गुरुवार, 3 नवंबर 2011

स्मृति में गोरख - शिवशंकर मिश्र


शायद वह सन् अस्सी की गर्मियों की कोई दोपहर थी, जब मैं पहली बार दिल्ली पहुंचा- उन दिनों चलने वाली अपर इंडिया एक्सप्रेस से। पूरे महानगर में जिस एक अदद आदमी से पहचान के आधार पर मैं दिल्ली पहुंचा था, वे थे गोरख पांडेय। पहली बार इलाहाबाद में 'परिवेश' की एक गोष्ठी में देखा और सुना था उन्हें। बार-बार दाढ़ी सहलाते और सिगरेट के गहरे कश लेते हुए वे गहन चिंतन की मुद्रा में बोल रहे थे और प्रभावित कर रहे थे।

गोष्ठी के अंत में 'दस्ता' की ओर से मैंने अनिल सिंह तथा कुछ और साथियों के साथ मिल कर गोरख का एक गीत गाया- धुन बदल कर। रामजी भाई बताया करते थे कि गोरख खुद भी गाते हैं और वे इस तरह नहीं, बल्कि इस तरह गाते हैं। फिर वे अपनी आवाज में उन धुनों को सुनाते। कुछ धुनों का मैं अनुकरण करता और कुछ को बदल देता। उस दिन बदली हुई धुन वाला जो गीत गाया गया, वह था- 'केकरा नावें जमीन पटवारी, केकरा नावें जमीन?'

इस गीत की धुन एक होली गीत पर आधारित है। उस सपाट धुन में मुझे गायकी का मजा न मिलता और मैं इस गीत को पूरबी की तरह गाता था। अपने ही गीत को बदली हुई धुन में सुनते हुए गोरख लगभग लगातार मुझे देखते रहे। सांझ हो चली थी। बल्ब जलाया गया, तो मेरा ध्यान उनके मैल से चीकट कुर्ते-पाजामे की ओर गया, जिसे मैंने दिल्ली से इलाहाबाद की यात्रा का परिणाम समझा। ..लेकिन दाढ़ी-बाल के साथ बढ़े हुए नाखून? मुझे लगा, जैसे किसी गंभीर समस्या का समाधान खोजने के क्रम में वे दाढ़ी-बाल और कपड़ों की सफाई जैसे कम जरूरी काम पता नहीं कब से भूले हुए हैं। गीत सुनने के बाद वे देर तक दाढ़ी सहलाते रहे। बीच-बीच में मुस्कराते, होंठों और दांतों के बीच खिली-खिली ऋजुता छलछला उठती और वे कहते- 'तो...मिश्र जी..!'

मुझे लगता कि अब वे कुछ कहने जा रहे हैं, लेकिन ऐसा कुछ न होता। वे फिर दाढ़ी सहलाते और उसी मुदिता के साथ कहते- 'तो... मिश्र जी...!' दसियों बार ऐसा किया उन्होंने। मुझे लगा, गोरख मुझे अपनी स्मृति में सहेज रहे हैं।

दूसरी मुलाकात गोरखपुर में हुई थी। डॉ. लालबहादुर वर्मा तब गोरखपुर विश्वविद्यालय में थे। उन्होंने खुले मैदान में एक बड़े कवि सम्मेलन का आयोजन किया था। अदम गोंडवी, अशोक चक्रधर, रामकुमार कृषक, पुरुषोत्तम प्रतीक और दूसरे अनेक कवि आये थे। इलाहाबाद से मैं था और हिमांशु रंजन। गोरख एक दिन पहले आ गए थे। देवेन्द्र आर्य और गोरखपुर के दूसरे अनेक साथी प्राण-पण से आगंतुक कवियों की खातिर तवज्जो में लगे थे। शायद वे ही हम लोगों को उस हालनुमा कमरे में ले गये, जहां फर्श पर बिछे गद्दों पर बैठे कवियों के बीच लगातार दाढ़ी सहलाते और बीच-बीच में सिगरेट के गहरे कश लेते गोरख दिखे। शाम हो गयी थी। हल्के वाट के बल्ब की पीली रोशनी में उनका सफेद खादी का कुर्ता-पाजामा कुछ कम गंदा लग रहा था। चेहरे पर गंभीरता थी और बीच-बीच में 'साथी आपको चाय मिली या नहीं' या 'अमुक आये या नहीं'- इस तरह के प्रश्न ऐसे पूछ रहे थे वे, जैसे आयोजन का सारा भार उन्हीं पर हो। मुझसे भी उसी आत्मीयता से उन्होंने चाय के लिए पूछा, लेकिन मैंने महसूस किया कि मुझे नहीं पहचान रहे हैं वे। फिर शहर के किसी महंगे होटल में, जिसका नाम मुझे याद नहीं, खाना हुआ- सुस्वादु। फिर सब लोग रिक्शों से उस मैदान की ओर रवाना हुए, जहां कवि सम्मलेन होना था।

मैदान श्रोताओं से भरा था- खचाखच। नाना वर्गों के श्रोता- विश्वविद्यालय के शिक्षक, शोधार्थी, छात्र-छात्राएं, गृहणियां, रेलवे कर्मचारी, नगर के रचनाकार, रंगकर्मी, शहरी मजदूर। रिक्शेवाले मैदान की चहारदीवारी के पार अपने-अपने रिक्शों पर खड़े होकर कविता सुन रहे थे। यह सब देखकर गोरख बहुत उत्साहित थे और पूरी उत्तेजना में अपना गीत प्रस्तुत कर रहे थे- 'जनता के आवे पलटनिया, हिलेले झकझोर दुनिया।' उत्साह में वे इतना खींच कर गा रहे थे कि अंतरा आते-आते गला जवाब दे गया। मैं तत्काल उनकी बगल में खड़ा हुआ और आगे का गीत हम दोनों ने मिलकर पूरा किया। गीत सुनाकर वे बैठे तो लगा, जैसे खींच कर गाने की वजह से थक गए हों। कुछ पलों तक वे सिर झुकाये, आँखें मूंदे बैठे रहे, फिर अचानक मेरी ओर देखा और मुस्कराते हुए बोले- 'तो मिश्र जी...इलाहाबाद वाले।' इसी बीच मेरे नाम की पुकार हुई। मैंने दो गीत सुनाये- एक अवधी में, दूसरा भोजपुरी में। गीत सुनाकर बैठते ही गोरख बोले- 'आइए साथी कहीं कुछ खाते हैं।’ मुझे याद नहीं कि हम लोग किस मुहल्ले में गए। शायद कवि सम्मेलन वाले मैदान से दक्षिण की ओर कुछ दूर चलकर हम लोग किसी मिठाई की दूकान तक गए थे।

'ये तो बूंदी के लड्डू हैं।' - लड्डू खाते हुए मैंने कहा।

'हाँ, भोजपुरी में इसे बुनिया कहते हैं। तरल बेसन की बूँदें खौलते घी में गिरकर ठोस रूप ले लती हैं।' - कविता जैसी भाषा में उन्होंने 'बुनिया' की रचना प्रक्रिया बतायी, फिर मुझे पान खिलाया और अपने लिए सिगरेट का पैकेट खरीदा। लौटती बार वे कुछ देर चुप रहे- सिगरेट का कश लेते हुए।

'जनता के आवे पलटनिया वाला गीत किस लोकधुन पर आधारित है, आप जानते हैं?' -थोड़ी दूर चलकर अचानक उन्होंने पूछा।

' नहीं।'

'रामजी के आवे दुलहिनिया पड़ेले झीर-झीर बुनिया।'

उस समय और उसके बाद भी कई मौकों पर मैंने महसूस किया कि लोकधुनें गोरख को बींधती थीं और उनके भीतर रचनात्मक बेचैनी उत्पन्न करती थीं या उनके भीतर की रचनात्मक बेचैनी को राह सुझाती थीं। लौटकर हम लोग मंच पर पहुंचे ही थे कि दूसरे दौर के लिए मेरा नाम पुकार दिया गया। पान की पीक थूकने की गरज से मैं मंच के पीछे गया। वहां एक स्थानीय वरिष्ठ कवि खड़े मिले, जिनका नाम उस समय मैं नहीं जानता था। खूब तारीफ की उन्होंने मेरी और बोले- ‘सुना है, तुम 'छापक पेड़ छिउलिया' वाला गीत बहुत अच्छा गाते हो, वही सुनाओ।'

अज्ञात वरिष्ठ कवि के द्वारा की गई प्रशंसा और गीत की अनुशंसा को मैंने अपने प्रति उनकी शुभाशंसा समझा। विह्वल भाव से मैं मंच पर गया और इस टिप्पणी के साथ गीत शुरू किया कि अब मैं अवधी का एक लोकगीत प्रस्तुत करने जा रहा हूँ। जाहिर है कि यह मेरी नहीं, बल्कि माँ-बहनों की सामूहिक रचना है। अभी मैं गीत की दो आरंभिक पंक्तियाँ ही सुना पाया था कि वही वरिष्ठ कवि खड़े हो गए और मुझसे माइक्रोफोन छीन कर अपना भाषण शुरू कर दिया, जिसका आशय यह था कि इस जनवादी क्रांतिकारी मंच से दूसरों की रचनाएँ अपने नाम से सुनाना जनता के साथ गद्दारी है और वे इसकी भर्त्सना करते हैं। मेरी तो मति मारी गयी। पहली बार इलाहाबाद से बाहर कहीं कवि सम्मेलन में गया था- एम. ए. का विद्यार्थी। वे माइक्रोफोन पर मेरी लानत-मलामत करते रहे। मैं अप्रासंगिक सा खड़ा उन्हें निहारता रहा। अब इतने दिनों बाद मुझे उनके व्यक्तित्व की कोई रेखा याद नहीं, सिवा उनकी थुलथुल हथेली के, जिसकी प्रतीति हाथ मिलाने के दौरान हुई थी। वे बोल चुके, तो मैंने अपना पक्ष रखा, जिसका तात्पर्य यह था कि ये वही कवि महोदय हैं, जिन्होंने मंच के पीछे मुझसे इस लोकगीत को सुनाने की फर्माइश की थी, जिसका अब स्वयं विरोध कर रहे हैं और यह कि अब मैं दूसरा गीत सुनाने जा रहा हूँ, जो मूलत: मेरी रचना है। मैं दूसरा गीत शुरू करूँ, इससे पहले ही श्रोताओं ने तालियाँ बजाकर वही लोकगीत सुनाने की जोरदार फर्माइश की। इस दौरान गोरख की क्या दशा रही, मैं ध्यान नहीं दे पाया। गीत सुनाते हुए गीत में डूबा रहा, फिर अपने में। एक तरफ लोगों का अपार स्नेह, दूसरी तरफ महाकवि की कुत्सा...! देर रात तक चला कवि सम्मेलन। महाकवि फिर मंच पर नहीं दिखे। श्रोताओं की भीड़ जस की तस थी, फिर भी भोर होने से कुछ घंटे पहले कवि सम्मेलन के संपन्न होने की घोषणा कर दी गयी- शायद इसलिए कि थोड़ा आराम करके लोग रोजमर्रा के कामों में लग सकें। कवियों को फिर उसी हालनुमा कमरे में ले जाया गया, जहां शाम को चाय पी गई थी। शायद वह रेलवे की इमारत थी। थके हुए लोग फर्श पर बिछे गद्दों पर लेटते ही खर्राटे लेने लगे। मैं भी लेट गया। इस बीच किसी ने बल्ब बुझा दिया। मैंने आँखें मूँद रखी थीं, लेकिन नींद नहीं आ रही थी। थोड़ी देर में मुझे लगा कि कोई टहल रहा है अँधेरे में। आँखें खोलीं तो लगा, कोई छाया कमरे से बाहर निकल गयी। मेरा अनुमान था कि यह गोरख होंगे। उनकी कुछ असहजताओं के किस्से सुन चुका था। मैं भी कमरे से बाहर निकल आया।

शायद वह पीपल का पेड़ था, जिसके नीचे चबूतरे पर बैठे गोरख सिगरेट सुलगा रहे थे। जलती हुई माचिस की तीली के उजाले में उनकी दाढ़ी, कम नुकीली नाक और माथे तक लटकती जुल्फों की झलक दिखी- एक क्षण के लिए। मैं भी बैठ गया उसी चबूतरे पर- गोरख से कुछ फासला बनाते हुए। लगभग घंटे भर बैठा रहा मैं, लेकिन वे मेरे अस्तित्व से बेखबर क्षितिज देखते रहे, जो शहर की रोशनियों और उषा की उजास के संयोग से पीला और ताँबई हो रहा था। लौटकर मैं अपने बिस्तर पर लेट गया। फिर तो ऐसी नींद आयी कि दोपहर से थोड़ा पहले ही उठ सका।

दोपहर का खाना डॉ. लालबहादुर वर्मा के यहाँ होना था। हुआ- सुरुचिसम्पन्न। सामिष भी, निरामिष भी। लेकिन खाने से पहले एक घटना हो गयी। खूबसूरत मोजैक वाले फर्श पर बिछे टाट पर सब लोग बैठे थे। खाना परोसने की तैयारी हो ही रही थी कि महाकवि फिर नमूदार हुए। वे टाट पर बैठे ही थे कि गोरख शुरू हो गए-अत्यंत गंभीर और बेहद उत्तेजित। गोरख रौद्र होते जा रहे थे। नथुने फड़क रहे थे। दाढ़ी तो सहला रहे थे, लेकिन सिगरेट पीना भूल गए थे शायद कुछ देर के लिए। या इसलिए नहीं पी रहे थे सिगरेट कि अब तो खाना खाना है। महाकवि की ओर तर्जनी उठाकर या कभी मुट्ठी बंधा हाथ उठाकर गोरख ने जो कुछ कहा, उसका सार कुछ इस तरह था कि कल आपने जिस तरह जनता के एक महत्वपूर्ण गीत की प्रस्तुति में बाधा उत्पन्न की और एक उदीयमान कवि को अपमानित करने की घिनौनी साजिश की, हम उसकी निंदा करते हैं। अब तो खाना पीछे छूट गया और सबकी चिंता का विषय यह हो गया कि गोरख को कैसे सम्हाला जाय। आखिरकार स्थिति को देखते हुए महाकवि खुद ही चले गये।

दो मुलाकातों के बाद मैं आश्वस्त था कि गोरख अब मुझे पहचान लेंगे। गर्मी की उस दोपहर, जब मैं डी.टी.सी. की बस से आर. के. पुरम् पहुँचा, तो मन में एक दूसरा संशय उठ रहा था कि कहीं ऐसा न हो कि वे कमरे में न हों और दिल्ली से बाहर चले गये हों किसी कार्यक्रम में। तिरछी समानांतर दीवारों वाला विश्वविद्यालय का स्थापत्य विचित्र और आकर्षक लग रहा था। अंग्रेजी बोलते देशी-विदेशी छात्र-छात्राओं का समूह मन में आतंक पैदा कर रहा था, लेकिन हर वैचित्र्य, आकर्षण और आतंक पर मन का संशय भारी पड़ रहा था। पेरियार हॉस्टल की ऊपरी मंजिल वाले गोरख के कमरे के सामने पहुंचकर वह संशय भी दूर हो गया। कमरे का नंबर अब मैं भूल चुका हूँ। दरवाजा आधा खुला था। मैंने हल्के से दस्तक दी। देर तक कोई प्रतिक्रिया न होने पर झाँकने की धृष्टता की और पाया कि वे सोये हैं। मैंने अनुमान किया कि सुबह उठे होंगे, नहाया-धोया होगा और दिन का खाना खाकर सो गये होंगे। मैं इलाहाबाद से यात्रा करके आया था-ट्रेन में खड़े-खड़े। खाने के नाम पर सुर्ती-चूना और पीने के नाम पर कुछ नहीं। लंबी यात्रा का अनुभव न होने के कारण पानी की व्यवस्था करके नहीं चला था। गला सूखा था। सीने और आंखों में जलन हो रही थी। ढिठाई करके मैं घुस गया और फर्श पर बिखरी किताबों के बीच जगह बनाकर बैठ गया। खटर-पटर से उनकी नींद में खलल पहुंचा। अधखुली आँखों से उन्होंने मुझे देखा, फिर आँखें मूँद लीं। फौरन नमस्कार किया मैंने और अपना तथा अपने गृह जनपद का नाम बताया। फिर उन्होंने एक बार मेरी ओर देखा और आँखें बंद कर लीं। मुझे लगा, नींद नहीं खुल रही है। वहीं रखे सिगरेट के पैकेट से मैंने एक सिगरेट निकाली, अपने होंठों से लगाकर जलायी और उनकी ओर बढ़ाते हुए कहा- ‘बाबा सिगरेट!’

गोरख ने एक बार मेरी ओर देखा, फिर सिगरेट की ओर। सिगरेट को उँगलियों में फँसाकर उन्होंने फिर आँखें बंद कर लीं। आँखें मूँदे-मूँदे सिगरेट के कुछ कश लेने के बाद वे उठे। मैंने नये सिरे से नमस्कार करते हुए अपना और अपने गृह जनपद का नाम बताया। गोरख पर कोई असर नहीं। अंडी के चादर की अस्त-व्यस्त लुंगी और रेशमी खादी की सिकुड़न भरी कमीज पहने वे कभी आँखें खोलते, कभी बंद करते रहे। कमीज की ऊपर की बटन खुली होने के कारण सीने के घने बाल दिख रहे थे। दाढ़ी पहले से कुछ बड़ी। सिर के बाल भी। हां, नाखून इस बार कुछ कम बड़े लग रहे थे।

‘तो..साथी..यह एक गंभीर समस्या है।’- काफी देर बाद बोले वे- दीवार की ओर देखते हुए।

‘बाबा क्या समस्या है?’- मैंने पूछा, लेकिन वे कुछ नहीं बोले। मैं उत्तर की प्रतीक्षा करता रहा और वे दाढ़ी सहलाते हुए दीवार देखते रहे- मौन। बीच-बीच में सिगरेट के गहरे कश। कुछ देर बाद उन्होंने मेरी ओर देखा, फिर दीवार की ओर देखने लगे और दाढ़ी सहलाते हुए बोले- ‘तो..साथी..यह एक गंभीर समस्या है।’

मैंने अनुमान किया कि वे मुझे नहीं पहचान रहे हैं।

‘हम लोग हर समस्या हल कर लेंगे बाबा, लेकिन पहले यह तो बताइए कि पानी कहां मिलेगा?’ - इस विश्वास के साथ मैंने कहा कि किसी न किसी तरह अभी वे पहचान लेंगे मुझे।

‘यह भी एक गंभीर समस्या है साथी यहाँ।’- दाढ़ी सहलाते हुए वे बोले-‘यहाँ पानी केवल सुबह शाम आता है।’

फिर वे उठे और कमरे में मौजूद इकलौता शीशे का गिलास उठाकर बगल के कमरे में गये।

‘चलिए साथी, आपको चाय की दूकान पर पानी पिलाते हैं।’

पेरियार की सीढ़ियाँ उतरकर बाँयी ओर की पथरीली पगडंडी से होते हुए हम लोग चाय की दूकान की ओर गये। खुले में चाय की दूकान। अरावली की चोटियों को काटने के दौरान चबूतरों जैसे कुछ छोटे-छोटे टीले छूट गये होंगे। या शायद जान-बूझकर छोड़ दिये गये होंगे। हम लोग ऐसे ही एक टीले पर बैठे थे। आस-पास और भी लड़के-लड़कियाँ बैठे थे। सब बातें कर रहे थे, लेकिन किसी की भी आवाज इतना तेज नहीं थी कि अवांछित ढंग से किसी और को सुनायी पड़ती। सन की मोटी, लंबी रस्सी लगातार सुलग रही थी, ताकि लोग सिगरेट जला सकें। हम लोग लगातार दो कप चाय पी गये। पानी मैं पहले ही पी चुका था। एक गिलास पानी में मुँह की तंबाकू भी साफ करनी थी और गला भी तर करना था।

‘तो..साथी..यह एक गंभीर समस्या है।’

चाय के दौरान गोरख बीच-बीच में बुदबुदाते रहे- कहीं दूर देखते हुए से। माहौल ऐसा नहीं था कि वहाँ भोजपुरी गीत गाया जाता, लेकिन अब मेरे पास इसके सिवा कोई और उपाय नहीं था गोरख के मन में अपनी याद जगाने का। मैंने उन्हीं का एक गीत शुरू किया-बदली हुई धुन में। शुरू की कुछ पंक्तियाँ सुनते ही उन्होंने गौर से देखा मुझे और देखते रहे। हल्की सफेद पुतलियों के पीछे कौतूहल झाँक रहा था। माथे पर सलवटें थीं, जिन्हें सिर के लटकते बालों ने लगभग ढक रखा था। हाँ, कपड़े वही थे उनके- अंडी की चादर की लुंगी, सिकुड़न भरी रेशमी खद्दर की कमीज और पैरों में चट्टी। गीत पूरा होते-होते होठों और दाँतों के बीच वही खिली-खिली ऋजुता छलछला आयी, जो कभी इलाहाबाद में दिखी थी।

‘तो..मिश्र जी..!’ -अब वे मुझसे मुखातिब थे- ‘रामजी भाई कैसे हैं?’

इसका मतलब, वे समझ गये कि मैं इलाहाबाद से आया हूं। उन दिनों इलाहाबाद के साथियों में यह कथन प्रचलित था कि कोई गोरख से कहे कि वह इलाहाबाद से आया है, तो वे पहला समाचार रामजी भाई का पूछेंगे। फिर तो चाय और गीतों का दौर दिन ढले तक चलता रहा। मैं गीत गाता रहा, वे सुनते रहे-अपने ही गीत।

शाम हो गयी थी- पानी आने का समय। हम लोग कमरे की ओर लौट रहे थे। अचानक गोरख का ध्यान इस ओर गया कि सिगरेट खत्म हो गयी है। पगडंडी के विपरीत छोर की ओर झुटपुटे में कुछ कदम चलकर हम लोग सड़क पर पहुँचे। स्ट्रीट लाइट के उजाले में कुछ लड़के-लड़कियाँ खड़े थे। शायद बस का इंतजार कर रहे थे वे। वहीं एक लड़का पान-सिगरेट की दूकान लगाये बैठा था - लकड़ी की गुमटी में।

‘कैसे हो हवासिंह?’-गोरख ने गुमटी में बैठे लड़के से पूछा। जवाब में लड़का मुस्कराया।

‘क्या सचमुच इसका नाम हवासिंह है?’-मैंने पूछा।

‘एक दिन यह पहाड़ से चलकर यहाँ आ गया-हवा की तरह। मैं इसे हवा कहने लगा- हवासिंह।’

काफी अच्छी मनोदशा में लग रहे थे वे।

लौटकर हम लोग कमरे की ओर आये। हॉस्टल की सीढ़ियां और गलियारे दूधिया उजाले से रौशन थे। नल की टोंटियों में पानी आने लगा था। गोरख के कमरे का दरवाजा पहले की तरह आधा खुला था और उससे भीतर का अँधेरा झाँक रहा था। वे अंदर घुसे और बिना लाइट जलाये तखत पर बैठ गये-चुपचाप। मैंने अनुमान से बटन दबायी। ट्यूब लाइट के उजाले में उन्होंने नये सिरे से मुझे देखा, मुस्कराये और दाढ़ी सहलाते हुए बोले-

‘..तो मिश्रजी..!’

फिर उन्होंने स्नान समेत सुबह की सारी क्रियाएँ निबटायीं। मैंने भी। कपड़े न उन्होंने बदले, न मैंने। मेरे पास बदलने के लिए कपड़े नहीं थे और गोरख का इधर ध्यान भी नहीं था।

‘तो..आइए साथी कहीं चलकर कुछ खाया जाय। मेस में तो अभी कुछ मिलेगा नहीं।’

-पता चला कि उन्होंने भी कल रात के बाद से कुछ नहीं खाया है। शाम को सुबह हो रही थी उनकी और नहा-धो लेने के बाद अब भूख महसूस कर रहे थे। फिर एक अप्रचलित सी पगडंडी से होकर वे मुझे डाउन कैंपस ले गये। धुंधलके में पगडंडी के दोनों ओर दिहाड़ी मजदूरों की अस्थायी झोपड़ियाँ दिख रही थीं। डाउन कैंपस के किसी चाइनीज रेस्तराँ में हम लोगों ने कुछ खाया।

‘यहां तक तो हम लोग बस से भी आ सकते थे।’- रेस्तराँ से निकल कर मैंने कहा।

‘हाँ, आ तो सकते थे।’

‘क्यों न इस बार बस से चला जाय?’

उनके कदम रुक गये। कुछ देर खड़े रहे वे सड़क की पटरी पर-लगातार सिगरेट के कश लेते और दाढ़ी सहलाते हुए। इस बीच बस आयी भी और चली भी गयी। पल भर के लिए रफ्तार कम हुई। इसी दौरान लोग चढ़ गये, कुछ उतर गये। गोरख बस की विपरीत दिशा में मुँह किये सिगरेट का धुआँ छोड़ते रहे।

‘तो..साथी..यह रास्ता आपको.. पसंद नहीं आया..!’ - बस चली जाने पर वे मेरी ओर मुड़े और बोले। वे रुक-रुककर बोल रहे थे और परेशान लग रहे थे।

‘नहीं, नहीं, ऐसा नहीं है। आइए इधर से ही चलते हैं।’ -बिना कुछ समझे मैं बोल पड़ा। हम लोग फिर उसी पगडंडी से लौटे। गोरख रास्ते भर चुप रहे। कमरे में लौटकर भी देर तक चुप रहे। दाढ़ी सहलाते हुए दीवार की ओर देखते रहे। बीच-बीच में सिगरेट के कश। मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा था। ..किस बात से आहत हुए वे इस तरह? ..बस वाली बात में कुछ अनुचित तो नहीं था। ..किराया भी न लगता। पता नहीं कितनी देर तक हम लोग चुप बैठे रहे। दाढ़ी सहलाते गोरख दीवार देखते रहे और मैं गोरख को। माहौल बोझिल हो रहा था। मेरे लिए तो असह्य भी। गोरख मुझसे वरिष्ठ थे-गुरुस्थानीय। वे मेरी किसी बात से आहत हों, यह सचमुच असह्य था मेरे लिए।

‘बाबा कोई गलती हुई..?’ -करीब घंटे भर बाद मैंने पूछने का साहस किया। उन्होंने मेरी ओर देखा। मैंने ट्यूब लाइट के उजाले में उनके माथे की सलवटें देखीं और आंखों का अपरिचय भी।

‘तो मिश्र जी..!’ क्षण भर बाद वे मुसकराते हुए बोले- मानो नये सिरे से पहचान रहे हों मुझे। मेरी जान में जान आयी, लेकिन यह समझ में नहीं आया कि किस बात से आहत हुए वे।

‘आइए साथी हम लोग मेस की ओर चलें। खाना मिल रहा होगा।’

-बेतरतीब किताबों के ढेर पर रखी टाइमपीस की ओर देखकर वे बोले। खाने के दौरान वे चुप रहे। खाने के बाद हम लोग फिर चाय की दूकान की ओर गये। दूकान खुली थी। अब भी वहां कुछ लड़के-लड़कियां बैठे थे-टीलों पर। सन की मोटी रस्सी सुलग रही थी। हम लोग भी एक टीले पर बैठ गये।

‘खाना कैसा रहा मिश्र जी?’

‘सब्जी अच्छी नहीं लगी। किस चीज की थी?’

‘कुँदरू की।’

‘कुँदरू?’

‘हाँ मेघदूत की नायिका के होंठों का रूपक-पक्वबिम्बाधरोष्ठी-पके कुँदरू रूपी होंठों वाली।’

‘तो यह बिंबाफल है?’

‘हां, पक जाने पर लाल हो जाता है। आकार भी लड़कियों के होंठों की तरह।’

तब तक मुझे गोरख की संस्कृत-पृष्ठभूमि का पता नहीं था। उनकी बहुज्ञता सुखद और विस्मयकारी लग रही थी। इस बीच एक लड़के और लड़की के बीच की कहा-सुनी तेज हो गयी। देखते-देखते लड़की ने लड़के की पिटाई चालू कर दी-चप्पलों से। लड़का पिटता रहा। न वह आत्मरक्षा कर रहा था, न प्रतिरोध।

‘तुम्हारी शादी हुई है मेरे साथ। कुछ तो सोचो!’

-वह बार-बार कहता। लड़की चुप थी और दोनों हाथों से चप्पल चला रही थी। लड़की की बगल में एक दूसरा लड़का खड़ा था, जो पिटाई के प्रति निरपेक्ष लग रहा था। थोड़ी ही देर में लड़की थक गयी थी शायद। उसने पिटाई बंद कर दी और बगल में खड़े लड़के के साथ चली गयी। पिटा हुआ लड़का कुछ देर वहीं खड़ा रहा, फिर सड़क की ओर चला गया।

इस घटना ने सब का ध्यान आकृष्ट किया। जब तक यह घटित होती रही, सब मंत्रमुग्ध से हुए रहे। लड़की और दोनों लड़कों के चले जाने के बाद लोग फिर बातों में व्यस्त हो गये। कुछ अंग्रेजी में बातें कर रहे थे, कुछ हिंदी में, लेकिन सब की बात-चीत के केंद्र में यही घटना थी। सुन-सुन कर पता चला कि पिटने वाला लड़का पुरानी दिल्ली के किसी सेठ का बेटा है। लड़की की शादी हुई है उसके साथ, लेकिन वह उसे पसंद नहीं करती, यहां पढ़ती है और हॉस्टल में रहती है। लड़का दिन में दूकान पर बैठता है, रात में कभी-कभी यहां आता है।

‘आत्मनिर्णय..का..अधिकार..तो होना ही चाहिए..मनुष्य के पास।’- काफी देर की चुप्पी के बाद गोरख बुदबुदाये।

आखिरी चाय पीकर हम लोग कमरे की ओर लौटै। किताबों के ढेर पर रखी टाइमपीस रात के दो बजने की सूचना दे रही थी।

‘तो..साथी..यह एक..गंभीर समस्या है।’ -गोरख फिर बुदबुदाये।

मैं चौंक गया- ‘अब क्या समस्या है बाबा?’

‘दरअसल..मैं किसी की..उपस्थिति में..सो नहीं पाता..। ..क्या आप..छत पर सो सकते हैं?’ -दाढ़ी सहलाते हुए वे दीवार की ओर देख रहे थे और परेशान लग रहे थे।

‘हां, हां। मुझे दिक्कत नहीं होगी छत पर।’

फिर उन्होंने मुझे छत का रास्ता दिखाया और समझाया कि सुबह उनके उठने की प्रतीक्षा न करूं और मेस में नाश्ता करके हिसाब उनके खाते में लिखवा दूं। मैं काफी थक चुका था और आदत के खिलाफ लेटते ही सो गया, लेकिन थोड़ी ही देर में उड़ान भरते हवाई जहाज की आवाज से घबरा कर उठ बैठा। अचानक लगा कि अगर मैं यूं ही बैठा रहा, तो सिर में जहाज की टक्कर लग सकती है और फिर लेट गया। नींद में बार-बार यह सिलसिला चलता रहा। जहाज आते और जाते रहे। उनकी गड़गड़ाहट सुनकर नींद बार-बार टूट जाती। मैं उठ कर बैठ जाता, फिर लगता कि अगर लेट नहीं गया तो इतनी कम ऊँचाई पर उड़ता जहाज जरूर सिर से टकरा जाएगा, लेकिन पता नहीं कब ऐसी नींद आयी कि मैं दिन चढ़े तक बेसुध पड़ा रहा।

धूप कड़ी हो गयी थी। सिर, माथे और चेहरे का पसीना कानों में घुसने लगा था, जब मैं हड़बड़ा कर उठ बैठा-भौंचक। कुर्ते के दामन से आँखें मलते हुए नीचे आया। गोरख के कमरे का दरवाजा आधा खुला था-पहले की तरह। लाइट बुझी थी। छत से लटकता पंखा सनसना रहा था और वे अभी सोये थे। घड़ी तो मैंने नहीं पहनी थी, फिर भी अनुमान किया जा सकता था कि सोकर उठने में देर हो गयी है। अनुमान तब प्रमाण बना, जब पता चला कि लैट्रिन और बाथरूम में पानी नहीं आ रहा है। अब मेरे पास इसके सिवा और कोई उपाय नहीं था कि चाय की दूकान पर समय बिताऊँ और गोरख के उठने और शाम होने का इंतजार करूं। दोपहर ढलने लगी थी, जब अंडी की चादर की लुंगी और सलवटों वाली रेशमी खादी की कमीज पहने गोरख चाय की दूकान की ओर आते दिखे। वे सिर झुकाये चले आ रहे थे-दाढ़ी सहलाते हुए। खूब नजदीक आ जाने पर मैंने नमस्कार किया। उन्होंने सिर उठाया-

‘..तो मिश्र जी..। ..आइए साथी चाय पीते हैं।’

‘आपका नाश्ता-खाना वगैरह हुआ?’

-चाय खत्म करके सिगरेट जलाते हुए उन्होंने पूछा।

‘नहीं।’

‘क्यों..?’

मैंने अपनी स्थिति स्पष्ट की।

‘तो..यह एक..गंभीर समस्या है। ’

‘क्या?’

वे कुछ नहीं बोले।

‘यहां..पूर्वांचल के..कई साथी..रहते हैं। ..आज मैं ..आपकी भेंट उन लोगों से करवाता हूं। ..आप गीत सुनाकर उन्हें प्रभावित कर सकते हैं, फिर उन्हीं में से किसी के साथ रह भी सकते हैं। खाना-नाश्ता मेस में हो जायेगा..। ..हिसाब मेरे खाते में लिखवा दीजिएगा..और शाम से देर रात तक हम लोग साथ रहा करेंगे।’

-कुछ देर चुप रहने के बाद वे बोले। अमूमन हम लोगों के बीच यह धारणा प्रचलित थी कि गोरख जितने प्रतिभाशाली कवि और क्रांतिचेता विद्वान् हैं, व्यावहारिक मामलों में उतने ही शून्य भी हैं। इसीलिए उस दिन की उनकी व्यावहारिक चतुराई देखकर मैं विस्मित हो रहा था। लगातार दो-तीन चाय पीकर हम लोग राजेश राहुल के कमरे की ओर गये, जो उसी हॉस्टल की किसी दूसरी लॉबी में था। वहाँ उर्मिलेश मिल गये। वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में मेरे सीनियर थे और वहाँ की छात्र राजनीति में अत्यंत सक्रिय थे। इलाहाबाद से एम.ए. करके ज.ने.वि. में पी-एच.डी. कर रहे थे। योजना के मुताबिक गोरख ने मेरा परिचय कराया और इसके साथ ही गीत सुनाने का प्रस्ताव भी कर दिया।

‘हाँ गुरू हो जाय।’ -उर्मिलेश ने हँसते हुए समर्थन किया। हँसने के दौरान उनके काले दाँत दिखे। काली दाढ़ी और काले दाँतों के बीच पान से रंगे होंठ चटख भेदक रेखा बना रहे थे। यों तो वहां सब दाढ़ी वाले थे, लेकिन दाढ़ी सहलाने का काम केवल गोरख कर रहे थे। मैंने कुछ गीत सुनाए- दो-तीन गोरख के, कुछ-एक अपने भी। इसी बीच किसी भूल से खुले रह गये वाश बेसिन के नल की टोंटी से पानी गिरने की आवाज आने लगी। यानी शाम हो गयी। घंटे भर बाद चाय की दूकान पर मिलने का वादा करके गान-गोष्ठी मुल्तवी की गयी।

वादे के मुताबिक हम लोग चाय की दूकान पर मिले। फिर चाय, गप-शप और गीत। खाने के बाद भी यह सिलसिला चलता रहा। इस दौरान कुछ और साथी आ गये थे, जिनके नाम मैं याद नहीं कर पा रहा हूं। देर रात को सब अपने-अपने कमरों की ओर गये। गोरख भी। मैं राजेश राहुल के साथ उनके कमरे की ओर गया। रास्ते में पहाड़ पर सिर पटकता नवयुवक दिखा। वह अंग्रेजी में विलाप कर रहा था, जिसका आशय यह था कि उसकी जरूरत किसी को नहीं है। नींद में मुझे बार-बार उसका विलाप सुनायी पड़ता रहा। अचानक ऐसा लगा, जैसे गोरख बुला रहे हों। नींद खुल जाने पर भी यही लगता रहा कि यह सपना है। इतनी सुबह उनके उठने की बात सोची भी नहीं जा सकती थी। फिर लगा कि खिड़की के पार वे खड़े हैं और मुझे बुला रहे हैं। बाहर निकल कर देखा, तो वे सचमुच खड़े थे। उगते सूरज की लाली में सब कुछ रँगा था। जलते बल्ब बेवजह लगने लगे थे। गोरख की आँखें अधखुली थीं। मैं कुछ समझ नहीं पा रहा था। बाद में जो समझ में आया, वह यह कि रात में मैंने निराला की एक गजल सुनायी थी, जिसकी धुन का उन पर ऐसा असर हुआ कि उसी धुन में एक गजल लिख डाली और अब चाह रहे थे कि मैं उसे गाकर सुनाऊँ ताकि वे विश्वस्त हो सकें कि गजल मुकम्मल हो गयी है। गजल सुन लेने के बाद उनके उनींदे चेहरे पर एक विशेष खुशी दिखने लगी। वे मुस्कराये और शाम को मिलने का वादा करके सोने चले गये। निराला की गजल थी- ‘किनारा वो हमसे किये जा रहे हैं।’ गोरख ने जो गजल लिखी, वह थी- ‘हमारे वतन की नयी जिंदगी हो।’

दिन भर सोये गोरख। मैं राजेश राहुल के साथ भारतीय भाषा केंद्र और लाइब्रेरी में कुछ काम करता रहा। बीच-बीच में राजेश राहुल मट्ठे जैसी लस्सी पिलाते रहे, जो उस तपती दोपहरी में अमृत जैसी लग रही थी। शाम को गोरख से फिर भेंट हुई- चाय की दूकान पर। बात-चीत के केंद्र में वह गजल ही रही। इसी सिलसिले में गोरख ने एक महत्वपूर्ण बात कही- ‘सरलता अपने आप में एक मूल्य है- साहित्य का भी और जीवन का भी।’

हम लोग मेस में रात का खाना खा रहे थे, जब किसी ने गोरख को सूचना दी कि बी.एच.यू. में दर्शनशास्त्र के प्रवक्ता की जगह निकली है। गोरख ने यह सूचना ऐसे सुनी, जैसे इससे उनका कोई संबंध ही न हो। थोड़ी देर बाद जब उसी व्यक्ति ने फिर से यह सूचना देते हुए कहा कि आप इस पद के लिए बेहतर अभ्यर्थी हो सकते हैं, तो गोरख ने आश्चर्यपूर्वक उसकी ओर देखा।

‘..तो साथी..क्या सचमुच ऐसा लगता है आपको?’ -अपने वैदुष्य से पूरी तरह बेखबर लग रहे थे वे।

‘हाँ हाँ, क्यों नहीं? लेकिन थोड़ी जल्दी करनी होगी। लास्ट डेट नजदीक है।’-मुँह का कौर जल्दी-जल्दी चबाकर वह फिर बोला- ‘मैं कल फॉर्म लेकर आपके कमरे पर आ जाता हूं।’

‘तो यह तो बहुत अच्छा होगा।’

रोज की तरह उस रात भी हम लोग खाना खाने के बाद चाय की दूकान की ओर गये। फिर देर रात तक चाय, सिगरेट और दुनिया-जहान की बातें। गोरख चुप थे और दाढ़ी सहलाते हुए सिगरेट के कश ले रहे थे। बीच-बीच में वे पूछते-‘..तो..साथी..क्या मेरी नियुक्ति..बी.एच.यू. में हो सकती है?’

‘हाँ हाँ, क्यों नहीं?’

-हम लोग कहते। वे बच्चों की तरह खुश हो जाते। अगले दिन लगभग दो बजे मैं गोरख के कमरे की ओर गया। वे न सिर्फ सोकर उठ गए थे, बल्कि खद्दर की पैंट-कमीज और पैरों में चप्पल पहने कहीं जाने को तैयार लग रहे थे। तखत पर बी.एच.यू. का फॉर्म रखा था और वे सिगरेट के कश लेते हुए कमरे में टहल रहे थे।

‘फॉर्म आ गया क्या बाबा?’

‘तो..मिश्र जी..आपको क्या लगता है? ..क्या मेरी नियुक्ति..बी.एच.यू. में..हो सकती है?’

-मेरे प्रश्न का उत्तर देने के बदले उन्होंने प्रश्न किया।

‘आप ऐसा क्यों सोचते हैं? आपका नहीं होगा तो किसका होगा?’

‘तो..आइए साथी कहीं चलकर कुछ खाते हैं।’

‘आप कहीं जाने वाले हैं?’

‘नहीं, आज मुझे अपनी गाइड के पास जाना था। वहीं से आ रहा हूं।’

सीढ़ियाँ उतर कर हम लोग उसी अप्रचलित पगडंडी की ओर चल पड़े, जिससे पहले दिन डाउन कैंपस गये थे, लेकिन कुछ कदम चलकर वे रुक गये और कुछ सोचने लगे।

‘क्या हुआ बाबा?’

‘आइए साथी हम लोग चाय से ही काम चला लेंगे।’ -जैसे उन्हें कुछ याद आया हो। मुझे भी पहले दिन वाली घटना याद आयी। पछतावा नये सिरे से होने लगा। ..मेरे किस व्यवहार से उस दिन आहत हुए वे? हम लोग चाय की दूकान की ओर गये। चाय, सिगरेट, गीत और बातों का सिलसिला शाम तक चलता रहा। खाना खाने के बाद फिर बैठे हम लोग- रोज की तरह। हाँ, आज गोरख की स्थिति भिन्न थी। अभी कल तक उन्हें अपनी अभ्यर्थिता को लेकर संदेह था और आज फॉर्म मिल जाने और गाइड तथा मित्रों की आश्वस्तियां सुन लेने के बाद वे मान बैठे थे कि नियुक्ति हो गयी है।

‘तो बाबा कल फॉर्म भर लीजिए। और भी जो औपचारिकताएं हों, पूरी कर लीजिए। लास्टडेट नजदीक है।’ -देर रात को जब हम लोग अलग होने को हुए, तो मैंने कहा। शायद मेरी बात से उनकी कल्पना को ठेस लगी। थोड़ी देर चुप रहे वे, फिर बोले- ‘तो..साथी..क्या आप..कल..सुबह..दस बजे तक..मेरे कमरे पर आ जाएंगे?’

‘हाँ, हाँ, क्यों नहीं?’

अगले दिन दस बजे मैं उनके कमरे पर पहुंचा, तो वे सो रहे थे। थोड़ी देर की प्रतीक्षा के बाद मैंने कोशिश करके जगाया, तो उन्होंने प्रश्नाकुल आँखों से मुझे देखा। सिगरेट के कुछ कश लेने के बाद उन्होंने चाय की दूकान की ओर चलने का इशारा किया। चाय पीकर हम लोग फिर कमरे की ओर लौटे-चुपचाप।

‘तो..क्या..समस्या है साथी?’-तखत पर बैठते हुए उन्होंने पूछा। रात की बात वे पूरी तरह भूल गये थे। मैंने फॉर्म की याद दिलायी। वे थोड़ी देर चुप रहे, फिर उन्हीं कपड़ों में चलने को तैयार हो गये। कमीज बदल गयी थी। लुंगी वही थी।

‘कुछ कागजात लेंगे?’

‘नहीं साथी। गाइड ने कहा है कि चूँकि थीसिस जमा है और डिग्री अभी नहीं मिली है, इसलिए शोधकार्य के बारे में एक संक्षिप्त वक्तव्य टाइप करा देना जरूरी है, बस।’

‘बाबा गाइड के कहने का आशय यह नहीं कि हाई स्कूल से एम.ए. तक के दस्तावेजों की जरूरत ही नहीं है।’

वे चुप हो गये। थोड़ी देर हम लोग चुप खड़े रहे, फिर उन्होंने कुछ किताबों को उलटना-पलटना शुरू कर दिया। तकरीबन आधे घंटे की मशक्कत के बाद विश्वविद्यालय स्तर के दस्तावेज तो मिल गये, लेकिन माध्यमिक और प्राथमिक कक्षाओं के नहीं मिले। देर तक पंखे की सनसनाहट सुनायी पड़ती रही और किताबों की उठा-पटक। गोरख के माथे की सिकुड़नें गहरी हो गयी थीं। कमरा सिगरेट के धुएँ से भर गया था।

‘बाकी..दस्तावेज..टुन्ना के घर में..हो सकते हैं..।’ -अचानक बोले वे -दाढ़ी सहलाते हुए।

‘टुन्ना..?’

‘आप टुन्ना को जानते होंगे साथी।’

तब तक मैं जलेश्वर का यह नाम नहीं जानता था, जबकि वे मेरे आत्मीय थे और बिना मंच और बिना वेश-भूषा के अभिनय करने की प्रथम दीक्षा उन्हीं ने दी थी। गोरख मुझे यह समझाने लगे कि टुन्ना का घर बनारस के किस मुहल्ले की किस गली में है।

‘बाबा यह सब मुझे क्यों समझा रहे हैं?’

‘साथी क्या आप बनारस तक नहीं चले जाएंगे? ..किराया..मैं दूँगा। ..ऐसे भी आपको इलाहाबाद तक जाना है।’

‘ठीक है। चले जाएंगे, लेकिन चलिए पहले आज का काम तो कर लिया जाय।’

थोड़ी देर बाद हम लोग हवा सिंह की दूकान के सामने खड़े थे। गोरख ने अपने लिए सिगरेट का पैकेट लिया। मुझे पान खिलाया, तब तक बस आ गयी। रफ्तार कम हुई। कुछ लोग चढ़ गये, कुछ उतर गये। बस चली गयी। गोरख जहाँ के तहाँ खड़े रहे।

‘क्या हुआ बाबा?’

‘तो..मिश्र जी..क्या आप..उस पगडंडी से..चलना पसंद नहीं करेंगे?’

‘इस धूप में..!’

मेरा प्रतिप्रश्न सुनकर वे चुप हो गये और उदास भी। मैंने इधर ध्यान नहीं दिया। थोड़ी देर में दूसरी बस आयी। रफ्तार कम हुई। मैं पीछे के गेट से चढ़ गया और खाली सीट तलाशते हुए आगे की ओर बढ़ गया। बीच में कुछ सीटें खाली थीं। बैठने से पहले मैंने गोरख की तलाश में पीछे की ओर देखा। वे सबसे पीछे खड़े थे। मैंने इशारे से बुलाया। वे कुछ नहीं बोले, कोई इशारा भी नहीं किया। बहुत व्यग्र लग रहे थे वे। न सिगरेट पी रहे थे, न दाढ़ी सहला रहे थे। फैली हुई आँखों की हल्की सफेद पुतलियाँ शायद कुछ नहीं देख रही थीं। जहाँ थे, वहीं खड़े रहे वे-सबसे पीछे, सबसे अलग। बस डाउन कैंपस पहुंच कर धीरे हुई, तो हम लोग उतर गये। गोरख बस से उतर कर वहीं खड़े हो गये-सड़क किनारे। सिगरेट के कुछ कश लेने के बाद वे सहज हुए।

‘तो..साथी..अब..क्या करना चाहिए?’

‘सबसे पहले तो थीसिस के बारे में अपना वक्तव्य टाइप कराइए

और दस्तावेज मुझे दीजिए, मैं फोटो कॉपी कराके आता हूँ।’

‘..यह तो..गंभीर समस्या है।’-वे बुदबुदाये।

‘अब क्या समस्या है बाबा?’

‘दस्तावेज..तो कहीं..छूट गये।’

‘क्या..?’

‘हाँ..साथी..।’

‘कहीं बस में तो नहीं छूट गये?’

वे कुछ नहीं बोले। हम लोग सड़क किनारे खड़े थे-किंकर्तव्यविमूढ़।

‘जहाँ तक मैं..समझता हूँ, दस्तावेज..हवासिंह की दूकान पर..हो सकते हैं।’

‘तब?’

‘साथी..क्या..आप..बस से..हवा सिंह..की दूकान तक..जा सकते हैं?’-उनके चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही थीं।

हवा सिंह की दूकान पर कागजात सही-सलामत मिल गये और मैं उन्हें लेकर लौटा, तो गोरख वहीं खड़े मिले, जहाँ पहले खड़े थे-सड़क किनारे।

‘तो..साथी..आपने..बहुत बड़ा काम..किया है। आइए..कहीं..कुछ खाते-पीते हैं।’

अब वे मुस्कराते हुए दाढ़ी सहला रहे थे।

‘नहीं बाबा आइए पहले ये काम कर लिये जाएं।’

‘तो..साथी..आप फोटो कॉपी करा लें..और मैं टाइप करवा लेता हूँ।’

दोनों दूकानें आस-पास थीं। फोटो कॉपी का काम जल्द ही हो गया और मैं गोरख के पास आ गया। सँकरे गलियारे जैसी जगह में टाइपिस्ट एक स्टूल पर बैठा था। बीच में टाइपराइटर। सामने एक दूसरा स्टूल-ग्राहक के लिए। गोरख खड़े थे और आँखें मूँदे डिक्टेशन बोल रहे थे-अँग्रेजी में। उनके खड़े होने के बाद गलियारे में बहुत कम जगह बची थी। एक युवक बार-बार उधर से ही आ-जा रहा था। हर बार उसकी कुहनी गोरख को छू जाती। दो-तीन बार ऐसा हुआ। अचानक गोरख का डिक्टेशन रुक गया। बंद आँखें खुल गयीं और एक अजीब आवेश से काँपने लगे वे।

‘मिश्र जी..यह आदमी..मुझे..इरादतन..अपमानित कर रहा है।’- युवक की ओर तर्जनी उठाकर किसी तरह बोले वे।

‘मैंने तो कुछ नहीं किया।’- युवक हक्का-बक्का खड़ा था। टाइपिस्ट गोरख का चेहरा देख रहा था। मैंने यह सुन रखा था कि किसी से छू जाने पर वे असहज हो जाते हैं, लेकिन उस समय की उनकी उत्तेजना देखकर मैं निरुपाय हो रहा था। कभी मैं गोरख का मुँह देखता, कभी युवक का। वह कोई मजदूर लग रहा था और अपनी निर्दोषिता सिद्ध करने के लिए खड़ा था। गोरख अपनी जगह खड़े थे। नथुने फड़क रहे थे, लेकिन वे कुछ बोल नहीं रहे थे। आँखें खुली थीं, लेकिन ऐसा लगता था, जैसे उन्हें कुछ दिख न रहा हो। थोड़ी देर में आवेश कम हुआ, तो उन्होंने सिगरेट जलायी। कुछ कश लेने के बाद आँखें फिर मुँद गयीं और वे डिक्टेशन बोलने लगे।

लौटती बार हम लोग पैदल आये-पगडंडी से। उनकी स्पर्श-संवेदना का यह हाल देख कर बस से चलने का प्रस्ताव नहीं कर सका मैं। पहाड़ी पगडंडी पर हम लोग चुपचाप चले जा रहे थे। लू चल रही थी। मजदूरों की झोपड़ियों के इर्द-गिर्द छोटे बच्चे खेल रहे थे। मेरे दिमाग में कभी उस युवक का निरीह चेहरा झाँक रहा था, तो कभी गोरख का उद्विग्न चेहरा। ..गोरख जनता के कवि हैं। ..वह युवक भी तो जनता का आदमी था। ..कपड़ों से मजदूर लग रहा है। ..उसकी छुअन से गोरख क्यों इतना परेशान हो गये? ..लेकिन ये तो सहपाठियों से छू जाने पर भी आपा खो बैठते हैं। ..क्या वजह हो सकती है? ..इनकी क्रांतिकारी चेतना पर संदेह नहीं किया जा सकता। ..इनका पूरा रचनाकर्म शोषण और गैर बराबरी के खिलाफ संकल्पित है। ..वह कौन सी अप्रिय छुअन थी, जिसने इनकी स्पर्श संवेदना को सदा के लिए कुंठित कर दिया? मैं गोरख के पीछे-पीछे चला जा रहा था और दिमाग में उधेड़बुन चालू थी।

उसी शाम गोरख ने मुझे बनारस तक का किराया दिया और अधूरे दस्तावेजों के साथ फॉर्म भी। एक चीज और दी उन्होंने-अपना कविता-संग्रह : ‘साथी..बनारस में..आपको..देवरिया के बहुत से विद्यार्थी..मिल जायेंगे। ..किसी से यह किताब..मेरे पिता के पास भिजवा दीजिएगा।’

बनारस पहुँच कर मैंने जलेश्वर का मकान खोज लिया था। जहाँ-जहाँ गोरख के दस्तावेज होने की संभावना थी, जलेश्वर ने तलाश की। कई घंटे की छान-बीन के बाद गोरख की इबारत वाले कुछ पन्नों के सिवा कुछ नहीं मिला। ..अब?

गोरख का कविता संग्रह उनके पिता तक पहुँचाने का काम तो आसानी से हो गया। बनारस में सचमुच देवरिया के बहुत से विद्यार्थी थे। सब गोरख को जानने वाले-चाहने वाले। कविता-संग्रह उनके पिता तक ले जाने की होड़ मची थी उनमें। ..लेकिन फॉर्म का क्या किया जाय? आखिरकार अधूरे दस्तावेजों के साथ ही फॉर्म को डाक के हवाले कर दिया गया। फिर हम लोगों ने मिलकर ठहाका लगाया था- मैं, जलेश्वर और दूसरे कई साथियों ने। उस समय दूर-दूर तक यह आशंका नहीं थी कि ये असहजताएं उनके किसी मनोरोग की अभिव्यक्ति हैं, जो एक दिन उनकी असमय दारुण मृत्यु का कारण बन सकता है।

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बुधवार, 7 जुलाई 2010

शिवशंकर मिश्र की कहानियाँ - मूरतें

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मूरतें -
एक पुरानी धार्मिक इमारत ढहा दी गयी थी और उससे भी पुरानी एक दूसरी धार्मिक इमारत के खँडहर धरती के गर्भ में गंभीरता से खोजे जा रहे थे। लाशों से भरी रेलगाड़ी की बोगियां एक शहर से दूसरे शहर पहुँच चुकी थीं। चलती गाड़ियों से लड़के फेंके जा रहे थे। रेलगाड़ियाँ खूनी हो गयी थीं। अखबारों में भूख से मरने वालों की खबरें नदारद थीं। उनकी जगह दंगों में मरने वालों की खबरों ने ले ली थी। ...करीब बीस साल बाद मैं अपने गाँव जा रहा था। जरूरी था। भाई ने पत्र में लिखा था कि बेटे का ब्याह है और जमीन का बँटवारा होना है। मौके से सब रिश्तेदार रहेंगे। रिश्तेदारों के सामने बाँट-बखरा होने से बाद में कुछ कहने-सुनने की बात नहीं रहेगी। ...बँटवारा है तो ख़राब चीज, लेकिन महानगर में बीस साल रहकर जमीन के छोटे से टुकड़े का महत्त्व समझ में आ गया था। ...सारे भय और आतंक के बावजूद जमीन के एक टुकड़े के मालिकाना हक़ का एहसास अच्छा लग रहा था... । डीजल, पेट्रोल और तकनीक के बाद एक जमीन ही तो है, जिसकी कीमत दिनों दिन बढ़ रही है।...अपनी जमीन। ...अपना गाँव। मेरे मन में गाँव की छवियाँ  तैर उठीं... । गाँव... । खेत... । ताल... । ताल की कच्ची मिट्टी... । बचपन... । मिट्टी की मूरतें... । सादिक... । मैंने जो भी खिलौने बचपन में खेले थे, सब सादिक के बनाये थे। ...मेरे खेत ताल के किनारे हैं। ...ताल में कुंजीबेरा... । महानगर की भीड़ में चलते हुए भी मरे मन में कुंजीबेरा खिल गये। ...कुंजीबेरा से जुड़ा बचपन का वह प्रसंग। ...मुंशी जी पढ़ा रहे हैं...
'बीती रात कमलदल फूले... ।'
हम लोग पढ़ रहे हैं...
'बीती रात कमंडल फूले  ... ।'
'गधाऽऽ !'
- मुंशी जी ने सब की पिटाई की...फिर श्यामपट्ट पर कमल का फूल बना दिया ... 'कमंडल नहीं कमलदल...!' मैंने कमल का फूल देखा ही नहीं था। ...एक दिन बाबा के साथ खेतों की ओर गया। ...ताल में कुंजीबेरा के फूल....! ...कमल। ...मेरा कमल... । मेरे मन में कुंजीबेरा ही कमल हो गया। एक दिन अकेले गया। घुस पड़ा ताल में। शायद बीच वाले कुंजीबेरा और बड़े हों... । मैं घुसता जा रहा हूँ... । कुंजीबेरा के ढेर सारे फूल! ...मैं फूल देख रहा हूँ। बस अब थोड़ी ही दूर रह गया फूलों का झुरमुट... । अरे!...अरे..!पानी... नाक तक... । ...अब...अब नाक से ऊपर। गुडुप...गुड़... गुड़ गुडुप...गुडुप। ...अजीब विकलता... । मैं पुकारना चाहता हूँ किसी को, लेकिन बोल नहीं पा रहा हूँ... । मुंह खोलते ही पानी अन्दर घुसने लगता है। कुछ सुनाई नहीं  पड़ रहा है। ...कुछ दिख नहीं रहा है। ..सारी पीड़ाएं सिमटकर घुसती जा रही हैं कपाल में... । गहरा अन्धेरा ... । ...भयानक पीड़ा... । ...कोई धक्का दे रहा है। ...फिर धक्का। ...कोई मुझे अपने कंधे पर लाद रहा है। ...मेरा पेट दबा रहा है कोई। ...मुंह से पानी निकल रहा है। ...आँखें खुलीं। अरे! सादिक चच्चा...! उस दिन से सादिक रोज मुझे कुंजीबेरा की माला और मिट्टी के खिलौने देते थे सांझ को, जब वे सिंवान से लौटते थे पशुओं के संग ।  पता नहीं अभी सादिक होंगे या नहीं ? ...होंगे भी तो कैसे होंगे? ...साढ़े सात बज रहे हैं। ...शाम हो गयी होगी गाँव में। यहाँ, महानगर के इस जंक्शन पर न तो सुबह होती है, न शाम। ... हमेशा एक सा उजाला... । उफ! इतनी भीड़! लोगों का विशाल झुरमुट...। धक्का... । फिर धक्का... । ...मन की छवियाँ खो जाती हैं... । बचते-बचाते  अपना डिब्बा तलाशता हूँ। लेकिन इस भीड़ में कोई कैसे बच सकता है धक्का-मुक्की से? काफी मशक्कत के बाद अपनी बर्थ पर पहुँच पाया। नीचे की बर्थ मिली है। पानी की बोतल और बैग वगैरह यथास्थान रखकर बैठ गया मैं। अच्छा रहा। समय से आ गया। गाड़ी  ने सीटी दे दी। कुछ यात्रियों को छोड़ने उनके जो  परिजन आये थे, उतरने लगे। ...धक्का! धक्क धक्क .... धक्क धक्क... । लम्बी साँस... । जूतों के फीते खोलना चाहता हूँ, लेटने के लिए। मत खोलो फीते, मन का एक कोना कहता है। पता नहीं कब क्या हो। ...जलती हुई आँखों को आराम देने के लिए पल भर पलकें बंद किये रहता हूँ। ...आँखें खोलो। आंखें खोलो। ...यह भीतर की आवाज है। मैं आस-पास के लोगों के चहरे देख लेना चाहता हूँ। सामने की नीचे वाली बर्थ पर दो लोग बैठे हैं। दोनों चुप हैं। दोनों अलग-अलग हैं। मेरे ऊपर की बर्थ पर कोई अभी से लेता है। शायद बीमार है। मेरी तरफ की सबसे ऊपर वाली बर्थ पर एक अधेड़ झुक कर बैठे हैं और चश्मा लगाए कुछ लिख रहे हैं। उन्हें देखने के लिए मुझे गर्दन खूब बांयी ओर घुमानी पड़ी और आँखों को अस्वाभाविक ढंग से ऊपर ले जाना पडा। यह लगभग अभद्रता ही थी, जिस पर मुझे थोड़ी झेंप भी आयी। कोई किसी को नहीं देख रहा है। या न देखने का दिखावा कर रहा है हर आदमी। सब एक दूसरे को देखते हैं, लेकिन नजर बचा कर। कभी धोखे से नजर मिल जाती है, तो लोग  झटके से गर्दन घुमा लेते हैं। मैं खुद कितना छुईमुई हो रहा हूँ! ...इन दिनों रेलगाड़ी का सफर! वह भी रात में! बाप रे...! मैं हरगिज ऐसा न करता। लेकिन और करता भी क्या? भतीजे का ब्याह कोई रोज-रोज तो होगा नहीं। गर्मी की छुट्टियां। शादी-ब्याह। यात्रियों की आपाधापी। इसी गाड़ी में रिजर्वेशन मिल पाया। ...गाडी रफ्तार पकड़ चुकी है। ...धक धक धक धक धक... । पीछे की बर्थ पर बातें चल रही हैं -
'सीधी सी बात है। जब दो देश बन ही गये, तो हिन्दू हिदुस्तान में रहें और मुसलमान पाकिस्तान में।'
'और मस्जिदों का क्या होगा?'
'हिन्दुस्तान की मस्जिदें गिरा दो और पाकिस्तान के मंदिर गिरा दो।'
मैं इन लोगों के चहरे नहीं देख पा रहा हूँ। अब मैं जूतों के फीते खोलकर लेट जाता हूँ। दिन भर की दौड़-धूप के बाद जलती हुई आँखें अपने आप मुंद  जाती हैं। ...आवाजें भीतर कहीं डूब जाती हैं... । ...छवियाँ जाग जाती हैं...। गाँव की...। जमीन की... । मिट्टी की... । मूरतों की... । सादिक की... । सादिक के बिना गाँव की तस्वीर बन ही नहीं पा रही है... । जिस तरह फुट्टू लोहार के बिना हर-फार नहीं बन सकता, गोलई नाऊ के बिना हजामत नहीं बन सकती, ननकाई सोनार के बिना गहना-गुरिया नहीं बन सकता और घुरहू पंडित के बिना शादी-ब्याह नहीं हो सकता, उसी तरह सादिक के बिना गाँव की तस्वीर नहीं बन सकती... । ...बनने लगीं... । बनने लगीं तस्वीरें...। गाँव की...। सादिक की... । घुटनों तक धोती। मारकीन की बंडी। कंधे पर गमछा। घुटा सिर। मुंड़ी दाढ़ी। नीचे झुकी खिचडी मूंछें। ...असाढ़ में किसी का छप्पर उठवा रहे हैं सादिक। ...आंधी-पानी में किसी की टूटी बंड़ेर में थूनी लगा रहे हैं। ...सावन-भादों की आधी रात को किसी के घर में निकले काले सांप को मार रहे हैं। ...गर्मी में किसी के घर आग लग गयी है। सादिक आग बुझा रहे हैं। ...किसी की गाय के पेट में बच्चा फँस गया है। चलो सादिक के पास। हर काम को करने की जुगत है सादिक के पास... ।
...छुक छुक छुक छुक छुक छुक...
गाड़ी स्टेशनों पर रुकती। झटका लगता। आँखें खुल जातीं। तरह-तरह के लोग घुस आते डिब्बे में। ...मैं डर जाता। सोये हुए लोग जाग जाते। शायद हर आदमी डर रहा है। कोई नहीं सो रहा है। सब यूं ही आँखें बंद किये हैं। ज्यों ही नए लोगों की भीड़ घुसती है, पहले से बैठे या लेटे हुए लोग एक-दूसरे को देखने लगते हैं। अब वे झटके से गर्दन नहीं घुमाते। पल दो पल नजरें मिलाकर नये आगंतुकों के बारे में अपनी -अपनी आशंकाओं को आपस में बाँटते हैं। ...मैं खुद कितना बदल गया हूँ। आदमी के चहरे पर जिन साम्प्रदायिक चिन्हों को देखना मैंने बहुत पहले छोड़ दिया था, आज उन्हीं की तलाश कर रहा हूँ लोगों के चेहरों में।
' चाऽऽई ...!' चाऽऽई...!'
'पुड़ीऽऽऽ!' 'पुड़ीऽऽऽ !'
'पूड़ी सब्जीऽऽ पूड़ी सब्जीऽऽ!'
सीटीऽऽऽ... । झटका... ।
धक्क धक्क...धक्क धक्क...धक धक धक धक... ।
गाड़ी महानगर से बहुत दूर निकल आयी है। मेरे आस - पास के लोग फिर सो गये हैं। या शायद आँखें बंद कर ली हैं उन्होंने। अब सामने वाली बर्थ खाली है। जो लोग उस पर बैठे थे, अब ऊपर अपनी - अपनी बर्थ पर चले गये हैं। मेरी तरफ की सबसे ऊपर वाली बर्थ के अधेड़ अब भी कुछ लिखे जा रहे हैं। भीतर उजाला है। बाहर काली रात... । कहीं कहीं कुछ टिमटिमाती रोशनियाँ दिख जाती हैं। गाँव होंगे... । गाँव, खेत, पेड़, ताल - पोखरे... । सब डूबे हैं अँधेरे में। ...सबेरा होगा। चरवाहे पशुओं के झुण्ड लेकर आ जायेंगे। पेड़ नाचने लगेंगे। जलती हुई आँखों की पलकें मुंद जाती हैं। ...माटी की छवियाँ जाग उठती हैं। ...मिट्टी की मूरतें। तरह-तरह की मूरतें। मोटा सेठ, ठिगना कारिन्दा, चिरई -कौआ, मोटर-गाड़ी, बैलगाड़ी... । ...सिंवान में पशुओं को संगोह कर सादिक एक पेड़ की छाया में बैठे हैं। पोखरे से कच्ची मिट्टी लेकर मूरतें बना रहे हैं। पशुओं पर भी नजर है। किसी की फसल न उजाड़ दें। दोपहर हो गयी है। बाकी चरवाहों को गाँव भेज दिया है उन्होंने  खाने के लिए। सादिक का खाना भौजाई किसी चरवाहे से भेज देंगी। रोटी--अचार  की पोटली। पानी पोखरे का। ...मूरतें धूप में सूख रही हैं। ...एक और बनानी है। नेता जी हेलीकाप्टर से आये थे। तभी से है दिमाग में... । ...बन गयी। ...बन गयी हेवलीकलट्टर की मूरत। अब बस। अरे...! धूप में मूरतें कहीं-कहीं दरक गयी हैं। सादिक कच्ची मिट्टी से मूरतों की दरारें भर रहे हैं। फिर सुखाना होगा इन्हें धूप में। अब कुंजीबेरा की मालाएं बनानी हैं... । सांझ हो गयी। गाँव से बाहर धूल उठ रही है। भीतर धुँआ। सादिक पशुओं के संग गाँव में घुस रहे हैं। गलियों में बच्चे खेल रहे हैं। सादिक उन्हें मूरतें और मालाएं बाँट रहे हैं। बच्चे खिल उठे... । उनकी ख़ुशी देख कर सादिक खिलखिला रहे हैं...।
...छुक छुक छुक छुक छुक छुक... ।
गाड़ी सीटी दे रही है। मेरे पीछे की बर्थ पर लोग बातें कर रहे हैं -
'क्यों, रफ्तार कम हो रही है न ?'
'हाँ, शायद कोई स्टेशन आने वाला है।'
धक्क...धक्क... धक्क...चींऽऽऽ!
'कौन सी जगह है भाई ?'
'पता नहीं।'
'यहाँ तो कोई चाय वाला भी नहीं है।'
'आउटर है। '
थोड़ी देर गाड़ी खड़ी रहती है। सब चुप...। गाड़ी सरकती है। अब स्टेशन। कई लोगों ने पढ़ा -
'अलीगढ़।'
' अलीगढ ?'
'हाँ, अलीगढ़।'
'चायऽऽऽ! चायऽऽऽ ! चायऽऽऽ ! चायऽऽऽ !'
'पुड़ेऽऽऽ! पुड़ेऽऽऽ ! पुड़ेऽऽऽ ...!'
चाऽऽईऽऽ चाऽऽईऽऽ ...!'
महिला एनाउंसर की आवाज। कोई ऊंघता हुआ आदमी कह रहा है-
'भाई साहब लाइट बुझा दीजिये।'
'जलने दीजिये।'
'जलने दीजिये।'
'उजाला जरूरी है।'
तरह - तरह की आवाजें और तरह-तरह के मत।
मैं भी नहीं चाहता कि लाइट बुझाई जाय। उजाले के पक्ष में ज्यादा लोग हैं। एक बेकाबू भीड़ घुसी आ रही है। उजाले में मैं सब की शिनाख्त कर लेना चाहता हूँ। हर चहरे को गौर से देख रहा हूँ। दाढ़ी... । मूंछ... । झुर्रियां... । दाग... । लम्बे-लम्बे बाल... । खूँखारियत... । मासूमियत... । हताशा... । जिन्दगी... । हर चेहरा आदमी का है।
धक धक धक धक... ।
गाड़ी खड़ी है। एक दूसरी गाड़ी जा रही है।
सामने की बर्थ पर एक युवती आ गयी। उसकी गोद में बच्चा है। ...क्या और कोई नहीं है इसके साथ? ...है। ...यह नौजवान शायद इसका पति है। उसे पीछे की बर्थ मिली है। दोनों आँखों ही आँखों में कुछ कहते हैं। नौजवान अपनी बर्थ पर चला जाता है। मेरे सभी पड़ोसी युवती को घूरते हैं। मैं भी, लगातार लिखने वाले अधेड़ भी और ऊपर का बीमार भी। क्या जाति होगी इसकी...? क्या धर्म होगा इसका...? पहनावे से कुछ समझ में नहीं आ रहा है। पीछे की बर्थ पर बातें चल रही हैं -
'आदमी के साथ सबसे बड़ी मुश्किल यही है कि उसे
 चहरे या पहनावे से नहीं समझा जा सकता।'
'अरे भाई चहरे की बात मत करो। कौन जाने कब एक जोड़ा मासूम
 आँखों वाला कोई चेहरा अपराजेय समझी जाने वाली मीनार को ढहा दे।'
अब भी मेरे सभी पड़ोसी युवती को घूर रहे हैं।
मैं भी, लगातार लिखने वाले अधेड़ भी और मेरे ऊपर का बीमार भी। सब उसकी जाति और धर्म जान लेना चाहते हैं। देख देखकर। सूंघ सूंघकर। बच्चा रोने लगता है। युवती उसे चुप कराती है। बच्चा चुप नहीं होता। रोता जा रहा है।
...सीटीऽऽऽ।
...झटका।
धक्क...धक्क...धक्क...धक्क।
चल पड़ी गाड़ी। ...बच्चा रोता जा रहा है।
युवती...युवती नहीं माँ। माँ चुप कराना चाहती है बच्चे को। बच्चा चुप नहीं होता। माँ बच्चे की आँखों में आँखें डालकर कुछ देर देखती है। बच्चे की आँखों में माँ उतर आई। माँ के आँचल में दूध उतर आया। बच्चा छिप गया आँचल में। माँ लेट गयी। दूध पिला रही है बच्चे को। न माँ किसी को देख रही है, न बच्चा। बच्चा चुप है। अब कोई किसी को नहीं देख रहा है।
छुक छुक छुक छुक... ।
गाड़ी चली जा रही है। मेरी  आँखों की जलन कम नहीं हो रही है। पलकें फिर मुंद जाती हैं। ...लीला हो रही है। गाँव में रामलीला हो रही है। आज बियाह होगा। मंडली मनीजर रामखेलावन जी माइक्रोफोन पकड़ कर बोल रहे हैं -
'भाइयों और बहनों एक बार प्रेम से बोलिए राजरामचन्द्र की...'
'जैऽऽऽ!'
'भाइयों-बहनों भगवान राम और माता जानकी के विवाह की लीला है आज। हमने लीला को और रोचक बनाने के लिए इस बार भगवान की बारात में हाथी ले आने की योजना बनायी थी। लेकिन बड़े दुःख की बात है कि चन्दा कम मिलने से हम हाथी नहीं ले आ सके। अब जैसी है भगवान की लीला है। प्रेम से देखिये। एक बार प्रेम से बोलिए राजारामचंद्र की...'
'जैऽऽऽ !'
छुक छुक छुक छुक छुक छुक छुक छुक... ।
...लीला शुरू। प्रार्थना चल रही है -
'रामसिया नमवा बड़ा अनमोल, बड़ा अनमोल, राधे गोविन्द हरी बोल हरी बोल... । '
प्रार्थना ख़तम। ... मंच पर नचनिया। भजन गा रहा है और नाच दिखा रहा है-
'दिखाया चीर कर सीना तो सीता राम लिक्खा था।'
अब ब्यास जी चौपाई गा रहे हैं। पर्दा गिरा। फिर उठा। दशरथ जी मंच पर। जनकपुर से दूत आये। पत्रिका बांची गयी। अब बारात सज रही है। बिंदा भगत की मंडली ने बीन बजाना शुरू कर दिया। लेकिन यह क्या...? पीछे के दर्शक चौंक गये। वे खड़े हो गये और शोर मचाने लगे -
'ह इ देखो! हाथी!'
'हाथी ?'
'हाँ रे देख पीछे। चला आ रहा है हाथी।'
कोई मंच की ओर नहीं देख रहा है।
...छुक छुक छुक छुक... ।
...रामखेलावन जी बार-बार मंच पर आकर बोल रहे हैं -
'एक बार प्रेम से बोलिए राजा रामचंद्र की ...'
'जय' बोलने वाला कोई नहीं। सब हाथी देख रहे हैं।
'भाइयों और बहनों कृपया शांती का सहजोग कीजै। भगवान की लीला है। विघ्न मत डालिए।'
लेकिन लोग रामखेलावन जी की बात पर ध्यान नहीं दे रहे हैं... ।
वे तो हाथी देख रहे हैं... । मझोले कद का हाथी... । पीठ पर सजीवन। हाथी धीरे-धीरे मंच के पास पहुँच रहा है। रामखेलावन जी, व्यास जी, दशरथ जी- सब चौंक पड़े। हाथी कभी रामखेलावन जी को धक्का मार रहा है, तो कभी किसी दर्शक को। जब मंच खाली होता, हाथी अपनी लीला दिखाता। मंच के एक कोने से दूसरे कोने तक दौड़ता। हाथी पर सवार सजीवन तरह-तरह की आवाजें निकालता -
'गरगत्त गरगत्त !'
'घिट पिट कीऽऽ घिट पिट कीऽऽ !'
सब भूलकर लोग हाथी देख रहे हैं । ...छुक छुक छुक छुक... ।
गाड़ी चली जा रही है। माँ सोयी है। बच्चा सोया है। ऊपर वाले सज्जन शायद बैठे-बैठे ही सो रहे हैं। पीछे की बर्थ पर बातें चल रही हैं। बाहर अँधेरा है। भीतर उजाला... । गाँव में मिट्टी के तेल वाली फोन्नोगैस का उजाला... । लीला ख़तम। अब हाथी परदे के पीछे जा रहा है। उसके पीछे-पीछे सभी दर्शक। ... सब जान लेना चाहते हैं कि कौन बना था हाथी और कैसे ? सजीवन को पीठ से उतार कर और झरेखू बांवारूपी के कंधे से हाथ हटाकर अंगड़ाई लेते हुए सादिक खड़े हुए।
'धन्नि है! धन्नि है सादिक!'
सादिक खिलखिला रहे हैं। उनके तम्बाकू से काले दांत साफ दिख रहे हैं...। ... छुक छुक छुक छुक... । झरेखू बांवारूपी चिल्लाया -
'अरे पहले मेरे मूड़ से सूँड़ तो उतारो!'
जल्दी-जल्दी सादिक उसके सिर से पुआल ठूंस कर बनाए हुए काले कपड़े का सूँड़ उतारते हैं। अपने शरीर से हाथी वाला काला झिंगोला उतार रहे हैं और झरेखू को निर्देश दे रहे हैं-
'हे झारेखुआ मेरी पिठांह से ई रसरी तो खोल और ई रजाई-गद्दा तो उतार!'
...छुक छुक छुक छुक छुक छुक ... । गाड़ी चली जा रही है।  सामने माँ सोयी है। बच्चा सोया है। सब सोये हैं। मेरे भीतर गाँव की छवियाँ जाग रही हैं... । रफ्तार कम हो रही है। शायद कोई स्टेशन आने वाला है। पीछे की बर्थ पर फिर बातें शुरू हो गयीं-
'कौन सी जगह आने वाली है?'
'पता नहीं...।'
सीटीऽऽऽ... ।
धक्क धक्क धक्क चींऽऽऽ... ।
'चाऽऽ चा गरम...चाऽऽ चा गरम... चाऽऽ चा गरम... ।'
'कौन सा स्टेशन है यार ?'
कई लोग नाम पढ़ते हैं । ...भीड़ अन्दर घुसी आ रही है। कुछ लोग उतर रहे हैं। झटके से ऊपर वाले महाशय की कापी गिर गयी और कई लोगों के पैरों के तले कुचल गयी। मैंने कापी उठायी। पन्ने खुल गए थे। हर पन्ने में लाल स्याही से 'रामराम' लिखा था। ...अरे यह क्या? कापी थमाते हुए महाशय मुझे इस तरह क्यों घूर रहे हैं?...तिलक लगे मस्तक पर इतनी सिकुड़नें ? ...चश्मे के भीतर से झांकती आँखों में इतनी नफरत ? ...ओह! शायद मेरी दाढ़ी! ...बाप रे! महीने में एक बार कैंची से दाढ़ी छोटी कर लेने का आलस लगता है आज अच्छी कीमत वसूलेगा। मेरा बार-बार मन करता है कि उठकर उन्हें नाम बता दूं। नाम बताने से  जाति और धर्म मालूम हो जाएगा और मैं सुरक्षित हो जाऊंगा। ...लेकिन बिना पूछे नाम बताना भी तो अटपटा लगता है। बच्चा कुनमुनाया... । हाथ-पैर चलाने लगा और रोने लगा... । भीड़ आ रही है, जा रही है। तरह-तरह के चहरे। लेकिन इस समय तो मुझे उन्हीं का चेहरा डरावना लग रहा है। सीटीऽऽऽ ... । धक्क धक्क ... । गाड़ी ने रफ्तार पकड़ ली। मेरे सामने की सबसे ऊपर वाली बर्थ पर लेटे हुए आदमी ने मुझसे जगह का नाम पूछा। बीच की बर्थ वाले ने टाइम पूछा। अब वे मुझे नहीं घूर रहे हैं। मैं लेट गया हूँ। बच्चा शांत है। माँ दूध पिला रही है । वे फिर 'राम राम' लिखने लगे शायद। मेरी पलकें फिर मुंद जाती हैं। ...सादिक भी लिख रहे हैं राम का नाम। ...लिखेंगे कैसे ? ...गा रहे हैं। ...होली जल रही है। ...सादिक की कमर में ढोलक बाँधी जा रही है। ...पहली फाग सादिक गा रहे हैं -
'लै लइए राम का नाम, पहिले देबी सारदा गाइ लइए।'
सादिक गा रहे हैं। साथ में सब गा रहे हैं। सादिक गा भी रहे हैं और ढोल भी बजा रहे हैं -'बिम्मलकड़...! । बिम्मलकड़...!'
...छुक छुक छुक छुक...
दूसरी फाग ग्रामदेवता को समर्पित। सादिक शुरू की दो फागों में हर साल नेतृत्व करते हैं। गाँव का नाम सँड़वा, तो ग्रामदेवता साँड़ेबीर । सादिक गा रहे हें -
' सँड़वा के साँड़ेबीर बाबा तोहरी सरन ढोलक बाजे.... । '
सब गा रहे हैं। अब सादिक केवल ढोल पीट रहे हैं -
'' बिम्मलकड़ ! बिम्मलकड़ !''
...छुक छुक छुक छुक छुक...
गाड़ी चली जा रही है। ...स्टेशन आ रहे होंगे। सवारियां चढ़ -उतर रही होंगी। हो सकता है, वे मुझे घूर रहे हों। लेकिन मैं आँखें नहीं खोल पा रहा हूँ। ...छुक छुक छुक छुक... । सब कुछ नाच रहा है दिमाग में। सचमुच नाच रहे हैं सादिक... । घर-घर। किसी का घर नहीं छोड़ रहे हैं। सबको न्योता दे रहे हैं -
'हे भाई महलूद हो रहा है। आना जरूर। हे कलुआ की माई कलुआ को जरूर भेजना। सीताराम दद्दा जरूर आना। हे भौजाई नचकउना को भेज देना। धियान रखना ! हाँ ! बड़का बतासा आया है। बाजार से। मौलवी साहब आये हैं। सहर से। सब लोग आना।'
...छुक छुक छुक छुक छुक...
...छिन भर में पूरे गाँव की परिक्रमा करके बड़के भाई द्वारा बनवाई बंडी और धोती पहन ली सादिक ने। सिर पर गोली टोपी भी लगा ली। ...मौलूद शुरू। मौलवी साहब तखत पर बाकी सब नीचे बैठे हैं। सब का ध्यान मौलवी साहब की बातों पर और सादिक का ध्यान इस बात पर भी कि कहीं कोई कुकुर-माकर बताशा न जुठार दे। इसलिए एक डंडा भी रख लिया है उन्होंने। सब मौलवी साहब का मुंह ताक रहे हैं। सादिक मौलवी साहब की बगल में रखी बताशे की टोकरी ताक रहे हैं।
...छुक छुक छुक छुक ... ।
...सब खड़े हो गए। सब गा रहे हैं -
' या नबीऽऽ सलामलैकाऽऽ... ।'
बस इतना ही याद है सादिक को। अब क्या करें ? ...अब सिर्फ मुंह डोला रहे हैं वे।
...छुक छुक छुक छुक... ।
गाना ख़तम। मौलूद ख़तम। ...अब सादिक एक-एक का नाम लेकर पुकार रहे हैं।
बताशा बाँट रहे हैं। ...उलींच रहे हैं आह्लाद। जो नहीं आ सकते, उनके घर जा रहे हैं बताशा देने।
...छुक छुक छुक छुक ... ।
मेरी आँख खुल गयी। सब सो रहे हैं।
बच्चा जाग रहा है। बच्चा मेरी ओर देख कर मुस्करा रहा है। ...क्या हो गया ? बच्चा अब चकित होकर मुझे घूर रहा है। अरे! अरे! बच्चा रोने वाला है। बच्चा मुझे देख कर चकित क्यों हुआ ? रुआंसा क्यों हो गया ?अनायास ही मेरा दाहिना हाथ अपनी बढ़ी हुई दाढ़ी छूने लगा। ...किस जाति का होगा बच्चा...? क्या धर्म होगा इसका...? अरे! अरे मैं पागल हो गया हूँ क्या...? ...मैं बच्चे की ओर देख कर मुस्कराता हूँ। शायद बदले में बच्चा भी मुस्करा दे। ...मुस्करा रहा है बच्चा। आँखों की जलन कम हुई। ...नींद आ गयी। ...आश्वस्ति की आख़िरी परछाईं बच्चे के ऊपर मंडरा रही है। परछाईं बच्चे को खाने के लिए बताशे और खेलने के लिए मिट्टी की मूरतें दे रही है। ...दृश्य बदल गया। ...अचानक अन्धेरा। बाहर भी अन्धेरा। भीतर भी अँधेरा। अँधेरे में गाड़ी चली जा रही है... ।
'हाय अंधेरा...!'
तरह- तरह की आवाजें। अफरा-तफरी। लोग भाग रहे हैं। गिर रहे हैं एक-दूसरे पर। किसी बोगी से लोगों के चीखने की आवाजें आ रही है। औरतों की चीख... । बच्चों की चीख... । आदमी की चीख।
'गाड़ी में बम!'
'किसने रखा बम ?'
'कौन जाने किसने रखा बम ?'
'नहीं मालूम ? फौरन पता करो, कौन किस जाति का है, कौन किस धर्म का है?'
...कोई कड़क कर कह रहा है। ...अब वे टार्च लेकर एक-एक का चेहरा देख रहे हैं अँधेरे में। ...हाय, मेरी दाढ़ी ! ...अब क्या हो ? अचानक टार्च मेरी ओर। टार्च की रोशनी में मैं किसी को नहीं देख  पा रहा हूँ। ...सब मुझे देख रहे हैं। ...सब मेरी दाढ़ी टटोल रहे हैं।
'किस जाति की है यह दाढ़ी ? किस मजहब की है ?'
-वही कड़कदार आवाज। ...मैं बता देना चाहता हूँ अपना नाम।
जाति और धर्म। खूब कोशिश करता हूँ, लेकिन मुंह से आवाज नहीं निकलती... ।
'मार साले को !'
...मेरी नींद खुल गयी। ...अजीब सपना था। नींद खुली तो देखा कि सचमुच लोग मार रहे हैं एक आदमी को । उसके पूरे बदन पर केवल एक जांघिया है। लम्बा सांवला जवान। गले में ताबीज। लोगों का कहना है कि वह जेबकट है। ...धक धक धक धक .... । एक बुजुर्ग अपनी सदरी और कुरते के नीचे वाली बनियान की कटी हुई जेब दिखा रहे हैं। पूरे पांच हजार थे। हाईकोर्ट जा रहे थे मुक़दमा लड़ने। पुलिस वाले मार रहे हैं। यात्री भी मार रहे हैं। वह आदमी बिल्कुल नहीं बोल रहा है। उसकी नाक से खून बहने लगा। लोग मार रहे हैं और वह बर्थ के नीचे देख रहा है। अचानक वह गिरा और तेजी से बर्थ के नीचे फिसल गया। पुलिस वाले बर्थ के नीचे डंडा घुसेड़ते हैं, लेकिन वह लापता हो गया... । शायद मार के डर से उसने ऐसा किया। बच्चा रो रहा है। माँ चुप करा रही है। मैं उठ बैठा। ...कितनी बेरहमी से मार रहे थे लोग! ... क्या सचमुच वह चोर था ? ...उसके शरीर पर कपड़े क्यों नहीं थे ? ...एक भी शब्द वह बोला क्यों नहीं? लोग लगातार उसी की बातें कर रहे हैं। उसकी ताबीज के मुताबिक़ उसकी जाति और धर्म का अनुमान कर रहे हैं।
....धक धक धक धक ....
गाड़ी चली जा रही है। भोर होने वाली है। गंदले तांबई उजाले में गाँव, पेड़, पोखरे, आदमी और जानवर नाचती हुई परछाइयों  की तरह झलकने लगे। ...गाड़ी सीटी दे रही है। कोई स्टेशन आने वाला है। रफ्तार कम हो गयी ।
...धक धक धक्क चींऽऽ!
अरे ! मैं आ गया ! मैं झांकता हूँ। ...हाँ यही तो है
मेरे गाँव के पास का स्टेशन। चोर वाले प्रसंग में दिमाग इस तरह उलझा कि ध्यान ही नहीं रहा। दो ही मिनट रुकेगी गाड़ी यहाँ। मन होता है कि एक बार सब को देख लूं। शायद वे मुझे अब भी घूर रहे हों। बच्चा मुस्करा रहा हो शायद... । चोर शायद यहीं कहीं छिपा हो. लेकिन यथार्थ मजबूर करता है कि केवल अपने जूते देखो। जल्दी-जल्दी जूते पहनता हूँ। बैग और पानी की बोतल लेकर जल्दी से कूद गया मैं। ...गाड़ी के भीतर एक दुनिया थी। अब अपने गाँव के पास के इस छोटे से स्टेशन पर हूँ। यह एक अलग दुनिया है। कोई चायवाला नहीं। ....सहंजन के कुछ पेड़। कुछ कुत्ते। रेलवे के दो ऊंघते हुए मुलाजिम। क्रासिंग पार करके मैं अपने गाँव की पगडंडी खोजना चाहता हूँ। ...यह तो पक्की सड़क है। धुंधले उजाले में काली सड़क दिख रही है। तीन पहियावाले दो टेम्पो खड़े हैं। ...क्या ये मेरे गाँव जायेंगे ?
'हाँ बाबूजी । निजरब कराओ तो बीस रुपया ,नहीं तो दो रूपये।
मगर टैम लगेगा। सवारी फुल होने पर चलेंगे।'
रात भर के सफर की थकान के बाद मुझे बीस रूपये ज्यादा नहीं लगे। टेम्पो चल पड़ा... फट फट फट फट ... । पूछने पर पता चला कि टेम्पो वाला मेरे गाँव का ही लड़का है, जो मुझे नहीं पहचान रहा था। मैं ने उस से पहला समाचार सादिक का पूछा। उस ने सादिक के बारे में जो कुछ बताया ,उससे एक ब्योरा कुछ इस तरह बनता है-
सादिक से दो गलतियां हुईं इस बीच। ...पहली गलती। ...नसीम का छोटा लड़का कई दिनों से अल्ला मियाँ की मूरत के लिए जिद कर रहा था। सादिक ने बहुत सोचा-बिचारा। ...कैसे होते होंगे अल्लामियां? आखिरकार उन्होंने मौलवी साहब की तरह बना दी अल्लामियां की मूरत।
किसी मौलूद में मौलवी साहब आये थे। मौलूद के बाद उन्होंने सादिक को बहुत फटकारा अल्लामियां की मूरत बनाने के लिए। कान पकड़कर उठावाया-बैठवाया और आइन्दा दाढ़ी रखने, नमाज पढ़ने और इस तरह की बेवकूफियों से बाज आने का हुक्म दिया।
...दूसरी गलती। एक बार गाँव में अकाल पड़ा। गाँव वालों ने साँड़ेबीर के चौरे पर अखंड कीर्तन बैठाया। कीर्तन होगा तो पानी बरसेगा। दिन भर होता रहा कीर्तन - ' सीता राम सीता राम ।' शाम को कीर्तनिया जवानों का स्वागत भांग-ठंडाई से हुआ। बाई-बतास से ग्रस्त बुजुर्गों ने अपनी-अपनी मजबूरियां बतायीं और सोने चले गए। अलबत्ता जाते-जाते समझा गये कि कीर्तन खंडित हुआ तो पुन्न के बदले पाप और लगेगा। रात में कीर्तनिया लड़कों को नशा हो गया। हाथों में करताल लिए -लिए वे सो गये। ...सब सो गये। ...क्या करें अकेले सादिक ? ...किसको बुलाने जायं इतनी रात। ...अब तो कीर्तन खंडित! सादिक ने फौरन सोये हुए लड़कों में से एक की करताल छीनी और लगे कीर्तन करने... । सुबह सब ने देखा। अकेले सादिक कीर्तन कर रहे हैं - ' सीता राम सीता राम। '
कीर्तन हुआ। एक दिन। दो दिन। तीन दिन। लोगों ने कई दिनों तक इंतज़ार किया। पानी नहीं बरसा। त्राहि-त्राहि मच गयी। हल-बैल, ट्रैक्टर सब खड़े हो गये। इस बीच तरह-तरह के लोग आये गाँव में। जीप से। कार से। हेलीकाप्टर से। लक-दक कपड़े। एक साधू जैसे नेता जी आये। उन्होंने गाँव वालों को अखंड कीर्तन करने के लिए कहा। गाँव वाले भड़क उठे-
'किया तो कीर्तन ! नहीं बरसा पानी। '
'कैसे किया ?'
'कैसे किया!'
'ऐसे किया।'
बताया सब ने कि सादिक ने कीर्तन खंडित होते-होते बचा लिया।
'भाइयों बुरा मत मानियेगा। धर्म-कर्म में तो पवित्रता होनी ही चाहिए।'
'क्या मतलब ?'
'क्या मतलब सादिक मुसलमान है कि नहीं ?'
'ये बात !'
गाँव वाले सारा रहस्य समझ गये। मुसलमान से कीर्तन कराओगे और समझोगे भगवान खुश...?
आज नेता जी गाँव में ही रुकेंगे। सांझ को नौजवानों की सभा करेंगे और अपनी देख-रेख में करायेंगे कीर्तन। ...नेता जी पूरे पंडित थे। अगले दिन उन्होंने मन्त्र पढ़कर चबूतरे के आस-पास की जमीन पर तांबे के लोटे में आम की टेरी और दूब डालकर जल छिड़का और कहा कि इस भूमि में हिन्दू के अतिरिक्त कोई आया तो अनुष्ठान खंडित। फिर नहीं बरसेगा पानी। ...कीर्तन की बैठकी कराकर महराज जीप में सवार हुए और दूसरे गाँव के दौरे पर निकल गए।
...सादिक हमेशा की तरह सारा दिन सिंवान में थे। कुछ अपने पशुओं के संग कुछ दूसरों के। वे दुबारा अनुष्ठान और इसके नियम-क़ानून नहीं जान पाए थे। शाम को पशुओं को खूंटे तक पहुंचाया,जल्दी से मिट्टी के तेल वाली फोन्नोगैस जलाई और पहुँच गए कीर्तनिया लड़कों के पास। मटुकमन करताल फ़ेंक कर खड़ा हो गया। वह सादिक की बांह पकड़ कर खींचते हुए लक्ष्मण-रेखा के पार ले गया। इस बीच सादिक पूछते रहे -
' का बात है हो बचऊ ?कुछ समझ में नाहीं आय रहा। का कौनौ खास बात...?'
'देखो चचा ! धरम-करम का काज कुछ अलग होता है। अभी तक हम लोग इस बात को नहीं समझ पाए थे। अब समझ में आ गया है। अब तक जो हुआ, सो हुआ, मुदा आगे से समझ लो। अब आज का अनुष्ठान तो खंडित ही हो गया। हाँ, आइन्दा धियान रखना !' - तमतमाया मटुक बोला !'
सादिक फटी-फटी आँखों से मटुक का चेहरा देख रहे थे। तब तक मटुक फिर बोला - '
'ले जाओ अपनी फोन्नोगैस । हमें इसकी जरूरत नहीं है और यह भी समझ लो चाचा कि अब हम तुम्हारी चतुराई समझ गये हैं। बताशा में चोरी से थूक कर फिर उसे हमें खिलाते हो चोरी-चोरी धरम भरिस्ट करते हो हम लोगों का ? अब बहुत मुंह मत खुलवाओ। इसी में खैरियत है कि चले जाओ हियाँ से।'
लड़के ने बताया कि सादिक वहां से चल तो पड़े, लेकिन अपने घर का रास्ता नहीं खोज पाए।
 फोन्नोगैस लिए वे सिंवान में घूमते रहे सारी रात... । सबेरा होने पर बड़े भाई हाथ पकड़ कर घर ले आये। सुबह के उजाले में फोन्नोगैस सनसना रही थी। उससे रोशनी नहीं निकल रही थी। शीशे में कालिख भर गयी थी। अब सादिक बिल्कुल नहीं बोलते। कहीं नहीं जाते। ऐसा लगता है कि वे लगातार कुछ देख रहे हैं, लेकिन कुछ नहीं देखते। किसी को नहीं पहचानते... । बड़े भाई महीने में एक बार सिर के बाल मुंड़वा देते हैं और लम्बी सफेद दाढ़ी के होठों के बाल कैंची से चुनवा देते हैं।
मेरा गाँव आ गया है।
गलियों में बिजली के खम्भे खड़े हैं। उनमे जलते बल्ब निस्तेज लग रहे हैं। सुबह की अजान सुनाई पड़ रही है। मंदिर का घंटा घनघना रहा है। माहौल में गोबर, भूसा, हवन और लोहबान की मिली-जुली गंध तैर रही है। मेरा मन होता है, लौट चलूँ। माटी की छवियाँ टूट चुकी है... lll
[''शब्दयोग'', नयी दिल्ली के प्रवेशांक में ''आश्वस्ति की आखिरी परछाईं'' शीर्षक से प्रकाशित ]

मंगलवार, 8 जून 2010

बाबा की उघन्नी

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बाबा की उघन्नी-


बारात आयी भी और चली भी गयी। सारा तामझाम हुआ। सारी रस्में पूरी की गयीं।खूब झाँय-झाँय हुआ। खूब झिकझिक हुई। आखिर में बैन करके रोती सियादुलारी भी विदा हो गयी, लेकिन बाबा की चारपाई जहां थी, वहीँ रही।पूरब के दालान में ऐन भंडारघर के सामने। पता नहीं कब से बिछी है यह चारपाई यहाँ... । बाबा के इकलौते पुत्र हीरालाल जी तिवारी कभी-कभी हिसाब करते हैं, तो पाते हैं कि पिछले तीस बरस से बिछी है यह चारपाई यहाँ। इसी पर लेटे रहते हैं बाबा। उठ-बैठ नहीं पाते। शौच आदि के लिए परिवारीजनों पर निर्भर रहते हैं। इन तीस वर्षों में बहुत कुछ बदला। पूरी दुनिया ही बदल गयी। बाबा की अपनी दुनिया थी। अपना परिवार...। अपने खेत... । यह दुनिया भी बदली। दुआर पर बैल कम हो गए। ट्रैक्टर आ गया और यह परिवार ऊपर से अमीर और भीतर से गरीब हो गया। घर में कई बच्चे पैदा हुए और बड़े हो गए। कई बारातें आयीं और गयीं। बाबा की चारपाई अपनी जगह ही रही। यहीं से लेटे-लेटे बाबा सब कुछ देखते-सम्हालते रहे...। कल रात भी वे लेटे-लेटे देखते रहे, जितना देख सकते थे। सुनते रहे, जितना सुन सकते थे। बोलते रहे,जितना बोल सकते थे, हमेशा की तरह। बाजे-गाजे के बीच उनकी आवाज सुनायी नहीं पड़ रही थी।बीच-बीच में संतोख बाबा के पास आता। उनके कान के पास मुंह ले जाकर कुछ कहता और बाबा कांपते हाथों से भंडारघर की चाबियों का गुच्छा उसे थमा देते। जो भी मेहमान आये और गये, सब बाबा के पास आये। नाम बता कर पैलगी की। बाबा ने सब को कांपते हाथों से छुआ। विह्वल हुए। आशीर्वाद दिया और दो-एक मार्मिक बातें कीं, जो बड़ी मुश्किल से लोगों की समझ में आयीं।
कल सांझ से आज सबेरे तक कितनी गहमा-गहमी थी यहाँ और अब आधी रात जैसा सन्नाटा पसरा है भरी दोपहर में। लू चल रही है। दुआर पर शामियाना फड़फड़ा रहा है। लाल फाइबर की कुर्सियां बेतरतीब पड़ी हैं। दालान में परिवार के मर्द और घराती मेहमान सोये हैं। उनके खर्राटे सुनाई पड़ रहे हैं और हवा की साँय-साँय। औरतें भीतर हैं, लकड़ी के इस मेहराबदार फाटक के भीतर। मेहराब और किवाड़ पर मांगलिक अल्पनाएं और बारीक बेलबूटे खुदे हैं। मेहराब, साह चौखट, किवाड़ और खम्भे अलकतरे से रंगे हैं। चूने से पुती सफेद दीवार पर फाटक के दोनों ओर औरतों ने पिसे चावल, हल्दी और सिन्दूर के घोल से हथेलियों की छाप मार दी है। बीच-बीच में औरतों के रोने-झगड़ने की आवाजें किवाड़ के पार आ जाती हैं। अभी भोर तक वे गीत गा रहीं थीं। सारी रात गाती रहीं वे। पंडित मन्त्र पढ़ते रहे। औरतें बेटी के गवन के गीत गाती रहीं :
...ऊसर मिट्टी को गोंड़-गोंड़ कर हमने ककड़ी के बीज बो दिए...। पता नहीं मीठी होंगी ककड़ियां या कड़वी ... । पूरे नगर में घूम-घूम कर पिता ने वर खोजा है तेरे लिए। नहीं मालूम क्या लिखा है तेरी तकदीर में... ।
गहरा अवसाद जगाने वाली धुनें। न ढोल न मजीरा। बारात  खाना खाने बैठी थी, तो औरतों ने गारी के गीत गाये थे। उन गीतों में बजा था ढोल-मजीरा। फिर नहीं बजा। सारी रात कर्मकांड होता रहा। औरतें गीत गाती रहीं...।अब लड़-झगड़ रही हैं दोपहर में। बच्चों का एक बड़ा झुण्ड नीम तले तिकोनी बैलगाड़ी पर खेल रहा है। सब इसी परिवार के बच्चे हैं। सब पांच साल के भीतर। वे कभी तिकोनी बैलगाड़ी के अगले छोर पर चढ़ जाते हैं, तो पिछला उठ जाता है। पिछले पर चढ़ते हैं, तो अगला उठ जाता है। यह उन्हें जादू जैसा लग रहा है।ज्यादा छोटे बच्चे बैलगाड़ी पर नहीं चढ़ पा रहे हैं। वे हाथ उठाकर बड़े बच्चों से गाड़ी पर चढ़ा लेने की शब्दहीन प्रार्थनाएं कर रहे हैं। रो भी रहे हैं। बड़े बच्चे अपने में मस्त हैं। लू चल रही है। नंग-धड़ंग बच्चे लू से बेअसर हैं। वे खेल रहे हैं और शोर मचा रहे हैं। रामलली सबसे अलग खेल रही है। पहले वह मंदिर के पिछवाड़े सुबकती रही देर तक, फिर आम के बाग की ओर चली गयी थी। कच्चे आम तोड़ने का विफल प्रयास करके लौटी है और अब बैलगाड़ी के पास खड़े ट्रैक्टर पर बैठ कर ट्रैक्टर चलाने का खेल खेल रही है। थोड़ी ही देर में वह ऊबने लगी। आज हर खेल थोड़ी ही देर में बेकार लगने लगता है। फिर सियई दीदी का बैन... । ...काहे भेज दिया गया दीदी को, जब वे इतना रो रही थीं...?डकार आई। डकार में केवड़े की गंध। अच्छी नहीं लगी गंध। दो दिन से केवड़े के फूल डाले गये हैं कुंए में। कल अच्छी लगी थी पानी में केवड़े की गंध। आज अजीब-अजीब हो रहा है मन उसी गंध से।
अचानक उसे लगा कि बाबा पुकार रहे हैं। ...सियई दीदी तो गयीं। ...अब किसे पुकारेंगे बाबा ? ...अब कौन सुनेगा छिन-छिन पर बाबा का अढ़ौना? वह दौड़ कर दालान की ओर गयी। सब सोये हैं। लोगों के मुंह खुले हैं। किसी के मुंह में मक्खी घुस गयी तो...?रामलली चिंतित हुई। वनस्पति तेलों के भभके उठ रहे हैं दालान में। रामलली को उबकाई महसूस हुई। बाबा जाग रहे हैं।
' छ्बललियाऽऽ छ्बललियाऽऽ अरे का नाम ? का नाम ? छ्बललियाऽऽ।'
-कफ से जूझती खरखराहट भरी आवाज हाथ काँप रहे हैं।
 पैर कांपते भी नहीं तीस साल से।
'नाम काहे बिगाड़ते हो बाबा? रामलली कहो
 रामलली। छ्बलली कहोगे तो नहीं बोलूंगी हाँ। '
- रामलली ने बाबा के मुंह पर बैठी मक्खियों को उड़ाते हुए कहा।
'हाँ... हाँ...का नाम उघन्नी। हाँ उघन्नीऽ। उघन्नी खोजो बिटियाऽऽ।'
-ऐसे ही बोलते हैं बाबा। एक बात को बीस बार। सबका नाम भूल जाते हैं और भूले हुए नाम वाली खाली जगह में कोई दूसरा नाम इस तरह बैठ जाता है कि हट ही नहीं पाता  बाबा के दिमाग से। चारपाई के नीचे से सुतली में बंधी चाबियों का एक बड़ा गुच्छा रामलली ने उठाया और बाबा को थमा दिया। कांपते हाथों से बाबा ने चाबियों का गुच्छा थामा। आँखों के पास हाथ ले जाकर चाबियों का निरीक्षण करना चाहा। आँखें साथ नहीं दे पायीं पूरी तरह। उँगलियों से टटोल कर चाबियों की पहचान की बाबा ने। माथे की सिकुड़नें   कम हुईं। वनस्पति तेलों की गंध के भभके उठ रहे हैं। मक्खियाँ भिनभिना रही हैं। बाबा के मुंह पर अब नहीं बैठ पा रही हैं मक्खियाँ। रामलली उड़ा रही है उन्हें। बाबा ने चाबियों का गुच्छा मुट्ठी में कस कर पकड़ रखा है। धुंधली आखें पता नहीं क्या देख रही हैं। नीम तले बच्चे शोर मचा रहे हैं। बीच-बीच में औरतों के रोने-झगड़ने की आवाजें और हवा की साँय-साँय सुनायी पड़ जाती है। बाबा ये आवाजें नहीं सुन पाते। रामलली सुन रही है हर आवाज। उसे कुछ लेना-देना नहीं इन आवाजों से। दीदी के जाने से आज उसका आज उसका महत्त्व बढ़ गया। अभी थोड़ी देर पहले वह दीदी के वियोग में सब कुछ भूल गयी थी। अब दीदी के जाने से बढ़े हुए महत्त्व के एहसास में मगन है। ...अब बाबा दीदी को नहीं बुलायेंगे। अब तो रामलली ही बची है बाबा की टहल के लिए। वह एकटक बाबा का चेहरा देख रही है और मक्खियाँ उड़ा रही है। बाबा के माथे की सिकुड़नें फिर बढ़ने लगीं।
'का है बाबा ?'
'का नाम का नाम...'
'रामलली रामलली। '
- बाबा का वाक्य पूरा नहीं हुआ था कि रामलली बोल पड़ी।
'वो नहींऽ वो नहींऽ। लेखाऽ लेखाऽ लेखा दो। जाओ बुला लाओ का नाम संतोख संतोख संतोख को।' - हाथ काँप रहे हैं। कफ से जूझती आवाज बड़ी मुश्किल से निकल रही है।
...लेखा ? ...लेखा कहाँ मिलेगा ? रामलली सोच में पड़ गयी। ...संतोख कक्कू कहाँ गये ? ...दालान में तो नहीं हैं। ...उत्तर की अटारी पर तो नहीं हैं ? पूरे घर में मिठाइयों और बासी पकवानों के टुकड़े गिरे हैं। हर जगह मक्खियाँ भिनभिना रही हैं। हर कमरे में लोग उल्टे-सीधे लेटे हैं।सब सो रहे हैं। छोटकी काकी आँगन से सटे अपने कमरे में कराह रही हैं। माई आँगन में खड़ी है। काकी और माई में कुछ कहा-सुनी चल रही है।
'इस घर में कोई मरे चाहे जरे, किसी को क्या मतलब ? सबको अपनी-अपनी पड़ी है।' - अपने कमरे में कराहती हुई काकी बोल रही थीं।
'ए नचकऊबहू घर को दोख न लगाओ हाँ ! दुआर पर चार आदमी बैठे हैं, तो लीला दिखा रही हो। जब भगवान ने मेहरारू का तन दे ही दिया, तो यह सब तो लगा ही रहेगा। ' - चिंचियाती हुई माई का चेहरा बहुत खराब लगा रामलली को। कुछ देर वह खड़ी रही आँगन में। अचानक बाबा की बात का ध्यान आया। दौड़ते हुए वह उत्तर की अँटारी की सीढियां चढ़ने लगी। आखिरी सीढ़ी पर पहुँच कर अटक गयी। क्या माँगा है बाबा ने ? उसने खूब कोशिश की, लेकिन नहीं याद आया। क्या कहेगी कक्कू से कि बाबा ने क्या माँगा है ? ...कह देगी बाबा ने बुलाया है।
'काकी हो ! काकी हो ! किवाड़ खोलो। कक्कू को बाबा बुला रहे हैं।' - वह किवाड़ पीट रही थी और चिल्ला रही थी।
'भाग जा नहीं तो उखाड़ लूंगी झोंटा। बड़ी आयी बाबा की दूती बनकर। मांग रहे होंगे, जो मांग रहे होंगे। इतनी बड़ी पलटन पड़ी है घर में। और कोई नहीं है ? अभी तो जाकर सोये हैं किसी तरह।' - दरवाजा खोलते ही काकी झपट पड़ीं। उनका आखिरी वाक्य पूरा होते-होते वह नीचे की आखिरी सीढ़ी उतर रही थी। फिर अटक गयी वह। ...क्या कहेगी बाबा से ? बड़ी देर तक वह वहीँ खड़ी रही मुंह लटकाए। छोटकी काकी कराह रही हैं। माई से उनकी कहा-सुनी चल रही है। रामलाली को डकार आई । फिर केवड़े की गंध...। पेट से निकल कर मुंह में समा गयी गंध। गहरी उदासी भर गयी मन में... । सब भूल कर वह मकान के पिछवाड़े उल्टी लंगड़ी का खेल खेलने चली गयी। जूठी पत्तलों और कुल्हड़ों का ढेर लगा था वहां। वनस्पति तेलों और बासी पकवानों की महक हवा में उड़ रही थी। कुत्ते पत्तलें चाट रहे थे। वे गुर्रा रहे थे और पत्तलें चाट रहे थे। रामलली उल्टी लंगड़ी का खेल खेल रही थी। अचानक एक कुत्ता दूसरे पर टूट पड़ा। रामलली थोड़ी ही देर खेल पायी थी कि कुत्तों ने एक दूसरे को काट खाया। वह डर गयी। भीतर चली गयी वह डरकर। काकी और माई की कहा-सुनी जारी है। आये दिन इस बड़े परिवार की औरतों में झगड़े होते रहते हैं। ज्यादातर झगड़े खाना बनाने के लिए। एक चूल्हे पर इतने लोगों का खाना... । कौन धिके उपलों और लकड़ी की आंच में...? लेकिन खाना तो बनाना ही पडेगा... । बिना खाना खाए कोई कैसे जियेगा...? बात ज्यादा बढ़ने पर कभी फैसला कर दिया था हीरालाल जी ने। आज भी चलता है वही फैसला। पन्द्रह -पन्द्रह दिन के लिए दो-दो औरतों की पारी बाँध दी थी उन्होंने। इस समय नचकऊबहू की पारी चल रही है खाना बनाने की। लेकिन वह बीमार है। माई समझती है कि वह नखरा दिखा रही है। रामलली पल भर खड़ी रही आँगन में। उसे लड़ते हुए कुत्तों के चहरे याद आये। वह दालान की ओर भाग चली। ...क्या माँगा है बाबा ने ? कदम फिर रुक गए... ।
सांझ हो गयी है। शामियाना उखड़ गया है। औरतें मकान के पिछ्वाड़ेपोखरे के घाट पर चौथी छुड़ा रही हैं। बीच-बीच में उनके गीतों के बोल सुनाई पड़ते हैं-
'बोये न होतिउँ सरसइया त का दइ पेरउतिउँ होऽ।
जनमी न होतिउँ बिटीवा त का दइ पुजतिउँ होऽ।'
...सरसों न बोई होती, तो क्या देकर तेल पेरातीं ...?
...बेटी का जन्म न हुआ होता, तो क्या देकर पूजा करतीं...?'
वे पोखरे की पूजा कर रही हैं... । ज्यादातर रिश्तेदार चले गए हैं। जो रुके हैं, उनकी चारपाइयाँ दुआर पर बिछी हैं , जहां अभी कुछ समय पहले शामियाना तना था। बाबा की चारपाई अपनी जगह। ऐन भंडारघर के सामने। संतोख लेखा दे रहा है। बाबा के मुंह की ओर बैठा है मोढ़े पर। लालटेन जल रही है दालान में। बिजली नहीं है।
'बिजली काहे नहीं आ रही है हो ?' - दुआर पर बैठे रिश्तेदारों के प्रश्न ।
'बिजली नहीं आयेगी महराज। चोर तार काट ले गए हैं। तीन किलोमीटर तक । तब से अँधियर घुप्प। हाँ! पूरा ऐकेट - पैकेट अंधियर घुप्प ।'
-हीरालाल जी रिश्तेदारों की खातिर -तवज्जो में लगे हैं ,दुआर पर ,नीम तले। हवा में अब भी जलन है। यहाँ रोशनी का कोई इंतजाम नहीं है। लोग अँधेरे में बैठे हैं। दालान में लालटेन जल रही है,बाबा की चारपाई के पास। बाबा लेखा ले रहे हैं। हाथ काँप रहे हैं। होंठ काँप रहे हैं। आवाज बड़ी मुश्किल से निकल रही है। बातें मुश्किल से समझ में आ रही हैं। संतोख की मुसीबत है आज। हर बात कान में बतानी पड़ रही है । बार-बार उठा - बैठक। एक-एक चीज का लेखा ले रहे हैं बाबा। संतोख का दिमाग चकरा रहा है। एक तरफ कर्ज का बोझ, दूसरी तरफ बाबा का लेखा... ।
'सोनहुलाऽ सोनहुलाऽ सोनहुलाऽ कितने थान ? कितने थान ?' - बाबा जानना चाह रहे हैं कि सोने के कुल कितने गहने बने। संतोख का दिमाग चकरा रहा है। वह निर्णय नहीं ले पाता कि क्या कहे, तब तक बाबा गिनाने लगते हैं अपने समय के गहनोंके नाम। ऐरन, बाजू बैरक्खी, हँसुली, हवेल, झुमकी, माथबेंदी और भी पता नहीं क्या-क्या ? संतोख के मुंह से कभी हाँ निकल जाता है, कभी ना। फिर कौन सी चीज कितने भर। यानी कौन चीज कितने तोला, कितने माशा। अब सोने का रेट। ...क्या बता दे संतोख ?
उसने तीस साल पहले की सोने की कीमत का अनुमान किया... । रिश्तेदार चौंक गए। संतोख ने सोने की जो कीमत बतायी, वह प्रचलित कीमत से इतना कम थी कि रिश्तेदार विश्वास नहीं कर सके। अब चांदी। फिर गहनों के नाम। करधन, छागल, पाँवपैजनिया, लच्छा - पटरी, इसी तरह और भी बहुत कुछ। अब फटफटिया। फटफटिया...? मोटरसाइकिल। हर चीज का दाम तीस साल पहले की कीमत का अनुमान करके बताया जा रहा है। दहाई सैकड़ा में। घी, चीनी, कपड़ा, पतरी-दोना, करई-कसोरा। कुछ भी छोड़ नहीं रहे हैं बाबा। बहुत दिमाग लगाना पड़ रहा है संतोख को। हज़ार की चीज सैकड़ा में। सैकड़ा की चीज दहाई में। दहाई की इकाई में। बाबा की आवाज बड़ी मुश्किल से निकलती है। संतोख  को तेज बोलना पड़ता है। नीम तले  चारपाइयों पर बैठे रिश्तेदार अब आपस में बातें नहीं कर रहे हैं। वे बाबा और संतोख की बातें सुन रहे हैं चकित होकर। तीस साल पहले की कीमतें रिश्तेदारों के दिमाग में अँट नहीं पा रही थीं । बाबा के दिमाग में आज की कीमतें नहीं अँट सकतीं। बेटी का ब्याह अब लाख के नीचे हो ही नहीं सकता और बाबा लाख का लेखा सुन नहीं सकते।
'अब जोड़ोऽ। जोड़ो अब। सामलाट लेखाऽ। सामलाट लेखाऽ।' - सब चीजों का लेखा मिल जाने पर बोले बाबा। ...जोड़ हज़ार में होना चाहिए। लाख की गिनती आई कि बाबा की मौत हो सकती है। बाबा की मौत...। काँप उठा संतोख इस कल्पना से... । बाबा के बिना यह घर नहीं चल सकता, यह सामूहिक विश्वास उस परिवार में प्रचलित था। इस विश्वास का अपना आधार था। बाबा इस परिवार के आधार पुरुष हैं। बाबा के इकलौते पुत्र हीरालाल जी। हीरालाल जी के सात पुत्र और तीन पुत्रियाँ। हीरालाल जी के हर पुत्र के चार-चार, पांच-पांच पुत्र। पुत्रियाँ अलग। इस तरह इस विशाल संयुक्त परिवार के मूल पुरुष बाबा ही हैं। बाबा ने ही खरीदे हैं इतने सारे खेत। कैसे खरीदे , यह हीरालाल जी जानते हैं। कभी-कभी हीरालाल जी बाबा के त्याग के किस्से सुनाते हैं। किस तरह बाबा एक धोती खरीद कर उसके दो टुकड़े करवाते और उसी से साल भर काम चलाते थे। किस तरह बाबा ने अब तक केवल एक मिर्जई, पांच सादी और एक रुइहा बंडी पर एक सौ दस साल का जीवन काट दिया। पूरे एक सौ दस साल गिनकर बताते हैं हीरालाल जी बाबा की उम्र। हाँ ब्याह-बारात के लिए दो कलीकाट कुर्तों और दो जोड़ी चमौधा जूतों की भी जरूरत पड़ी। विवादित खेतों पर कब्जा करने के लिए लाठी चलानी पड़ी। चलाई लाठी बाबा ने। ऐसी चलायी कि नामी लठैत हो गए। उसी बीते पराक्रम के प्रतीक रूप में मोटी  लाठी सिरहाने रखी जाती है, जिसे अब बाबा नहीं उठा पाते। जिन दिनों बाबा की नयी उम्र थी, कुछ लोग आजादी की लड़ाई लड़ रहे थे। बाबा की समझ में यह सब ठीक नहीं था। हाकिम-हुक्काम से बैर करने पर नुक्सान ही होगा... । वे जमीन खरीदने में लगे रहे। मिडिल पास करते ही हीरालाल जी को सरकारी नौकरी मिल गई थी। वे दूर-दूर तक साइकिल से जाते। नौकरी करते। बाबा की ही तरह एक धोती के दो टुकड़े करवाते। उसी से साल भर काम चलाने की कोशिश करते और हर महीने पूरी तनख्वाह बाबा के हाथों में रख देते। बाबा की आँखें छलछला आतीं... । इसी किफायतशारी के चलते इतना बड़ा मकान बनवाया है बाबा ने, कचौड़ीदार। भीतर की दीवारें मिट्टी की और बाहर की ईंट की। बड़ा सा लकड़ी का मेहराबदार फाटक, खम्भेदार दालान। दालान के उत्तर में भंडारघर।इसी के सामने रहती है बाबा की चारपाई। भंडारघर की चाबियों का गुच्छा बाबा खुद अपने पास रखते हैं। तब भी रखते थे, जब दादी जीवित थीं और बाबा दूर -दूर तक जाकर खेत खरीदते थे और अब भी, जब कि बाबा उठ-बैठ भी नहीं पाते। यों इस गुच्छे की हर चाबी नकली है , लेकिन सिरहाने रखी लाठी और चाबियों के इस गुच्छे के बल पर ही बाबा की संप्रभुता टिकी है। दालान में ठीक भंडारघर के सामने चारपाई पर पड़े रहते हैं वे। ऋतुएं आती हैं और जाती हैं, बाबा की चारपाई यहीं रहती है। इसी पर होती हैं उनकी सभी क्रियाएं। हाथ कांपते हैं। पैर कांपते भी नहीं। आँखें कम देखती हैं। कान कम सुनते हैं, फिर भी बाबा इस घर को चला रहे हैं। पिछले तीस सालों से चला रहे हैं इसी तरह। बिस्तर पर पड़े-पड़े वे किस खेत में क्या बोया गया और किस काम में कितना खर्च हुआ, इन सब बातों का ब्योरा और लेखा लेते आ रहे हैं।
'सामलाट लेखाऽ सामलाट लेखाऽ सामलाट लेखाऽ बोलो । बाबा का प्रश्न सुनकर संतोख चौंक गया। वह भी शामिलात लेखा यानी कुल खर्च जोड़ रहा था। तीन लाख के अल्ले-पल्ले जा रहा था कुल खर्च। उसका दिमाग बुरी तरह चकरा रहा था। लाख तो लाख बाबा दस हजार का खर्च सुनते ही असहाय हो जाते हैं। फिजूलखर्ची के चलते परिवार के सत्यानाश की आशंका से मूर्च्छित होने लगते हैं वे। इसीलिये भंडारघर की चाबियों का गुच्छा अपने पास रखते हैं। शादी-ब्याह का खर्च अब लाख से कम नहीं होता और बाबा को लाख के खर्च की सूचना देना प्राणघातक है। इसीलिये कभी तीस साल पहले संतोख ने हीरालाल जी की सहमति से भंडारघर का ताला बदल दिया था। अचानक एक दिन असली चाबियाँ बेकार हो गयीं। नकली चाबियाँ काम आने लगीं। हर रोज संतोख बाबा से चाबी माँगने का नाटक करता है। आज महँगा पड़ रहा है नाटक। बरात विदा होते ही वह खुद जोड़ने लगा था कुल खर्च और कर्ज। ...औरतों के गहने-गिरौं हैं।किसान क्रेडिट कार्ड से सारा पैसा निकाला जा चुका है। ...एक लाख के लगभग दुकानदारों का हो गया है। बेचेने के लिए केवल गेहूं बचा है और गेहूं अभी बहुत सस्ता है। ...गेहूं बेचकर भी क्या पूरा कर्ज अदा हो सकता है ?भूमिविकास बैंक और सहकारी समिति वाले अलग चक्कर लगा रहे हैं। रोती-झगड़ती औरतें,लेखा माँगते बाबा...। नमस्कार करते दुकानदार।चोरों की तरह किसानों को खोजते बैंक वाले... । तहसील वाले... । दुआर पर लेटे बड़के समाधी- सब संतोख के दिमाग में नाच रहे हैं। लालटेन का शीशा गंदा हो रहा है। लौ अभी तेज़ जल रही है।
'चलो एक बोझ उतर गया, हाँ बोझ। उतर गया बोझ। आगे से इसी तरह काम करो हाथ बाँध कर। हाँ! समझे ! हाथ बांधकर। असाढ़। असाढ़ सिर पर है। समझे? असाढ़। खेती में भी तो लागत लगेगी। खेती में। हाथ बांधकर काम करो, नहीं तो बिक जाओगे। हाँ...।' -बाबा के होठों पर बारीक मुस्कान तैर रही है। लालटेन का शीशा गंदा होता जा रहा है। लौ बढ़ती जा रही है। संतोख मोढ़े से उठा तो उसे चक्कर सा महसूस हुआ। दीवार का सहारा लेते हुए वह उत्तर की अटारी की ओर चला गया। हीरालाल जी रिश्तेदारों के संग बैठे हैं नीम तले अँधेरे में। हवा के झोंके अब भी चल रहे हैं। नीम की पत्तियाँ अँधेरे में सिहर रही होंगी। कोई पक्षी बीच-बीच में पंख फड़फड़ाता है।बेटी का ब्याह किफायत से हो गया, इस ख़ुशी में बाबा मुस्कराते रहे कुछ देर। अचानक धुंधली आँखों ने बाहर  का अंधेरा देख लिया।
' छ्बललियाऽ छ्बललियाऽ! संतोख संतोख! अरे का नाम। का नाम उघन्नी। उघन्नीऽ उघन्नीऽ उघन्नीऽ।' - बाबा लगातार पुकार रहे हैं। एक ही नाम कई-कई बार। रामलली सो गयी थी शायद। संतोख उत्तर की अटारी की ओर चला गया था। हीरालाल जी के बाकी छः बेटे और उनके बेटों के बेटे थक  कर सो गये थे। हीरालाल जी लाठी के सहारे उठे। दस साल हो गये उन्हें सरकारी मुलाजमत से रिटायर हुए। जिस दिन रिटायर हुए, उसी दिन से गठिया के मरीज हो गये। उठ गये, तो बैठ नहीं पाते। बैठ गये, तो उठ नहीं पाते। जैसे ही पैरों ने इजाजत दी, वे दौड़ पड़े। बाबा हीरालाल जी को देख कर जीते हैं और हीरालाल जी बाबा के जीने के लिए जीते हैं, यह मान्यता थी।
'का है बाबू?'
- बाबा के कान के पास मुंह ले जाकर हीरालाल जी ने पूछा।
'दादूऽ दादूऽ उघन्नीऽ। उघन्नीऽ खोजो। उघन्नीऽ।'
-बाबा घबराये से लगे। हाथ काँप रहे हैं। नथुने फड़क रहे हैं। हीरालाल जी ने बाबा के सिरहाने से चाबियों का गुच्छा उठाया और उनके कांपते हाथों में थमा दिया। सुतली से बंधा भंडारघर की असली चाबियों का गुच्छा, जो असली होने के कारण बेकार हो गया है। बाबा के दिमाग के भीतरी हिस्से में एक अलग दुनिया है...। वहां ट्रैक्टर की कीमत तीन हजार है और इस खिलौने के लिए यह भी ज्यादा है। खेती की सारी उपज ट्रैक्टर की किस्त   अदा करने में चली जाती है, ज़माना बदल चुका है और नौकरी के  अवसर  कम हो गए हैं, ये खबरें नहीं पहुँची हैं अभी उस दुनिया में। घर के कई लड़कों ने बी.ए., बी.एस-सी. कर लिया है, लेकिन बाबा की दुनिया में कोई मिडिल नहीं पास है। मिडिल किया होता,तो मुलाजमत न मिल जाती अपने हीरालाल की तरह... । इस दुनिया में चलती हैं ये चाबियाँ। और कहीं नहीं है इनका काम। बेकार की चीज हो गयी हैं ये। बाबा के लिए बड़े काम की है इस गुच्छे  की हर उघन्नी-हर चाबी। हुआ यह कि यौवन के पराक्रमी बाबा अब, जबकि वे जीवन के एक सौ दस  शरद पार कर चुके हैं, तीन चीजों से डरने लगे हैं - अलगौझी से, भूतों से और मौत से। अलगौझी की समस्या को बाबा लाठी और उघन्नी के सहारे हल करते हैं। हीरालाल जी के सात पुत्रों और उनके पुत्रों के पुत्रों के बीच आये दिन छोटी-छोटी बातों पर कहा-सुनी होने लगती है। झगड़े होते हैं और हर झगड़े का समाधान अलगौझी के प्रस्ताव के साथ होता है। यों तो बाबा कम सुनते हैं, लेकिन कभी-कभी उनके कानों तक अलगौझी की उत्तेजना भरी बातें आ ही जाती हैं। ऐसे अवसरों पर विचलित हो जाते हैं बाबा। वे मूर्छित न हो जाएँ, इससे बचने के लिए हीरालाल जी के दो पुत्र बाबा को सहारा देकर बैठाते हैं। तीसरा लाठी थमाता है। अलगौझी का नाम लेने वाले को खुद ही चलकर बाबा के पास आना पड़ता है। बाबा कांपते हाथों से लाठी पकड़ते हैं। तीसरा लाठी उठाता है। अलगौझी का नाम लेने वाले की पीठ पर लाठी छुआई जाती है। सारे अंतर्विरोध मुल्तवी हो जाते हैं थोड़ी देर के लिए। सब की चिंता एक, कहीं मूर्च्छित न हो जाएँ बाबा। इस दौरान बुरी तरह कांपते रहते हैं बाबा के हाथ, होंठ  और नथुने। बड़बड़ाते रहते हैं वे थोड़ी देर तक- 'भीख, भीख, भीख मांगोगे ! भीख हाँ! भीख भी नहीं मिलेगी। कोई दरवाजे पर खड़ा नहीं होने देगा। हाँऽ।'
इस तरह लाठी और उघन्नी के सहारे बाबा अलगौझी की समस्या का समाधान करते आ रहे हैं। लेकिन इधर एक नयी समस्या खड़ी हो गयी है। अन्धेरा होते ही भूत दिखने लगते हैं बाबा को। उनके सारे दोस्त और दुश्मन मर गए हैं। अँधेरे में उनकी छवियाँ तैरती हैं।इसीलिये दिन ढलते ही बाबा कसकर पकड़ लेते हैं उघन्नी। सुतली से बंधी लोहे की पुरानी चाबियों के उस गुच्छे की छुअन से भूत पास नहीं आयेंगे, बाबा का विश्वास। अन्धेरा गहरा हो गया था। अब उघन्नी मुट्ठी में आ जाने से भूतों का भय जाता रहा। थोड़ी ही देर में बाबा के खर्राटे सुनाई पड़ने लगे। नीम तले बैठे रिश्तेदार बड़ी देर तक कौतुकपूर्वक बाबा को देखते रहे। अब वे मौसम और जमाने की बातें कर रहे हैं और यह कि किसने कितना दहेज लिया या दिया। कौन कितना कुलीन ब्राह्मण है या किसके खेत में गेहूं की उपज ज्यादा हुई। औरतों के रोने-झगड़ने की आवाजें फिर बाहर आने लगीं। इन आवाजों पर आम तौर पर ध्यान नहीं दिया जाता। घर-घर की बातें हैं ये। बच्चे सो गए हैं। हीरालाल जी के सातों बेटे और उन के बेटों के बेटे इधर-उधर सोये हैं अँधेरे में। कुछ रिश्तेदार भी सो गये हैं। जागने वाले रिश्तेदारों की खातिर-तवज्जो में हीरालाल जी लगे हैं।
गाँव से बाहर होने के कारण इस घर में रात का खाना देर से खाने का रिवाज है। रिश्तेदारों को भूख महसूस हो रही है। वे बात करने के लिए बातें कर रहे हैं। कुछ नहा-धोकर हनुमान चालीसा का पाठ कर रहे हैं। हनुमान चालीसा ख़त्म हो जाने पर भी जब भोजन का बुलावा नहीं आया, तो वे सुन्दरकाण्ड का पाठ करने लगे। कहीं थ्रेशर चल रहा है। भूसे के बारीक कण हवा के साथ आ रहे हैं। वनस्पति तेलों की गंध के भभके अब भी उठ रहे हैं। अचानक किसी औरत के कराहने की आवाज बाहर तक सुनाई पड़ने लगी। फिर सब शांत... । रिश्तेदार बातें कर रहे हैं। पूरा परिवार इधर-उधर सोया है नीम तले। संतोख छत पर है। रात में वह छत पर ही सोता है बन्दूक लेकर। आज वह बन्दूक लोड करता है बार-बार। फिर कारतूस निकाल लेता है... । बड़ी बिटिया के ससुर दुआर पर लेटे हैं। सबेरे विदा कराने पर अड़े हैं। बिटिया के भी गहने-गिरौं रखने पड़े हैं। ...कहाँ मुंह दिखाएँगे? उसे डर लगने लगा अपने आप से... ।
नीम तले रिश्तेदार बातें कर रहे हैं। वे ऊंघते हुए इस बड़े परिवार की मिलौझी  और साहुत  की तारीफ  कर रहे हैं। हीरालाल जी बार-बार शिवमंदिर की ओर हाथ उठा कर कहते हैं -
'सब इन्हीं की कृपा है। '
 या कभी दालान में लेटे बाबा की ओर इशारा करके कहते हैं - 'सब इन्हीं का पुन्य-प्रताप है।'
 बीच-बीच में थ्रेशर की आवाज बंद हो जाती है, तो रींवा बोलते हैं - रींऽ रींऽ रींऽ। कहीं दूर से बीन और ढोल की आवाजें आ रही हैं। सुन्दरकाण्ड का पाठ करने वाले रिश्तेदार थक गए हैं या शायद सुन्दरकाण्ड ही समाप्त हो गया है। अचानक कई औरतों के रोने की आवाजें बाहर आने लगीं। जो सोये थे, वे जाग गए। जो जाग रहे थे, वे चौंक गए। हीरालाल जी, उनके सातों बेटे और सभी नाती-पोते, जो जहां थे, वहीँ से आँगन की ओर दौड़े।
' का बात है ? काहे हाहो-बीपो मचा रखा है? आयँ ?'
'नचकऊ बहू नहीं रहीं! ...अरे मोर करेजाऽ!'
-पल भर के लिए एक महिला विलाप बंद करके घूंघट निकालते हुए बोली और फिर विलाप में शामिल हो गयी।
'कैसे ?'
- हीरालाल जी और उनके सभी बेटे एक साथ बोल पड़े।
'अब कैसे मुंह फोर के बताएं...? खून जारी था एक महीना से।' - हीरालाल जी की पत्नी ने उन्हें एक कोने में ले जाकर कहा।
'तो दवा-दारू काहे नहीं हुई ? डाक्टर को काहे नहीं दिखाया गया?'
'महीना भर से सब बियाह - काज में दौड़ रहे हैं। किसी को मरने भर की तो मोहलत नहीं। किससे कहें और का कहें ?' इतने भारी परिवार में किसी का दुख-दुरापद जानने में ही एक महीना लग जाता है।'
'देखो, अब जो होना था, हो गया। धीरज से काम लो सब लोग। बात अभी फैलने न पाए, नहीं तो नात-मेहमान खाना नहीं खायेंगे। मिट्टी पिछवाड़े रखवा दी जाय। भोर में किरिया-करम होगा। पहले मेहमानों को खाना खिलाओ।'
-हीरालाल जी ने फुसफुसाते हुए कहा। औरतें बैन करके रो रही थीं।
'हाय मोर बहुरियाऽ।'
'हाय मोर करेजा।'
'ए चोप्प अब कोई नहीं रोयेगा। खबरदार।'
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रिश्तेदारों ने खाना खा लिया है। अब वे सो रहे हैं नीम तले। बाबा दालान में सो रहे हैं। हवा के झोंके अब भी गर्म हैं। नीम पर कोई पक्षी बेचैन होता है बार-बार। लाश पिछवाड़े रख दी गयी है। कुछ औरतें लाश को घेरकर बैठी हैं। ...लाश को अकेले नहीं छोड़ना चाहिए! कुछ उपले सुलगा दिए गये हैं। ...लाश के पास आग जलनी चाहिए! एक  दिया जला दिया गया है। ...लाश के पास रोशनी होनी चाहिए! रह-रहकर औरतें सुबकने लगती हैं।
अचानक बाबा गिंगिंयाने लगे।
'गींऽऽगींऽऽ गींऽऽ।'
-बकार नहीं फूट रहा था। शब्द नहीं निकल पा रहे थे। सोये हुए लोग चौंक कर जाग गए। जो जाग रहे थे, चौंक कर बाबा के पास पहुँच गए। हीरालाल जी लाठी लिए पिछवाड़े खड़े थे। वे जितना दौड़ सकते थे, दौड़ कर बाबा के पास पहुंचे लाठी के सहारे। बाबा रो रहे थे शायद। सब चकित हुए। जो बाबा दादी के मरने पर भी नहीं रोये थे, आज इस तरह क्यों रो रहे हैं?हीरालाल जी को लगा कि नचकऊबहू वाली खबर किसी ने दे दी बाबू को...।
'गींऽऽ गींऽऽ गींऽऽ !'
- गिंगिंया रहे हैं बाबा।
'बाबूऽ बाबूऽ !'
- हीरालाल जी ने बाबा  के कान के पास मुंह ले जाकर कहा।
'दादूऽऽ दादूऽऽ दादूऽऽ !'
-अब फूटा बकार। निकलने लगे कफ से जूझते हुए शब्द। इस बीच किसी ने लालटेन का शीशा साफ कर दिया था। हाथ, होंठ और नथुने बुरी तरह काँप रहे थे। बहुत डरे हुए लग रहे थे बाबा।
'दादूऽऽ दादूऽऽ जल्दी करो। बत्तिस आना। बत्तिस आना ले आओ। हाकिमऽहाकिम आये हैं। जमपुरी के हाकिम आये हैं। टिकस काट रहे हैं टिकस। अरे जल्दी करो। बत्तिस आना। हाँ बत्तिस आना...।'
रिश्तेदार एक दूसरे का मुंह देखने लगे। हीरालाल जी ने जल्दी से बंडी से एक नोट निकाला, लालटेन के उजाले में देखा और बाबा के हाथों में थमा दिया।
'दोहाई परगना हाकिम की। दोहाई सरकार की। बड़ी कच्ची गिरस्ती। बड़ी कच्ची गिरस्ती सरकार।' आँखें मुंदी थीं। पैर छोड़कर पूरा शरीर काँप रहा था।
'पांच साल की मोहलत सरकार। बस पांच साल। बहुत गरीब असामी सरकार। बड़ी कच्ची गिरस्ती। हाँ सरकार बस पांच साल....।'
- बुरी तरह गिड़गिड़ा रहे थे बाबा। रिश्तेदार कभी बाबा का मुंह देखते, कभी आपस में एक-दूसरे का। सब चुप थे। बड़ी देर बाद सहज हो पाए बाबा। रिश्तेदार एक-एक कर चारपाइयों  की ओर चले गए। अकेले हीरालाल जी खड़े थे बाबा के पास, लाठी के सहारे। लालटेन की रोशनी में वे बाबा का चेहरा देखते रहे लगातार। अब सहज थे बाबा। चेहरे पर चिंता की कोई रेखा नहीं। दाहिने हाथ की मुट्ठी ढीली पड़ गयी थी। दो रुपये का नोट नीचे गिर गया था। बाबा के खर्राटे सुनाई पड़ रहे थे। हीरालाल जी लाठी के सहारे पिछवाड़े गये। दूर से ही उन्होंने खांसना शुरू कर दिया कि औरतें पर्दा कर लें। पिछवाड़े रखी लाश को घेर कर बैठी औरतें रोते-रोते सो गयी थीं। दीया बुझ गया था। अँधेरे में उपलों के अंगारे चमक रहे थे एक कोने में। बाकी सब धूसर-सा दिख रहा था। लाश, लाश को घेर कर सोयी हुई औरतें, पोखरा, पीपल का पेड़ , खेत, जंगल - सब धूसर अँधेरे में डूबे थे। यह क्या चमक रहा है ...? अरे ! किसी जानवर की आँखें हैं... । कई जानवरों की आँखें हैं। ये तो दूर तक फैले हैं। मरी मिट्टी की गंध इन्हें इतनी जल्दी मिल जाती है ... । अँधेरे में आँखें दिख रही हैं, शरीर नहीं...। आँखें आगे बढ़ रही हैं...। धीरे-धीरे एक साथ... । औरतें सोयी थीं। अँधेरे में चमकती आँखों की घेराबंदी नजदीक आती जा रही थी। हीरालाल जी को डर महसूस हुआ।
''हियाँ सब सो रही हैं और जंगली जानवर घेरे आ रहे हैं। उठो सब लोग! सोना हो तो भीतर जाओ ।' -हीरालाल जी ने डांट लगायी। वे कुकुरनिंदिया सो रही थीं। सब जाग गयीं। जागते ही लाश को देखा। उन्होंने नए सिरे से रोना शुरू कर दिया।
'हाय मोर बहुरियाऽ हो!'
'हाय मोर करेजा!'
एक औरत ने बुझे दीपक को फिर से जला दिया।
'हायऽ हमें कटारी मार गयी रेऽ..!'
'हायऽ हमें लैसंसी मार गयी रेऽ..!'
- बैन करने की होड़ मच गयी। हीरालाल जी औरतों से थोड़ी दूरी बनाकर खड़े थे। खड़े-खड़े सोच रहे थे। सबेरे हरे बांस कटवाने होंगे... । सुहागिन का कफन लाल साड़ी का होना चाहिए... । उन्हें अपनी माँ की याद आ गयी... । लाल साड़ी में लाश बंधी थी माई की... । हरे बांस की टिकठी... । वे छोटे थे। अँधेरे में आंसू बह चले उनकी आँखों से। थोड़ी ही देर में किरिया-करम के खर्च का अनुमान करने लगे और आंसू कहीं सूख गये।
गुमसुम पक्षी आकाश की ओर उड़े जा रहे हैं। साँयऽ साँयऽ...! हीरालाल जी ने आकाश की ओर देखा और संतोख को पुकारा। उनकी तेज आवाज पोखरे और मकान से होकर लौट आयी। संतोख भी आ गया। पिता-पुत्र बिना कुछ बोले बाबा के पास गए। संतोख एक बाल्टी पानी ले आया कुएं से। हीरालाल जी ने देखा,बाबा जाग रहे थे। दोनों ने पैताने का बिस्तर लपेटा। मूंज की चारपाई में बाध को काट कर एक  वृत्ताकार  जगह बना दी गयी थी बाबा की कमर से थोड़ा नीचे। दोनों ने पहले बाबा की, फिर चारपाई की वृताकार जगह की सफाई की। इस बीच न संतोख कुछ बोला, न हीरालाल जी। संतोख को थोड़ी राहत मिली। ...अब अब तेरह दिन बिदाई तो होगी नहीं। इस बीच वह बड़ी बिटिया के लिए कलाई-मुलम्मा वाले गहनों का इंतजाम कर सकेगा। दूसरी तरफ तेरही-बरखी का खर्च। हीरालाल जी सोच रहे हैं, अभी बाबा को नचकऊबहू वाली बात न बतायी जाय... । बाबा न सिर्फ मरने से डरते हैं, बल्कि मौत की खबरों से भी उतना ही डरते हैं और इस मृत्युलोक में कोई न कोई मरता ही रहता है... । दूसरों के मरने की खबर से जब इतना परेशान होते हैं, तो यह तो घर की ही औरत थी। जब नचकऊबहू की पारी होती खाना बनाने की, बाबा उड़द की दाल जरूर बनवाते। बाबा को सबसे ज्यादा प्रिय रसाज-बग्जा तो नचकऊबहू के सिवा कोई बना ही नहीं सकता था। जब तक बाबा का मुंह वगैरह धुला कर उन्हें फिर से लेटाया गया, उजास इतना फैल चुकी थी कि लालटेन की रोशनी बेवजह लगने लगी थी।पेट साफ़ होते ही रात का प्रसंग याद आया बाबा को। बाप रे बाप...! जमपुरी  के परगना हाकिम...! लाल-लाल आँखें...! बड़ी-बड़ी मूंछें ... ! एक क्षण के लिए फिर डर गए बाबा। थोड़ी ही देर में उन्हें पछतावा होने लगा। ...मति मारी गयी थी। बत्तिस आना और दे देते। दस साल की मोहलत मिल जाती... ।
झालाफाली होते-होते हरे बांस काट लिए गए थे। बाजार से लाल साड़ी, लाल चूड़ियाँ, सिन्दूर और सिंगार के दूसरे सामान आ गए थे। खुद नचकऊ गया था बाजार। फिर गया नचकऊ... । अब कहाँ...? थोड़ी ही देर में आ गया वह अंजुरी में फूल लेकर। कुछ फूल गमछे में भी थे। हर फूल महक रहा था। अभी दिन नहीं निकला था, लेकिन चीजें साफ -साफ दिखने लगी थीं। दुआर पर एक जगह गोबर से लीप दी गयी थी। हरे बांस की टिकठी वहीँ रख दी गयी । लाल साड़ी में लिपटी लाश। नचकउना पगला गया है। दौड़कर जाता है। अंजुरी में महकते फूल ले आता है और लाश पर डाल देता है। महीने भर से उसकी मेहरारू डाक्टर को दिखाने के लिए कह रही थी। उसने सोचा था कि ब्याह-काज निपट जाए और खेत-खलिहान का काम हो जाए, तो ले जाएगा डाक्टर के पास...। फिर रुपया तो चाहिए...। रुपया संतोख भैया के पास रहता है... । क्या कह के मांगता रूपया...? इसी हाय-बिस्स में समय निकल गया।
लोग मृतक-कर्म के जरूरी सामान सहेजने में लगे हैं। औरतों ने नचकऊ के मन की दशा को भांप लिया । अचानक औरतों की रुलाई का ऐसा आवेग उमड़ा कि आस-पास के पेड़ों पर चहचहाते पक्षी पल भर के लिए चुप हो गए। बाबा के कानों तक पहुँच गयी रुलाई। अब क्या करें...?हीरालाल जी चिंतित। अर्थी उठने के पहले जैकारे  के पहले ही हीरालाल जी ने बाबा को नचकऊबहू के मरने की खबर दे दी डरते-डरते। बाबा विचलित। कांपने लगा पूरा शरीर पैरों को छोड़कर। हीरालाल जी बहुत डर गये। कुछ हो न जाय बाबू को... ।
'जब ऐसी हारी-बीमारी थी , तो हमें काहे नहीं बताया? आँय? काहे नहीं बताया? '- बाबा की बात से हीरालाल जी चकित। क्या कर लेते बाबू...? मौत को टाल सकते थे क्या...?
'बेकार गया। बेकार गया बत्तिस आना। हाँ। अब हम जी कर का करेंगे? का करेंगे जी कर? नचकउना नचकउना नचकउना कि गिरस्ती बिगड़ गयी... । गिरस्ती हाँ... ।'- नए सिरे से पछता रहे हैं बाबा।
''उघन्नीऽ उघन्नीऽ दादूऽ उघन्नीऽ कहाँ है उघन्नीऽ ?'' - वे डरे हुए लग रहे थे। हीरालाल जी ने बाबा के सिरहाने रखा लोहे की चाबियों का गुच्छा उन्हें थमा दिया। बाबा ने कसकर पकड़ लिया गुच्छे को।
''अब दस दिन दस दिन सूदक रहेगा। हाँ हाँ दस दिन। भूत-प्रेत नाचेंगे भूत-प्रेत। दिन-दुपहरिया हाँ।'' बाबा ने फिर एक बार चाबियों के गुच्छे पर पकड़ मजबूत की।
''अब दिन में भी उघन्नीऽ मुट्ठी में पकड़ कर रखनी पड़ेगी। '' - मन में कहा बाबा ने।
''जाओ जाओ। सहूर से सहूर से हाँ सहूर से किरिया-करम करो। बहुत फैरबक्सी नहीं।''
टिकठी जा चुकी थी। कुछ फूल दालान में गिरे थे, कुछ दुआर पर। वनस्पति तेलों की गंध के भभके अब भी उठ रहे थे। मक्खियाँ उजाला होते ही भिनभिनाने लगी थीं। बाबा के पूरे शरीर पर बैठी थी मक्खियाँ। रामलली बाबा के सिरहाने खड़ी थी, लेकिन उसका ध्यान बाबा के मुंह पर बैठी मक्खियों की ओर नहीं था। पता नहीं क्या देख रही थीं उसकी सूजी हुई आँखें। बाबा की भी आँखें खुली थीं।
उघन्नी को मुट्ठी में जकड़े बाबा तेरही-बरखी के खर्च का अनुमान कर रहे थे। बच्चे अन्यमनस्क खड़े थे, जहां अभी टिकठी पड़ी थी। वे धरती पर बिखरे फूलों, अधजली अगरबत्तियों और आटे की गोलियों को सहमे-सहमे देख रहे थे।
ग ह ह
[ 'कथादेश', अगस्त - 2007 में प्रकाशित ]