रविवार, 24 मई 2020

‘कथादेश’ मासिक फरवरी 2020 अंक, में प्रकाशित शिवशंकर मिश्र की कहानी ‘जश्न’ की समीक्षा


   ‘कथादेश’ मासिक फरवरी 2020 अंक, में प्रकाशित शिवशंकर मिश्र की कहानी ‘जश्न’ भारत की बहुसंख्य आबादी का प्रतिनिधित्व करती है। इसमें जहाँ एक ओर मानव में मानव सुलभ आनंद प्राप्ति की लालसा है, तो दूसरी ओर उचित शिक्षा/ज्ञान के अभाव में दिन-रात दुःखों को सहन करते हुए उसे सहज सहचर स्वीकार कर लेने की प्रवृत्ति दिखाई पड़ती है।
              इसमें एक ओर यदि ग्रामीण परिवेश में पलकर अनपढ़ होते हुए भी परिवार के सदस्यों का आपसी सद्भाव और प्रेम दिखाई देता है तो दूसरी ओर शहरी परिवेश के पढ़े लिखे लोगों की उस प्रवृत्ति को दिखाता है, जो चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी से हाथ मिलाने में अपनी ज्ञान-गरिमा की उच्चता प्रभावित होने का खतरा महसूस करता है। एक ओर अभाव ग्रस्त लोग उत्सव और आनंद हेतु अवसर निकालकर अपनी दबी इच्छापूर्ति का संतोष करते हैं और दूसरी तरफ साधन संपन्न तनाव में जीने के अभ्यासी हो रहे हैं। कहानी धर्म, जाति के आवरण में जीने वालों के दिखावे को भी सहज भाव से अनावृत करती है। 

             प्रस्तुत कहानी गंदगी और अज्ञान के साहचर्य से उपजी ग्रामीण समस्याओं को उकेरती है, तो साथ ही शासन की सड़ांध से उपजी चिकित्सा क्षेत्र की समस्या से भी पर्दा उठाती है। कहानी यह भी उद्घाटित करती है कि देश की बहुसंख्य आबादी की समस्या का कारण केवल शिक्षा का अभाव, अज्ञान ही नहीं है, बल्कि, तथाकथित ज्ञानसम्पन्न लोगों की तांत्रिक भ्रष्टाचार का साहचर्य भी है। इस कहानी के प्रमुख पात्र के सभी भाई विकलांग या अभाव ग्रस्त होकर भी आनंद और प्रेम से रहा जा सकता है, इस रहस्य को उद्घाटित करते दिखाई देते हैं।यह एक जीवन दर्शन है। यह मानव प्रवृत्ति है कि अत्यंत कष्टमय दशाओं मेंभी  वह जीवन से उदासीन नहीं होती- ‘अतिकष्टासु दशास्वपि जीवितनिरपेक्षा न भवन्ति खलु जगति प्राणिनां वृत्तयः’- बाणभट्ट। कहानी यह भी दिखाती है कि अज्ञान और जागरूकता के अभाव में जीवन संकट से कितना घिर सकता है, यहाँ तक कि‌ मृत्यु का वरण भी कर लेता है और यह कहानी इस रूप में भारतीय ग्रामीण समाज के एक बहुत बड़े हिस्से का प्रतिनिधित्व करती है। फिर भी, मनुष्य सहज भाव से जश्न मनाने का कोई न कोई कारण भी खोज लेता है। आज देश को जिस ज्ञान एवं जागरूकता की आवश्यकता है, उस कान्तासम्मित संदेश को समेटे प्रस्तुत कहानी समाज और तंत्र से अपेक्षा रखती हुई और अधिक प्रासंगिक एवं सफल हुई है। प्रकारांतर से यह कहानी ‘कोरोना’ का भविष्य वाचन है।
  - डॉ. निशाकान्त द्विवेदी
        केन्द्रीय विद्यालय, मुजफ्फरपुर, बिहार

बुधवार, 9 अक्तूबर 2019

स्मृति में कामतानाथ- शिवशंकर मिश्र

            कामतानाथ जी का नाम तो पहले से सुन रखा था, कुछ कहानियाँ भी पढ़ी थीं, पर मिलना काफी बाद में हुआ- दुधवा नेशनल पार्क में आयोजित ‘शब्दयोग’ के एक अनौपचारिक कार्यक्रम में। दुधवा तक पहुँचना बाद में हुआ, कामतानाथ जी से मिलना लखनऊ में ही हो गया। जिस कार से मुझे दुधवा तक जाना था, उसी से कामतानाथ जी को भी चलना था। इससे पहलेे मैंने सिर्फ तस्वीर देखी थी उनकी- कलँगी जैसे बाल, सुगठित क्लीन शेव्ड चेहरा। फिर ‘शब्दयोग’ के उन पर केन्द्रित विशेषांक में एक चित्र देखा था- बिना कालर के कुर्ते में। बाल वैसे ही- कलँगी जैसे। हाँ, अब वे पूरी तरह सफेद थे। ठोड़ी पर तर्जनी। दूर देखती आँखें। साक्षात् मिले, तो जींस और टी शर्ट में थे। चेहरा वही। हाँ, अब उसके कई-कई आयाम थे। 
           बड़े लेखक की बगल में बैठने के एहसास से मैं गौरवान्वित भी हो रहा था और थोड़ा आतंकित भी। आतंक और आकर्षण- दोनों में कहीं न कहीं ‘कालकथा’ के आकार की भी भूमिका रही होगी। तब तक मैंने यह उपन्यास नहीं पढ़ा था। सिर्फ आकार देखा था। बाद में, जब पढ़ा, तो एक रात में ही एक खंड पढ़ गया। आतंक का दूसरा कारण मेरी अपनी अराजकताएं थीं और उनकी आँखें भी। एक नजर में गहराई तक टोह लेने वाली आँखें...। ...कुछ नहीं छिपेगा इनसे। हालांकि राजकुमार साथ में थे, उन्हें पहले से कामतानाथ जी की निकटता प्राप्त थी और स्वयं कामतानाथ जी बड़ी आत्मीयता से पेश आ रहे थे, फिर भी मेरा आतंक अपनी जगह था। पिछली सीट पर मेरी बायीं तरफ बैठे थे वे। डाॅ. वृजेंद्र पांडेय (विद्यान्त हिन्दू महाविद्यालय लखनऊ) गाड़ी चला रहे थे। उनकी बगल में राजकुमार बैठे थे। तब तक उनकी नियुक्ति बी.एच.यू. में नहीं हुई थी और वे और डाॅ. पांडेय एक ही महाविद्यालय के अलग-अलग विभागों में कार्यरत थे। हर दस-बीस किलोमीटर पर कोई हल्की-फुल्की बात हो जाती। राजकुमार मुझे लक्ष्य करके कुछ विनोद करते। पांडेय जी साथ देते और कामतानाथ जी किसी हमउम्र की तरह शामिल हो जाते उस व्यंग्य-विनोद में।
         इसके बाद की जो बातें मैं लिखना चाह रहा हूँ, उनका जिक्र राजकुमार के ‘पत्ता टूटा डार से’ शीर्षक लेख में आ चुका है, जो ‘कथादेश’ के ‘श्रद्धांजलि’ स्तम्भ में छपा है। मेरी समस्या यह है कि अपनी स्मृतियों का क्या करूँ। यदि वह हिस्सा छोड़ता हूँ, तो लगता है, खंडित स्मृतियों का लेखन कर रहा हूँ। इसलिए यह पिष्टपेषण करने को विवश हूँ। कार चली जा रही थी। सड़क किनारे के खेत-खलिहान, गाँव-बस्ती जल्दी-जल्दी पीछे चले जाते। पांडेय जी सड़क देख रहे थे और हम लोग सड़क किनारे के दृश्य। दोनों तरफ उर्वरा धरती। आम-महुए के पेड़। नीम-पीपल। कहीं-कहीं कटहल। रास्ते में एक नदी पड़ी। पता नहीं उन्नाव में थी नदी या आगे कहीं। बहरहाल, नदी जहाँ थी, वहीं रही होगी और मेरी स्मृति में अपनी जगह है। नदी पर अँगरेजों के समय का खतरनाक और विचित्र पुल बना था। खतरनाक और विचित्र इस अर्थ में कि उस निहायत सँकरे पुल से रेलगाड़ी भी जाती थी और पैदल चलने वाले तथा दूसरी गाडि़याँ भी। सब एक साथ, बिना किसी सिग्नल के। बचते-बचाते लोग पुल से निकल जाते थे-शायद रोज-रोज के अभ्यास से या अपनी किस्मत से। नदी, पुल और अँगरेजी हुकूमत से जुड़ी कई बातें बतायीं कामतानाथ जी ने। ऐसा लगा, जैसे इस क्षेत्र का कई-कई बार दौरा किया हो उन्होंने। बाद में, ‘लमही’ के उन पर केंद्रित विशेषांक में छपे उनके चित्रों को देखकर मेरा अनुमान पुष्ट हुआ, जिनमें उन्नाव के किसी गाँव की खपरैल पृष्ठभूमि में है और वे गाँव के युवकों के केंद्र में। ‘कालकथा’ पढ़ लेने के बाद तो उनके विशद गँवई अनुभवों और ऐतिहासिक बोध को लेकर कोई संशय शेष न रहा। ‘कालकथा’ पढ़ते हुए मुझे इस बात के लिए थोड़ी झेंप भी महसूस हुई कि बेवजह मैं उस यात्रा के दौरान उनके लोक-बोध पर चकित हो-होकर विस्मय भाव प्रकट कर रहा था। यह तो उस उपन्यास में घटित और चित्रित होने वाला इलाका ही था। आम, महुआ, नीम और पीपल के पेड़ अब और ज्यादा मिल रहे थे। हवा में ताजे गुड़ की गंध आ रही थी। गन्ने की खोई उड़ रही थी। इसी सब के बीच एक अलग दृश्य ने मेरा ध्यान आकृष्ट किया। सड़क किनारे पटरियों से थोड़ा हटकर घनी-ऊँची घास की कतार सी उगी थी- दोनों तरफ दूर तक या शायद दुधवा तक। वहीं कहीं कुछ क्षणों के लिए रुके हम लोग। रुकने का प्रस्ताव शायद मेरा ही था-कुछ हल्का होने की गरज से। निकट से देखने पर पता चला कि यह घास नहीं भाँग है। उसी समय अवधी का एक लोक-विश्वास याद आया कि बहराइची भाँग दुनिया की सर्वश्रेष्ठ भाँग होती है। मेरे गाँव के वे बुजुर्ग, जो रोज शाम को भाँग छानते (जी, यही शब्द प्रचलित है), अक्सर ठेके पर यह कहते पाये जाते-’सेठ! असली बहराइची पत्ती देना!’
       मेरा भूबोध या भौगोलिक ज्ञान शुरू से माशा अल्ला रहा है। मैंने मान लिया कि बहराइच में हूँ। या उसी भूमि के निकट हूँ। सोच-विचार के इसी सिलसिले में मैंने एक पौधा उखाड़ लिया और पौधे के साथ ही गाड़ी में आ बैठा। जल्दी-जल्दी पत्तियाँ तोड़कर डंठल बाहर फेंक दूँ, इस इरादे से पत्तियाँ तोड़ने में मैं इस तरह मशगूल हुआ कि मेरा ध्यान इस ओर गया ही नहीं कि पौधे की जड़ में लगी भुरभुरी मिट्टी कामतानाथ जी की पैंट पर गिर रही है। वे कुछ नहीं बोले। पांडेय जी गाड़ी चला रहे थे। स्वाभाविक रूप से सामने देख रहे होंगे। राजकुमार की भी नजर सामने रही होगी। 
‘यह क्या है मिश्र जी?’ -कामतानाथ जी उस समय बोले, जब मैं पत्तियाँ  तोड़कर डंठल खिड़की से बाहर फेंक रहा था। उनका वाक्य सुनकर मैं अकबका गया।
 ‘कोई आयुर्वेदिक वनस्पति है। वैद्य ने पहचनवायी थी।’  -कोई जवाब न सूझने की दशा में मैं बोल पड़ा।
'हाँ, मैं भी खाता था पहले।' -उदासीन भाव से बोले वे। 
                    अब मेरे पास कोई चारा न था। मैंने स्वीकार किया कि यह भाँग है। इसके साथ ही दबी जबान में बहराइची भाँग की सुनी हुई लोकख्याति की भी संक्षिप्त चर्चा की। फिर तो उस यात्रा में ही नहीं, बल्कि पूरे कार्यक्रम के दौरान परिहास का यह स्थायी प्रसंग हो गया। बीच-बीच में कामतानाथ जी पूछते: ‘आप तो बहराइच में होंगे?’
    सब हँस पड़ते। मैं भी। बाद में, जब भी कभी फोन पर बात हुई, शायद ही कभी ऐसा हुआ हो, जब प्रश्नवाचक मुद्रा में उनका यह विनोद सुनने को न मिला हो। 
    दुधवा का तीन दिनों का प्रवास कई तरह से अविस्मरणीय रहा। अब तो कामतानाथ जी की दृष्टि से उसकी अविस्मरणीयता और बढ़ जाती है। हर स्मृति के केंद्र में उनकी आँखें आ जाती हैं और विदग्ध टिप्पणियाँ भी। दुधवा से पहले ही किसी कस्बे में कुछ राशन, सब्जी वगैरह की खरीद हुई। यों यह काम राजकुमार और पांडेय जी कर रहे थे, लेकिन क्या खरीदें और क्या नहीं- इस तरह की बातों में कामतानाथ जी पूरी बेतकल्लुफी और गर्मजोशी से शामिल थे। कौन सी जगह रही होगी, मुझे याद नहीं। हाँ, अब आम-महुए के पेड़ों की जगह सेमल के ढेर सारे पेड़ मिल रहे थे- शाल्मली वन! मुझे दूर गहराइयों में ऊँचे खड़े सेमल के पेड़ों को निहारते देखकर कामतानाथ जी बोले-‘नेपाल की तराई का इलाका है।’ सड़क छोड़कर अब वन की पगडंडी पर गाड़ी चल रही थी। गिरे घने पत्तों के बीच राह कहाँ होगी और गहराई कहाँ, पांडेय जी बड़ी कुशलता से समझ लेते थे। रोमांचक ड्राइविंग कर रहे थे वे। इस बात का पूरी तरह प्रत्यायन तो तब हो पाया, जब कुछ घंटों के बाद पता चला कि दिल्ली और देहरादून के लेखकों को लेकर आती कार किसी गहराई में इस तरह फँस गयी कि निकल ही नहीं पायी। जगह-जगह ऊँची-ऊँची बाँबियाँ मिल रही थीं-वल्मीक! कामतानाथ जी ने वहाँ से नैमिषारण्य की निकटता के बारे में बताया और मेरे मन में तरह-तरह के पौराणिक बिंब गड्ड-मड्ड होने लगे। वन-विभाग के गेस्ट हाउस में हम लोगों के पहुँचते-पहुँचते दिन ढलने को था। थोड़ी ही देर में अँधेरा हो गया। जेनरेटर चलवाया गया। उसी समय राजकुमार के फोन पर दिल्ली और देहरादून के लेखकों को लेकर आती कार के गड्ढे में फँस जाने वाली खबर आयी। राजकुमार बार-बार फोन लगा रहे थे। अचानक नेटवर्क गायब। ...अब क्या हो? पांडेय जी तुरंत तैयार हो गये- ‘चलिए देखते हैं।’ इसी बीच कुछ दूरी पर टार्च की रोशनी दिखी और करीब आधे घंटे में आगे-आगे टार्च थामे आर.के.पालीवाल और उनके साथ दूसरे कई लोग आते दिखायी पड़े। नजदीक पहुँचने पर सबके चेहरे दिखे। पालीवाल जी ऐसे मुस्करा रहे थे और उत्साह से मिल रहे थे, जैसे कुछ हुआ ही न हो। एक लंबा आदमी दिखा। बाल भी लंबे। कुर्ता और भी लंबा। ये से.रा.यात्री थे। हरिनारायण जी ने भी उस दिन कुर्ता-पाजामा पहन रखा था। सुभाष पंत अपनी मितभाषिता और सादगी से प्रभावित कर रहे थे। गुरदीप खुराना, श्रीमती कृष्णा खुराना, राजकमल और दूसरे भी कई लोग थे। सब के अपने-अपने व्यक्तित्व। हर व्यक्तित्व का अपना प्रभाव। बाद में कृष्णा जी के पैरों में लिपटी जोंकों को देखकर उनकी हिम्मत की दाद देनी पड़ी। फिर तो शिष्ट सुसंस्कृत रात। सब थके थे। पहली रात जल्दी ही सोना हो गया।
      अगले दिन सुबह-सुबह शेर देखने का कार्यक्रम बना। सब लोग गाडि़यों में बैठे। अब एक गाड़ी वन विभाग की भी थी और वन विभाग का एक सुरक्षाकर्मी भी, जो नशे में लग रहा था। मैंने गौर किया कि उसकी बंदूक की नली में निशाना लगाने के काम आने वाली पीतल की फुलिया भी नहीं थी। जंगल के रास्ते में कहीं एक कुआँ पड़ा, जिसके बारे में किसी ने बताया कि कभी-कभी शेर यहाँ आकर बैठता है। हम लोग नये सिरे से सजग हुए। शेर नहीं दिखा। जगह-जगह मोर दिख रहे थे। कहीं चीतलों के झुंड, कहीं दूसरे वन्य पशुओं के। आखिरकार हम लोग जलाशय के पास बने मचान पर चढ़े, लेकिन कोई फायदा नहीं। शेर नहीं दिखा। लगातार दो दिनों तक सुबह-शाम शेर देखने की कोशिश हुई, लेकिन सफलता नहीं मिली। मचान से आखिरी बार उतरते हुए मेरे मन में एक ऊटपटाँग सा खयाल आया कि शेर कोई नौकरी तो करता नहीं कि वक्त पर पानी पीने आये, वक्त पर खाना खाये और लोगों को दर्शन देने के लिए वक्त पर हाजिर भी रहे!
        शायद वह प्रवास का तीसरा दिन था, जब दोपहर का खाना खाने के बाद हम लोग नेपाल की सीमा से लगी एक आदिवासी बस्ती में गये। एक ऐसा संयुक्त परिवार मिला, जिसमें सत्तर-अस्सी सदस्य थे। सबने कुछ-न-कुछ कपड़े पहन रखे थे। हाँ, बच्चे प्रकृत थे-नंग-धड़ंग। सबका खाना एक चूल्हे पर बनता था। संयुक्त परिवार का यह रूप देखकर लोग विस्मित हो रहे थे। गाँव वालों ने चलते समय महुए की शराब का उपहार दिया। जहाँ तक मुझे याद है, पैसे देने पर भी नहीं लिये थे उन लोगों ने।
हाँ, वहाँ भी भाँग के पौधे खूब उगे थे। साथियों की नजर बचाकर मैंने कुछ पत्तियाँ तोड़ लीं।
‘क्या है?’  - मैंने चौंककर कर पीछे देखा। अब की कृष्णा जी की नजर पड़ गयी। मैंने काम चलाने के लिए वही जवाब दिया, जो कामतानाथ जी को दिया था।
‘मैं एक पत्ती ले सकती हूँ?’ -कृष्णा जी के बालसुलभ कौतूहल के सामने मैं निरुत्तर था।
‘जी, एक आध पत्ती ले सकती हैं।’ उन्होंने एक पत्ती तोड़ी और मुँह में डालने लगीं। 
 ‘रुकिए! कहीं पानी से धुलकर खायेंगे और बेहतर हो,  इसे धुलकर और सुखाकर इस्तेमाल किया जाय।’ 
 ‘क्यों? हरी पत्ती नुकसान करेगी?
 ‘नहीं।’          और क्या कहूँ? कुछ समझ में नहीं आ रहा था। कहीं किसी जलाशय या शायद किसी हैंडपंप के पानी से भाँग की पत्तियाँ धोयी गयीं। कृष्णा जी ने एक पत्ती खायी, मैंने कई पत्तियाँ। बाकी पत्तियाँ मैंने एक लिफाफे में डालीं। डंठल फेंक रहा था कि एक आवाज सुनायी पड़ी:
‘कभी देहरादून आइए जनाब।आपको भाँग की पकौड़ी खिलाऊँगा।’ -ये सुभाष पंत थे। ...उफ! ...इन उपन्यासकारों से तो कुछ छिपाया ही नहीं जा सकता!
दिन की तुलना में रातें खास होतीं। पहली ही रात की पान-गोष्ठी में राजकुमार चुहल करते हुए बोले:
 ‘थाली या कुछ और मिल जाय, तो पंडिज्जी गाना सुनायेंगे।’
                                  तब तक वहाँ बैठे किसी व्यक्ति को मेरे मूर्खतापूर्ण गायन की खबर नहीं थी। यों गायक नहीं हूँ, कोई तालीम नहीं, सुरों की कोई समझ नहीं, फिर भी छात्र जीवन में ‘दस्ता’ नाट्य मंच और बाद में दूसरी मंडलियों के लिए लोकधर्मी अभिनय और गायन करता था। ‘दस्ता’ के कार्यक्रमों में राजकुमार अमूमन साथ में होते। कार्यक्रमों के दौरान मूक प्रेक्षक बने रहते। बाद में या पहले खूब टिप्पणियाँ करते। पहले तो पालीवाल जी राजकुमार की खुड़पेंच में शामिल नहीं हुए, लेकिन जब राजकुमार ने थाली वाली बात दुहरायी, तो उन्होंने थाली ले आने का आदेश किया और थाली हाजिर। मन ही मन मैं खीझ उठा राजकुमार की शैतानी पर। पालीवाल पर खीझने का कोई कारण नहीं था। पहली मुलाकात थी उनसे। इससे पहले फोन पर एक बार बात हुई थी। फोन की बातचीत में सौमनस्य की झलक मिली थी और अब सम्यक् प्रतीति हो रही थी। राजकुमार पर खीझने का कारण यह था कि थाली कोई बाजा तो है नहीं, जो गाने में मदद करे! मैंने अवधी का एक लोकगीत शुरू किया-थाली पर तर्जनी के नाखून से कहरवा की टाँकी लगाते हुए। पांडेय जी ने मेज पर माकूल थाप मारनी शुरू की। पहले गीत के सम की तीसरी आवृत्ति आते-आते उन्होंने सहयोगी स्वर भी लगाना शुरू कर दिया। कहरवा की टाँकी लगती रही। मेज पर थाप पड़ती रही। पल भर के लिए वन के मौन और जेनरेटर की धड़धड़ का आधार संगीत के रूप में इस्तेमाल करते हुए मैंने लोगों के चेहरे देखे। सब आमने-सामने बैठे थे। कामतानाथ, सुभाष पंत, गुरदीप खुराना, से.रा.यात्री, हरिनारायण, राजकमल और कृष्णा जी। पालीवाल, राजकुमार और पांडेय जी तो ऐन मेरे सामने थे। सबकी आँखों में आत्मीय कुतूहल कौंध रहा था। फिर तो कई गीत हुए। हर गीत में पांडेय जी मेज बजाते और जहाँ जरूरत समझते, सहयोगी स्वर लगाते। देहरादून के साथी कभी किसी शब्द का अर्थ पूछते। जहाँ तक मुझे याद है, किसी ने एक गीत में आये ‘बान’ शब्द का अर्थ पूछा था। 
‘बान। बान माने आदत।’ -कामतानाथ जी बोले थे। गीत में यह शब्द अवधी के मुताबिक ‘बानि’ हो जाता था। पति-पत्नी की कहा-सुनी पर केंद्रित था गीत। पहली पंक्ति इस तरह थी:
‘तोहार कउन बानि राजा, रोजइ रिसानऽऽ?’
 ....तुम्हारी यह कौन सी आदत है कि रोज-रोज रूठ जाते हो...?
      देर रात तक गीत होते रहे। पान-गोष्ठी अब गान-गोष्ठी हो चुकी थी। फिर खाना। जेनरेटर बंद। अँधेरा...। जंगल की खामोशी...। नींद...।
                      सुबह नींद खुली। पालीवाल जी पहले ही उठ गये थे। हर एक के पास पहुँच रहे थे। हर एक की जरूरत पूछ रहे थे- प्रशासनिक सक्रियता और विरल सरलता के साथ। गुरदीप खुराना कुछ चिंतित दिखे। हम लोग तो कुछ समझ नहीं पाये। 
‘अरे भाई, श्रीमती खुराना को खोजिए!’
             -बारीक मुस्कान के साथ बोले कामतानाथ जी। मैं सचमुच उन्हें खोजने निकल पड़ा। गेस्ट हाउस से दूर वे एक ऐसी जगह दिखीं, जहाँ कोई पेड़ नहीं था। धरती में आँखें गड़ाये पता नहीं क्या देख रही थीं। नजदीक पहुँचने पर पता चला कि घास में आलता जैसी रंगत वाला एक नन्हा सा फूल खिला है। उसी को निहार रही हैं कृष्णा जी-एकटक। जैसे वन का सारा रहस्य इसी नन्हे से फूल में समाया हो!
             लौटकर हम लोग गेस्ट हाउस पहुँचे, तो सबको चाय दी जा रही थी। कामतानाथ जी के लिए बिना चीनी की चाय आयी। उन्हें ब्लडशुगर थी। मुझे भी हो चुकी थी तब तक। हम दोनों ने बिना चीनी की चाय ली। थोड़ी देर बाद कामतानाथ जी ने कहकर नींबू की चाय बनवायी। चाय आने पर शुगरफ्री की एक गोली अपनी चाय में डाली और दूसरी मेरी चाय में। जितने दिन हम लोग वहाँ साथ रुके, नींबू की चाय रोज पी गयी। सुबह की दूसरी चाय वे कहकर बनवाते- नींबू की। 
          दोपहर कथा-गोष्ठी हुई। गुरदीप खुराना की कहानी का वाचन कृष्णा जी ने किया। फिर मुझे कथा-वाचन के लिए पालीवाल जी ने प्रस्तुत किया। मैंने ‘बाबा की उघन्नी’ का वाचन किया। तब तक यह कहीं छपी नहीं थी और सच तो यह है कि ठीक से लिखी भी नहीं गयी थी। यों श्री खुराना वरिष्ठ कथाकार हैं, लेकिन मैंने देखा कि कामतानाथ जी उनकी कहानी में खूब नुक्ताचीनी कर रहे थे। मैं नया था, शायद इसलिए वे नुक्ताचीनी के बदले कुछ आत्मीय सुझाव दे रहे थे। मसलन, मेरी कहानी का एक वाक्यांश था ‘बच्चों का एक बड़ा समूह’। कामतानाथ जी ने यहाँ ‘समूह’ हटाकर ‘झुंड’ रखने की राय दी। पंत जी ने भाषा की सरलता का सुझाव दिया।
         दुधवा में जो आखिरी रात बितायी गयी, उस रात चंद्र ग्रहण लगा था। हम लोगों से थोड़ी ही दूरी पर बैठे पांडेय जी जप कर रहे थे- मौन। हम लोग पानगोष्ठी की शुरुआत कर चुके थे और इसके साथ ही गानगोष्ठी की भी। तर्जनी के नाखून से कहरवा की टाँकी लग रही थी थाली पर, लेकिन मेज की थाप की कमी महसूस हो रही थी। आज वन विभाग के कुछ अधिकारी भी आ गये थे। वरिष्ठ लेखकों की सहज उपस्थिति देखकर वे चकित हो रहे थे और प्रसन्न भी। कई गीत हो चुके थे। कई दौर भी। कामतानाथ जी युवकों की तरह दाद दे रहे थे। सब मुदित थे। सब विह्वल। अंतरा तक लोग चुप रहते, लेकिन जैसे ही अगला सम आने को होता, आगामी शब्द का अनुमान करके बोल पड़ते सब अपने-अपने ढंग से। हो सकता है, न भी बोलते रहे हों सब, पर मेरी स्मृति में यह दृश्य कुछ इसी तरह अंकित है। दरअसल उस समय मैं खुद विह्वल था। एक तो मदविह्वल और दूसरे इस एहसास से विह्वल कि इस वन प्रांत में हिंदी के इतने वरिष्ठ तथा महत्वपूर्ण रचनाकार और संपादक मेरी बेवकूफियों को इतना तवज्जो दे रहे हैं! 
         उसी रात किसी ने मुझे ‘मतवाला हाथी’ कहा। शायद कामतानाथ जी ने ही कहा। राजकुमार को ‘अंकुश’ कहा गया। शायद सुभाष पंत ने कहा। राजकुमार गीतों के दौरान मुझे चिढ़ाने के अंदाज में कुछ बोलते।
 ‘अंकुश हटाया जाय, नहीं तो गाना नहीं होगा।’ -मैंने कहा।
       पालीवाल जी ने जिस सदाशयता से राजकुमार की खुड़पेंच में शामिल होते हुए मेरे बजाने के लिए थाली मँगा दी थी, उसी से प्रेरित होकर राजकुमार को कमरे में बंद करने के लिए भी तैयार हो गये। बहरहाल, ऐसा करने की जरूरत नहीं पड़ी।
 ‘अरे भाई, इनका ध्यान रखिए! डाइबिटीज है इन्हें!’  -मेरा मदात्यय देखकर कामतानाथ जी ने राजकुमार से कहा था। यह अजीब संयोग है कि आज, जब कामतानाथ जी पर लिख रहा हूँ, मेरी माँ का कुछ ही दिनों पहले निधन हो चुका है। माँ की याद आती है और कामतानाथ जी के वाक्य में निहित मातृत्व की भी...!
         आँख मूँद कर गा रहा था मैं। नहीं, नहीं, मुहावरे में नहीं; सचमुच अधमुँदी हो रही थीं आँखें। इसी बीच एक गीत में मेज की थाप जरूरत से कुछ ज्यादा सुनायी पड़ने लगी। मुझे लगा, पांडेय जी पूजा-पाठ से निवृत्त होकर आ गये हैं। आँख खोलने पर पता चला कि पांडेय जी तो आ ही गये हैं, अब पालीवाल जी भी मेज बजा रहे हैं। वह गीत था-
 ‘डोरी डाल दे...!’
           इस गीत पर पालीवाल जी ने इस तरह मेज बजायी कि उनकी उँगलियों से खून की कुछ बूँदें निकल आयीं। हो सकता है, न भी निकला हो खून। मैं मेज के इस पार था और विह्वलता की उस दशा में ठीक से उनकी उँगलियाँ  देख नहीं पाया। हाँ, मित्रों की आह्लाद भरी टिप्पणियों से पालीवाल की उँगलियों से खून बहने की सूचना मिल रही थी। पता नहीं खून बहा या नहीं, मेज पर पालीवाल जी की थाप बंद नहीं हुई। सम पर आते-आते गाने भी लगते वे। कई साथी स्वर लगाने लगते। 
                       उस रात जिस गीत को सुनते हुए लोग कुछ ज्यादा ही गंभीर हो गये, वह हिरनी वाला गीत था: ....नया पलाश का पेड़..। ...घने पत्ते...। ...पेड़ तले हिरन-हिरनी...। ...चरते-चरते हिरनी हिरन से पूछती है-
‘क्या तेरा चरागाह सूख गया है? या पानी के बिना कुम्हलाये हो?’
‘नहीं हिरनी, न तो मेरा चरागाह सूखा है, न ही पानी के बिना कुम्हलाया हूँ। कल राजा के यहाँ जन्मोत्सव है। मुझे मार न डालें राजा के लोग।’
          दृश्यांतर। ...हिरनी हिरन की खाल माँग रही है रानी से...। पेड़ में टाँग देगी खाल और मान लेगी कि हिरन जिंदा है। ...मूर्ति बनी कृष्णा जी वीडियोग्राफी कर रही हैं। कामतानाथ, सुभाष पंत, से.रा.यात्री, आर.के.पालीवाल, गुरदीप खुराना, हरिनारायण, राजकमल सब गंभीर। सब विह्वल। शोक विह्वल। दो रातों की परंपरा के विपरीत यह गंभीर गीत था। वृजेंद्र पांडेय तो मंडली में शामिल थे। लगातार मेज बजा रहे थेे। राजकुमार बिना कुछ गाये-बजाये मंडली में शामिल थे। प्रेरक की भूमिका में थे वे। इस गीत का प्रस्ताव उन्हीं का था। हाँ, घायल उँगलियों वाले कलाकार का नाम मंडली में शामिल न करना सरासर नाइंसाफी होगी!
 ‘...नहीं दी जायेगी खाल! ...बच्चे हिरन की खाल से बनी खँजड़ी बजायेंगे।’  -रानी का जवाब।
...जब-जब खँजड़ी बजती है, पलाश के घने पत्तों वाले उसी नये पेड़ के नीचे खड़ी हिरनी हिरन को बिसूरती है...। क्षण भर सब चुप रहे। मैं भी। ‘अंकुश’ की संज्ञा पाये राजकुमार भी। इस गीत के बाद कोई गीत नहीं हुआ। 
अगले दिन सब अपनी-अपनी मंजिल को रवाना हुए। दिल्ली और देहरादून के साथी अलग गाड़ी से और लखनऊ  और उसके आस-पास के साथी अलग गाड़ी से। पालीवाल जी उन दिनों दिल्ली में ही थे। अलग होते समय लगा, हम सब कहीं-न-कहीं एक-दूसरे को अपने भीतर लिये जा रहे हैं। 
 लौटते हुए एक बार फिर हम लोग उसी पथ पर थे, जिससे आये थे। सेमल के ढेर सारे पेड़। नेपाल की तराई। आम-महुआ के पेड़। ताजे गुड़ की गंध। हवा में उड़ती गन्ने की खोई। फिर नदी। नदी पर पुल। बिना किसी निर्धारित संकेत के एक साथ हर गाड़ी का आना और जाना। रेलगाड़ी का भी। हाँ, आदमी कितनी-कितनी भंगिमाएँ अपना कर संकेत कर सकता है, इसके नाना नमूने दिख रहे थे।
 लखनऊ पहुँचकर इस बात की मुझे कतई उम्मीद नहीं थी कि कामतानाथ जी मुझे एक शाम की खास दावत देंगे। शाम को हम लोग साथ बैठे। राजकुमार, मैं और कामतानाथ जी। उनका कंम्प्यूटर। पांडुलिपियाँ। मेज के ऊपर भी और नीचे भी। 
‘खुद चलाते हैं कंम्प्यूटर?’
‘नहीं, लड़का आता है। रोज नहीं आता। बुलाने पर आता है। शाम को। बोलकर लिखवाता हूँ।’ 
सुरुचिपूर्ण पानगोष्ठी। उन्हें मेरे निरामिष होने का अनुमान नहीं था। कबाब आया।
 ‘क्या यह निरामिष है?’ -मैंने पूछा।
‘आप से तो ऐसी उम्मीद नहीं थी।’ -आँखों में मुस्कराते हुए बोले वे। फिर मेरे लिए कोई दूसरी चीज मँगवायी उन्होंने-शायद बैगन का कोई व्यंजन। फिर कभी मेरा मिलना कामतानाथ जी से नहीं हुआ। हाँ, फोन पर बातें होतीं। जब कभी मैंने दुआ-सलाम की औपचारिकता की, उधर से आवाज आती:
‘आप तो बहराइच में होंगे...!’                                                                                           

मंगलवार, 8 अक्तूबर 2019

पखावज वृत्तान्त- शिवशंकर मिश्र

              महाराज इन्द्र के दरबार में संगीत की सभा बैठी। दरबारियों ने महाराज से निवेदन किया कि वे स्वयं पखावज बजायें........और एक ताजा मिढ़ा हुआ पखावज महाराज के सामने हाजिर किया गया। तमाम दरबारी उत्सुक होकर बैठे.....लेकिन पखावज से कोई कर्णप्रिय बोल नहीं निकला। बदले में वह भाँय−भाँय करके रह गया। महाराज ने पखावज को इधर−उधर से देखा। दरबारियों ने भी पखावज का ही निरीक्षण किया। महाराज के बजाने में तो कोर−कसर थी नहीं। बाकी दिनों तो वे बहुत मीठा बजाते थे। लोग हैरान हुए......काफी देर में एक दरबारी ने, जो खुद भी कभी पखावज बजता था, खड़े होकर निवेदन किया, ''महाराज, यह जो भाँय−भाँय कर रहा है, शायद भात मॉँग रहा है!'' भात मँगवाया गया। पखावज के चमड़े में मसाला और सियाही थी। दूसरी तरफ भात  लगाया गया। फिर क्या था! पखावज के मधुर बोलों में दरबारी,अप्सराएं और नंदनवन सब झूम उठे। राजमहल की दीवारें हिलने लगीं.....लेकिन यह क्या! लोग अवाक् रह गये। महाराज ने पखावज को अपने से दूर झिटक दिया और कहा, ''इसे महल के पिछवाड़े नाले में फेंक दिया जाय।''
              दूसरे दिन जब महाराज का दरबार लगा था, मेहनत−मजूरी करने वाले शूद्रों का एक दल महल के पिछवाड़े की राह से गुजरा। उन्होंने नाले के गन्दे पानी में पखावज को तैरते हुए देखा। एक नौजवान जो गाने−बजाने में निपुण था, नाले में कूद पड़ा और पखावज को उठा लाया। दल के मुखिया को पखावज दिखाया गया। दोनों तरफ का चाम पानी से फूल उठा था.....ठोंकने से भद्द−भद्द की आवाज हो रही थी। एक कारीगर ने बताया कि थोड़ा धूप दिखाने से ही यह सुन्दर हो  जायेगा.....लेकिन दल के मुखिया और तमाम बुजुर्गों ने जोर डालकर यह बात कही कि पखावज राजमहल के पिछवाड़े नाले में मिला है, इसलिए साथ ले चलने के पहले यहां के राजा से पूछना जरूरी है। 
                 महाराज ने कहा, ''तुम इसे ले जा सकते हो।'' महाराज से मिलाने गए बुजुर्गों के साथ थोड़े से नौजवान भी थे। उनमें से एक, जो गाने−बजाने में निपुण था, पूछ बैठा, ''लेकिन यह नाले में क्यों फेंका गया था, जब कि यह काफी सुन्दर है और इसकी काठी ऐसी है कि बड़े मधुर बोल फूटते होंगे।'' यह सुनकर तमाम दरबारी खिल उठे, लेकिन तुरन्त ही महाराज की ओर देख गम्भीर हो गये। महाराज बोले, ''भात लगाने से यह जूठा हो चुका है और हम जूठी चीजों का इस्तेमाल नहीं करते।'' ....और तब से महाराज के दरबार में और भी पखावज मिढ़वाये गये। लेकिन कोई भी पखावज बिना भात के नहीं बजा....और इस तरह जूठा हो जाने की वजह से उन सब को नाले में उपेक्षित कर दिया गया। बहुत से पखावज नाले के गंदे, ठंडे और स्थिर पानी में सड़ गये.... लेकिन जो मेहनतकशों के हाथ लगे, उन्हें धूप दिखायी गयी, उनमें सुन्दर जोशीले बोल फूटे और चिरंजीवी हो गये।


''गाँव की नई आवाज़'' इलाहाबाद 2019 में प्रकाशित
('अभिप्राय' अप्रैल, 1983, इलाहाबाद, से साभार)

गुरुवार, 3 नवंबर 2011

स्मृति में गोरख - शिवशंकर मिश्र


शायद वह सन् अस्सी की गर्मियों की कोई दोपहर थी, जब मैं पहली बार दिल्ली पहुंचा- उन दिनों चलने वाली अपर इंडिया एक्सप्रेस से। पूरे महानगर में जिस एक अदद आदमी से पहचान के आधार पर मैं दिल्ली पहुंचा था, वे थे गोरख पांडेय। पहली बार इलाहाबाद में 'परिवेश' की एक गोष्ठी में देखा और सुना था उन्हें। बार-बार दाढ़ी सहलाते और सिगरेट के गहरे कश लेते हुए वे गहन चिंतन की मुद्रा में बोल रहे थे और प्रभावित कर रहे थे।

गोष्ठी के अंत में 'दस्ता' की ओर से मैंने अनिल सिंह तथा कुछ और साथियों के साथ मिल कर गोरख का एक गीत गाया- धुन बदल कर। रामजी भाई बताया करते थे कि गोरख खुद भी गाते हैं और वे इस तरह नहीं, बल्कि इस तरह गाते हैं। फिर वे अपनी आवाज में उन धुनों को सुनाते। कुछ धुनों का मैं अनुकरण करता और कुछ को बदल देता। उस दिन बदली हुई धुन वाला जो गीत गाया गया, वह था- 'केकरा नावें जमीन पटवारी, केकरा नावें जमीन?'

इस गीत की धुन एक होली गीत पर आधारित है। उस सपाट धुन में मुझे गायकी का मजा न मिलता और मैं इस गीत को पूरबी की तरह गाता था। अपने ही गीत को बदली हुई धुन में सुनते हुए गोरख लगभग लगातार मुझे देखते रहे। सांझ हो चली थी। बल्ब जलाया गया, तो मेरा ध्यान उनके मैल से चीकट कुर्ते-पाजामे की ओर गया, जिसे मैंने दिल्ली से इलाहाबाद की यात्रा का परिणाम समझा। ..लेकिन दाढ़ी-बाल के साथ बढ़े हुए नाखून? मुझे लगा, जैसे किसी गंभीर समस्या का समाधान खोजने के क्रम में वे दाढ़ी-बाल और कपड़ों की सफाई जैसे कम जरूरी काम पता नहीं कब से भूले हुए हैं। गीत सुनने के बाद वे देर तक दाढ़ी सहलाते रहे। बीच-बीच में मुस्कराते, होंठों और दांतों के बीच खिली-खिली ऋजुता छलछला उठती और वे कहते- 'तो...मिश्र जी..!'

मुझे लगता कि अब वे कुछ कहने जा रहे हैं, लेकिन ऐसा कुछ न होता। वे फिर दाढ़ी सहलाते और उसी मुदिता के साथ कहते- 'तो... मिश्र जी...!' दसियों बार ऐसा किया उन्होंने। मुझे लगा, गोरख मुझे अपनी स्मृति में सहेज रहे हैं।

दूसरी मुलाकात गोरखपुर में हुई थी। डॉ. लालबहादुर वर्मा तब गोरखपुर विश्वविद्यालय में थे। उन्होंने खुले मैदान में एक बड़े कवि सम्मेलन का आयोजन किया था। अदम गोंडवी, अशोक चक्रधर, रामकुमार कृषक, पुरुषोत्तम प्रतीक और दूसरे अनेक कवि आये थे। इलाहाबाद से मैं था और हिमांशु रंजन। गोरख एक दिन पहले आ गए थे। देवेन्द्र आर्य और गोरखपुर के दूसरे अनेक साथी प्राण-पण से आगंतुक कवियों की खातिर तवज्जो में लगे थे। शायद वे ही हम लोगों को उस हालनुमा कमरे में ले गये, जहां फर्श पर बिछे गद्दों पर बैठे कवियों के बीच लगातार दाढ़ी सहलाते और बीच-बीच में सिगरेट के गहरे कश लेते गोरख दिखे। शाम हो गयी थी। हल्के वाट के बल्ब की पीली रोशनी में उनका सफेद खादी का कुर्ता-पाजामा कुछ कम गंदा लग रहा था। चेहरे पर गंभीरता थी और बीच-बीच में 'साथी आपको चाय मिली या नहीं' या 'अमुक आये या नहीं'- इस तरह के प्रश्न ऐसे पूछ रहे थे वे, जैसे आयोजन का सारा भार उन्हीं पर हो। मुझसे भी उसी आत्मीयता से उन्होंने चाय के लिए पूछा, लेकिन मैंने महसूस किया कि मुझे नहीं पहचान रहे हैं वे। फिर शहर के किसी महंगे होटल में, जिसका नाम मुझे याद नहीं, खाना हुआ- सुस्वादु। फिर सब लोग रिक्शों से उस मैदान की ओर रवाना हुए, जहां कवि सम्मलेन होना था।

मैदान श्रोताओं से भरा था- खचाखच। नाना वर्गों के श्रोता- विश्वविद्यालय के शिक्षक, शोधार्थी, छात्र-छात्राएं, गृहणियां, रेलवे कर्मचारी, नगर के रचनाकार, रंगकर्मी, शहरी मजदूर। रिक्शेवाले मैदान की चहारदीवारी के पार अपने-अपने रिक्शों पर खड़े होकर कविता सुन रहे थे। यह सब देखकर गोरख बहुत उत्साहित थे और पूरी उत्तेजना में अपना गीत प्रस्तुत कर रहे थे- 'जनता के आवे पलटनिया, हिलेले झकझोर दुनिया।' उत्साह में वे इतना खींच कर गा रहे थे कि अंतरा आते-आते गला जवाब दे गया। मैं तत्काल उनकी बगल में खड़ा हुआ और आगे का गीत हम दोनों ने मिलकर पूरा किया। गीत सुनाकर वे बैठे तो लगा, जैसे खींच कर गाने की वजह से थक गए हों। कुछ पलों तक वे सिर झुकाये, आँखें मूंदे बैठे रहे, फिर अचानक मेरी ओर देखा और मुस्कराते हुए बोले- 'तो मिश्र जी...इलाहाबाद वाले।' इसी बीच मेरे नाम की पुकार हुई। मैंने दो गीत सुनाये- एक अवधी में, दूसरा भोजपुरी में। गीत सुनाकर बैठते ही गोरख बोले- 'आइए साथी कहीं कुछ खाते हैं।’ मुझे याद नहीं कि हम लोग किस मुहल्ले में गए। शायद कवि सम्मेलन वाले मैदान से दक्षिण की ओर कुछ दूर चलकर हम लोग किसी मिठाई की दूकान तक गए थे।

'ये तो बूंदी के लड्डू हैं।' - लड्डू खाते हुए मैंने कहा।

'हाँ, भोजपुरी में इसे बुनिया कहते हैं। तरल बेसन की बूँदें खौलते घी में गिरकर ठोस रूप ले लती हैं।' - कविता जैसी भाषा में उन्होंने 'बुनिया' की रचना प्रक्रिया बतायी, फिर मुझे पान खिलाया और अपने लिए सिगरेट का पैकेट खरीदा। लौटती बार वे कुछ देर चुप रहे- सिगरेट का कश लेते हुए।

'जनता के आवे पलटनिया वाला गीत किस लोकधुन पर आधारित है, आप जानते हैं?' -थोड़ी दूर चलकर अचानक उन्होंने पूछा।

' नहीं।'

'रामजी के आवे दुलहिनिया पड़ेले झीर-झीर बुनिया।'

उस समय और उसके बाद भी कई मौकों पर मैंने महसूस किया कि लोकधुनें गोरख को बींधती थीं और उनके भीतर रचनात्मक बेचैनी उत्पन्न करती थीं या उनके भीतर की रचनात्मक बेचैनी को राह सुझाती थीं। लौटकर हम लोग मंच पर पहुंचे ही थे कि दूसरे दौर के लिए मेरा नाम पुकार दिया गया। पान की पीक थूकने की गरज से मैं मंच के पीछे गया। वहां एक स्थानीय वरिष्ठ कवि खड़े मिले, जिनका नाम उस समय मैं नहीं जानता था। खूब तारीफ की उन्होंने मेरी और बोले- ‘सुना है, तुम 'छापक पेड़ छिउलिया' वाला गीत बहुत अच्छा गाते हो, वही सुनाओ।'

अज्ञात वरिष्ठ कवि के द्वारा की गई प्रशंसा और गीत की अनुशंसा को मैंने अपने प्रति उनकी शुभाशंसा समझा। विह्वल भाव से मैं मंच पर गया और इस टिप्पणी के साथ गीत शुरू किया कि अब मैं अवधी का एक लोकगीत प्रस्तुत करने जा रहा हूँ। जाहिर है कि यह मेरी नहीं, बल्कि माँ-बहनों की सामूहिक रचना है। अभी मैं गीत की दो आरंभिक पंक्तियाँ ही सुना पाया था कि वही वरिष्ठ कवि खड़े हो गए और मुझसे माइक्रोफोन छीन कर अपना भाषण शुरू कर दिया, जिसका आशय यह था कि इस जनवादी क्रांतिकारी मंच से दूसरों की रचनाएँ अपने नाम से सुनाना जनता के साथ गद्दारी है और वे इसकी भर्त्सना करते हैं। मेरी तो मति मारी गयी। पहली बार इलाहाबाद से बाहर कहीं कवि सम्मेलन में गया था- एम. ए. का विद्यार्थी। वे माइक्रोफोन पर मेरी लानत-मलामत करते रहे। मैं अप्रासंगिक सा खड़ा उन्हें निहारता रहा। अब इतने दिनों बाद मुझे उनके व्यक्तित्व की कोई रेखा याद नहीं, सिवा उनकी थुलथुल हथेली के, जिसकी प्रतीति हाथ मिलाने के दौरान हुई थी। वे बोल चुके, तो मैंने अपना पक्ष रखा, जिसका तात्पर्य यह था कि ये वही कवि महोदय हैं, जिन्होंने मंच के पीछे मुझसे इस लोकगीत को सुनाने की फर्माइश की थी, जिसका अब स्वयं विरोध कर रहे हैं और यह कि अब मैं दूसरा गीत सुनाने जा रहा हूँ, जो मूलत: मेरी रचना है। मैं दूसरा गीत शुरू करूँ, इससे पहले ही श्रोताओं ने तालियाँ बजाकर वही लोकगीत सुनाने की जोरदार फर्माइश की। इस दौरान गोरख की क्या दशा रही, मैं ध्यान नहीं दे पाया। गीत सुनाते हुए गीत में डूबा रहा, फिर अपने में। एक तरफ लोगों का अपार स्नेह, दूसरी तरफ महाकवि की कुत्सा...! देर रात तक चला कवि सम्मेलन। महाकवि फिर मंच पर नहीं दिखे। श्रोताओं की भीड़ जस की तस थी, फिर भी भोर होने से कुछ घंटे पहले कवि सम्मेलन के संपन्न होने की घोषणा कर दी गयी- शायद इसलिए कि थोड़ा आराम करके लोग रोजमर्रा के कामों में लग सकें। कवियों को फिर उसी हालनुमा कमरे में ले जाया गया, जहां शाम को चाय पी गई थी। शायद वह रेलवे की इमारत थी। थके हुए लोग फर्श पर बिछे गद्दों पर लेटते ही खर्राटे लेने लगे। मैं भी लेट गया। इस बीच किसी ने बल्ब बुझा दिया। मैंने आँखें मूँद रखी थीं, लेकिन नींद नहीं आ रही थी। थोड़ी देर में मुझे लगा कि कोई टहल रहा है अँधेरे में। आँखें खोलीं तो लगा, कोई छाया कमरे से बाहर निकल गयी। मेरा अनुमान था कि यह गोरख होंगे। उनकी कुछ असहजताओं के किस्से सुन चुका था। मैं भी कमरे से बाहर निकल आया।

शायद वह पीपल का पेड़ था, जिसके नीचे चबूतरे पर बैठे गोरख सिगरेट सुलगा रहे थे। जलती हुई माचिस की तीली के उजाले में उनकी दाढ़ी, कम नुकीली नाक और माथे तक लटकती जुल्फों की झलक दिखी- एक क्षण के लिए। मैं भी बैठ गया उसी चबूतरे पर- गोरख से कुछ फासला बनाते हुए। लगभग घंटे भर बैठा रहा मैं, लेकिन वे मेरे अस्तित्व से बेखबर क्षितिज देखते रहे, जो शहर की रोशनियों और उषा की उजास के संयोग से पीला और ताँबई हो रहा था। लौटकर मैं अपने बिस्तर पर लेट गया। फिर तो ऐसी नींद आयी कि दोपहर से थोड़ा पहले ही उठ सका।

दोपहर का खाना डॉ. लालबहादुर वर्मा के यहाँ होना था। हुआ- सुरुचिसम्पन्न। सामिष भी, निरामिष भी। लेकिन खाने से पहले एक घटना हो गयी। खूबसूरत मोजैक वाले फर्श पर बिछे टाट पर सब लोग बैठे थे। खाना परोसने की तैयारी हो ही रही थी कि महाकवि फिर नमूदार हुए। वे टाट पर बैठे ही थे कि गोरख शुरू हो गए-अत्यंत गंभीर और बेहद उत्तेजित। गोरख रौद्र होते जा रहे थे। नथुने फड़क रहे थे। दाढ़ी तो सहला रहे थे, लेकिन सिगरेट पीना भूल गए थे शायद कुछ देर के लिए। या इसलिए नहीं पी रहे थे सिगरेट कि अब तो खाना खाना है। महाकवि की ओर तर्जनी उठाकर या कभी मुट्ठी बंधा हाथ उठाकर गोरख ने जो कुछ कहा, उसका सार कुछ इस तरह था कि कल आपने जिस तरह जनता के एक महत्वपूर्ण गीत की प्रस्तुति में बाधा उत्पन्न की और एक उदीयमान कवि को अपमानित करने की घिनौनी साजिश की, हम उसकी निंदा करते हैं। अब तो खाना पीछे छूट गया और सबकी चिंता का विषय यह हो गया कि गोरख को कैसे सम्हाला जाय। आखिरकार स्थिति को देखते हुए महाकवि खुद ही चले गये।

दो मुलाकातों के बाद मैं आश्वस्त था कि गोरख अब मुझे पहचान लेंगे। गर्मी की उस दोपहर, जब मैं डी.टी.सी. की बस से आर. के. पुरम् पहुँचा, तो मन में एक दूसरा संशय उठ रहा था कि कहीं ऐसा न हो कि वे कमरे में न हों और दिल्ली से बाहर चले गये हों किसी कार्यक्रम में। तिरछी समानांतर दीवारों वाला विश्वविद्यालय का स्थापत्य विचित्र और आकर्षक लग रहा था। अंग्रेजी बोलते देशी-विदेशी छात्र-छात्राओं का समूह मन में आतंक पैदा कर रहा था, लेकिन हर वैचित्र्य, आकर्षण और आतंक पर मन का संशय भारी पड़ रहा था। पेरियार हॉस्टल की ऊपरी मंजिल वाले गोरख के कमरे के सामने पहुंचकर वह संशय भी दूर हो गया। कमरे का नंबर अब मैं भूल चुका हूँ। दरवाजा आधा खुला था। मैंने हल्के से दस्तक दी। देर तक कोई प्रतिक्रिया न होने पर झाँकने की धृष्टता की और पाया कि वे सोये हैं। मैंने अनुमान किया कि सुबह उठे होंगे, नहाया-धोया होगा और दिन का खाना खाकर सो गये होंगे। मैं इलाहाबाद से यात्रा करके आया था-ट्रेन में खड़े-खड़े। खाने के नाम पर सुर्ती-चूना और पीने के नाम पर कुछ नहीं। लंबी यात्रा का अनुभव न होने के कारण पानी की व्यवस्था करके नहीं चला था। गला सूखा था। सीने और आंखों में जलन हो रही थी। ढिठाई करके मैं घुस गया और फर्श पर बिखरी किताबों के बीच जगह बनाकर बैठ गया। खटर-पटर से उनकी नींद में खलल पहुंचा। अधखुली आँखों से उन्होंने मुझे देखा, फिर आँखें मूँद लीं। फौरन नमस्कार किया मैंने और अपना तथा अपने गृह जनपद का नाम बताया। फिर उन्होंने एक बार मेरी ओर देखा और आँखें बंद कर लीं। मुझे लगा, नींद नहीं खुल रही है। वहीं रखे सिगरेट के पैकेट से मैंने एक सिगरेट निकाली, अपने होंठों से लगाकर जलायी और उनकी ओर बढ़ाते हुए कहा- ‘बाबा सिगरेट!’

गोरख ने एक बार मेरी ओर देखा, फिर सिगरेट की ओर। सिगरेट को उँगलियों में फँसाकर उन्होंने फिर आँखें बंद कर लीं। आँखें मूँदे-मूँदे सिगरेट के कुछ कश लेने के बाद वे उठे। मैंने नये सिरे से नमस्कार करते हुए अपना और अपने गृह जनपद का नाम बताया। गोरख पर कोई असर नहीं। अंडी के चादर की अस्त-व्यस्त लुंगी और रेशमी खादी की सिकुड़न भरी कमीज पहने वे कभी आँखें खोलते, कभी बंद करते रहे। कमीज की ऊपर की बटन खुली होने के कारण सीने के घने बाल दिख रहे थे। दाढ़ी पहले से कुछ बड़ी। सिर के बाल भी। हां, नाखून इस बार कुछ कम बड़े लग रहे थे।

‘तो..साथी..यह एक गंभीर समस्या है।’- काफी देर बाद बोले वे- दीवार की ओर देखते हुए।

‘बाबा क्या समस्या है?’- मैंने पूछा, लेकिन वे कुछ नहीं बोले। मैं उत्तर की प्रतीक्षा करता रहा और वे दाढ़ी सहलाते हुए दीवार देखते रहे- मौन। बीच-बीच में सिगरेट के गहरे कश। कुछ देर बाद उन्होंने मेरी ओर देखा, फिर दीवार की ओर देखने लगे और दाढ़ी सहलाते हुए बोले- ‘तो..साथी..यह एक गंभीर समस्या है।’

मैंने अनुमान किया कि वे मुझे नहीं पहचान रहे हैं।

‘हम लोग हर समस्या हल कर लेंगे बाबा, लेकिन पहले यह तो बताइए कि पानी कहां मिलेगा?’ - इस विश्वास के साथ मैंने कहा कि किसी न किसी तरह अभी वे पहचान लेंगे मुझे।

‘यह भी एक गंभीर समस्या है साथी यहाँ।’- दाढ़ी सहलाते हुए वे बोले-‘यहाँ पानी केवल सुबह शाम आता है।’

फिर वे उठे और कमरे में मौजूद इकलौता शीशे का गिलास उठाकर बगल के कमरे में गये।

‘चलिए साथी, आपको चाय की दूकान पर पानी पिलाते हैं।’

पेरियार की सीढ़ियाँ उतरकर बाँयी ओर की पथरीली पगडंडी से होते हुए हम लोग चाय की दूकान की ओर गये। खुले में चाय की दूकान। अरावली की चोटियों को काटने के दौरान चबूतरों जैसे कुछ छोटे-छोटे टीले छूट गये होंगे। या शायद जान-बूझकर छोड़ दिये गये होंगे। हम लोग ऐसे ही एक टीले पर बैठे थे। आस-पास और भी लड़के-लड़कियाँ बैठे थे। सब बातें कर रहे थे, लेकिन किसी की भी आवाज इतना तेज नहीं थी कि अवांछित ढंग से किसी और को सुनायी पड़ती। सन की मोटी, लंबी रस्सी लगातार सुलग रही थी, ताकि लोग सिगरेट जला सकें। हम लोग लगातार दो कप चाय पी गये। पानी मैं पहले ही पी चुका था। एक गिलास पानी में मुँह की तंबाकू भी साफ करनी थी और गला भी तर करना था।

‘तो..साथी..यह एक गंभीर समस्या है।’

चाय के दौरान गोरख बीच-बीच में बुदबुदाते रहे- कहीं दूर देखते हुए से। माहौल ऐसा नहीं था कि वहाँ भोजपुरी गीत गाया जाता, लेकिन अब मेरे पास इसके सिवा कोई और उपाय नहीं था गोरख के मन में अपनी याद जगाने का। मैंने उन्हीं का एक गीत शुरू किया-बदली हुई धुन में। शुरू की कुछ पंक्तियाँ सुनते ही उन्होंने गौर से देखा मुझे और देखते रहे। हल्की सफेद पुतलियों के पीछे कौतूहल झाँक रहा था। माथे पर सलवटें थीं, जिन्हें सिर के लटकते बालों ने लगभग ढक रखा था। हाँ, कपड़े वही थे उनके- अंडी की चादर की लुंगी, सिकुड़न भरी रेशमी खद्दर की कमीज और पैरों में चट्टी। गीत पूरा होते-होते होठों और दाँतों के बीच वही खिली-खिली ऋजुता छलछला आयी, जो कभी इलाहाबाद में दिखी थी।

‘तो..मिश्र जी..!’ -अब वे मुझसे मुखातिब थे- ‘रामजी भाई कैसे हैं?’

इसका मतलब, वे समझ गये कि मैं इलाहाबाद से आया हूं। उन दिनों इलाहाबाद के साथियों में यह कथन प्रचलित था कि कोई गोरख से कहे कि वह इलाहाबाद से आया है, तो वे पहला समाचार रामजी भाई का पूछेंगे। फिर तो चाय और गीतों का दौर दिन ढले तक चलता रहा। मैं गीत गाता रहा, वे सुनते रहे-अपने ही गीत।

शाम हो गयी थी- पानी आने का समय। हम लोग कमरे की ओर लौट रहे थे। अचानक गोरख का ध्यान इस ओर गया कि सिगरेट खत्म हो गयी है। पगडंडी के विपरीत छोर की ओर झुटपुटे में कुछ कदम चलकर हम लोग सड़क पर पहुँचे। स्ट्रीट लाइट के उजाले में कुछ लड़के-लड़कियाँ खड़े थे। शायद बस का इंतजार कर रहे थे वे। वहीं एक लड़का पान-सिगरेट की दूकान लगाये बैठा था - लकड़ी की गुमटी में।

‘कैसे हो हवासिंह?’-गोरख ने गुमटी में बैठे लड़के से पूछा। जवाब में लड़का मुस्कराया।

‘क्या सचमुच इसका नाम हवासिंह है?’-मैंने पूछा।

‘एक दिन यह पहाड़ से चलकर यहाँ आ गया-हवा की तरह। मैं इसे हवा कहने लगा- हवासिंह।’

काफी अच्छी मनोदशा में लग रहे थे वे।

लौटकर हम लोग कमरे की ओर आये। हॉस्टल की सीढ़ियां और गलियारे दूधिया उजाले से रौशन थे। नल की टोंटियों में पानी आने लगा था। गोरख के कमरे का दरवाजा पहले की तरह आधा खुला था और उससे भीतर का अँधेरा झाँक रहा था। वे अंदर घुसे और बिना लाइट जलाये तखत पर बैठ गये-चुपचाप। मैंने अनुमान से बटन दबायी। ट्यूब लाइट के उजाले में उन्होंने नये सिरे से मुझे देखा, मुस्कराये और दाढ़ी सहलाते हुए बोले-

‘..तो मिश्रजी..!’

फिर उन्होंने स्नान समेत सुबह की सारी क्रियाएँ निबटायीं। मैंने भी। कपड़े न उन्होंने बदले, न मैंने। मेरे पास बदलने के लिए कपड़े नहीं थे और गोरख का इधर ध्यान भी नहीं था।

‘तो..आइए साथी कहीं चलकर कुछ खाया जाय। मेस में तो अभी कुछ मिलेगा नहीं।’

-पता चला कि उन्होंने भी कल रात के बाद से कुछ नहीं खाया है। शाम को सुबह हो रही थी उनकी और नहा-धो लेने के बाद अब भूख महसूस कर रहे थे। फिर एक अप्रचलित सी पगडंडी से होकर वे मुझे डाउन कैंपस ले गये। धुंधलके में पगडंडी के दोनों ओर दिहाड़ी मजदूरों की अस्थायी झोपड़ियाँ दिख रही थीं। डाउन कैंपस के किसी चाइनीज रेस्तराँ में हम लोगों ने कुछ खाया।

‘यहां तक तो हम लोग बस से भी आ सकते थे।’- रेस्तराँ से निकल कर मैंने कहा।

‘हाँ, आ तो सकते थे।’

‘क्यों न इस बार बस से चला जाय?’

उनके कदम रुक गये। कुछ देर खड़े रहे वे सड़क की पटरी पर-लगातार सिगरेट के कश लेते और दाढ़ी सहलाते हुए। इस बीच बस आयी भी और चली भी गयी। पल भर के लिए रफ्तार कम हुई। इसी दौरान लोग चढ़ गये, कुछ उतर गये। गोरख बस की विपरीत दिशा में मुँह किये सिगरेट का धुआँ छोड़ते रहे।

‘तो..साथी..यह रास्ता आपको.. पसंद नहीं आया..!’ - बस चली जाने पर वे मेरी ओर मुड़े और बोले। वे रुक-रुककर बोल रहे थे और परेशान लग रहे थे।

‘नहीं, नहीं, ऐसा नहीं है। आइए इधर से ही चलते हैं।’ -बिना कुछ समझे मैं बोल पड़ा। हम लोग फिर उसी पगडंडी से लौटे। गोरख रास्ते भर चुप रहे। कमरे में लौटकर भी देर तक चुप रहे। दाढ़ी सहलाते हुए दीवार की ओर देखते रहे। बीच-बीच में सिगरेट के कश। मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। ..किस बात से आहत हुए वे इस तरह? ..बस वाली बात में कुछ अनुचित तो नहीं था। ..किराया भी न लगता। पता नहीं कितनी देर तक हम लोग चुप बैठे रहे। दाढ़ी सहलाते गोरख दीवार देखते रहे और मैं गोरख को। माहौल बोझिल हो रहा था। मेरे लिए तो असह्य भी। गोरख मुझसे वरिष्ठ थे-गुरुस्थानीय। वे मेरी किसी बात से आहत हों, यह सचमुच असह्य था मेरे लिए।

‘बाबा कोई गलती हुई..?’ -करीब घंटे भर बाद मैंने पूछने का साहस किया। उन्होंने मेरी ओर देखा। मैंने ट्यूब लाइट के उजाले में उनके माथे की सलवटें देखीं और आंखों का अपरिचय भी।

‘तो मिश्र जी..!’ क्षण भर बाद वे मुसकराते हुए बोले- मानो नये सिरे से पहचान रहे हों मुझे। मेरी जान में जान आयी, लेकिन यह समझ में नहीं आया कि किस बात से आहत हुए वे।

‘आइए साथी हम लोग मेस की ओर चलें। खाना मिल रहा होगा।’

-बेतरतीब किताबों के ढेर पर रखी टाइमपीस की ओर देखकर वे बोले। खाने के दौरान वे चुप रहे। खाने के बाद हम लोग फिर चाय की दूकान की ओर गये। दूकान खुली थी। अब भी वहां कुछ लड़के-लड़कियां बैठे थे-टीलों पर। सन की मोटी रस्सी सुलग रही थी। हम लोग भी एक टीले पर बैठ गये।

‘खाना कैसा रहा मिश्र जी?’

‘सब्जी अच्छी नहीं लगी। किस चीज की थी?’

‘कुँदरू की।’

‘कुँदरू?’

‘हाँ मेघदूत की नायिका के होंठों का रूपक-पक्वबिम्बाधरोष्ठी-पके कुँदरू रूपी होंठों वाली।’

‘तो यह बिंबाफल है?’

‘हां, पक जाने पर लाल हो जाता है। आकार भी लड़कियों के होंठों की तरह।’

तब तक मुझे गोरख की संस्कृत-पृष्ठभूमि का पता नहीं था। उनकी बहुज्ञता सुखद और विस्मयकारी लग रही थी। इस बीच एक लड़के और लड़की के बीच की कहा-सुनी तेज हो गयी। देखते-देखते लड़की ने लड़के की पिटाई चालू कर दी-चप्पलों से। लड़का पिटता रहा। न वह आत्मरक्षा कर रहा था, न प्रतिरोध।

‘तुम्हारी शादी हुई है मेरे साथ। कुछ तो सोचो!’

-वह बार-बार कहता। लड़की चुप थी और दोनों हाथों से चप्पल चला रही थी। लड़की की बगल में एक दूसरा लड़का खड़ा था, जो पिटाई के प्रति निरपेक्ष लग रहा था। थोड़ी ही देर में लड़की थक गयी थी शायद। उसने पिटाई बंद कर दी और बगल में खड़े लड़के के साथ चली गयी। पिटा हुआ लड़का कुछ देर वहीं खड़ा रहा, फिर सड़क की ओर चला गया।

इस घटना ने सब का ध्यान आकृष्ट किया। जब तक यह घटित होती रही, सब मंत्रमुग्ध से हुए रहे। लड़की और दोनों लड़कों के चले जाने के बाद लोग फिर बातों में व्यस्त हो गये। कुछ अंग्रेजी में बातें कर रहे थे, कुछ हिंदी में, लेकिन सब की बात-चीत के केंद्र में यही घटना थी। सुन-सुन कर पता चला कि पिटने वाला लड़का पुरानी दिल्ली के किसी सेठ का बेटा है। लड़की की शादी हुई है उसके साथ, लेकिन वह उसे पसंद नहीं करती, यहां पढ़ती है और हॉस्टल में रहती है। लड़का दिन में दूकान पर बैठता है, रात में कभी-कभी यहां आता है।

‘आत्मनिर्णय..का..अधिकार..तो होना ही चाहिए..मनुष्य के पास।’- काफी देर की चुप्पी के बाद गोरख बुदबुदाये।

आखिरी चाय पीकर हम लोग कमरे की ओर लौटै। किताबों के ढेर पर रखी टाइमपीस रात के दो बजने की सूचना दे रही थी।

‘तो..साथी..यह एक..गंभीर समस्या है।’ -गोरख फिर बुदबुदाये।

मैं चौंक गया- ‘अब क्या समस्या है बाबा?’

‘दरअसल..मैं किसी की..उपस्थिति में..सो नहीं पाता..। ..क्या आप..छत पर सो सकते हैं?’ -दाढ़ी सहलाते हुए वे दीवार की ओर देख रहे थे और परेशान लग रहे थे।

‘हां, हां। मुझे दिक्कत नहीं होगी छत पर।’

फिर उन्होंने मुझे छत का रास्ता दिखाया और समझाया कि सुबह उनके उठने की प्रतीक्षा न करूं और मेस में नाश्ता करके हिसाब उनके खाते में लिखवा दूं। मैं काफी थक चुका था और आदत के खिलाफ लेटते ही सो गया, लेकिन थोड़ी ही देर में उड़ान भरते हवाई जहाज की आवाज से घबरा कर उठ बैठा। अचानक लगा कि अगर मैं यूं ही बैठा रहा, तो सिर में जहाज की टक्कर लग सकती है और फिर लेट गया। नींद में बार-बार यह सिलसिला चलता रहा। जहाज आते और जाते रहे। उनकी गड़गड़ाहट सुनकर नींद बार-बार टूट जाती। मैं उठ कर बैठ जाता, फिर लगता कि अगर लेट नहीं गया तो इतनी कम ऊँचाई पर उड़ता जहाज जरूर सिर से टकरा जाएगा, लेकिन पता नहीं कब ऐसी नींद आयी कि मैं दिन चढ़े तक बेसुध पड़ा रहा।

धूप कड़ी हो गयी थी। सिर, माथे और चेहरे का पसीना कानों में घुसने लगा था, जब मैं हड़बड़ा कर उठ बैठा-भौंचक। कुर्ते के दामन से आँखें मलते हुए नीचे आया। गोरख के कमरे का दरवाजा आधा खुला था-पहले की तरह। लाइट बुझी थी। छत से लटकता पंखा सनसना रहा था और वे अभी सोये थे। घड़ी तो मैंने नहीं पहनी थी, फिर भी अनुमान किया जा सकता था कि सोकर उठने में देर हो गयी है। अनुमान तब प्रमाण बना, जब पता चला कि लैट्रिन और बाथरूम में पानी नहीं आ रहा है। अब मेरे पास इसके सिवा और कोई उपाय नहीं था कि चाय की दूकान पर समय बिताऊँ और गोरख के उठने और शाम होने का इंतजार करूं। दोपहर ढलने लगी थी, जब अंडी की चादर की लुंगी और सलवटों वाली रेशमी खादी की कमीज पहने गोरख चाय की दूकान की ओर आते दिखे। वे सिर झुकाये चले आ रहे थे-दाढ़ी सहलाते हुए। खूब नजदीक आ जाने पर मैंने नमस्कार किया। उन्होंने सिर उठाया-

‘..तो मिश्र जी..। ..आइए साथी चाय पीते हैं।’

‘आपका नाश्ता-खाना वगैरह हुआ?’

-चाय खत्म करके सिगरेट जलाते हुए उन्होंने पूछा।

‘नहीं।’

‘क्यों..?’

मैंने अपनी स्थिति स्पष्ट की।

‘तो..यह एक..गंभीर समस्या है। ’

‘क्या?’

वे कुछ नहीं बोले।

‘यहां..पूर्वांचल के..कई साथी..रहते हैं। ..आज मैं ..आपकी भेंट उन लोगों से करवाता हूं। ..आप गीत सुनाकर उन्हें प्रभावित कर सकते हैं, फिर उन्हीं में से किसी के साथ रह भी सकते हैं। खाना-नाश्ता मेस में हो जायेगा..। ..हिसाब मेरे खाते में लिखवा दीजिएगा..और शाम से देर रात तक हम लोग साथ रहा करेंगे।’

-कुछ देर चुप रहने के बाद वे बोले। अमूमन हम लोगों के बीच यह धारणा प्रचलित थी कि गोरख जितने प्रतिभाशाली कवि और क्रांतिचेता विद्वान् हैं, व्यावहारिक मामलों में उतने ही शून्य भी हैं। इसीलिए उस दिन की उनकी व्यावहारिक चतुराई देखकर मैं विस्मित हो रहा था। लगातार दो-तीन चाय पीकर हम लोग राजेश राहुल के कमरे की ओर गये, जो उसी हॉस्टल की किसी दूसरी लॉबी में था। वहाँ उर्मिलेश मिल गये। वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मेरे सीनियर थे और वहाँ की छात्र राजनीति में अत्यंत सक्रिय थे। इलाहाबाद से एम.ए. करके ज.ने.वि. में पी-एच.डी. कर रहे थे। योजना के मुताबिक गोरख ने मेरा परिचय कराया और इसके साथ ही गीत सुनाने का प्रस्ताव भी कर दिया।

‘हाँ गुरू हो जाय।’ -उर्मिलेश ने हँसते हुए समर्थन किया। हँसने के दौरान उनके काले दाँत दिखे। काली दाढ़ी और काले दाँतों के बीच पान से रंगे होंठ चटख भेदक रेखा बना रहे थे। यों तो वहां सब दाढ़ी वाले थे, लेकिन दाढ़ी सहलाने का काम केवल गोरख कर रहे थे। मैंने कुछ गीत सुनाए- दो-तीन गोरख के, कुछ-एक अपने भी। इसी बीच किसी भूल से खुले रह गये वाश बेसिन के नल की टोंटी से पानी गिरने की आवाज आने लगी। यानी शाम हो गयी। घंटे भर बाद चाय की दूकान पर मिलने का वादा करके गान-गोष्ठी मुल्तवी की गयी।

वादे के मुताबिक हम लोग चाय की दूकान पर मिले। फिर चाय, गप-शप और गीत। खाने के बाद भी यह सिलसिला चलता रहा। इस दौरान कुछ और साथी आ गये थे, जिनके नाम मैं याद नहीं कर पा रहा हूं। देर रात को सब अपने-अपने कमरों की ओर गये। गोरख भी। मैं राजेश राहुल के साथ उनके कमरे की ओर गया। रास्ते में पहाड़ पर सिर पटकता नवयुवक दिखा। वह अंग्रेजी में विलाप कर रहा था, जिसका आशय यह था कि उसकी जरूरत किसी को नहीं है। नींद में मुझे बार-बार उसका विलाप सुनायी पड़ता रहा। अचानक ऐसा लगा, जैसे गोरख बुला रहे हों। नींद खुल जाने पर भी यही लगता रहा कि यह सपना है। इतनी सुबह उनके उठने की बात सोची भी नहीं जा सकती थी। फिर लगा कि खिड़की के पार वे खड़े हैं और मुझे बुला रहे हैं। बाहर निकल कर देखा, तो वे सचमुच खड़े थे। उगते सूरज की लाली में सब कुछ रँगा था। जलते बल्ब बेवजह लगने लगे थे। गोरख की आँखें अधखुली थीं। मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था। बाद में जो समझ में आया, वह यह कि रात में मैंने निराला की एक गजल सुनायी थी, जिसकी धुन का उन पर ऐसा असर हुआ कि उसी धुन में एक गजल लिख डाली और अब चाह रहे थे कि मैं उसे गाकर सुनाऊँ ताकि वे विश्वस्त हो सकें कि गजल मुकम्मल हो गयी है। गजल सुन लेने के बाद उनके उनींदे चेहरे पर एक विशेष खुशी दिखने लगी। वे मुस्कराये और शाम को मिलने का वादा करके सोने चले गये। निराला की गजल थी- ‘किनारा वो हमसे किये जा रहे हैं।’ गोरख ने जो गजल लिखी, वह थी- ‘हमारे वतन की नयी जिंदगी हो।’

दिन भर सोये गोरख। मैं राजेश राहुल के साथ भारतीय भाषा केंद्र और लाइब्रेरी में कुछ काम करता रहा। बीच-बीच में राजेश राहुल मट्ठे जैसी लस्सी पिलाते रहे, जो उस तपती दोपहरी में अमृत जैसी लग रही थी। शाम को गोरख से फिर भेंट हुई- चाय की दूकान पर। बात-चीत के केंद्र में वह गजल ही रही। इसी सिलसिले में गोरख ने एक महत्वपूर्ण बात कही- ‘सरलता अपने आप में एक मूल्य है- साहित्य का भी और जीवन का भी।’

हम लोग मेस में रात का खाना खा रहे थे, जब किसी ने गोरख को सूचना दी कि बी.एच.यू. में दर्शनशास्त्र के प्रवक्ता की जगह निकली है। गोरख ने यह सूचना ऐसे सुनी, जैसे इससे उनका कोई संबंध ही न हो। थोड़ी देर बाद जब उसी व्यक्ति ने फिर से यह सूचना देते हुए कहा कि आप इस पद के लिए बेहतर अभ्यर्थी हो सकते हैं, तो गोरख ने आश्चर्यपूर्वक उसकी ओर देखा।

‘..तो साथी..क्या सचमुच ऐसा लगता है आपको?’ -अपने वैदुष्य से पूरी तरह बेखबर लग रहे थे वे।

‘हाँ हाँ, क्यों नहीं? लेकिन थोड़ी जल्दी करनी होगी। लास्ट डेट नजदीक है।’-मुँह का कौर जल्दी-जल्दी चबाकर वह फिर बोला- ‘मैं कल फॉर्म लेकर आपके कमरे पर आ जाता हूं।’

‘तो यह तो बहुत अच्छा होगा।’

रोज की तरह उस रात भी हम लोग खाना खाने के बाद चाय की दूकान की ओर गये। फिर देर रात तक चाय, सिगरेट और दुनिया-जहान की बातें। गोरख चुप थे और दाढ़ी सहलाते हुए सिगरेट के कश ले रहे थे। बीच-बीच में वे पूछते-‘..तो..साथी..क्या मेरी नियुक्ति..बी.एच.यू. में हो सकती है?’

‘हाँ हाँ, क्यों नहीं?’

-हम लोग कहते। वे बच्चों की तरह खुश हो जाते। अगले दिन लगभग दो बजे मैं गोरख के कमरे की ओर गया। वे न सिर्फ सोकर उठ गए थे, बल्कि खद्दर की पैंट-कमीज और पैरों में चप्पल पहने कहीं जाने को तैयार लग रहे थे। तखत पर बी.एच.यू. का फॉर्म रखा था और वे सिगरेट के कश लेते हुए कमरे में टहल रहे थे।

‘फॉर्म आ गया क्या बाबा?’

‘तो..मिश्र जी..आपको क्या लगता है? ..क्या मेरी नियुक्ति..बी.एच.यू. में..हो सकती है?’

-मेरे प्रश्न का उत्तर देने के बदले उन्होंने प्रश्न किया।

‘आप ऐसा क्यों सोचते हैं? आपका नहीं होगा तो किसका होगा?’

‘तो..आइए साथी कहीं चलकर कुछ खाते हैं।’

‘आप कहीं जाने वाले हैं?’

‘नहीं, आज मुझे अपनी गाइड के पास जाना था। वहीं से आ रहा हूं।’

सीढ़ियाँ उतर कर हम लोग उसी अप्रचलित पगडंडी की ओर चल पड़े, जिससे पहले दिन डाउन कैंपस गये थे, लेकिन कुछ कदम चलकर वे रुक गये और कुछ सोचने लगे।

‘क्या हुआ बाबा?’

‘आइए साथी हम लोग चाय से ही काम चला लेंगे।’ -जैसे उन्हें कुछ याद आया हो। मुझे भी पहले दिन वाली घटना याद आयी। पछतावा नये सिरे से होने लगा। ..मेरे किस व्यवहार से उस दिन आहत हुए वे? हम लोग चाय की दूकान की ओर गये। चाय, सिगरेट, गीत और बातों का सिलसिला शाम तक चलता रहा। खाना खाने के बाद फिर बैठे हम लोग- रोज की तरह। हाँ, आज गोरख की स्थिति भिन्न थी। अभी कल तक उन्हें अपनी अभ्यर्थिता को लेकर संदेह था और आज फॉर्म मिल जाने और गाइड तथा मित्रों की आश्वस्तियां सुन लेने के बाद वे मान बैठे थे कि नियुक्ति हो गयी है।

‘तो बाबा कल फॉर्म भर लीजिए। और भी जो औपचारिकताएं हों, पूरी कर लीजिए। लास्टडेट नजदीक है।’ -देर रात को जब हम लोग अलग होने को हुए, तो मैंने कहा। शायद मेरी बात से उनकी कल्पना को ठेस लगी। थोड़ी देर चुप रहे वे, फिर बोले- ‘तो..साथी..क्या आप..कल..सुबह..दस बजे तक..मेरे कमरे पर आ जाएंगे?’

‘हाँ, हाँ, क्यों नहीं?’

अगले दिन दस बजे मैं उनके कमरे पर पहुंचा, तो वे सो रहे थे। थोड़ी देर की प्रतीक्षा के बाद मैंने कोशिश करके जगाया, तो उन्होंने प्रश्नाकुल आँखों से मुझे देखा। सिगरेट के कुछ कश लेने के बाद उन्होंने चाय की दूकान की ओर चलने का इशारा किया। चाय पीकर हम लोग फिर कमरे की ओर लौटे-चुपचाप।

‘तो..क्या..समस्या है साथी?’-तखत पर बैठते हुए उन्होंने पूछा। रात की बात वे पूरी तरह भूल गये थे। मैंने फॉर्म की याद दिलायी। वे थोड़ी देर चुप रहे, फिर उन्हीं कपड़ों में चलने को तैयार हो गये। कमीज बदल गयी थी। लुंगी वही थी।

‘कुछ कागजात लेंगे?’

‘नहीं साथी। गाइड ने कहा है कि चूँकि थीसिस जमा है और डिग्री अभी नहीं मिली है, इसलिए शोधकार्य के बारे में एक संक्षिप्त वक्तव्य टाइप करा देना जरूरी है, बस।’

‘बाबा गाइड के कहने का आशय यह नहीं कि हाई स्कूल से एम.ए. तक के दस्तावेजों की जरूरत ही नहीं है।’

वे चुप हो गये। थोड़ी देर हम लोग चुप खड़े रहे, फिर उन्होंने कुछ किताबों को उलटना-पलटना शुरू कर दिया। तकरीबन आधे घंटे की मशक्कत के बाद विश्वविद्यालय स्तर के दस्तावेज तो मिल गये, लेकिन माध्यमिक और प्राथमिक कक्षाओं के नहीं मिले। देर तक पंखे की सनसनाहट सुनायी पड़ती रही और किताबों की उठा-पटक। गोरख के माथे की सिकुड़नें गहरी हो गयी थीं। कमरा सिगरेट के धुएँ से भर गया था।

‘बाकी..दस्तावेज..टुन्ना के घर में..हो सकते हैं..।’ -अचानक बोले वे -दाढ़ी सहलाते हुए।

‘टुन्ना..?’

‘आप टुन्ना को जानते होंगे साथी।’

तब तक मैं जलेश्वर का यह नाम नहीं जानता था, जबकि वे मेरे आत्मीय थे और बिना मंच और बिना वेश-भूषा के अभिनय करने की प्रथम दीक्षा उन्हीं ने दी थी। गोरख मुझे यह समझाने लगे कि टुन्ना का घर बनारस के किस मुहल्ले की किस गली में है।

‘बाबा यह सब मुझे क्यों समझा रहे हैं?’

‘साथी क्या आप बनारस तक नहीं चले जाएंगे? ..किराया..मैं दूँगा। ..ऐसे भी आपको इलाहाबाद तक जाना है।’

‘ठीक है। चले जाएंगे, लेकिन चलिए पहले आज का काम तो कर लिया जाय।’

थोड़ी देर बाद हम लोग हवा सिंह की दूकान के सामने खड़े थे। गोरख ने अपने लिए सिगरेट का पैकेट लिया। मुझे पान खिलाया, तब तक बस आ गयी। रफ्तार कम हुई। कुछ लोग चढ़ गये, कुछ उतर गये। बस चली गयी। गोरख जहाँ के तहाँ खड़े रहे।

‘क्या हुआ बाबा?’

‘तो..मिश्र जी..क्या आप..उस पगडंडी से..चलना पसंद नहीं करेंगे?’

‘इस धूप में..!’

मेरा प्रतिप्रश्न सुनकर वे चुप हो गये और उदास भी। मैंने इधर ध्यान नहीं दिया। थोड़ी देर में दूसरी बस आयी। रफ्तार कम हुई। मैं पीछे के गेट से चढ़ गया और खाली सीट तलाशते हुए आगे की ओर बढ़ गया। बीच में कुछ सीटें खाली थीं। बैठने से पहले मैंने गोरख की तलाश में पीछे की ओर देखा। वे सबसे पीछे खड़े थे। मैंने इशारे से बुलाया। वे कुछ नहीं बोले, कोई इशारा भी नहीं किया। बहुत व्यग्र लग रहे थे वे। न सिगरेट पी रहे थे, न दाढ़ी सहला रहे थे। फैली हुई आँखों की हल्की सफेद पुतलियाँ शायद कुछ नहीं देख रही थीं। जहाँ थे, वहीं खड़े रहे वे-सबसे पीछे, सबसे अलग। बस डाउन कैंपस पहुंच कर धीरे हुई, तो हम लोग उतर गये। गोरख बस से उतर कर वहीं खड़े हो गये-सड़क किनारे। सिगरेट के कुछ कश लेने के बाद वे सहज हुए।

‘तो..साथी..अब..क्या करना चाहिए?’

‘सबसे पहले तो थीसिस के बारे में अपना वक्तव्य टाइप कराइए

और दस्तावेज मुझे दीजिए, मैं फोटो कॉपी कराके आता हूँ।’

‘..यह तो..गंभीर समस्या है।’-वे बुदबुदाये।

‘अब क्या समस्या है बाबा?’

‘दस्तावेज..तो कहीं..छूट गये।’

‘क्या..?’

‘हाँ..साथी..।’

‘कहीं बस में तो नहीं छूट गये?’

वे कुछ नहीं बोले। हम लोग सड़क किनारे खड़े थे-किंकर्तव्यविमूढ़।

‘जहाँ तक मैं..समझता हूँ, दस्तावेज..हवासिंह की दूकान पर..हो सकते हैं।’

‘तब?’

‘साथी..क्या..आप..बस से..हवा सिंह..की दूकान तक..जा सकते हैं?’-उनके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थीं।

हवा सिंह की दूकान पर कागजात सही-सलामत मिल गये और मैं उन्हें लेकर लौटा, तो गोरख वहीं खड़े मिले, जहाँ पहले खड़े थे-सड़क किनारे।

‘तो..साथी..आपने..बहुत बड़ा काम..किया है। आइए..कहीं..कुछ खाते-पीते हैं।’

अब वे मुस्कराते हुए दाढ़ी सहला रहे थे।

‘नहीं बाबा आइए पहले ये काम कर लिये जाएं।’

‘तो..साथी..आप फोटो कॉपी करा लें..और मैं टाइप करवा लेता हूँ।’

दोनों दूकानें आस-पास थीं। फोटो कॉपी का काम जल्द ही हो गया और मैं गोरख के पास आ गया। सँकरे गलियारे जैसी जगह में टाइपिस्ट एक स्टूल पर बैठा था। बीच में टाइपराइटर। सामने एक दूसरा स्टूल-ग्राहक के लिए। गोरख खड़े थे और आँखें मूँदे डिक्टेशन बोल रहे थे-अँग्रेजी में। उनके खड़े होने के बाद गलियारे में बहुत कम जगह बची थी। एक युवक बार-बार उधर से ही आ-जा रहा था। हर बार उसकी कुहनी गोरख को छू जाती। दो-तीन बार ऐसा हुआ। अचानक गोरख का डिक्टेशन रुक गया। बंद आँखें खुल गयीं और एक अजीब आवेश से काँपने लगे वे।

‘मिश्र जी..यह आदमी..मुझे..इरादतन..अपमानित कर रहा है।’- युवक की ओर तर्जनी उठाकर किसी तरह बोले वे।

‘मैंने तो कुछ नहीं किया।’- युवक हक्का-बक्का खड़ा था। टाइपिस्ट गोरख का चेहरा देख रहा था। मैंने यह सुन रखा था कि किसी से छू जाने पर वे असहज हो जाते हैं, लेकिन उस समय की उनकी उत्तेजना देखकर मैं निरुपाय हो रहा था। कभी मैं गोरख का मुँह देखता, कभी युवक का। वह कोई मजदूर लग रहा था और अपनी निर्दोषिता सिद्ध करने के लिए खड़ा था। गोरख अपनी जगह खड़े थे। नथुने फड़क रहे थे, लेकिन वे कुछ बोल नहीं रहे थे। आँखें खुली थीं, लेकिन ऐसा लगता था, जैसे उन्हें कुछ दिख न रहा हो। थोड़ी देर में आवेश कम हुआ, तो उन्होंने सिगरेट जलायी। कुछ कश लेने के बाद आँखें फिर मुँद गयीं और वे डिक्टेशन बोलने लगे।

लौटती बार हम लोग पैदल आये-पगडंडी से। उनकी स्पर्श-संवेदना का यह हाल देख कर बस से चलने का प्रस्ताव नहीं कर सका मैं। पहाड़ी पगडंडी पर हम लोग चुपचाप चले जा रहे थे। लू चल रही थी। मजदूरों की झोपड़ियों के इर्द-गिर्द छोटे बच्चे खेल रहे थे। मेरे दिमाग में कभी उस युवक का निरीह चेहरा झाँक रहा था, तो कभी गोरख का उद्विग्न चेहरा। ..गोरख जनता के कवि हैं। ..वह युवक भी तो जनता का आदमी था। ..कपड़ों से मजदूर लग रहा है। ..उसकी छुअन से गोरख क्यों इतना परेशान हो गये? ..लेकिन ये तो सहपाठियों से छू जाने पर भी आपा खो बैठते हैं। ..क्या वजह हो सकती है? ..इनकी क्रांतिकारी चेतना पर संदेह नहीं किया जा सकता। ..इनका पूरा रचनाकर्म शोषण और गैर बराबरी के खिलाफ संकल्पित है। ..वह कौन सी अप्रिय छुअन थी, जिसने इनकी स्पर्श संवेदना को सदा के लिए कुंठित कर दिया? मैं गोरख के पीछे-पीछे चला जा रहा था और दिमाग में उधेड़बुन चालू थी।

उसी शाम गोरख ने मुझे बनारस तक का किराया दिया और अधूरे दस्तावेजों के साथ फॉर्म भी। एक चीज और दी उन्होंने-अपना कविता-संग्रह : ‘साथी..बनारस में..आपको..देवरिया के बहुत से विद्यार्थी..मिल जायेंगे। ..किसी से यह किताब..मेरे पिता के पास भिजवा दीजिएगा।’

बनारस पहुँच कर मैंने जलेश्वर का मकान खोज लिया था। जहाँ-जहाँ गोरख के दस्तावेज होने की संभावना थी, जलेश्वर ने तलाश की। कई घंटे की छान-बीन के बाद गोरख की इबारत वाले कुछ पन्नों के सिवा कुछ नहीं मिला। ..अब?

गोरख का कविता संग्रह उनके पिता तक पहुँचाने का काम तो आसानी से हो गया। बनारस में सचमुच देवरिया के बहुत से विद्यार्थी थे। सब गोरख को जानने वाले-चाहने वाले। कविता-संग्रह उनके पिता तक ले जाने की होड़ मची थी उनमें। ..लेकिन फॉर्म का क्या किया जाय? आखिरकार अधूरे दस्तावेजों के साथ ही फॉर्म को डाक के हवाले कर दिया गया। फिर हम लोगों ने मिलकर ठहाका लगाया था- मैं, जलेश्वर और दूसरे कई साथियों ने। उस समय दूर-दूर तक यह आशंका नहीं थी कि ये असहजताएं उनके किसी मनोरोग की अभिव्यक्ति हैं, जो एक दिन उनकी असमय दारुण मृत्यु का कारण बन सकता है।

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