई को छोड़ नहीं रहा था। लिपट गया था माई से और खिलखिला रहा था। इस बीच गाँव के बड़े-बुजुर्ग हरखू के द्वार पर इकट्ठा हो गये। उन्होंने बई के चाचा रामजियावन को भी साथ में ले लिया था। गाँव की परम्पराओं को सुरक्षित रखने का जिम्मा था उनके सिर पर। काफी गंभीर थे सब लोग। कौतूहलवश कुछ बच्चे भी आ गये। बुजुर्गों ने उन्हें डांटा -'भागो यहाँ से! तुम्हारा क्या काम ?'
बच्चे फिर भी डटे रहे। शास्त्री जी कड़क मिजाज के आदमी थे। धार्मिक कर्मकांड में
 किसी तरह की त्रुटि, गाँव के रीति-रिवाज और जात-पांत की मर्यादाओं का किसी भी तरह का उल्लंघन देख कर आपे से बाहर हो जाते। मनुस्मृति पढ़ते थे। उन्होंने कहा-
 'ऐशे नहीं मानेंगे ये।'
फिर बच्चों की ओर मुखातिब हो कर दांत पीसते हुए कड़क कर बोले -
'भाग जाओ शरऊ नहीं तो हुमक कर चढ़ बैठेंगे। तुम्हारा यहाँ का परोजन है ?'
बच्चे भयभीत हो कर भाग गये...। अन्य लोगों ने शास्त्री जी की बात का समर्थन किया-
'महराज बच्चों की दोस्ती जान का खतरा।' 'बालक-बर्रै एक समाना।' आदि-आदि।
बई को कुछ नहीं दिख रहा था। वह अब भी माई से लिपटा था और खिलखिला रहा था।
 माई उसे झटकने की कोशिश करती तो 'बाँई-बाँई' कहते हुए और कसकर चिपक जाता। माई का अजब हाल था। आंसुओं की धार बंद नहीं हो रही थी। आवाज निकल नहीं रही थी। कभी बई को झटकना चाहती। कभी खुद भी कसकर चिपक जाती उससे... । लोगों के सामने समस्या थी। बई को उसकी माई से अलग कैसे किया जाय ? उसे छुआ नहीं जा सकता था ?धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। रामजियावन ने उपाय खोज निकाला। एक डंडा कसकर मारा बई की पीठ पर। बोले-
 'मार के आगे भूत नाचते हैं सरऊ ! क्या मुंह दिखाएँगे जात-बिरादरी में ?
आँय ? बेटा-बेटियों का बियाह कैसे होगा ? कुलच्छनी ससुर !'
वे बड़ी देर तक बड़बड़ाते रहे।
डंडे की चोट से बई का सपना टूट गया... । अचानक उसे सब कुछ याद आने लगा। गाँव के जिम्मेदार बुजुर्गों के चहरे देखे उसने। उसे लगा कि अभी इन लोगों के हाथों में कोई खिलौने जैसी चीज आ सकती है। धमाका हो सकता है। खून के फौव्वारे फूट सकते हैं। ...बुरी तरह डर गया वह। मुंह से चीख भी नहीं निकल सकी और भाग गया। माई ने दौड़ कर पकड़ लिया उसे। बड़ा बल आ गया था माई के शरीर में। बोली - 'कहाँ जा रहा है ? चल बैठ घर में !'
शास्त्री जी ने फैसला सुनाया-
'देखो हरखू बहू, तुम्हारे लड़के ने शुअर का मांश खाया है।
 मैंने बहुत शे शाश्तर-पुराण बांचे, इश का कोई पराश्चित नहीं है।
 छत्री मांश-मदिरा का शेवन कर शकता है, परंच बाम्हन के लिए
 महापाप है। फिर शुअर का मांश ? राम-राम!'
 इतना कह कर उन्होंने जमीन पर थूक दिया। फिर बोले-
'हाँ तुम्हारा पराश्चित हो शकता है। तुम्हें उशने छुआ है, तुम पंचगब्ब पियो।
दूध में शंखपुहुपी उबाल कर पियो। तभी हम लोग तुम्हारे भोज में खायेंगे।
 रही लड़के की बात तो अपना लड़का शबको पियारा होता है। मुदा इश
कारनी लड़के के मोह में न फंशो । यह अभगुतमूल नछत्तर में पैदा हुआ है।
 बाप को लील लिया, यह तुमने देखा ही। यदि यह घर में रहेगा तो पूरे बंश
का बिनाश हो जाएगा। जो हमारा करतब था, हमने शमझा दिया। बाकी तुम जानो।'
हरखू बहू बोलीं-
'ऐसा न करो पंडीजी ! कुछ तो उपाय खोजो!'
इतना ही कह पायीं वे और रोने लगीं... ।
हरखू का बड़ा लड़का धीरे से बोला-
'आज-कल होटलों में हर जाती के लोग सब कुछ खाते-पीते हैं।'
शास्त्री जी तमतमा उठे-
'होटल-फोटल की बात छोड़ो। शोनबरशा की बात करो। हमारे गाँव की
 बंभनमंडली का आचरण पूरे इलाके में बखाना जाता है। इशी के बलबूते
 हम लोगों को और गाँव वालों शे अधिक दैजा-दहेज़ मिलता है। शमझे ?'
आम तौर पर सरपंच दयालु आदमी थे। दखल की हुई जमीन, बंधुआ मजदूरी और उनके
प्रभुत्व के खिलाफ बोलने वालों को छोड़कर बाकी सब के लिए वे बहुत भले आदमी थे। अपने आदमियों के लिए जायज-नाजायज सब कुछ करने के लिए तैयार रहते। हरखू बहू का रोना देख कर वे पसीज उठे। उन्होंने शास्त्री जी को घुड़का-
'सास्त्री जी हरखू हमारे आदमी थे। हर चीज का परास्चित होता है।
जरा होस-हवास में बाँचो किताब। कोई रास्ता निकल आयेगा। तुम
पंचगब्ब, दूध और संखपुहुपी पिलाने को कहते हो। मैं कहता हूँ नहला
 दो साले को उसी में। तो भी नहीं होगा परास्चित ? क्यों भाई तुम लोग बोलो ?'
प्राइमरी स्कूल के मास्टर रामतवंकल बोले -
'अरे भाई जून - जमाना बदल रहा है और फिर जब सरपंच
 साहब कह रहे हैं तो जरा सोच-समझ कर बोलो सास्त्री जी। '
शास्त्री जी दबे मन से बोले-
'उपाय तो कुछ नहीं है। मुदा शमरथ को नहि दोश गोशांई।
जब शरपंच शाहब कहते हैं तो इशको भी शंखपुहुपी और
 पंचगब्ब पिलाओ। शतनरायन की कथा शुनाओ। अब हम क्या
 कहें ? मुदा छोकरा कारनी है। इश बात को शमझ लो। '
सरपंच ने कहा-
'कुछ कारनी - वारनी नहीं। देखो हरखू बहू, सास्त्री जी जो कह रहे हैं, सो करो
 और इस ससुरे को घर में रखो। अब कोई भच्छाभच्छ न खाने पाए। न कोई
 खुराफात करने पाए। घर से निकले तो हड्डी - पसली एक कर दो साले की।'
बई का प्रायश्चित हुए कई साल बीत गए हैं। झरबेरियों में अब भी फल लगते हैं।
चम्पा के गालों की चमक और मुस्कान का जादू और भी बढ़ गया है। बिसाती अब भी आइने बेचता है। लेकिन अब उसे किसी चीज की जरूरत नहीं। अब वह गाँव में नहीं मंडराता। सारे दिन अपने द्वार पर बैठा रहता है। निर्मल हँसी अब नहीं हँसता। उच्चारण की विफल चेष्टा और सफल संकेत नहीं करता। किसी आदमी को देख कर झट से भाग जाता है और कोठरी में छिप जाता है। ...शरीर में सूजन बढ़ गयी है। लोगों का विचार है कि अब वह सुधर गया है।

[ 'अभिप्राय ', इलाहाबाद, संयुक्तांक - २४ -२५ में प्रकाशित।]