बुधवार, 7 जुलाई 2010

शिवशंकर मिश्र की कहानियाँ - मूरतें

[3] 
मूरतें -
एक पुरानी धार्मिक इमारत ढहा दी गयी थी और उससे भी पुरानी एक दूसरी धार्मिक इमारत के खँडहर धरती के गर्भ में गंभीरता से खोजे जा रहे थे। लाशों से भरी रेलगाड़ी की बोगियां एक शहर से दूसरे शहर पहुँच चुकी थीं। चलती गाड़ियों से लड़के फेंके जा रहे थे। रेलगाड़ियाँ खूनी हो गयी थीं। अखबारों में भूख से मरने वालों की खबरें नदारद थीं। उनकी जगह दंगों में मरने वालों की खबरों ने ले ली थी। ...करीब बीस साल बाद मैं अपने गाँव जा रहा था। जरूरी था। भाई ने पत्र में लिखा था कि बेटे का ब्याह है और जमीन का बँटवारा होना है। मौके से सब रिश्तेदार रहेंगे। रिश्तेदारों के सामने बाँट-बखरा होने से बाद में कुछ कहने-सुनने की बात नहीं रहेगी। ...बँटवारा है तो ख़राब चीज, लेकिन महानगर में बीस साल रहकर जमीन के छोटे से टुकड़े का महत्त्व समझ में आ गया था। ...सारे भय और आतंक के बावजूद जमीन के एक टुकड़े के मालिकाना हक़ का एहसास अच्छा लग रहा था... । डीजल, पेट्रोल और तकनीक के बाद एक जमीन ही तो है, जिसकी कीमत दिनों दिन बढ़ रही है।...अपनी जमीन। ...अपना गाँव। मेरे मन में गाँव की छवियाँ  तैर उठीं... । गाँव... । खेत... । ताल... । ताल की कच्ची मिट्टी... । बचपन... । मिट्टी की मूरतें... । सादिक... । मैंने जो भी खिलौने बचपन में खेले थे, सब सादिक के बनाये थे। ...मेरे खेत ताल के किनारे हैं। ...ताल में कुंजीबेरा... । महानगर की भीड़ में चलते हुए भी मरे मन में कुंजीबेरा खिल गये। ...कुंजीबेरा से जुड़ा बचपन का वह प्रसंग। ...मुंशी जी पढ़ा रहे हैं...
'बीती रात कमलदल फूले... ।'
हम लोग पढ़ रहे हैं...
'बीती रात कमंडल फूले  ... ।'
'गधाऽऽ !'
- मुंशी जी ने सब की पिटाई की...फिर श्यामपट्ट पर कमल का फूल बना दिया ... 'कमंडल नहीं कमलदल...!' मैंने कमल का फूल देखा ही नहीं था। ...एक दिन बाबा के साथ खेतों की ओर गया। ...ताल में कुंजीबेरा के फूल....! ...कमल। ...मेरा कमल... । मेरे मन में कुंजीबेरा ही कमल हो गया। एक दिन अकेले गया। घुस पड़ा ताल में। शायद बीच वाले कुंजीबेरा और बड़े हों... । मैं घुसता जा रहा हूँ... । कुंजीबेरा के ढेर सारे फूल! ...मैं फूल देख रहा हूँ। बस अब थोड़ी ही दूर रह गया फूलों का झुरमुट... । अरे!...अरे..!पानी... नाक तक... । ...अब...अब नाक से ऊपर। गुडुप...गुड़... गुड़ गुडुप...गुडुप। ...अजीब विकलता... । मैं पुकारना चाहता हूँ किसी को, लेकिन बोल नहीं पा रहा हूँ... । मुंह खोलते ही पानी अन्दर घुसने लगता है। कुछ सुनाई नहीं  पड़ रहा है। ...कुछ दिख नहीं रहा है। ..सारी पीड़ाएं सिमटकर घुसती जा रही हैं कपाल में... । गहरा अन्धेरा ... । ...भयानक पीड़ा... । ...कोई धक्का दे रहा है। ...फिर धक्का। ...कोई मुझे अपने कंधे पर लाद रहा है। ...मेरा पेट दबा रहा है कोई। ...मुंह से पानी निकल रहा है। ...आँखें खुलीं। अरे! सादिक चच्चा...! उस दिन से सादिक रोज मुझे कुंजीबेरा की माला और मिट्टी के खिलौने देते थे सांझ को, जब वे सिंवान से लौटते थे पशुओं के संग ।  पता नहीं अभी सादिक होंगे या नहीं ? ...होंगे भी तो कैसे होंगे? ...साढ़े सात बज रहे हैं। ...शाम हो गयी होगी गाँव में। यहाँ, महानगर के इस जंक्शन पर न तो सुबह होती है, न शाम। ... हमेशा एक सा उजाला... । उफ! इतनी भीड़! लोगों का विशाल झुरमुट...। धक्का... । फिर धक्का... । ...मन की छवियाँ खो जाती हैं... । बचते-बचाते  अपना डिब्बा तलाशता हूँ। लेकिन इस भीड़ में कोई कैसे बच सकता है धक्का-मुक्की से? काफी मशक्कत के बाद अपनी बर्थ पर पहुँच पाया। नीचे की बर्थ मिली है। पानी की बोतल और बैग वगैरह यथास्थान रखकर बैठ गया मैं। अच्छा रहा। समय से आ गया। गाड़ी  ने सीटी दे दी। कुछ यात्रियों को छोड़ने उनके जो  परिजन आये थे, उतरने लगे। ...धक्का! धक्क धक्क .... धक्क धक्क... । लम्बी साँस... । जूतों के फीते खोलना चाहता हूँ, लेटने के लिए। मत खोलो फीते, मन का एक कोना कहता है। पता नहीं कब क्या हो। ...जलती हुई आँखों को आराम देने के लिए पल भर पलकें बंद किये रहता हूँ। ...आँखें खोलो। आंखें खोलो। ...यह भीतर की आवाज है। मैं आस-पास के लोगों के चहरे देख लेना चाहता हूँ। सामने की नीचे वाली बर्थ पर दो लोग बैठे हैं। दोनों चुप हैं। दोनों अलग-अलग हैं। मेरे ऊपर की बर्थ पर कोई अभी से लेता है। शायद बीमार है। मेरी तरफ की सबसे ऊपर वाली बर्थ पर एक अधेड़ झुक कर बैठे हैं और चश्मा लगाए कुछ लिख रहे हैं। उन्हें देखने के लिए मुझे गर्दन खूब बांयी ओर घुमानी पड़ी और आँखों को अस्वाभाविक ढंग से ऊपर ले जाना पडा। यह लगभग अभद्रता ही थी, जिस पर मुझे थोड़ी झेंप भी आयी। कोई किसी को नहीं देख रहा है। या न देखने का दिखावा कर रहा है हर आदमी। सब एक दूसरे को देखते हैं, लेकिन नजर बचा कर। कभी धोखे से नजर मिल जाती है, तो लोग  झटके से गर्दन घुमा लेते हैं। मैं खुद कितना छुईमुई हो रहा हूँ! ...इन दिनों रेलगाड़ी का सफर! वह भी रात में! बाप रे...! मैं हरगिज ऐसा न करता। लेकिन और करता भी क्या? भतीजे का ब्याह कोई रोज-रोज तो होगा नहीं। गर्मी की छुट्टियां। शादी-ब्याह। यात्रियों की आपाधापी। इसी गाड़ी में रिजर्वेशन मिल पाया। ...गाडी रफ्तार पकड़ चुकी है। ...धक धक धक धक धक... । पीछे की बर्थ पर बातें चल रही हैं -
'सीधी सी बात है। जब दो देश बन ही गये, तो हिन्दू हिदुस्तान में रहें और मुसलमान पाकिस्तान में।'
'और मस्जिदों का क्या होगा?'
'हिन्दुस्तान की मस्जिदें गिरा दो और पाकिस्तान के मंदिर गिरा दो।'
मैं इन लोगों के चहरे नहीं देख पा रहा हूँ। अब मैं जूतों के फीते खोलकर लेट जाता हूँ। दिन भर की दौड़-धूप के बाद जलती हुई आँखें अपने आप मुंद  जाती हैं। ...आवाजें भीतर कहीं डूब जाती हैं... । ...छवियाँ जाग जाती हैं...। गाँव की...। जमीन की... । मिट्टी की... । मूरतों की... । सादिक की... । सादिक के बिना गाँव की तस्वीर बन ही नहीं पा रही है... । जिस तरह फुट्टू लोहार के बिना हर-फार नहीं बन सकता, गोलई नाऊ के बिना हजामत नहीं बन सकती, ननकाई सोनार के बिना गहना-गुरिया नहीं बन सकता और घुरहू पंडित के बिना शादी-ब्याह नहीं हो सकता, उसी तरह सादिक के बिना गाँव की तस्वीर नहीं बन सकती... । ...बनने लगीं... । बनने लगीं तस्वीरें...। गाँव की...। सादिक की... । घुटनों तक धोती। मारकीन की बंडी। कंधे पर गमछा। घुटा सिर। मुंड़ी दाढ़ी। नीचे झुकी खिचडी मूंछें। ...असाढ़ में किसी का छप्पर उठवा रहे हैं सादिक। ...आंधी-पानी में किसी की टूटी बंड़ेर में थूनी लगा रहे हैं। ...सावन-भादों की आधी रात को किसी के घर में निकले काले सांप को मार रहे हैं। ...गर्मी में किसी के घर आग लग गयी है। सादिक आग बुझा रहे हैं। ...किसी की गाय के पेट में बच्चा फँस गया है। चलो सादिक के पास। हर काम को करने की जुगत है सादिक के पास... ।
...छुक छुक छुक छुक छुक छुक...
गाड़ी स्टेशनों पर रुकती। झटका लगता। आँखें खुल जातीं। तरह-तरह के लोग घुस आते डिब्बे में। ...मैं डर जाता। सोये हुए लोग जाग जाते। शायद हर आदमी डर रहा है। कोई नहीं सो रहा है। सब यूं ही आँखें बंद किये हैं। ज्यों ही नए लोगों की भीड़ घुसती है, पहले से बैठे या लेटे हुए लोग एक-दूसरे को देखने लगते हैं। अब वे झटके से गर्दन नहीं घुमाते। पल दो पल नजरें मिलाकर नये आगंतुकों के बारे में अपनी -अपनी आशंकाओं को आपस में बाँटते हैं। ...मैं खुद कितना बदल गया हूँ। आदमी के चहरे पर जिन साम्प्रदायिक चिन्हों को देखना मैंने बहुत पहले छोड़ दिया था, आज उन्हीं की तलाश कर रहा हूँ लोगों के चेहरों में।
' चाऽऽई ...!' चाऽऽई...!'
'पुड़ीऽऽऽ!' 'पुड़ीऽऽऽ !'
'पूड़ी सब्जीऽऽ पूड़ी सब्जीऽऽ!'
सीटीऽऽऽ... । झटका... ।
धक्क धक्क...धक्क धक्क...धक धक धक धक... ।
गाड़ी महानगर से बहुत दूर निकल आयी है। मेरे आस - पास के लोग फिर सो गये हैं। या शायद आँखें बंद कर ली हैं उन्होंने। अब सामने वाली बर्थ खाली है। जो लोग उस पर बैठे थे, अब ऊपर अपनी - अपनी बर्थ पर चले गये हैं। मेरी तरफ की सबसे ऊपर वाली बर्थ के अधेड़ अब भी कुछ लिखे जा रहे हैं। भीतर उजाला है। बाहर काली रात... । कहीं कहीं कुछ टिमटिमाती रोशनियाँ दिख जाती हैं। गाँव होंगे... । गाँव, खेत, पेड़, ताल - पोखरे... । सब डूबे हैं अँधेरे में। ...सबेरा होगा। चरवाहे पशुओं के झुण्ड लेकर आ जायेंगे। पेड़ नाचने लगेंगे। जलती हुई आँखों की पलकें मुंद जाती हैं। ...माटी की छवियाँ जाग उठती हैं। ...मिट्टी की मूरतें। तरह-तरह की मूरतें। मोटा सेठ, ठिगना कारिन्दा, चिरई -कौआ, मोटर-गाड़ी, बैलगाड़ी... । ...सिंवान में पशुओं को संगोह कर सादिक एक पेड़ की छाया में बैठे हैं। पोखरे से कच्ची मिट्टी लेकर मूरतें बना रहे हैं। पशुओं पर भी नजर है। किसी की फसल न उजाड़ दें। दोपहर हो गयी है। बाकी चरवाहों को गाँव भेज दिया है उन्होंने  खाने के लिए। सादिक का खाना भौजाई किसी चरवाहे से भेज देंगी। रोटी--अचार  की पोटली। पानी पोखरे का। ...मूरतें धूप में सूख रही हैं। ...एक और बनानी है। नेता जी हेलीकाप्टर से आये थे। तभी से है दिमाग में... । ...बन गयी। ...बन गयी हेवलीकलट्टर की मूरत। अब बस। अरे...! धूप में मूरतें कहीं-कहीं दरक गयी हैं। सादिक कच्ची मिट्टी से मूरतों की दरारें भर रहे हैं। फिर सुखाना होगा इन्हें धूप में। अब कुंजीबेरा की मालाएं बनानी हैं... । सांझ हो गयी। गाँव से बाहर धूल उठ रही है। भीतर धुँआ। सादिक पशुओं के संग गाँव में घुस रहे हैं। गलियों में बच्चे खेल रहे हैं। सादिक उन्हें मूरतें और मालाएं बाँट रहे हैं। बच्चे खिल उठे... । उनकी ख़ुशी देख कर सादिक खिलखिला रहे हैं...।
...छुक छुक छुक छुक छुक छुक... ।
गाड़ी सीटी दे रही है। मेरे पीछे की बर्थ पर लोग बातें कर रहे हैं -
'क्यों, रफ्तार कम हो रही है न ?'
'हाँ, शायद कोई स्टेशन आने वाला है।'
धक्क...धक्क... धक्क...चींऽऽऽ!
'कौन सी जगह है भाई ?'
'पता नहीं।'
'यहाँ तो कोई चाय वाला भी नहीं है।'
'आउटर है। '
थोड़ी देर गाड़ी खड़ी रहती है। सब चुप...। गाड़ी सरकती है। अब स्टेशन। कई लोगों ने पढ़ा -
'अलीगढ़।'
' अलीगढ ?'
'हाँ, अलीगढ़।'
'चायऽऽऽ! चायऽऽऽ ! चायऽऽऽ ! चायऽऽऽ !'
'पुड़ेऽऽऽ! पुड़ेऽऽऽ ! पुड़ेऽऽऽ ...!'
चाऽऽईऽऽ चाऽऽईऽऽ ...!'
महिला एनाउंसर की आवाज। कोई ऊंघता हुआ आदमी कह रहा है-
'भाई साहब लाइट बुझा दीजिये।'
'जलने दीजिये।'
'जलने दीजिये।'
'उजाला जरूरी है।'
तरह - तरह की आवाजें और तरह-तरह के मत।
मैं भी नहीं चाहता कि लाइट बुझाई जाय। उजाले के पक्ष में ज्यादा लोग हैं। एक बेकाबू भीड़ घुसी आ रही है। उजाले में मैं सब की शिनाख्त कर लेना चाहता हूँ। हर चहरे को गौर से देख रहा हूँ। दाढ़ी... । मूंछ... । झुर्रियां... । दाग... । लम्बे-लम्बे बाल... । खूँखारियत... । मासूमियत... । हताशा... । जिन्दगी... । हर चेहरा आदमी का है।
धक धक धक धक... ।
गाड़ी खड़ी है। एक दूसरी गाड़ी जा रही है।
सामने की बर्थ पर एक युवती आ गयी। उसकी गोद में बच्चा है। ...क्या और कोई नहीं है इसके साथ? ...है। ...यह नौजवान शायद इसका पति है। उसे पीछे की बर्थ मिली है। दोनों आँखों ही आँखों में कुछ कहते हैं। नौजवान अपनी बर्थ पर चला जाता है। मेरे सभी पड़ोसी युवती को घूरते हैं। मैं भी, लगातार लिखने वाले अधेड़ भी और ऊपर का बीमार भी। क्या जाति होगी इसकी...? क्या धर्म होगा इसका...? पहनावे से कुछ समझ में नहीं आ रहा है। पीछे की बर्थ पर बातें चल रही हैं -
'आदमी के साथ सबसे बड़ी मुश्किल यही है कि उसे
 चहरे या पहनावे से नहीं समझा जा सकता।'
'अरे भाई चहरे की बात मत करो। कौन जाने कब एक जोड़ा मासूम
 आँखों वाला कोई चेहरा अपराजेय समझी जाने वाली मीनार को ढहा दे।'
अब भी मेरे सभी पड़ोसी युवती को घूर रहे हैं।
मैं भी, लगातार लिखने वाले अधेड़ भी और मेरे ऊपर का बीमार भी। सब उसकी जाति और धर्म जान लेना चाहते हैं। देख देखकर। सूंघ सूंघकर। बच्चा रोने लगता है। युवती उसे चुप कराती है। बच्चा चुप नहीं होता। रोता जा रहा है।
...सीटीऽऽऽ।
...झटका।
धक्क...धक्क...धक्क...धक्क।
चल पड़ी गाड़ी। ...बच्चा रोता जा रहा है।
युवती...युवती नहीं माँ। माँ चुप कराना चाहती है बच्चे को। बच्चा चुप नहीं होता। माँ बच्चे की आँखों में आँखें डालकर कुछ देर देखती है। बच्चे की आँखों में माँ उतर आई। माँ के आँचल में दूध उतर आया। बच्चा छिप गया आँचल में। माँ लेट गयी। दूध पिला रही है बच्चे को। न माँ किसी को देख रही है, न बच्चा। बच्चा चुप है। अब कोई किसी को नहीं देख रहा है।
छुक छुक छुक छुक... ।
गाड़ी चली जा रही है। मेरी  आँखों की जलन कम नहीं हो रही है। पलकें फिर मुंद जाती हैं। ...लीला हो रही है। गाँव में रामलीला हो रही है। आज बियाह होगा। मंडली मनीजर रामखेलावन जी माइक्रोफोन पकड़ कर बोल रहे हैं -
'भाइयों और बहनों एक बार प्रेम से बोलिए राजरामचन्द्र की...'
'जैऽऽऽ!'
'भाइयों-बहनों भगवान राम और माता जानकी के विवाह की लीला है आज। हमने लीला को और रोचक बनाने के लिए इस बार भगवान की बारात में हाथी ले आने की योजना बनायी थी। लेकिन बड़े दुःख की बात है कि चन्दा कम मिलने से हम हाथी नहीं ले आ सके। अब जैसी है भगवान की लीला है। प्रेम से देखिये। एक बार प्रेम से बोलिए राजारामचंद्र की...'
'जैऽऽऽ !'
छुक छुक छुक छुक छुक छुक छुक छुक... ।
...लीला शुरू। प्रार्थना चल रही है -
'रामसिया नमवा बड़ा अनमोल, बड़ा अनमोल, राधे गोविन्द हरी बोल हरी बोल... । '
प्रार्थना ख़तम। ... मंच पर नचनिया। भजन गा रहा है और नाच दिखा रहा है-
'दिखाया चीर कर सीना तो सीता राम लिक्खा था।'
अब ब्यास जी चौपाई गा रहे हैं। पर्दा गिरा। फिर उठा। दशरथ जी मंच पर। जनकपुर से दूत आये। पत्रिका बांची गयी। अब बारात सज रही है। बिंदा भगत की मंडली ने बीन बजाना शुरू कर दिया। लेकिन यह क्या...? पीछे के दर्शक चौंक गये। वे खड़े हो गये और शोर मचाने लगे -
'ह इ देखो! हाथी!'
'हाथी ?'
'हाँ रे देख पीछे। चला आ रहा है हाथी।'
कोई मंच की ओर नहीं देख रहा है।
...छुक छुक छुक छुक... ।
...रामखेलावन जी बार-बार मंच पर आकर बोल रहे हैं -
'एक बार प्रेम से बोलिए राजा रामचंद्र की ...'
'जय' बोलने वाला कोई नहीं। सब हाथी देख रहे हैं।
'भाइयों और बहनों कृपया शांती का सहजोग कीजै। भगवान की लीला है। विघ्न मत डालिए।'
लेकिन लोग रामखेलावन जी की बात पर ध्यान नहीं दे रहे हैं... ।
वे तो हाथी देख रहे हैं... । मझोले कद का हाथी... । पीठ पर सजीवन। हाथी धीरे-धीरे मंच के पास पहुँच रहा है। रामखेलावन जी, व्यास जी, दशरथ जी- सब चौंक पड़े। हाथी कभी रामखेलावन जी को धक्का मार रहा है, तो कभी किसी दर्शक को। जब मंच खाली होता, हाथी अपनी लीला दिखाता। मंच के एक कोने से दूसरे कोने तक दौड़ता। हाथी पर सवार सजीवन तरह-तरह की आवाजें निकालता -
'गरगत्त गरगत्त !'
'घिट पिट कीऽऽ घिट पिट कीऽऽ !'
सब भूलकर लोग हाथी देख रहे हैं । ...छुक छुक छुक छुक... ।
गाड़ी चली जा रही है। माँ सोयी है। बच्चा सोया है। ऊपर वाले सज्जन शायद बैठे-बैठे ही सो रहे हैं। पीछे की बर्थ पर बातें चल रही हैं। बाहर अँधेरा है। भीतर उजाला... । गाँव में मिट्टी के तेल वाली फोन्नोगैस का उजाला... । लीला ख़तम। अब हाथी परदे के पीछे जा रहा है। उसके पीछे-पीछे सभी दर्शक। ... सब जान लेना चाहते हैं कि कौन बना था हाथी और कैसे ? सजीवन को पीठ से उतार कर और झरेखू बांवारूपी के कंधे से हाथ हटाकर अंगड़ाई लेते हुए सादिक खड़े हुए।
'धन्नि है! धन्नि है सादिक!'
सादिक खिलखिला रहे हैं। उनके तम्बाकू से काले दांत साफ दिख रहे हैं...। ... छुक छुक छुक छुक... । झरेखू बांवारूपी चिल्लाया -
'अरे पहले मेरे मूड़ से सूँड़ तो उतारो!'
जल्दी-जल्दी सादिक उसके सिर से पुआल ठूंस कर बनाए हुए काले कपड़े का सूँड़ उतारते हैं। अपने शरीर से हाथी वाला काला झिंगोला उतार रहे हैं और झरेखू को निर्देश दे रहे हैं-
'हे झारेखुआ मेरी पिठांह से ई रसरी तो खोल और ई रजाई-गद्दा तो उतार!'
...छुक छुक छुक छुक छुक छुक ... । गाड़ी चली जा रही है।  सामने माँ सोयी है। बच्चा सोया है। सब सोये हैं। मेरे भीतर गाँव की छवियाँ जाग रही हैं... । रफ्तार कम हो रही है। शायद कोई स्टेशन आने वाला है। पीछे की बर्थ पर फिर बातें शुरू हो गयीं-
'कौन सी जगह आने वाली है?'
'पता नहीं...।'
सीटीऽऽऽ... ।
धक्क धक्क धक्क चींऽऽऽ... ।
'चाऽऽ चा गरम...चाऽऽ चा गरम... चाऽऽ चा गरम... ।'
'कौन सा स्टेशन है यार ?'
कई लोग नाम पढ़ते हैं । ...भीड़ अन्दर घुसी आ रही है। कुछ लोग उतर रहे हैं। झटके से ऊपर वाले महाशय की कापी गिर गयी और कई लोगों के पैरों के तले कुचल गयी। मैंने कापी उठायी। पन्ने खुल गए थे। हर पन्ने में लाल स्याही से 'रामराम' लिखा था। ...अरे यह क्या? कापी थमाते हुए महाशय मुझे इस तरह क्यों घूर रहे हैं?...तिलक लगे मस्तक पर इतनी सिकुड़नें ? ...चश्मे के भीतर से झांकती आँखों में इतनी नफरत ? ...ओह! शायद मेरी दाढ़ी! ...बाप रे! महीने में एक बार कैंची से दाढ़ी छोटी कर लेने का आलस लगता है आज अच्छी कीमत वसूलेगा। मेरा बार-बार मन करता है कि उठकर उन्हें नाम बता दूं। नाम बताने से  जाति और धर्म मालूम हो जाएगा और मैं सुरक्षित हो जाऊंगा। ...लेकिन बिना पूछे नाम बताना भी तो अटपटा लगता है। बच्चा कुनमुनाया... । हाथ-पैर चलाने लगा और रोने लगा... । भीड़ आ रही है, जा रही है। तरह-तरह के चहरे। लेकिन इस समय तो मुझे उन्हीं का चेहरा डरावना लग रहा है। सीटीऽऽऽ ... । धक्क धक्क ... । गाड़ी ने रफ्तार पकड़ ली। मेरे सामने की सबसे ऊपर वाली बर्थ पर लेटे हुए आदमी ने मुझसे जगह का नाम पूछा। बीच की बर्थ वाले ने टाइम पूछा। अब वे मुझे नहीं घूर रहे हैं। मैं लेट गया हूँ। बच्चा शांत है। माँ दूध पिला रही है । वे फिर 'राम राम' लिखने लगे शायद। मेरी पलकें फिर मुंद जाती हैं। ...सादिक भी लिख रहे हैं राम का नाम। ...लिखेंगे कैसे ? ...गा रहे हैं। ...होली जल रही है। ...सादिक की कमर में ढोलक बाँधी जा रही है। ...पहली फाग सादिक गा रहे हैं -
'लै लइए राम का नाम, पहिले देबी सारदा गाइ लइए।'
सादिक गा रहे हैं। साथ में सब गा रहे हैं। सादिक गा भी रहे हैं और ढोल भी बजा रहे हैं -'बिम्मलकड़...! । बिम्मलकड़...!'
...छुक छुक छुक छुक...
दूसरी फाग ग्रामदेवता को समर्पित। सादिक शुरू की दो फागों में हर साल नेतृत्व करते हैं। गाँव का नाम सँड़वा, तो ग्रामदेवता साँड़ेबीर । सादिक गा रहे हें -
' सँड़वा के साँड़ेबीर बाबा तोहरी सरन ढोलक बाजे.... । '
सब गा रहे हैं। अब सादिक केवल ढोल पीट रहे हैं -
'' बिम्मलकड़ ! बिम्मलकड़ !''
...छुक छुक छुक छुक छुक...
गाड़ी चली जा रही है। ...स्टेशन आ रहे होंगे। सवारियां चढ़ -उतर रही होंगी। हो सकता है, वे मुझे घूर रहे हों। लेकिन मैं आँखें नहीं खोल पा रहा हूँ। ...छुक छुक छुक छुक... । सब कुछ नाच रहा है दिमाग में। सचमुच नाच रहे हैं सादिक... । घर-घर। किसी का घर नहीं छोड़ रहे हैं। सबको न्योता दे रहे हैं -
'हे भाई महलूद हो रहा है। आना जरूर। हे कलुआ की माई कलुआ को जरूर भेजना। सीताराम दद्दा जरूर आना। हे भौजाई नचकउना को भेज देना। धियान रखना ! हाँ ! बड़का बतासा आया है। बाजार से। मौलवी साहब आये हैं। सहर से। सब लोग आना।'
...छुक छुक छुक छुक छुक...
...छिन भर में पूरे गाँव की परिक्रमा करके बड़के भाई द्वारा बनवाई बंडी और धोती पहन ली सादिक ने। सिर पर गोली टोपी भी लगा ली। ...मौलूद शुरू। मौलवी साहब तखत पर बाकी सब नीचे बैठे हैं। सब का ध्यान मौलवी साहब की बातों पर और सादिक का ध्यान इस बात पर भी कि कहीं कोई कुकुर-माकर बताशा न जुठार दे। इसलिए एक डंडा भी रख लिया है उन्होंने। सब मौलवी साहब का मुंह ताक रहे हैं। सादिक मौलवी साहब की बगल में रखी बताशे की टोकरी ताक रहे हैं।
...छुक छुक छुक छुक ... ।
...सब खड़े हो गए। सब गा रहे हैं -
' या नबीऽऽ सलामलैकाऽऽ... ।'
बस इतना ही याद है सादिक को। अब क्या करें ? ...अब सिर्फ मुंह डोला रहे हैं वे।
...छुक छुक छुक छुक... ।
गाना ख़तम। मौलूद ख़तम। ...अब सादिक एक-एक का नाम लेकर पुकार रहे हैं।
बताशा बाँट रहे हैं। ...उलींच रहे हैं आह्लाद। जो नहीं आ सकते, उनके घर जा रहे हैं बताशा देने।
...छुक छुक छुक छुक ... ।
मेरी आँख खुल गयी। सब सो रहे हैं।
बच्चा जाग रहा है। बच्चा मेरी ओर देख कर मुस्करा रहा है। ...क्या हो गया ? बच्चा अब चकित होकर मुझे घूर रहा है। अरे! अरे! बच्चा रोने वाला है। बच्चा मुझे देख कर चकित क्यों हुआ ? रुआंसा क्यों हो गया ?अनायास ही मेरा दाहिना हाथ अपनी बढ़ी हुई दाढ़ी छूने लगा। ...किस जाति का होगा बच्चा...? क्या धर्म होगा इसका...? अरे! अरे मैं पागल हो गया हूँ क्या...? ...मैं बच्चे की ओर देख कर मुस्कराता हूँ। शायद बदले में बच्चा भी मुस्करा दे। ...मुस्करा रहा है बच्चा। आँखों की जलन कम हुई। ...नींद आ गयी। ...आश्वस्ति की आख़िरी परछाईं बच्चे के ऊपर मंडरा रही है। परछाईं बच्चे को खाने के लिए बताशे और खेलने के लिए मिट्टी की मूरतें दे रही है। ...दृश्य बदल गया। ...अचानक अन्धेरा। बाहर भी अन्धेरा। भीतर भी अँधेरा। अँधेरे में गाड़ी चली जा रही है... ।
'हाय अंधेरा...!'
तरह- तरह की आवाजें। अफरा-तफरी। लोग भाग रहे हैं। गिर रहे हैं एक-दूसरे पर। किसी बोगी से लोगों के चीखने की आवाजें आ रही है। औरतों की चीख... । बच्चों की चीख... । आदमी की चीख।
'गाड़ी में बम!'
'किसने रखा बम ?'
'कौन जाने किसने रखा बम ?'
'नहीं मालूम ? फौरन पता करो, कौन किस जाति का है, कौन किस धर्म का है?'
...कोई कड़क कर कह रहा है। ...अब वे टार्च लेकर एक-एक का चेहरा देख रहे हैं अँधेरे में। ...हाय, मेरी दाढ़ी ! ...अब क्या हो ? अचानक टार्च मेरी ओर। टार्च की रोशनी में मैं किसी को नहीं देख  पा रहा हूँ। ...सब मुझे देख रहे हैं। ...सब मेरी दाढ़ी टटोल रहे हैं।
'किस जाति की है यह दाढ़ी ? किस मजहब की है ?'
-वही कड़कदार आवाज। ...मैं बता देना चाहता हूँ अपना नाम।
जाति और धर्म। खूब कोशिश करता हूँ, लेकिन मुंह से आवाज नहीं निकलती... ।
'मार साले को !'
...मेरी नींद खुल गयी। ...अजीब सपना था। नींद खुली तो देखा कि सचमुच लोग मार रहे हैं एक आदमी को । उसके पूरे बदन पर केवल एक जांघिया है। लम्बा सांवला जवान। गले में ताबीज। लोगों का कहना है कि वह जेबकट है। ...धक धक धक धक .... । एक बुजुर्ग अपनी सदरी और कुरते के नीचे वाली बनियान की कटी हुई जेब दिखा रहे हैं। पूरे पांच हजार थे। हाईकोर्ट जा रहे थे मुक़दमा लड़ने। पुलिस वाले मार रहे हैं। यात्री भी मार रहे हैं। वह आदमी बिल्कुल नहीं बोल रहा है। उसकी नाक से खून बहने लगा। लोग मार रहे हैं और वह बर्थ के नीचे देख रहा है। अचानक वह गिरा और तेजी से बर्थ के नीचे फिसल गया। पुलिस वाले बर्थ के नीचे डंडा घुसेड़ते हैं, लेकिन वह लापता हो गया... । शायद मार के डर से उसने ऐसा किया। बच्चा रो रहा है। माँ चुप करा रही है। मैं उठ बैठा। ...कितनी बेरहमी से मार रहे थे लोग! ... क्या सचमुच वह चोर था ? ...उसके शरीर पर कपड़े क्यों नहीं थे ? ...एक भी शब्द वह बोला क्यों नहीं? लोग लगातार उसी की बातें कर रहे हैं। उसकी ताबीज के मुताबिक़ उसकी जाति और धर्म का अनुमान कर रहे हैं।
....धक धक धक धक ....
गाड़ी चली जा रही है। भोर होने वाली है। गंदले तांबई उजाले में गाँव, पेड़, पोखरे, आदमी और जानवर नाचती हुई परछाइयों  की तरह झलकने लगे। ...गाड़ी सीटी दे रही है। कोई स्टेशन आने वाला है। रफ्तार कम हो गयी ।
...धक धक धक्क चींऽऽ!
अरे ! मैं आ गया ! मैं झांकता हूँ। ...हाँ यही तो है
मेरे गाँव के पास का स्टेशन। चोर वाले प्रसंग में दिमाग इस तरह उलझा कि ध्यान ही नहीं रहा। दो ही मिनट रुकेगी गाड़ी यहाँ। मन होता है कि एक बार सब को देख लूं। शायद वे मुझे अब भी घूर रहे हों। बच्चा मुस्करा रहा हो शायद... । चोर शायद यहीं कहीं छिपा हो. लेकिन यथार्थ मजबूर करता है कि केवल अपने जूते देखो। जल्दी-जल्दी जूते पहनता हूँ। बैग और पानी की बोतल लेकर जल्दी से कूद गया मैं। ...गाड़ी के भीतर एक दुनिया थी। अब अपने गाँव के पास के इस छोटे से स्टेशन पर हूँ। यह एक अलग दुनिया है। कोई चायवाला नहीं। ....सहंजन के कुछ पेड़। कुछ कुत्ते। रेलवे के दो ऊंघते हुए मुलाजिम। क्रासिंग पार करके मैं अपने गाँव की पगडंडी खोजना चाहता हूँ। ...यह तो पक्की सड़क है। धुंधले उजाले में काली सड़क दिख रही है। तीन पहियावाले दो टेम्पो खड़े हैं। ...क्या ये मेरे गाँव जायेंगे ?
'हाँ बाबूजी । निजरब कराओ तो बीस रुपया ,नहीं तो दो रूपये।
मगर टैम लगेगा। सवारी फुल होने पर चलेंगे।'
रात भर के सफर की थकान के बाद मुझे बीस रूपये ज्यादा नहीं लगे। टेम्पो चल पड़ा... फट फट फट फट ... । पूछने पर पता चला कि टेम्पो वाला मेरे गाँव का ही लड़का है, जो मुझे नहीं पहचान रहा था। मैं ने उस से पहला समाचार सादिक का पूछा। उस ने सादिक के बारे में जो कुछ बताया ,उससे एक ब्योरा कुछ इस तरह बनता है-
सादिक से दो गलतियां हुईं इस बीच। ...पहली गलती। ...नसीम का छोटा लड़का कई दिनों से अल्ला मियाँ की मूरत के लिए जिद कर रहा था। सादिक ने बहुत सोचा-बिचारा। ...कैसे होते होंगे अल्लामियां? आखिरकार उन्होंने मौलवी साहब की तरह बना दी अल्लामियां की मूरत।
किसी मौलूद में मौलवी साहब आये थे। मौलूद के बाद उन्होंने सादिक को बहुत फटकारा अल्लामियां की मूरत बनाने के लिए। कान पकड़कर उठावाया-बैठवाया और आइन्दा दाढ़ी रखने, नमाज पढ़ने और इस तरह की बेवकूफियों से बाज आने का हुक्म दिया।
...दूसरी गलती। एक बार गाँव में अकाल पड़ा। गाँव वालों ने साँड़ेबीर के चौरे पर अखंड कीर्तन बैठाया। कीर्तन होगा तो पानी बरसेगा। दिन भर होता रहा कीर्तन - ' सीता राम सीता राम ।' शाम को कीर्तनिया जवानों का स्वागत भांग-ठंडाई से हुआ। बाई-बतास से ग्रस्त बुजुर्गों ने अपनी-अपनी मजबूरियां बतायीं और सोने चले गए। अलबत्ता जाते-जाते समझा गये कि कीर्तन खंडित हुआ तो पुन्न के बदले पाप और लगेगा। रात में कीर्तनिया लड़कों को नशा हो गया। हाथों में करताल लिए -लिए वे सो गये। ...सब सो गये। ...क्या करें अकेले सादिक ? ...किसको बुलाने जायं इतनी रात। ...अब तो कीर्तन खंडित! सादिक ने फौरन सोये हुए लड़कों में से एक की करताल छीनी और लगे कीर्तन करने... । सुबह सब ने देखा। अकेले सादिक कीर्तन कर रहे हैं - ' सीता राम सीता राम। '
कीर्तन हुआ। एक दिन। दो दिन। तीन दिन। लोगों ने कई दिनों तक इंतज़ार किया। पानी नहीं बरसा। त्राहि-त्राहि मच गयी। हल-बैल, ट्रैक्टर सब खड़े हो गये। इस बीच तरह-तरह के लोग आये गाँव में। जीप से। कार से। हेलीकाप्टर से। लक-दक कपड़े। एक साधू जैसे नेता जी आये। उन्होंने गाँव वालों को अखंड कीर्तन करने के लिए कहा। गाँव वाले भड़क उठे-
'किया तो कीर्तन ! नहीं बरसा पानी। '
'कैसे किया ?'
'कैसे किया!'
'ऐसे किया।'
बताया सब ने कि सादिक ने कीर्तन खंडित होते-होते बचा लिया।
'भाइयों बुरा मत मानियेगा। धर्म-कर्म में तो पवित्रता होनी ही चाहिए।'
'क्या मतलब ?'
'क्या मतलब सादिक मुसलमान है कि नहीं ?'
'ये बात !'
गाँव वाले सारा रहस्य समझ गये। मुसलमान से कीर्तन कराओगे और समझोगे भगवान खुश...?
आज नेता जी गाँव में ही रुकेंगे। सांझ को नौजवानों की सभा करेंगे और अपनी देख-रेख में करायेंगे कीर्तन। ...नेता जी पूरे पंडित थे। अगले दिन उन्होंने मन्त्र पढ़कर चबूतरे के आस-पास की जमीन पर तांबे के लोटे में आम की टेरी और दूब डालकर जल छिड़का और कहा कि इस भूमि में हिन्दू के अतिरिक्त कोई आया तो अनुष्ठान खंडित। फिर नहीं बरसेगा पानी। ...कीर्तन की बैठकी कराकर महराज जीप में सवार हुए और दूसरे गाँव के दौरे पर निकल गए।
...सादिक हमेशा की तरह सारा दिन सिंवान में थे। कुछ अपने पशुओं के संग कुछ दूसरों के। वे दुबारा अनुष्ठान और इसके नियम-क़ानून नहीं जान पाए थे। शाम को पशुओं को खूंटे तक पहुंचाया,जल्दी से मिट्टी के तेल वाली फोन्नोगैस जलाई और पहुँच गए कीर्तनिया लड़कों के पास। मटुकमन करताल फ़ेंक कर खड़ा हो गया। वह सादिक की बांह पकड़ कर खींचते हुए लक्ष्मण-रेखा के पार ले गया। इस बीच सादिक पूछते रहे -
' का बात है हो बचऊ ?कुछ समझ में नाहीं आय रहा। का कौनौ खास बात...?'
'देखो चचा ! धरम-करम का काज कुछ अलग होता है। अभी तक हम लोग इस बात को नहीं समझ पाए थे। अब समझ में आ गया है। अब तक जो हुआ, सो हुआ, मुदा आगे से समझ लो। अब आज का अनुष्ठान तो खंडित ही हो गया। हाँ, आइन्दा धियान रखना !' - तमतमाया मटुक बोला !'
सादिक फटी-फटी आँखों से मटुक का चेहरा देख रहे थे। तब तक मटुक फिर बोला - '
'ले जाओ अपनी फोन्नोगैस । हमें इसकी जरूरत नहीं है और यह भी समझ लो चाचा कि अब हम तुम्हारी चतुराई समझ गये हैं। बताशा में चोरी से थूक कर फिर उसे हमें खिलाते हो चोरी-चोरी धरम भरिस्ट करते हो हम लोगों का ? अब बहुत मुंह मत खुलवाओ। इसी में खैरियत है कि चले जाओ हियाँ से।'
लड़के ने बताया कि सादिक वहां से चल तो पड़े, लेकिन अपने घर का रास्ता नहीं खोज पाए।
 फोन्नोगैस लिए वे सिंवान में घूमते रहे सारी रात... । सबेरा होने पर बड़े भाई हाथ पकड़ कर घर ले आये। सुबह के उजाले में फोन्नोगैस सनसना रही थी। उससे रोशनी नहीं निकल रही थी। शीशे में कालिख भर गयी थी। अब सादिक बिल्कुल नहीं बोलते। कहीं नहीं जाते। ऐसा लगता है कि वे लगातार कुछ देख रहे हैं, लेकिन कुछ नहीं देखते। किसी को नहीं पहचानते... । बड़े भाई महीने में एक बार सिर के बाल मुंड़वा देते हैं और लम्बी सफेद दाढ़ी के होठों के बाल कैंची से चुनवा देते हैं।
मेरा गाँव आ गया है।
गलियों में बिजली के खम्भे खड़े हैं। उनमे जलते बल्ब निस्तेज लग रहे हैं। सुबह की अजान सुनाई पड़ रही है। मंदिर का घंटा घनघना रहा है। माहौल में गोबर, भूसा, हवन और लोहबान की मिली-जुली गंध तैर रही है। मेरा मन होता है, लौट चलूँ। माटी की छवियाँ टूट चुकी है... lll
[''शब्दयोग'', नयी दिल्ली के प्रवेशांक में ''आश्वस्ति की आखिरी परछाईं'' शीर्षक से प्रकाशित ]

9 टिप्‍पणियां:

  1. बड़े रोमांचकारी मोड़ पर लाकर क्रमशः लगा दिया..अगले अंक का इन्तजार.

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  2. वाह.. आज ही कहीं से आपका प्रोफाइल देखा, और यूँ ही आपके इस ब्लॉग पर आ गया.. ब्लॉग बढ़िया लगा.. अगले का इन्तजार है.. :)

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  3. Aadaraneeya udantashtari ji,
    ank kaa intajaar karane ke liye dhanyvaad. Aap kaa is blog par swaagat hai.

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  4. शिव शंकर जी अब हमारे समय के जरूरी कथाकार हैं.अब इसलिए कि इनकी कहानियाँ इधर प्रमुख पत्रिकाओं में आनी शुरू हुईं हैं.और उनपर ध्यान भी गया है.शिव शंकर जी के अनुभव का आकाश विस्तृत है उनके बीहड़ जीवन की ही तरह.उनकी दृष्टी देशज बनैले समाज पर है पर उनका तीसरा नेत्र इसके कारणों के वैचारिक आधार पर भी टिका है और इस तरह उनके कथा संसार में दृश्य और दृष्टीकोण का सटीक समन्वय हो गया है.विस्तार से कभी लिखूंगा .पर आप कहानियाँ इसी तरह लिखते रहें.

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  5. PRIYASHREE ARUN DEV, Aap kee tippanee taatvik hai aur mere liye utsaahjaanak bhi. is kee khaasiyat yah hai ki na sirf isase mujhe preranaa miltee hai, balki likhane ke liye naye-naye vishaya bhi soojhte hain. kripya blog par aate rahen.

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  6. वर्तमान भारत की यह मूरत हमेशा पढ़ी जायेगी।

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  7. प्रिय गुरुदेव आपकी कहानियाँ अत्यधिक रुचिकर है, और सत्य है, कृपया मुझे भी अपने आशीर्वाद से मार्गदर्शित करे, आपका शिष्य - हरिओम शुक्ला (09927803799)

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